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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages
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इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वन्द्व-युद्धविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1716)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध

संजय उवाच

राजन् शतसहस्राणि तत्र तत्र पदातिनाम् ।
निर्मर्यादं प्रयुद्धानि तत् ते वक्ष्यामि भारत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**भरतवंशी नरेश! उस रणभूमिमें जहाँ-तहाँ लाखों सैनिकोंका मर्यादाशून्य युद्ध चल रहा था। वह सब आपको बता रहा हूँ, सुनिये ॥ १ ॥

न पुत्रः पितरं जज्ञे पिता वा पुत्रमौरसम् ।
न भ्राता भ्रातरं तत्र स्वस्रीयं न च मातुलः ॥ २ ॥
न पुत्र पिताको पहचानता था, न पिता अपने औरस पुत्रको। न भाई भाईको जानता था, न मामा अपने भानजेको ॥ २ ॥

न मातुलं च स्वस्त्रीयो न सखायं सखा तथा ।
आविष्टा इव युध्यन्ते पाण्डवाः कुरुभिः सह ॥ ३ ॥
न भानजेने मामाको पहचाना, न मित्रने मित्रको। उस समय पाण्डव-योद्धा कौरव-सैनिकोंके साथ इस प्रकार युद्ध करते थे, मानो उनमें किसी ग्रह आदिका आवेश हो गया हो ॥ ३ ॥

रथानीकं नरव्याघ्राः केचिदभ्यपतन् रथैः ।
अभज्यन्त युगैरेव युगानि भरतर्षभ ॥ ४ ॥
कुछ नरश्रेष्ठ वीर अपने रथोंद्वारा शत्रुपक्षकी रथ-सेनापर टूट पड़े। भरतश्रेष्ठ! कितने ही रथोंके जूए विपक्षी रथोंके जूओंसे ही टकराकर टूट गये ॥ ४ ॥

रथेषाश्च रथेषाभिः कूबरा रथकूबरैः ।
संगतैः सहिताः केचित् परस्परजिघांसवः ॥ ५ ॥
न शेकुश्चलितुं केचित् संनिपत्य रथा रथैः ।
रथोंके ईषादण्ड और कूबर भी सामने आये हुए रथोंके ईषादण्ड और कूबरोंसे भिड़कर टूक-टूक हो गये। एक दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखनेवाले कितने ही रथ दूसरे रथोंसे आमने-सामने भिड़कर एक पग भी इधर-उधर चल न सके ॥ ५ ½ ॥

प्रभिन्नास्तु महाकायाः संनिपत्य गजा गजैः ॥ ६ ॥
बहुधादारयन् क्रुद्धा विषाणैरितरेतरम् ।
गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले विशालकाय गजराज कुपित हो दूसरे हाथियोंसे टक्कर लेते हुए अपने दाँतोंके आघातसे एक-दूसरेको नाना प्रकारसे विदीर्ण करने लगे ॥ ६ ½ ॥

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सतोरणपताकैश्च वारणा वरवारणैः ॥ ७ ॥ अभिसृत्य महाराज वेगवद्भिर्महागजैः । दन्तैरभिहतास्तत्र चुक्रुशुः परमातुराः ॥ ८ ॥ महाराज! कितने ही हाथी तोरण और पताकाओंसहित वेगशाली महाकाय एवं श्रेष्ठ गजराजोंसे भिड़कर उनके दाँतोंके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हो आतुर भावसे चिग्घाड़ रहे थे ॥ ७-८ ॥

अभिनेताश्च शिक्षाभिस्तोत्रांकुशसमाहताः । अप्रभिन्नाः प्रभिन्नानां सम्मुखाभिमुखा ययुः ॥ ९ ॥ जिन्हें अनेक प्रकारकी शिक्षाएँ मिली थीं तथा जिनका मद अभी प्रकट नहीं हुआ था, वे हाथी तोत्र और अंकुशोंकी चोट खाकर सम्मुख खड़े हुए मदस्रावी गजराजोंके सामने जाकर युद्धके लिये डट गये ॥ ९ ॥

प्रभिन्नैरपि संसक्ताः केचित् तत्र महागजाः । क्रौञ्चवन्निनदं कृत्वा दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥ १० ॥ कुछ महान् गजराज मदस्रावी हाथियोंसे टक्कर लेकर क्रौंच पक्षीकी भाँति चीत्कार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये ॥ १० ॥

सम्यक् प्रणीता नागाश्च प्रभिन्नकरटामुखाः । ऋष्टितोमरनाराचैर्निर्विद्धा वरवारणाः ॥ ११ ॥ प्रणेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः । प्राद्रवन्त दिशः केचिन्नदन्तो भैरवान् रवान् ॥ १२ ॥ अच्छी तरह शिक्षा पाये हुए कितने ही हाथी तथा श्रेष्ठ गज, जिनके गण्डस्थलसे मद चू रहा था, ऋष्टि, तोमर और नाराचोंसे विद्ध होकर मर्म विदीर्ण हो जानेके कारण चिग्घाड़ते और प्राणशून्य हो धरतीपर गिर पड़ते थे। कितने ही भयानक चीत्कार करते हुए सब दिशाओंमें भाग जाते थे ॥ ११-१२ ॥

गजानां पादरक्षास्तु व्यूढोरस्काः प्रहारिणः । ऋष्टिभिश्च धनुर्भिश्च विमलैश्च परश्वधैः ॥ १३ ॥ गदाभिर्मुसलैश्चैव भिन्दिपालैः सतोमरैः । आयसैः परिघैश्चैव निस्त्रिंशैर्विमलैः शितैः ॥ १४ ॥ प्रगृहीतैः सुसंरब्धा द्रवमाणास्ततस्ततः । व्यदृश्यन्त महाराज परस्परजिघांसवः ॥ १५ ॥ महाराज! हाथियोंके पैरोंकी रक्षा करनेवाले योद्धा, जिनके वक्षःस्थल विस्तृत एवं विशाल थे, अत्यन्त क्रोधमें भरकर इधर-उधर दौड़ रहे थे और हाथोंमें लिये हुए ऋष्टि, धनुष, चमकीले फरसे, गदा, मूसल, भिन्दिपाल, तोमर, लोहेकी परिघ तथा तेज धारवाले

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उज्ज्वल खड्ग आदि आयुधोंद्वारा एक-दूसरेके वधके लिये उत्सुक दिखायी दे रहे थे ।। १३—१५ ।।

राजमानाश्च निस्त्रिंशाः संसिक्ता नरशोणितैः ।
प्रत्यदृश्यन्त शूराणामन्योन्यमभिधावताम् ।। १६ ।।
परस्पर धावा करनेवाले शूरवीरोंके चमकीले खड्ग मनुष्योंके रक्तसे रँगे हुए देखे जाते थे ।। १६ ।।

अवक्षिप्तावधूतानामसीनां वीरबाहुभिः ।
संजज्ञे तुमुलः शब्दः पततां परमर्मसु ।। १७ ।।
वीरोंकी भुजाओंसे घुमाकर चलाये हुए खड्ग जब दूसरोंके मर्मपर आघात करते थे, उस समय उनका भयंकर शब्द सुनायी पड़ता था ।। १७ ।।

