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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,343 pages
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तब दुर्योधनने कुपित हो समस्त राजाओं तथा सेनाके साथ उस युद्धभूमिमें पाण्डव-सेनापर आक्रमण किया ॥ ४५ १/२ ॥
दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विशाम्पतेः ॥ ४६ ॥
भीष्मं जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण नोदिताः ।
दुर्मुख, कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा राजा शल्य आपके पुत्रकी आज्ञासे आकर भीष्मकी रक्षा करने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
दृष्ट्वा तु पार्थिवैः सर्वैर्दुर्योधनपुरोगमैः ॥ ४७ ॥
पाण्डवानामनीकानि वध्यमानानि संयुगे ।
श्वेतो गाङ्गेयमुत्सृज्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ ४८ ॥
नाशयामास वेगेन वायुर्वृक्षानिवौजसा ।
दुर्योधन आदि सब राजाओंके द्वारा पाण्डवसेनाको युद्धमें मारी जाती देख श्वेतने गङ्गापुत्र भीष्मको छोड़कर आपके पुत्रकी सेनाका उसी प्रकार वेगपूर्वक विनाश आरम्भ किया, जैसे आँधी अपनी शक्तिसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ॥ ४७-४८ १/२ ॥
द्रावयित्वा चमूं राजन् वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ४९ ॥
आपतत् सहसा भूयो यत्र भीष्मो व्यवस्थितः ।
राजन्! विराटपुत्र श्वेत उस समय क्रोधसे मूर्च्छित हो रहे थे। वे आपकी सेनाको दूर भगाकर फिर सहसा वहीं आ पहुँचे, जहाँ भीष्म खड़े थे ॥ ४९ १/२ ॥
तौ तत्रोपगतौ राजन् शरदीप्तौ महाबलौ ॥ ५० ॥
अयुध्येतां महात्मानौ यथोभौ वृत्रवासवौ ।
अन्योन्यं तु महाराज परस्परवधैषिणौ ॥ ५१ ॥
महाराज! वे दोनों महाबली महामना वीर बाणोंसे उद्दीप्त हो एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे समीप आकर वृत्रासुर और इन्द्रके समान युद्ध करने लगे ॥ ५०-५१ ॥
निगृह्य कार्मुकं श्वेतो भीष्मं विव्याध सप्तभिः ।
पराक्रमं ततस्तस्य पराक्रम्य पराक्रमी ॥ ५२ ॥
तरसा वारयामास मत्तो मत्तमिव द्विपम् ।
श्वेतने धनुष खींचकर सात बाणोंद्वारा भीष्मको बेध डाला। तब पराक्रमी भीष्मने श्वेतके उस पराक्रमको स्वयं पराक्रम करके वेगपूर्वक रोक दिया; मानो किसी मतवाले हाथीने दूसरे मतवाले हाथीको रोक दिया हो ॥ ५२ १/२ ॥
श्वेतः शान्तनवं भूयः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ५३ ॥
विव्याध पञ्चविंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् ।
तदनन्तर श्वेतने पुनः झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे शान्तनुनन्दन भीष्मको बींध डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ ५३ १/२ ॥
तं प्रत्यविध्यद् दशभिर्भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ५४ ॥

