भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2232

इति सेनापतेः श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ २३ ॥ अभ्यद्रवन्त संहृष्टा गाङ्गेयस्य रथं प्रति । सेनापतिकी यह वचन सुनकर पाण्डव महारथी अत्यन्त हर्षमें भरकर गंगानन्दन भीष्मके रथपर टूट पड़े ॥

आगच्छमानान् समरे वार्योघान् प्रलयानिव ॥ २४ ॥ अवारयन्त संहृष्टास्तावकाः पुरुषर्षभाः । युद्धमें प्रलयकालीन जलप्रवाहके समान आते हुए उन वीरोंको आपकी सेनाके श्रेष्ठ पुरुषोंने हर्ष और उत्साहमें भरकर रोका ॥ २४ १/२ ॥

दुःशासनो महाराज भयं त्यक्त्वा महारथः ॥ २५ ॥ भीष्मस्य जीविताकाङ्क्षी धनंजयमुपाद्रवत् । महाराज! महारथी दुःशासनने भय छोड़कर भीष्मकी जीवन-रक्षाके लिये धनंजयपर धावा किया ॥ २५ १/२ ॥

तथैव पाण्डवाः शूरा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ २६ ॥ अभ्यद्रवन्त संग्रामे तव पुत्रान् महारथाः । इसी प्रकार शूरवीर महारथी पाण्डवोंने युद्धमें गंगानन्दन भीष्मके रथकी ओर खड़े हुए आपके पुत्रोंपर आक्रमण किया ॥ २६ १/२ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम चित्ररूपं विशाम्पते ॥ २७ ॥ दुःशासनरथं प्राप्य यत् पार्थो नात्यवर्तत । प्रजानाथ! वहाँ हमने सबसे अद्भुत और विचित्र बात यह देखी कि अर्जुन दुःशासनके रथके पास पहुँचकर वहाँसे आगे न बढ़ सके ॥ २७ १/२ ॥

यथा वारयते वेला क्षुब्धतोयं महार्णवम् ॥ २८ ॥ तथैव पाण्डवं क्रुद्धं तव पुत्रो न्यवारयत् । जैसे तटकी भूमि विक्षुब्ध जलराशिवाले महासागरको रोके रहती है, उसी प्रकार आपके पुत्रने क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको रोक दिया था ॥ २८ १/२ ॥

उभौ तौ रथिनां श्रेष्ठावुभौ भारत दुर्जयौ ॥ २९ ॥ उभौ चन्द्रार्कसदृशौ कान्त्या दीप्त्या च भारत । तथा तौ जातसंरम्भावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३० ॥ (दुःशासनार्जुनौ वीरौ वृत्रेन्द्रसमतेजसौ ।) समीयतुर्महासंख्ये मयशक्रौ यथा पुरा ।