गदामुसलरुग्णानां भिन्नानां च वरासिभिः ।
दन्तिदन्तावभिन्नानां मृदितानां च दन्तिभिः ।। १८ ।।
तत्र तत्र नरौघाणां क्रोशतामितरेतरम् ।
शुश्रुवुर्दारुणा वाचः प्रेतानामिव भारत ।। १९ ।।
उस युद्धस्थलमें गदा और मूसलके आघातसे कितने ही मनुष्योंके अंग-भंग हो गये थे, कितने ही अच्छी श्रेणीके तलवारोंसे छिन्न-भिन्न हो रहे थे, कितनोंके शरीर हाथियोंके दाँतोंसे दबकर विदीर्ण हो गये थे और कितनोंको हाथियोंने कुचल दिया था। इस प्रकार असंख्य मनुष्योंके समुदाय अधमरे-से होकर एक-दूसरेको पुकार रहे थे। भारत! उनके वे भयंकर आर्तनाद प्रेतोंके कोलाहलके समान श्रवणगोचर हो रहे थे ।। १८-१९ ।।

हयैरपि हयारोहाश्चामरापीडधारिभिः ।
हंसैरिव महावेगैरन्योन्यमभिविद्रुताः ।। २० ।।
चँवर और कलंगीसे सुशोभित हंस-तुल्य सफेद एवं महान् वेगशाली घोड़ोंपर बैठे हुए कितने ही घुड़सवार एक-दूसरेपर धावा कर रहे थे ।। २० ।।

तैर्विमुक्ता महाप्रासा जाम्बूनदविभूषणाः ।
आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ।। २१ ।।
उनके द्वारा चलाये हुए सुवर्णभूषित निर्मल और तेज धारवाले शीघ्रगामी महाप्रास (भाले) सर्पोंके समान गिर रहे थे ।। २१ ।।

अश्वैरग्रयजवैः केचिदाप्लुत्य महतो रथान् ।
शिरांस्याददिरे वीरा रथिनामश्वसादिनः ।। २२ ।।
कितने ही वीर घुड़सवार शीघ्रगामी अश्वोंद्वारा धावा करके बड़े-बड़े रथोंपर कूद पड़ते और रथियोंके मस्तक काट लेते थे ।। २२ ।।

बहूनपि हयारोहान् भल्लैः संनतपर्वभिः ।
रथी जघान सम्प्राप्य बाणगोचरमागतान् ।। २३ ।।

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इसी प्रकार एक-एक रथी झुकी हुई गाँठवाले भल्ल नामक बाणोंद्वारा निशानेपर आये हुए बहुत-से घुड़सवारोंका संहार कर डालता था ।। २३ ।।

नवमेघप्रतीकाशाश्चाक्षिप्य तुरगान् गजाः ।
पादैरेव विमृद्नन्ति मत्ताः कनकभूषणाः ।। २४ ।।

नूतन मेघोंके समान शोभा पानेवाले स्वर्णभूषित मतवाले हाथी बहुत-से घोड़ोंको सूँड़ोंसे झटककर पैरोंसे ही रौंद डालते थे ।। २४ ।।

पाट्यमानेषु कुम्भेषु पार्श्वेष्वपि च वारणाः ।
प्रासैर्विनिहताः केचिद् विनेदुः परमातुराः ।। २५ ।।

कितने ही हाथी प्रासोंकी चोट खाकर कुम्भस्थल और पार्श्वभागोंके विदीर्ण हो जानेपर अत्यन्त आतुर हो घोर चिग्घाड़ मचा रहे थे ।। २५ ।।

साश्वारोहान् हयान् कांचिदुन्मथ्य वरवारणाः ।
सहसा चिक्षिपुस्तत्र संकुले भैरवे सति ।। २६ ।।

बहुत-से बड़े-बड़े हाथी कितने ही घुड़सवारों-सहित घोड़ोंको पैरोंसे कुचलकर सहसा भयंकर युद्धमें फेंक देते थे ।। २६ ।।

साश्वारोहान् विषाणाग्रैरुत्क्षिप्य तुरगान् गजाः ।
रथौघानभिमृद्नन्तः सध्वजानभिचक्रमुः ।। २७ ।।

कितने ही हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे घुड़सवारों-सहित घोड़ोंको उछालकर ध्वजोंसहित रथसमूहोंको पैरोंतले रौंदते हुए रणभूमिमें विचर रहे थे ।। २७ ।।

पुंस्त्वादतिमदत्वाच्च केचित् तत्र महागजाः ।
साश्वारोहान् हयाञ्जघ्नुः करैः सचरणैस्तथा ।। २८ ।।

वहाँ कितने ही महान् गज अत्यन्त मदोन्मत्त तथा पुरुष होनेके कारण सूँड़ों और पैरोंसे घोड़ों और घुड़सवारोंका संहार कर डालते थे ।। २८ ।।

अश्वारोहैश्च समरे हस्तिसादिभिरेव च ।
प्रतिमानेषु गात्रेषु पार्श्वेष्वभि च वारणान् ।
आशुगा विमलास्तीक्ष्णाः सम्पेतुर्भुजगोपमाः ।। २९ ।।

युद्धमें घुड़सवारों और गजारोहियोंके चलाये हुए निर्मल, तीक्ष्ण तथा सर्पोंके समान भयंकर शीघ्रगामी बाण हाथियोंके ललाटों, अन्यान्य अंगों तथा पसलियोंपर चोट करते थे ।। २९ ।।

नराश्वकायान् निर्भिद्य लौहानि कवचानि च ।
निपेतुर्विमलाः शक्त्यो वीरबाहुभिरर्पिताः ।। ३० ।।
महोल्काप्रतिमा घोरास्तत्र तत्र विशाम्पते ।

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वीरोंकी भुजाओंसे चलायी हुई निर्मल शक्तियाँ, मनुष्यों और घोड़ोंकी काया तथा लोहमय कवचोंको भी विदीर्ण करके धरतीपर गिर जाती थीं। प्रजानाथ! वहाँ गिरते समय वे भयंकर शक्तियाँ बड़ी भारी उल्काओंके समान प्रतीत होती थीं ॥ ३० १/२ ॥

द्वीपिचर्मावनद्धैश्च व्याघ्रचर्मच्छदैरपि ॥ ३१ ॥
विकोशैर्विमलैः खड्गैरभिजग्मुः परान् रणे ।
जो चमकीली तलवारें पहले चितकबरे अथवा साधारण व्याघ्र-चर्मकी बनी हुई म्यानोंमें बंद रहती थीं, उन्हें उन म्यानोंसे निकालकर उनके द्वारा वीर पुरुष रणभूमिमें विपक्षियोंका वध कर रहे थे ॥ ३१ १/२ ॥

अभिप्लुतम्भिक्रुद्धमेकपाश्र्वविदारितम् ॥ ३२ ॥
विदर्शयन्तः सम्पेतुः खड्गचर्मपरश्वधैः ।
कितने ही योद्धा ढाल, तलवार तथा फरसोंसे निर्भय होकर शत्रुके सम्मुख जाने, क्रोधपूर्वक दाँतोंसे ओठ दबाकर आक्रमण करने तथा बायीं पसलीपर चोट करके उसे विदीर्ण करने आदिके पैंतरे दिखाते हुए शत्रुओंपर टूट पड़ते थे ॥ ३२ १/२ ॥