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स विद्धस्तेन बलवान् नाकम्पत यथाचलः ।
तब शान्तनुनन्दन भीष्मने भी दस बाण मारकर बदला चुकाया। उनके द्वारा घायल किये जानेपर भी बलवान् श्वेत विचलित नहीं हुआ। वह पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा रहा ॥ ५४ १/२ ॥
वैराटिः समरे क्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् ॥ ५५ ॥
आजघान ततो भीष्मं श्वेतः क्षत्रियनन्दनः ।
तदनन्तर क्षत्रियकुलको आनन्दित करनेवाले विराटकुमार श्वेतने युद्धमें कुपित हो धनुषको जोर-जोरसे खींचकर भीष्मपर पुनः बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ ५५ १/२ ॥
सम्प्रहस्य ततः श्वेतः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ ५६ ॥
धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य नवभिर्दशधा शरैः ।
इसके बाद उन्होंने हँसकर अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए नौ बाण मारकर भीष्मके धनुषके दस टुकड़े कर दिये ॥ ५६ १/२ ॥
संधाय विशिखं चैव शरं लोमप्रवाहिनम् ॥ ५७ ॥
उन्ममाथ ततस्तालं ध्वजशीर्षं महात्मनः ।
फिर शिखाशून्य पंखयुक्त बाणका संधान करके उसके द्वारा महात्मा भीष्मके तालचिह्नयुक्त ध्वजका ऊपरी भाग काट डाला ॥ ५७ १/२ ॥
केतुं निपतितं दृष्ट्वा भीष्मस्य तनयास्तव ॥ ५८ ॥
हतं भीष्मममन्यन्त श्वेतस्य वशमागतम् ।
भीष्मके ध्वजको नीचे गिरा देख आपके पुत्रोंने उन्हें श्वेतके वशमें पड़कर मरा हुआ ही माना ॥ ५८ १/२ ॥
पाण्डवाश्चापि संहृष्टा दध्मुः शङ्खान् मुदा युताः ॥ ५९ ॥
भीष्मस्य पतितं केतुं दृष्ट्वा तालं महात्मनः ।
महात्मा भीष्मके तालध्वजको पृथ्वीपर पड़ा देख पाण्डव हर्षसे उल्लसित हो प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाने लगे ॥ ५९ १/२ ॥
ततो दुर्योधनः क्रोधात् स्वमनीकमनोदयत् ॥ ६० ॥
यत्ता भीष्मं परीप्सध्वं रक्षमाणाः समन्ततः ।
मा नः प्रपश्यमानानां श्वेतान्मृत्युमवाप्स्यति ॥ ६१ ॥
भीष्मः शान्तनवः शूरस्तथा सत्यं ब्रवीमि वः ।
तब दुर्योधनने क्रोधपूर्वक अपनी सेनाको आदेश दिया—'वीरो! सावधान होकर सब ओरसे भीष्मकी रक्षा करते हुए उन्हें घेरकर खड़े हो जाओ। कहीं ऐसा न हो कि ये हमारे देखते-देखते श्वेतके हाथों मारे जायँ। मैं तुमलोगोंको सत्य कहता हूँ कि शान्तनुनन्दन भीष्म महान् शूरवीर हैं' ॥ ६०-६१ १/२ ॥
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः ॥ ६२ ॥

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बलेन चतुरङ्गेण गाङ्गेयमन्वपालयन् । राजा दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब महारथी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये और चतुरङ्गिणी सेनाद्वारा गंगानन्दन भीष्मकी रक्षा करने लगे ।। ६२ १/२ ।।

बाह्लीकः कृतवर्मा च शलः शल्यश्च भारत ।। ६३ ।। जलसंधो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः । त्वरमाणास्त्वराकाले परिवार्य समन्ततः ।। ६४ ।। शस्त्रवृष्टिं सुतुमुलां श्वेतस्योपर्यपातयन् । भारत! बाह्लीक, कृतवर्मा, शल, शल्य, जलसंध, विकर्ण, चित्रसेन और विविंशति—इन सबने शीघ्रताके अवसरपर शीघ्रता करते हुए चारों ओरसे भीष्मजीको घेर लिया और श्वेतके ऊपर भयंकर शस्त्र-वर्षा करने लगे ।। ६३-६४ १/२ ।।

तान् क्रुद्धो निशितैर्बाणैस्त्वरमाणो महारथः ।। ६५ ।। अवारयदमेयात्मा दर्शयन् पाणिलाघवम् । तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न महारथी श्वेतने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए बड़ी उतावलीके साथ क्रोधपूर्वक पैने बाणोंद्वारा उन सबको रोक दिया ।। ६५ १/२ ।।

स निवार्य तु तान् सर्वान् केसरी कुञ्जरानिव ।। ६६ ।। महता शरवर्षेण भीष्मस्य धनुरच्छिनत् । जैसे सिंह हाथियोंके समूहको आगे बढ़नेसे रोक देता है, उसी प्रकार उन सभी महारथियोंको रोककर भारी बाणवर्षाके द्वारा श्वेतने भीष्मका धनुष काट दिया ।। ६६ १/२ ।।

ततोऽन्यद् धनुरादाय भीष्मः शान्तनवो युधि ।। ६७ ।। श्वेतं विव्याध राजेन्द्र कङ्कपत्रैः शितैः शरैः । राजेन्द्र! तब शान्तनुनन्दन भीष्मने दूसरा धनुष लेकर युद्धस्थलमें कंकपत्रयुक्त पैने बाणोंद्वारा श्वेतको घायल कर दिया ।। ६७ १/२ ।।