केचिदाक्षिप्य करिणः साश्वानपि रथान् करैः ॥ ३३ ॥
विकर्षन्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः सर्वशब्दगाः ।
प्रत्येक शब्दकी ओर गमन करनेवाले कितने ही हाथी घोड़ोंसहित रथोंकी अपनी सूँड़ोंसे खींचकर उन्हें लिये-दिये सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥

शङ्कुभिर्दारिताः केचित् सम्भिन्नाश्च परश्वधैः ॥ ३४ ॥
हस्तिभिर्मृदिताः केचित् क्षुण्णाश्चान्ये तुरंगमैः ।
रथनेमिनिकृत्ताश्च निकृत्ताश्च परश्वधैः ॥ ३५ ॥
कुछ मनुष्य बाणोंसे विदीर्ण होकर पड़े थे, कितने ही फरसोंसे छिन्न-भिन्न हो रहे थे, कितनोंको हाथियोंने मसल डाला था, कितने ही घोड़ोंकी तापसे कुचल गये थे, कितनोंके शरीर रथके पहियोंसे कट गये थे और कितने ही कूबरोंसे काट डाले गये थे ॥ ३४-३५ ॥

व्याक्रोशन्त नरा राजंस्तत्र तत्र स्म बान्धवान् ।
पुत्रानन्ये पितॄनन्ये भ्रातृंश्च सह बन्धुभिः ॥ ३६ ॥
मातुलान् भागिनेयांश्च परानपि च संयुगे ।
राजन्! रणभूमिमें जहाँ-तहाँ गिरे हुए अगणित मनुष्य अपने कुटुम्बीजनोंको पुकार रहे थे। कुछ बेटोंको, कुछ पिताको, कुछ भाई-बन्धुओंको, कुछ मामा-भाजोंको और कुछ लोग दूसरों-दूसरोंके नाम ले-लेकर विलाप कर रहे थे ॥ ३६ १/२ ॥

विकीर्णान्त्राः सुबहवो भग्नसक्थाश्च भारत ॥ ३७ ॥
बाहुभिश्चापरे छिन्नैः पार्श्वेषु च विदारिताः ।
क्रन्दन्तः समदृश्यन्त तृषिता जीवितेप्सवः ॥ ३८ ॥

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भारत! बहुतोंकी आँतें बाहर निकलकर बिखर गयी थीं, जाँघें टूट गयी थीं, कितनोंकी बाहें कट गयी थीं, बहुतोंकी पसलियाँ फट गयी थीं और कितने ही घायल अवस्थामें प्याससे पीड़ित हो जीवनके लोभसे रोते दिखायी देते थे ॥ ३७-३८ ॥

तृषा परिगताः केचिदल्पसत्त्वा विशाम्पते ।
भूमौ निपतिताः संख्ये मृगयांचक्रिरे जलम् ॥ ३९ ॥
राजन्! कुछ लोग धरतीपर अधमरे पड़े थे। उनमें जीवनकी शक्ति बहुत थोड़ी रह गयी थी और वे पिपासासे पीड़ित हो युद्धभूमिमें ही जलकी खोज कर रहे थे ॥ ३९ ॥

रुधिरौघपरिक्लिन्नाः क्लिश्यमानाश्च भारत ।
व्यनिन्दन् भृशमात्मानं तव पुत्रांश्च संगतान् ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! लहूलुहान होकर कष्ट पाते हुए वे समस्त घायल सैनिक अपनी और आपके पुत्रोंकी अत्यन्त निन्दा करते थे ॥ ४० ॥

अपरे क्षत्रियाः शूराः कृतवैराः परस्परम् ।
नैव शस्त्रं विमुञ्चन्ति नैव क्रन्दन्ति मारिष ॥ ४१ ॥
माननीय महाराज! दूसरे शूरवीर क्षत्रिय आपसमें वैर बाँधे हुए उस घायल अवस्थामें भी न हथियार छोड़ते थे और न क्रन्दन ही करते थे ॥ ४१ ॥

तर्जयन्ति च संहृष्टास्तत्र तत्र परस्परम् ।
आदश्य दशनैश्चापि क्रोधात् सरदनच्छदम् ॥ ४२ ॥
भ्रुकुटीकुटिलैर्वक्त्रैः प्रेक्षन्ति च परस्परम् ।
वे बार-बार उत्साहित होकर एक-दूसरेको डाँट बताते और क्रोधपूर्वक ओठोंको दाँतसे दबाकर भौंहें टेढ़ी करके परस्पर दृष्टिपात करते थे ॥ ४२ १/२ ॥

अपरे क्लिश्यमानास्तु शरार्ता व्रणपीडिताः ॥ ४३ ॥
निष्कूजाः समपद्यन्त दृढसत्त्वा महाबलाः ।
धैर्यको दृढ़तापूर्वक धारण किये रहनेवाले दूसरे महाबली वीर बाणोंके आघातसे पीड़ित हो क्लेश सहन करते हुए भी मौन ही रहते थे—अपनी वेदना प्रकाशित नहीं करते थे ॥ ४३ १/२ ॥

अन्ये च विरथाः शूरा रथमन्यस्य संयुगे ॥ ४४ ॥
प्रार्थयाना निपतिताः संक्षुण्णा वरवारणैः ।
अशोभन्त महाराज सपुष्पा इव किंशुकाः ॥ ४५ ॥
महाराज! कुछ वीर पुरुष अपना रथ भग्न हो जानेके कारण युद्धमें पृथ्वीपर गिरकर दूसरेका रथ माँग रहे थे, इतनेहीमें बड़े-बड़े हाथियोंके पैरोंसे वे कुचल गये। उस समय उनके रक्तरंजित शरीर फूले हुए पलाशके समान शोभा पा रहे थे ॥ ४४-४५ ॥

सम्बभूवुरनीकेषु बहवो भैरवस्वनाः ।
वर्तमाने महाभीमे तस्मिन् वीरवरक्षये ॥ ४६ ॥

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निजघान पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं रणे । स्वस्त्रीयो मातुलं चापि स्वस्त्रीयं चापि मातुलः ॥ ४७ ॥ सखा सखायं च तथा सम्बन्धी बान्धवं तथा । उन सेनाओंमें अनेकानेक भयंकर शब्द सुनायी पड़ते थे। बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस महाभयानक संग्राममें पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको, भानजेने मामाको, मामाने भानजेको, मित्रने मित्रको तथा सगे-सम्बन्धीने अपने सगे बान्धवजनोंको मार डाला ॥ ४६-४७ १/२ ॥

एवं युयुधिरे तत्र कुरवः पाण्डवैः सह ॥ ४८ ॥ वर्तमाने तथा तस्मिन् निर्मर्यादे भयानके । भीष्ममासाद्य पार्थानां वाहिनी समकम्पत ॥ ४९ ॥ इस प्रकार उस मर्यादाशून्य भयानक संग्राममें कौरवोंका पाण्डवोंके साथ घोर युद्ध हो रहा था। इतनेहीमें सेनापति भीष्मके पास पहुँचकर पाण्डवोंकी सारी सेना काँपने लगी ॥ ४८-४९ ॥

केतुना पञ्चतारेण तालेन भरतर्षभ । राजतेन महाबाहुरुच्छ्रितेन महारथे । बभौ भीष्मस्तदा राजंश्चन्द्रमा इव मेरुणा ॥ ५० ॥ भरतश्रेष्ठ! महाबाहु भीष्म अपने विशाल रथपर बैठकर चाँदीके बने हुए पाँच तारोंसे युक्त तालांकित ध्वजके द्वारा मेरुके शिखरपर स्थित हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें दोनों सेनाओंका घमासान युद्धविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1723)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

भीष्मके साथ अभिमन्युका भयंकर युद्ध, शल्यके द्वारा उत्तरकुमारका वध और श्वेतका पराक्रम

संजय उवाच

गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे ।
वर्तमाने तथा रौद्रे महावीरवरक्षये ॥ १ ॥
दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विविंशतिः ।
भीष्मं जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण चोदिताः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! उस अत्यन्त भयंकर दिनका पूर्वभाग जब प्रायः व्यतीत हो गया, तब बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस भयानक संग्राममें आपके पुत्रकी आज्ञासे दुर्मुख, कृतवर्मा, कृपाचार्य, शल्य और विविंशति वहाँ आकर भीष्मकी रक्षा करने लगे ॥ १-२ ॥

एतैरतिरथैर्गुप्तः पञ्चभिर्भरतर्षभः ।
पाण्डवानामनीकानि विजगाहे महारथः ॥ ३ ॥
इन पाँच अतिरथी वीरोंसे सुरक्षित हो भरत-भूषण महारथी भीष्मजीने पाण्डवोंकी सेनाओंमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥

चेदिकाशिकरूषेषु पञ्चालेषु च भारत ।
भीष्मस्य बहुधा तालश्चलत्केतुरदृश्यत ॥ ४ ॥
भारत! चेदि, काशि, करूष तथा पांचालोंमें विचरते हुए भीष्मका तालचिह्नित चंचल पताकाओंवाला रथ अनेक-सा दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥

स शिरांसि रणेऽरीणां रथांश्च सयुगध्वजान् ।
निचकर्त महावेगैर्भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ ५ ॥
वे युद्धमें झुकी हुई गाँठवाले अत्यन्त वेगशाली भल्लोंद्वारा शत्रुओंके मस्तक, रथ, जूआ तथा ध्वज काट-काटकर गिराने लगे ॥ ५ ॥

नृत्यतो रथमार्गेषु भीष्मस्य भरतर्षभ ।
भृशमार्तस्वरं चक्रुर्नागा मर्मणि ताडिताः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे रथके मार्गोंपर नृत्य-सा कर रहे थे। उनके बाणोंसे मर्मस्थानोंमें चोट खाये हुए हाथी अत्यन्त आर्तनाद करने लगे ॥ ६ ॥

अभिमन्युः सुसंक्रुद्धः पिशङ्गैस्तुरगोत्तमैः ।
संयुक्तं रथमास्थाय प्रायाद् भीष्मरथं प्रति ॥ ७ ॥

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जांबूनदविचित्रेण कर्णिकारेण केतुना ।
अभ्यवर्तत भीष्मं च तांश्चैव रथसत्तमान् ॥ ८ ॥
यह देख अभिमन्यु अत्यन्त कुपित हो पिंगलवर्णके श्रेष्ठ घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर भीष्मके रथकी ओर दौड़े आये। उनका वह रथ कर्णिकारके चिह्नसे युक्त स्वर्णनिर्मित विचित्र ध्वजसे सुशोभित था। उन्होंने भीष्मपर तथा उनकी रक्षाके लिये आये हुए उन श्रेष्ठ रथियोंपर भी आक्रमण किया ।। ७-८ ।।

स तालकेतोस्तीक्ष्णेन केतुमाहत्य पत्रिणा ।
भीष्मेण युयुधे वीरस्तस्य चानुरथैः सह ॥ ९ ॥
वीर अभिमन्युने तीखे बाणसे उस तालचिह्नित ध्वजको छेद डाला और भीष्म तथा उनके अनुगामी रथियोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ।। ९ ।।

कृतवर्माणमेकेन शल्यं पञ्चभिराशुगैः ।
विद्ध्वा नवभिरानर्च्छच्छिताग्रैः प्रपितामहम् ॥ १० ॥
उन्होंने एक बाणसे कृतवर्माको और पाँच शीघ्रगामी बाणोंसे शल्यको बेधकर तीखी धारवाले नौ बाणोंसे प्रपितामह भीष्मको भी चोट पहुँचायी ।। १० ।।

पूर्णायतविसृष्टेन सम्यक् प्रणिहितेन च ।
ध्वजमेकेन विव्याध जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् धनुषको अच्छी तरह खींचकर पूरे मनोयोगसे चलाये हुए एक बाणके द्वारा उनके सुवर्ण-भूषित ध्वजको भी छेद डाला ।। ११ ।।

दुर्मुखस्य तु भल्लेन सर्वावरणभेदिना ।
जहार सारथेः कायाच्छिरः संनतपर्वणा ॥ १२ ॥
इसके बाद झुकी हुई गाँठवाले तथा सब प्रकारके आवरणोंका भेदन करनेवाले एक भल्लके द्वारा दुर्मुखके सारथिका मस्तक धड़से अलग कर दिया ।। १२ ।।

धनुश्छिच्छेद भल्लेन कार्तस्वरविभूषितम् ।
कृपस्य निशिताग्रेण तांश्च तीक्ष्णमुखैः शरैः ॥ १३ ॥
जघान परमक्रुद्धो नृत्यन्निव महारथः ।
साथ ही कृपाचार्यके स्वर्णभूषित धनुषको भी तेज धारवाले भालासे काट गिराया; फिर सब ओर घूमकर नृत्य-सा करते हुए महारथी अभिमन्युने अत्यन्त कुपित हो तीखी नोकवाले बाणोंसे भीष्मकी रक्षा करनेवाले उन महारथियोंको भी घायल कर दिया ।। १३ ½ ।।

तस्य लाघवमुद्वीक्ष्य तुतुषुर्देवता अपि ॥ १४ ॥
लब्धलक्षतया कार्ष्णेः सर्वे भीष्ममुखा रथाः ।
सत्त्ववन्तममन्यन्त साक्षादिव धनंजयम् ॥ १५ ॥

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अभिमन्युके हाथोंकी यह फुर्ती देखकर देवताओंको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। अर्जुनकुमारके इस लक्ष्य-वेधकी सफलतासे प्रभावित हो भीष्म आदि सभी रथियोंने उन्हें साक्षात् अर्जुनके समान शक्तिशाली समझा।। १४-१५।।

तस्य लाघवमार्गस्थमलातसदृशप्रभम् । दिशः पर्यपतच्चापं गाण्डीवमिव घोषवत् ।। १६ ।।

अभिमन्युका धनुष गाण्डीवके समान टंकारध्वनि प्रकट करनेवाला, हाथोंकी फुर्ती दिखानेका उपयुक्त स्थान और खींचे जानेपर अलातचक्रके समान मण्डलाकार प्रकाशित होनेवाला था। वह वहाँ सम्पूर्ण दिशाओंमें घूम रहा था ।। १६ ।।

तमासाद्य महावेगैर्भीष्मो नवभिराशुगैः । विव्याध समरे तूर्णमार्जुनं परवीरहा ।। १७ ।।