ततः सेनापतिः क्रुद्धो भीष्मं बहुभिरायसैः ।। ६८ ।। विव्याध समरे राजन् सर्वलोकस्य पश्यतः । राजन्! तब सेनापति श्वेतने कुपित हो उस समरभूमिमें बहुत-से लौहमय बाणोंद्वारा सब लोगोंके देखते-देखते भीष्मको क्षत-विक्षत कर दिया ।। ६८ १/२ ।।

ततः प्रव्यथितो राजा भीष्मं दृष्ट्वा निवारितम् ।। ६९ ।। प्रवीरं सर्वलोकस्य श्वेतेन युधि वै तदा । निष्ठानकश्च सुमहांस्तव सैन्यस्य चाभवत् ।। ७० ।। श्वेतने सम्पूर्ण विश्वके विख्यात वीर भीष्मको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया, यह देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ी व्यथा हुई। साथ ही आपकी सेनामें सब लोगोंपर महान् भय छा गया ।। ६९-७० ।।

तं वीरं वारितं दृष्ट्वा श्वेतेन शरविक्षतम् ।

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हतं श्वेतेन मन्यन्ते श्वेतस्य वशमागतम् ॥ ७१ ॥ श्वेतने वीरवर भीष्मको कुण्ठित कर दिया और उनका शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गया है, यह देखकर सब लोग यह मानने लगे कि भीष्मजी श्वेतके वशमें पड़ गये हैं और अब उन्हींके हाथसे मारे जायँगे ॥ ७१ ॥

ततः क्रोधवशं प्राप्तः पिता देवव्रतस्तव । ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा तां च सेनां निवारिताम् ॥ ७२ ॥ तब आपके पिता देवव्रत भीष्म अपने ध्वजको टूटकर गिरा हुआ और सेनाको निवारित की हुई देखकर क्रोधके अधीन हो गये ॥ ७२ ॥

श्वेतं प्रति महाराज व्यसृजत् सायकान् बहून् । तानावार्य रणे श्वेतो भीष्मस्य रथिनां वरः ॥ ७३ ॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन पुनरेव पितुस्तव । महाराज! उन्होंने श्वेतपर बहुत-से बाणोंकी वर्षा की, परंतु रथियोंमें श्रेष्ठ श्वेतने रणक्षेत्रमें उन सब सायकोंका निवारण करके पुनः एक भल्लके द्वारा आपके पिता भीष्मका धनुष काट दिया ॥ ७३ १/२ ॥

उत्सृज्य कार्मुकं राजन् गाङ्गेयः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ७४ ॥ अन्यत् कार्मुकमादाय विपुलं बलवत्तरम् । तत्र संधाय विपुलान् भल्लान् सप्त शिलाशितान् ॥ ७५ ॥ चतुर्भिश्च जघानाश्वाञ्श्वेतस्य पृतनापतेः । ध्वजं द्वाभ्यां तु चिच्छेद सप्तमेन च सारथेः ॥ ७६ ॥ शिरश्चिच्छेद भल्लेन संक्रुद्धो लघुविक्रमः । राजन्! यह देख गंगानन्दन भीष्मने क्रोधसे मूर्च्छित हो उस धनुषको फेंककर दूसरा अत्यन्त प्रबल एवं विशाल धनुष ले लिया और उसके ऊपर पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए सात विशाल भल्लोंका संधान किया। उनमेंसे चार भल्लोंके द्वारा उन्होंने सेनापति श्वेतके चार घोड़ोंको मार डाला, दोसे उनका ध्वज काट दिया और अपनी फुर्तीका परिचय देते हुए सातवें भल्लके द्वारा क्रोधपूर्वक उनके सारथिका सिर उड़ा दिया ॥ ७४-७६ १/२ ॥

हताश्वसूतात् स रथादवप्लुत्य महाबलः ॥ ७७ ॥ अमर्षवशमापन्नो व्याकुलः समपद्यत । घोड़े और सारथिके मारे जानेपर महाबली श्वेत उस रथसे कूद पड़े और अमर्षके वशीभूत होकर व्याकुल हो उठे ॥ ७७ १/२ ॥

विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पितामहः ॥ ७८ ॥ ताडयामास निशितैः शरसंघैः समन्ततः । रथियोंमें श्रेष्ठ श्वेतको रथहीन हुआ देख पितामह भीष्मने चारों ओरसे पैने बाणसमूहोंद्वारा उन्हें पीड़ा देनी प्रारम्भ की ॥ ७८ १/२ ॥

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स ताड्यमानः समरे भीष्मचापच्युतैः शरैः ॥ ७९ ॥ स्वरथे धनुरुत्सृज्य शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् । उस समरभूमिमें भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा पीड़ित होनेपर श्वेतने धनुषको रथपर ही छोड़कर सुवर्णमयी शक्ति हाथमें ले ली ॥ ७९ १/२ ॥

ततः शक्तिं रणे श्वेतो जग्राहोग्रां महाभयाम् ॥ ८० ॥ कालदण्डोपमां घोरां मृत्योर्जिह्वामिव श्वसन् । अब्रवीच्च तदा श्वेतो भीष्मं शान्तनवं रणे ॥ ८१ ॥ अत्यन्त उग्र, महाभयंकर, कालदण्डके समान घोर और मृत्युकी जिह्वा-सी प्रतीत होनेवाली उस शक्तिको श्वेतने हाथमें उठाया और लंबी साँस लेते हुए रणक्षेत्रमें शान्तनुपुत्र भीष्मसे इस प्रकार कहा— ॥ ८०-८१ ॥

तिष्ठेदानीं सुसंरब्धः पश्य मां पुरुषो भव । एवमुक्त्वा महेष्वासो भीष्मं युधि पराक्रमी ॥ ८२ ॥ ततः शक्तिममेयात्मा चिक्षेप भुजगोपमाम् । पाण्डवार्थे पराक्रान्तस्तवानर्थं चिकीर्षुकः ॥ ८३ ॥ ‘भीष्म! इस समय साहसपूर्वक खड़े रहो। मुझे देखो और पुरुष बनो’, ऐसा कहकर अमित आत्मबलसे सम्पन्न महाधनुर्धर और पराक्रमी वीर श्वेतने भीष्मपर वह सर्पके समान भयंकर शक्ति चलायी। श्वेत पाण्डवोंका हित और आपके पक्षका अहित करनेकी इच्छासे पराक्रम दिखा रहे थे ॥ ८२-८३ ॥

हाहाकारो महानासीत् पुत्राणां ते विशाम्पते । दृष्ट्वा शक्तिं महाघोरां मृत्योर्दण्डसमप्रभाम् ॥ ८४ ॥ श्वेतस्य करनिर्मुक्तां निर्मुक्तोरगसंनिभाम् । राजन्! श्वेतके हाथसे छूटकर यमदण्डके समान प्रकाशित होनेवाली और केंचुल छोड़कर निकली हुई सर्पिणीकी भाँति अत्यन्त भय उत्पन्न करनेवाली उस शक्तिको देखकर आपके पुत्रोंके दलमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ८४ १/२ ॥

अपतत् सहसा राजन् महोल्केव नभस्तलात् ॥ ८५ ॥ ज्वलन्तीमन्तरिक्षे तां ज्वालाभिरिव संवृताम् । असम्भ्रान्तस्तदा राजन् पिता देवव्रतस्तव ॥ ८६ ॥ अष्टभिर्नवभिर्भीष्मः शक्तिं चिच्छेद पत्रिभिः । राजन्! वह शक्ति आकाशसे बहुत बड़ी उल्काके समान सहसा गिरी। अन्तरिक्षमें ज्वालाओंसे घिरी हुई-सी उस प्रज्वलित शक्तिको देखकर आपके पिता देवव्रतको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने आठ-नौ बाण मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥ ८५-८६ १/२ ॥