अर्जुनकुमार अभिमन्युको पाकर शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले भीष्मने समरभूमिमें नौ शीघ्रगामी महावेगवान् बाणोंद्वारा तुरंत ही उन्हें वेध दिया ।। १७ ।।

ध्वजं चास्य त्रिभिर्भल्लैश्चिच्छेद परमौजसः । सारथिं च त्रिभिर्बाणैराजघान यतव्रतः ।। १८ ।।

साथ ही उस महातेजस्वी वीरके ध्वजको भी तीन बाणोंसे काट गिराया; इतना ही नहीं, नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले भीष्मने तीन बाणोंसे अभिमन्युके सारथिको भी मार डाला ।। १८ ।।

तथैव कृतवर्मा च कृपः शल्यश्च मारिष । विद्ध्वा नाकम्पयत् कार्ष्णिं मैनाकमिव पर्वतम् ।। १९ ।।

आर्य! इसी प्रकार कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा शल्य उस मैनाक पर्वतकी भाँति स्थिर हुए अर्जुनकुमारको बाणविद्ध करके भी कम्पित न कर सके ।। १९ ।।

स तैः परिवृतः शूरो धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । ववर्ष शरवर्षाणि कार्ष्णिः पञ्चरथान् प्रति ।। २० ।।

दुर्योधनके उन महारथियोंसे घिर जानेपर भी शूरवीर अर्जुनकुमार उन पाँचों रथियोंपर बाण-वर्षा करता रहा ।। २० ।।

ततस्तेषां महास्त्राणि संवार्य शरवृष्टिभिः । ननाद बलवान् कार्ष्णिर्भीष्माय विसृजन् शरान् ।। २१ ।।

इस प्रकार अपने बाणोंकी वर्षासे उन सबके महान् अस्त्रोंका निवारण करके बलवान् अर्जुनकुमार अभिमन्युने भीष्मपर सायकोंका प्रहार करते हुए बड़े जोरका सिंहनाद किया ।। २१ ।।

तत्रास्य सुमहद् राजन् बाह्वोर्बलमदृश्यत । यतमानस्य समरे भीष्ममर्दयतः शरैः ।। २२ ।।

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राजन्! उस समय समरभूमिमें प्रयत्नपूर्वक अपने बाणोंद्वारा भीष्मको पीड़ा देते हुए अभिमन्युकी भुजाओंका महान् बल प्रत्यक्ष देखा गया ॥ २२ ॥ पराक्रान्तस्य तस्यैव भीष्मोऽपि प्राहिणोच्छरान् ।
स तांश्छिच्छेद समरे भीष्मचापच्युतान् शरान् ॥ २३ ॥
तब भीष्मने भी उस पराक्रमी वीरपर बाणोंका प्रहार किया; परंतु अभिमन्युने रणभूमिमें भीष्मके धनुषसे छूटे हुए समस्त बाणोंको काट डाला ॥ २३ ॥
ततो ध्वजममोधेषुर्भीष्मस्य नवभिः शरैः ।
चिच्छेद समरे वीरस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ २४ ॥
अभिमन्युके बाण अमोघ थे। उस वीरने समरांगणमें नौ बाणोंद्वारा भीष्मके ध्वजको काट गिराया। यह देख सब लोग उच्च स्वरसे कोलाहल कर उठे ॥ २४ ॥
स राजतो महास्कन्धस्तालो हेमविभूषितः ।
सौभद्रविशिखैश्छिन्नः पपात भुवि भारत ॥ २५ ॥
भरतनन्दन! वह रजतनिर्मित, स्वर्णभूषित अत्यन्त ऊँचा ताल-चिह्नसे युक्त भीष्मका ध्वज सुभद्राकुमारके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २५ ॥
तं तु सौभद्रविशिखैः पातितं भरतर्षभ ।
दृष्ट्वा भीमो ननादोच्चैः सौभद्रमभिहर्षयन् ॥ २६ ॥
भरतश्रेष्ठ! अभिमन्युके बाणोंसे कटकर गिरे हुए उस ध्वजको देखकर भीमसेनने सुभद्राकुमारका हर्ष बढ़ाते हुए उच्चस्वरसे गर्जना की ॥ २६ ॥
अथ भीष्मो महास्त्राणि दिव्यानि सुबहूनि च ।
प्रादुश्चक्रे महारौद्रे रणे तस्मिन् महाबलः ॥ २७ ॥
तब महाबली भीष्मने उस अत्यन्त भयंकर संग्राममें बहुत-से महान् दिव्यास्त्र प्रकट किये ॥ २७ ॥
ततः शरसहस्रेण सौभद्रं प्रपितामहः ।
अवाकिरदमेयात्मा तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २८ ॥
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न प्रपितामह भीष्मने सुभद्राकुमारपर हजारों बाणोंकी वर्षा की। वह एक अद्भुत-सी घटना प्रतीत हुई ॥ २८ ॥
ततो दश महेष्वासाः पाण्डवानां महारथाः ।
रक्षार्थमभ्यधावन्त सौभद्रं त्वरिता रथैः ॥ २९ ॥
विराटः सह पुत्रेण धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
भीमश्च केकयाश्चैव सात्यकिश्च विशाम्पते ॥ ३० ॥
राजन्! तब पुत्रसहित विराट, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, भीमसेन, पाँचों भाई केकयराजकुमार तथा सात्यकि—ये पाण्डव-पक्षके महान् धनुर्धर दस महारथी अभिमन्युकी रक्षाके लिये रथोंद्वारा तुरंत वहाँ दौड़े आये ॥ २९-३० ॥

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तेषां जवेनापततां भीष्मः शान्तनवो रणे । पाञ्चाल्यं त्रिभिरानर्च्छत् सात्यकिं नवभिः शरैः ॥ ३१ ॥ शान्तनुनन्दन भीष्मने रणभूमिमें वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाले उन दसों महारथियोंमेंसे धृष्टद्युम्नको तीन और सात्यकिको नौ बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३१ ॥

पूर्णायतविसृष्टेन क्षुरेण निशितेन च । ध्वजमेकेन चिच्छेद भीमसेनस्य पत्रिणा ॥ ३२ ॥ फिर धनुषको पूरी तरहसे खींचकर छोड़े हुए एक पंखयुक्त तीखे बाणसे भीमसेनकी ध्वजा काट डाली ॥ ३२ ॥

जाम्बूनदमयः श्रीमान् केसरी स नरोत्तम । पपात भीमसेनस्य भीष्मेण मथितो रथात् ॥ ३३ ॥ नरश्रेष्ठ! भीमसेनका वह सुवर्णमय सुन्दर ध्वज सिंहके चिह्नसे युक्त था। वह भीष्मके द्वारा काट दिये जानेपर रथसे नीचे गिर पड़ा ॥ ३३ ॥

ततो भीमस्त्रिभिर्विद्ध्वा भीष्मं शान्तनवं रणे । कृपमेकेन विव्याध कृतवर्माणमष्टभिः ॥ ३४ ॥ तब भीमसेनने उस रणक्षेत्रमें शान्तनुनन्दन भीष्मको तीन बाणोंसे घायल करके कृपाचार्यको एक और कृतवर्माको आठ बाणोंसे बेध दिया ॥ ३४ ॥

प्रगृहीताग्रहस्तेन वैराटिरपि दन्तिना । अभ्यद्रवत राजानं मद्राधिपतिमुत्तरः ॥ ३५ ॥ इसी समय जिसने अपनी सूँड़को मोड़कर मुखमें रख लिया था, उस दन्तार हाथीपर आरूढ़ हो विराट-कुमार उत्तरने मद्रदेशके स्वामी राजा शल्यपर धावा किया ॥ ३५ ॥

तस्य वारणराजस्य जवेनापततो रथे । शल्यो निवारयामास वेगमप्रतिमं शरैः ॥ ३६ ॥ वह गजराज बड़े वेगसे शल्यके रथकी ओर झपटा। उस समय शल्यने अपने बाणोंद्वारा उसके अप्रतिम वेगको रोक दिया ॥ ३६ ॥

तस्य क्रुद्धः स नागेन्द्रो बृहतः साधुवाहिनः । पदा युगमधिष्ठाय जघान चतुरो हयान् ॥ ३७ ॥ इससे वह गजेन्द्र शल्यपर अत्यन्त कुपित हो उठा और अपना एक पैर रथके जूएपर रखकर उसे अच्छी तरह वहन करनेवाले चारों विशाल घोड़ोंको मार डाला ॥ ३७ ॥

स हताश्वे रथे तिष्ठन् मद्राधिपतिरायसीम् । उत्तरान्तकरीं शक्तिं चिक्षेप भुजगोपमाम् ॥ ३८ ॥ घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर बैठे हुए मद्रराज शल्यने लोहेकी बनी हुई एक शक्ति चलायी, जो सर्पके समान भयंकर और राजकुमार उत्तरका अन्त करनेवाली थी ॥ ३८ ॥

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तया भिन्नतनुत्राणः प्रविश्य विपुलं तमः । स पपात गजस्कन्धात् प्रमुक्ताङ्कुशतोमरः ॥ ३९ ॥ उस शक्तिने उनके कवचको काट दिया। उसकी चोटसे उनपर अत्यन्त मोह छा गया। उनके हाथसे अंकुश और तोमर छूटकर गिर गये और वे भी अचेत होकर हाथीकी पीठसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३९ ॥

असिमादाय शल्योऽपि अवप्लुत्य रथोत्तमात् । तस्य वारणराजस्य चिच्छेदाथ महाकरम् ॥ ४० ॥ इसी समय शल्य हाथमें तलवार लेकर अपने श्रेष्ठ रथसे कूद पड़े और उसीके द्वारा उस गजराजकी विशाल सूँड़को उन्होंने काट गिराया ॥ ४० ॥

भिन्नमर्मा शरशतैश्छिन्नहस्तः स वारणः । भीममार्तस्वरं कृत्वा पपात च ममार च ॥ ४१ ॥ सैकड़ों बाणोंसे उसके मर्म विद्ध हो गये थे और उसकी सूँड़ भी काट डाली गयी। इससे भयंकर आर्तनाद करके वह गजराज भूमिपर गिरा और मर गया ॥ ४१ ॥

एतदीदृशकं कृत्वा मद्रराजो नराधिप । आरुरोह रथं तूर्णं भास्वरं कृतवर्मणः ॥ ४२ ॥ नरेश्वर! यह पराक्रम करके मद्रराज शल्य तुरंत ही कृतवर्माके तेजस्वी रथपर चढ़ गये ॥ ४२ ॥

उत्तरं वै हतं दृष्ट्वा वैराटिर्भ्रातरं तदा । कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥ ४३ ॥ श्वेतः क्रोधात् प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव । अपने भाई उत्तरको मारा गया और शल्यको कृतवर्माके साथ रथपर बैठा हुआ देख विराटपुत्र श्वेत क्रोधसे जल उठे, मानो अग्निमें घीकी आहुति पड़ गयी हो ॥ ४३ १/२ ॥

स विस्फार्य महच्चापं शक्रचापोपमं बली ॥ ४४ ॥ अभ्यधावज्जिघांसन् वै शल्यं मद्राधिपं बली । उस बलवान् वीरने इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल शरासनको कानोंतक खींचकर मद्रराज शल्यको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया ॥ ४४ १/२ ॥

महता रथवंशेन समन्तात् परिवारितः ॥ ४५ ॥ मुञ्चन् बाणमयं वर्षं प्रायाच्छल्यरथं प्रति । वह विशाल रथ-सेनाके द्वारा सब ओरसे घिरकर बाणोंकी वर्षा करता हुआ शल्यके रथपर चढ़ आया ॥ ४५ १/२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥ ४६ ॥ तावकानां रथाः सप्त समन्तात् पर्यवारयन् । मद्रराजमभीप्सन्तो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतम् ॥ ४७ ॥

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मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले श्वेतको धावा करते देख आपके सात रथियोंने मौतके दाँतोंमें फँसे हुए मद्रराज शल्यको बचानेकी इच्छा रखकर उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४६-४७ ॥

बृहद्बलश्च कौसल्यो जयत्सेनश्च मागधः ।
तथा रुक्मरथो राजन् शल्यपुत्रः प्रतापवान् ॥ ४८ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः ।
बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ ४९ ॥

राजन्! उन रथियोंके नाम ये हैं—कोसलनरेश बृहद्बल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्तिके राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ ॥ ४८-४९ ॥

नानावर्णविचित्राणि धनूंषि च महात्मनाम् ।
विस्फारितानि दृश्यन्ते तोयदेष्विव विद्युततः ॥ ५० ॥

इन महामना वीरोंके फैलाये हुए अनेक रूपरंगके विचित्र धनुष बादलोंमें बिजलियोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ५० ॥

ते तु बाणमयं वर्षं श्वेतमूर्धन्यपातयन् ।
निदाघान्तेऽनिलोद्धूता मेघा इव नगे जलम् ॥ ५१ ॥

उन सबने श्वेतके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें वायुके द्वारा उठाये हुए मेघ पर्वतपर जल बरसा रहे हों ॥ ५१ ॥

ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः ।
धनूंषि तेषामाच्छिद्य ममर्द पृतनापतिः ॥ ५२ ॥

उस समय महान् धनुर्धर सेनापति श्वेतने कुपित होकर तेज किये हुए भल्ल नामक सात बाणोंद्वारा उन सातों रथियोंके धनुष काटकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ५२ ॥

निकृत्तान्येव तानि स्म समदृश्यन्त भारत ।
ततस्ते तु निमेषार्धात् प्रत्यपद्यन् धनूंषि च ॥ ५३ ॥
सप्त चैव पृषत्कांश्च श्वेतस्योपर्यपातयन् ।
ततः पुनरमेयात्मा भल्लैः सप्तभिराशुगैः ।
निचकर्त महाबाहुस्तेषां चापानि धन्विनाम् ॥ ५४ ॥

भारत! वे सातों धनुष कट जानेपर ही दृष्टिमें आये। तदनन्तर उन सबने आधे निमेषमें ही दूसरे धनुष ले लिये और श्वेतके ऊपर एक ही साथ सात बाण चलाये। तब अमेय आत्मबलसे युक्त महाबाहु श्वेतने पुनः शीघ्रगामी सात भल्ल मारकर उन धनुर्धरोंके धनुष काट दिये ॥ ५३-५४ ॥