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उत्कृष्टहेमविकृतां निकृतां निशितैः शरैः ॥ ८७ ॥ उच्चुक्रुशुस्ततः सर्वे तावका भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उत्तम सुवर्णकी बनी हुई उस शक्तिको भीष्मके पैने बाणोंसे नष्ट हुई देख आपके पुत्र हर्षके मारे जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे ॥ ८७ १/२ ॥ शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ८८ ॥ कालोपहतचेतास्तु कर्तव्यं नाभ्यजानत । क्रोधसम्मूर्च्छितो राजन् वैराटिः प्रहसन्निव ॥ ८९ ॥ गदां जग्राह संहृष्टो भीष्मस्य निधनं प्रति । अपनी शक्तिको इस प्रकार विफल हुई देख विराटपुत्र श्वेत क्रोधसे मूर्च्छित हो गये। कालने उनकी विवेक-शक्तिको नष्ट कर दिया था; अतः उन्हें अपने कर्तव्यका भान न रहा। उन्होंने हर्षसे उत्साहित हो हँसते-हँसते भीष्मको मार डालनेके लिये हाथमें गदा उठा ली ॥ ८८-८९ १/२ ॥ क्रोधेन रक्तनयनो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ९० ॥ भीष्मं समभिदुद्राव जलौघ इव पर्वतम् ।

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उस समय उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वे हाथमें दण्ड लिये यमराजके समान जान पड़ते थे। जैसे महान् जलप्रवाह किसी पर्वतसे टकराता हो, उसी प्रकार वे गदा लिये भीष्मकी ओर दौड़े ॥ ९० १/२ ॥ तस्य वेगमसंवार्यं मत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥ ९१ ॥ प्रहारविप्रमोक्षार्थं सहसा धरणीं गतः । प्रतापी भीष्म उसके वेगको अनिवार्य समझकर उस प्रहारसे बचनेके लिये सहसा पृथ्वीपर कूद पड़े ॥ ९१ १/२ ॥ श्वेतः क्रोधसमाविष्टो भ्रामयित्वा तु तां गदाम् ॥ ९२ ॥ रथे भीष्मस्य चिक्षेप यथा देवो धनेश्वरः । उधर श्वेतने क्रोधसे व्याप्त हो उस गदाको आकाशमें घुमाकर भीष्मके रथपर फेंक दिया, मानो कुबेरने गदाका प्रहार किया हो ॥ ९२ १/२ ॥ तया भीष्मनिपातिन्या स रथो भस्मसात्कृतः ॥ ९३ ॥ सध्वजः सह सूतेन साश्वः सयुगबन्धुरः । भीष्मको मार डालनेके लिये चलायी हुई उस गदाके आघातसे ध्वज, सारथि, घोड़े, जूआ और धुरा आदिके साथ वह सारा रथ चूर-चूर हो गया ॥ ९३ १/२ ॥ विरथं रथिनां श्रेष्ठं भीष्मं दृष्ट्वा रथोत्तमाः ॥ ९४ ॥ अभ्यधावन्त सहिताः शल्यप्रभृतयो रथाः । रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मको रथहीन हुआ देख शल्य आदि उत्तम महारथी एक साथ दौड़े ॥ ९४ १/२ ॥ ततोऽन्यं रथमास्थाय धनुर्विस्फार्य दुर्मनाः ॥ ९५ ॥ शनकैरभ्ययाच्छ्वेतं गाङ्गेयः प्रहसन्निव । तब दूसरे रथपर बैठकर धनुषकी टंकार करते हुए गंगानन्दन भीष्म उदास मनसे हँसते हुए-से धीरे-धीरे श्वेतकी ओर चले ॥ ९५ १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे भीष्मः शुश्राव विपुलां गिरम् ॥ ९६ ॥ आकाशादीरितां दिव्यामात्मनो हितसम्भवाम् । भीष्म भीष्म महाबाहो शीघ्रं यत्नं कुरुष्व वै ॥ ९७ ॥ एष ह्यस्य जये कालो निर्दिष्टो विश्वयोनिना । इसी बीचमें भीष्मने अपने हितसे सम्बन्ध रखनेवाली एक दिव्य एवं गम्भीर आकाशवाणी सुनी—'महाबाहु भीष्म! शीघ्र प्रयत्न करो। इस श्वेतपर विजय पानेके लिये ब्रह्माजीने यही समय निश्चित किया है' ॥ ९६-९७ १/२ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदूतेन भाषितम् ॥ ९८ ॥ सम्प्रहृष्टमना भूत्वा वधे तस्य मनो दधे ।