ते निकृत्तमहाचापास्त्वरमाणा महारथाः ।
रथशक्तीः परामृश्य विनेदुर्भैरवान् रवान् ॥ ५५ ॥

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अपने विशाल धनुषोंके कट जानेपर उन सातों महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ रथ-शक्तियाँ उठा लीं और भयंकर गर्जना की॥ ५५॥ अन्वयुर्भरतश्रेष्ठ सप्त श्वेतरथं प्रति । ततस्ता ज्वलिताः सप्त महेन्द्राशनिनिःस्वनाः॥ ५६॥ भरतश्रेष्ठ! वे सातों शक्तियाँ प्रज्वलित हो देवराज इन्द्रके वज्रकी भाँति भयंकर शब्द करती हुई श्वेतके रथकी ओर एक साथ चलीं॥ ५६॥ अप्राप्ताः सप्तभिर्भल्लैश्चिच्छेद परमास्त्रवित् । ततः समादाय शरं सर्वकायविदारणम् ॥ ५७॥ प्राहिणोद् भरतश्रेष्ठ श्वेतो रुक्मरथं प्रति । परंतु श्वेत उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने सात भल्ल मारकर अपने निकट आनेसे पहले ही उन शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् श्वेतने सबकी कायाको विदीर्ण कर देनेवाले एक बाणको लेकर उसे रुक्मरथकी ओर चलाया॥ ५७ १/२॥ तस्य देहे निपतितो बाणो वज्रातिगो महान् ॥ ५८ ॥ ततो रुक्मरथो राजन् सायकेन दृढाहतः। निषसाद रथोपस्थे कश्मलं चाविशन्महत् ॥ ५९ ॥ वज्रसे भी अधिक प्रभावशाली वह महान् बाण रुक्मरथके शरीरपर जा गिरा। राजन्! उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर रुक्मरथ अपने रथके पिछले भागमें बैठ गया और अत्यन्त मूर्च्छित हो गया॥ ५८-५९॥ तं विसंज्ञं विमनसं त्वरमाणस्तु सारथिः । अपोवाह न सम्भ्रान्तः सर्वलोकस्य पश्यतः॥ ६०॥ उसे अचेत और अनमना देख सारथि तनिक भी घबराहटमें न पड़कर अत्यन्त उतावलीके साथ सबके देखते-देखते रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ ६०॥ ततोऽन्यान् षट् समादाय श्वेतो हेमविभूषितान् । तेषां षण्णां महाबाहुर्ध्वजशीर्षाण्यपातयत् ॥ ६१ ॥ तब महाबाहु श्वेतने दूसरे स्वर्णभूषित छः बाण लेकर उन छहों रथियोंके ध्वजके अग्रभाग काट गिराये ॥ ६१॥ हयांश्च तेषां निर्भिद्य सारथींश्च परंतप । शरैश्चैतान् समाकीर्य प्रायाच्छल्यरथं प्रति ॥ ६२ ॥ परंतप! फिर उनके घोड़ों और सारथियोंको विदीर्ण करके उनके शरीरोंमें भी बहुत-से बाण जड़ दिये। इसके बाद श्वेतने शल्यके रथपर धावा किया॥ ६२॥ ततो हलहलाशब्दस्तव सैन्येषु भारत । दृष्ट्वा सेनापतिं तूर्णं यान्तं शल्यरथं प्रति ॥ ६३ ॥

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भारत! तब सेनापति श्वेतको शीघ्रतापूर्वक शल्यके रथकी ओर जाते देख आपकी सेनाओंमें हाहाकार मच गया ।। ६३ ।। ततो भीष्मं पुरस्कृत्य तव पुत्रो महाबलः । वृतस्तु सर्वसैन्येन प्रायाच्छ्वैतरथं प्रति ।। ६४ ।। मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मद्रराजममोचयत् । तब आपके महाबली पुत्र दुर्योधनने भीष्मजीको आगे करके सम्पूर्ण सेनाके साथ श्वेतके रथपर चढ़ाई की और मृत्युके मुखमें पहुँचे हुए मद्रराज शल्यको छुड़ा लिया ।। ६४ १/२ ।।

ततो युद्धं समभवत् तुमुलं लोमहर्षणम् ।। ६५ ।। तावकानां परेषां च व्यतिषक्तरथद्विपम् । तदनन्तर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर रोमांचकारी युद्ध होने लगा। रथसे रथ और हाथीसे हाथी गुँथ गये ।। ६५ १/२ ।।

सौभद्रे भीमसेने च सात्यकौ च महारथे ।। ६६ ।। कैकेये च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते । एतेषु नरसिंहेषु चेदिमत्स्येषु चैव ह । ववर्ष शरवर्षाणि कुरुवृद्धः पितामहः ।। ६७ ।। पाण्डवपक्षकी ओरसे सुभद्रकुमार अभिमन्यु, भीमसेन, महारथी सात्यकि, केकयराजकुमार, राजा विराट तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये पुरुषसिंह और चेदि एवं मत्स्यदेशके क्षत्रिय युद्ध कर रहे थे। कुरुकुलके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मने इन सबपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ६६-६७ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि श्वेतयुद्धे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें श्वेतयुद्धविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1732)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

श्वेतका महाभयंकर पराक्रम और भीष्मके द्वारा उसका वध

धृतराष्ट्र उवाच

एवं श्वेते महेष्वासे प्राप्ते शल्यरथं प्रति ।
कुरवः पाण्डवेयाश्च किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
भीष्मः शान्तनवः किं वा तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! इस प्रकार महान् धनुर्धर श्वेतके शल्यके रथके समीप पहुँचनेपर कौरवों तथा पाण्डवोंने क्या किया? अथवा शान्तनुनन्दन भीष्मने कौन-सा पुरुषार्थ किया? मेरे पूछनेके अनुसार ये सब बातें मुझसे कहो ॥ १ ½ ॥

संजय उवाच

राजन् शतसहस्राणि ततः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ २ ॥
श्वेतं सेनापतिं शूरं पुरस्कृत्य महारथाः ।
राज्ञो बलं दर्शयन्तस्तव पुत्रस्य भारत ॥ ३ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य त्रातुमैच्छन्महारथाः ।
अभ्यवर्तन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥ ४ ॥
जिघांसन्तं युधां श्रेष्ठं तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ।
संजय कहते हैं— राजन्! पाण्डवपक्षके लाखों क्षत्रियशिरोमणि महारथी विराट सेनापति शूरवीर श्वेतको आगे करके आपके पुत्र दुर्योधनको अपना बल दिखाते हुए शिखण्डीको सामने रखकर भीष्मके सुवर्णभूषित रथपर चढ़ आये। भारत! वे महारथी श्वेतकी रक्षा करना चाहते थे। इसलिये उसे मारनेकी इच्छावाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्मपर उन्होंने धावा किया। उस समय बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ २—४ ½ ॥

तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि महावैशसमद्भुतम् ॥ ५ ॥
तावकानां परेषां च यथा युद्धमवर्तत ।
आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें जो महान् संहारकारी युद्ध जिस प्रकार हुआ, उसका उसी रूपमें आपसे वर्णन करता हूँ ॥ ५ ½ ॥

तत्राकरोद् रथोपस्थान् शून्यान् शान्तनवो बहून् ॥ ६ ॥
तत्राद्भुतं महच्चक्रे शरैराच्छर्द रथोत्तमान् ।
समावृणोच्छरैरर्कमर्कतुल्यप्रतापवान् ॥ ७ ॥
उस युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मने बहुत-से रथोंकी बैठकोंको रथियोंसे शून्य कर दिया। वहाँ उन्होंने अत्यन्त अद्भुत कार्य किया। अपने बाणोंद्वारा बहुत-से श्रेष्ठ रथियोंको बहुत

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पीड़ा दी। वे सूर्यके समान तेजस्वी थे। उन्होंने अपने सायकोंद्वारा सूर्यदेवको भी आच्छादित कर दिया।। ६-७।।

नुदन् समन्तात् समरे रविरुद्यन् यथा तमः। तेनाजौ प्रेषिता राजन् शराः शतसहस्रशः।। ८ ।। क्षत्रियान्तकराः संख्ये महावेगा महाबलाः। शिरांसि पातयामासुर्वीराणां शतशो रणे ।। ९ ।। जैसे सूर्य उदित होकर अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार वे सब ओर समरभूमिमें शत्रु-सेनाओंका संहार कर रहे थे। राजन्! उनके द्वारा चलाये हुए महान् वेग और बलसे सम्पन्न तथा क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले लाखों बाणोंने रणभूमिमें सैकड़ों श्रेष्ठ वीरोंके मस्तक काट गिराये।। ८-९ ।।

गजान् कण्टकसन्नाहान् वज्रेणेव शिलोच्चयान्। रथा रधेषु संसक्ता व्यदृश्यन्त विशाम्पते ।। १० ।। उन बाणोंने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति काँटेदार कवचोंसे सुसज्जित हाथियोंको भी धराशायी कर दिया। प्रजानाथ! उस समय रथ रथोंसे सटे हुए दिखायी देते थे।। १० ।।

एके रथं पर्यवहंस्तुरगाः सतुरङ्गमम्। युवानं निहतं वीरं लम्बमानं सकार्मुकम् ।। ११ ।। कितने ही घोड़े अपनेसहित रथको लिये हुए दूर भागे जा रहे थे और उसपर मरा हुआ नवयुवक वीर रथी धनुषके साथ ही लटक रहा था।। ११ ।।

उदीर्णाश्च हया राजन् वहन्तस्तत्र तत्र ह। बद्धखड्गनिषङ्गाश्च विध्वस्तशिरसो हताः ।। १२ ।। शतशः पतिता भूमौ वीरशय्यासु शेरते। राजन्! वे प्रचण्ड घोड़े उस रथको लिये-दिये यत्र-तत्र घूम रहे थे। कमरमें तलवार और पीठपर तरकस बाँधे हुए सैकड़ों आहत वीर मस्तक कट जानेके कारण पृथ्वीपर गिरकर वीरोचित शय्याओंपर शयन कर रहे थे।। १२ १/२ ।।

परस्परेण धावन्तः पतिताः पुनरुत्थिताः ।। १३ ।। उत्थाय च प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवाप्नुवन्। पीडिताः पुनरन्योन्यं लुठन्तो रणमूर्धनि ।। १४ ।। एक-दूसरेपर धावा करनेवाले कितने ही सैनिक गिर पड़ते और फिर उठकर खड़े हो जाते थे। खड़े होकर वे दौड़ते और परस्पर द्वन्द्वयुद्ध करने लगते थे। फिर आपसके प्रहारोंसे पीड़ित हो वे युद्धके मुहानेपर ही गिरकर लुढ़क जाते थे।। १३-१४ ।।

सचापाः सनिषङ्गाश्च जातरूपपरिष्कृताः। विस्रब्धहतवीराश्च शतशः परिपीडिताः ।। १५ ।। तेन तेनाभ्यधावन्त विसृजन्तश्च भारत।

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भारत! सैकड़ों वीर धनुष और तरकस लिये सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित हो कितने ही विपक्षी वीरोंका विश्वस्त भावसे विनाश करके स्वयं भी शत्रुओंके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे और स्वयं भी अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए विभिन्न मार्गोंसे इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे ॥ १५ १/२ ॥

मत्तो गजः पर्यवर्तद्धयांश्च हतसादिनः ॥ १६ ॥ सरथा रथिनश्चापि विमृद्नन्तः समन्ततः । मतवाले हाथी उन घोड़ोंके पीछे पड़े थे, जिनके सवार मारे गये थे। इसी प्रकार रथोंसहित रथी चारों ओर भूतलपर पड़ी हुई लाशोंको रौंदते हुए विचरण करते थे ॥ १६ १/२ ॥

स्यन्दनादपतत् कश्चिन्निहतोऽन्येन सायकैः ॥ १७ ॥ हतसारथिरप्युच्चैः पपात काष्ठवद् रथः । कितने ही वीर दूसरोंके बाणोंसे मारे जाकर रथसे गिर पड़ते थे। कहीं सारथिके मारे जानेपर रथ साधारण काष्ठकी भाँति ऊँचेसे नीचे गिर पड़ता था ॥ १७ १/२ ॥

युध्यमानस्य संग्रामे व्यूढे रजसि चोत्थिते ॥ १८ ॥ धनुः कूजितविज्ञानं तत्रासीत् प्रतियुद्ध्यतः । गात्रस्पर्शेन योधानां व्यज्ञास्त परिपन्थिनम् ॥ १९ ॥ उस संग्राममें इतनी धूल उड़ी कि कुछ सूझ नहीं पड़ता था। केवल धनुषकी टंकारसे ही यह जाना जाता था कि प्रतिद्वन्द्वी युद्ध कर रहा है। कितने ही योद्धा दूसरे योद्धाओंके शरीरका स्पर्श करके ही यह समझ पाते थे कि यह शत्रुदलका है ॥ १८-१९ ॥

युद्ध्यमानं शरै राजन् सिञ्जिनीध्वजिनीरवात् । अन्योन्यं वीरसंशब्दो नाश्रूयत भटैः कृतः ॥ २० ॥ राजन्! कुछ लोग धनुषकी टंकार और सेनाका कोलाहल सुनकर ही यह समझ पाते थे कि कोई बाणोंद्वारा युद्ध कर रहा है। योद्धा एक-दूसरेके प्रति जो वीरोचित गर्जना करते थे, वह भी उस समय अच्छी तरह सुनायी नहीं देती थी ॥ २० ॥

शब्दायमाने संग्रामे पटहे कर्णदारिणि । युद्ध्यमानस्य संग्रामे कुर्वतः पौरुषं स्वकम् ॥ २१ ॥ नाश्रौषं नामगोत्राणि कीर्तनं च परस्परम् । कानोंका परदा फाड़नेवाले डंकेकी आवाजसे सारी रणभूमि गूँज उठी थी। अतः वहाँ अपने पुरुषार्थको प्रकट करनेवाले किसी योद्धाकी बात मुझे नहीं सुनायी देती थी। वे लोग जो आपसमें नाम-गोत्र आदिका परिचय देते थे, उसे भी मैं नहीं सुन पाता था ॥ २१ १/२ ॥

भीष्मचापच्युतैर्बाणैरार्तानां युध्यतां मृधे ॥ २२ ॥ परस्परेषां वीराणां मनांसि समकम्पयन् ।