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देवदूतका कहा हुआ यह वचन सुनकर भीष्मजीका मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने श्वेतके वधका विचार किया ।। ९८ १/२ ।। विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पदातिनम् ।। ९९ ।। सहितास्त्वभ्यवर्तन्त परीप्सन्तो महारथाः । रथियोंमें श्रेष्ठ श्वेतको रथहीन और पैदल देख उसकी रक्षा करनेके लिये एक साथ बहुत-से महारथी दौड़े आये ।। ९९ १/२ ।। सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। १०० ।। कैकेयो धृष्टकेतुश्च अभिमन्युश्च वीर्यवान् । उनके नाम इस प्रकार हैं—सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, केकयराजकुमार, धृष्टकेतु तथा पराक्रमी अभिमन्यु ।। १०० १/२ ।। एतानापततः सर्वान् द्रोणशल्यकृपैः सह ।। १०१ ।। अवारयदमेयात्मा वारिवेगानिवाचलः । इन सबको आते देख अमेय शक्तिसम्पन्न भीष्मजीने द्रोणाचार्य, शल्य तथा कृपाचार्यके साथ जाकर उनकी गति रोक दी, मानो किसी पर्वतने जलके प्रवाहको अवरुद्ध कर दिया हो ।। १०१ १/२ ।। स निरुद्धेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।। १०२ ।। श्वेतः खड्गमथाकृष्य भीष्मस्य धनुरच्छिनत् । समस्त महामना पाण्डवोंके अवरुद्ध हो जानेपर श्वेतने तलवार खींचकर भीष्मका धनुष काट दिया ।। १०२ १/२ ।। तदपास्य धनुश्छिन्नं त्वरमाणः पितामहः ।। १०३ ।। देवदूतवचः श्रुत्वा वधे तस्य मनो दधे । उस कटे हुए धनुषको फेंककर पितामह भीष्मने देवदूतके कथनपर ध्यान देकर तुरंत ही श्वेतके वधका निश्चय किया ।। १०३ १/२ ।। ततः प्रचरमाणस्तु पिता देवव्रतस्तव ।। १०४ ।। अन्यत् कार्मुकमादाय त्वरमाणो महारथः । क्षणेन सज्यमकरोच्छक्रचापसमप्रभम् ।। १०५ ।। तदनन्तर आपके पिता महारथी देवव्रतने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर वहाँ विचरण करते हुए ही क्षणभरमें उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। वह इन्द्रधनुषके समान प्रकाशित हो रहा था ।। १०४-१०५ ।। पिता ते भरतश्रेष्ठ श्वेतं दृष्ट्वा महारथैः । वृतं तं मनुजव्याघ्रैर्भीमसेनपुरोगमैः ।। १०६ ।। अभ्यवर्तत गाङ्गेयः श्वेतं सेनापतिं द्रुतम् ।

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भरतश्रेष्ठ! आपके पिता गंगानन्दन भीष्मने नरश्रेष्ठ भीमसेन आदि महारथियोंसे घिरे हुए सेनापति श्वेतको देखकर उनपर तुरंत धावा किया ।। १०६ १/२ ।। आपतन्तं ततो भीष्मो भीमसेनं प्रतापवान् ।। १०७ ।। आजघ्ने विशिखैः षष्ट्या सेनान्यं स महारथः । उस समय सेनानायक भीमसेनको सामने आते देख प्रतापी महारथी भीष्मने उन्हें साठ बाणोंसे घायल कर दिया ।। १०७ १/२ ।। अभिमन्युं च समरे पिता देवव्रतस्तव ।। १०८ ।। आजघ्ने भरतश्रेष्ठस्त्रिभिः संनतपर्वभिः । उस समरभूमिमें आपके पिता भरतश्रेष्ठ भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले तीन बाणोंसे अभिमन्युको चोट पहुँचायी ।। १०८ १/२ ।। सात्यकिं च शतेनाजौ भरतानां पितामहः ।। १०९ ।। धृष्टद्युम्नं च विंशत्या कैकेयं चापि पञ्चभिः । तांश्च सर्वान् महेष्वासान् पिता देवव्रतस्तव ।। ११० ।। वारयित्वा शरैर्घोरैः श्वेतमेवाभिदुद्रुवे । भरतवंशियोंके उन पितामहने युद्धस्थलमें सौ बाणोंसे सात्यकिको, बीस सायकोंद्वारा धृष्टद्युम्नको और पाँच बाणोंसे केकयराजकुमारको क्षत-विक्षत कर दिया। इस प्रकार आपके पिता भीष्मने अपने भयंकर बाणोंद्वारा उन सम्पूर्ण महाधनुर्धरोंको जहाँके तहाँ रोककर पुनः श्वेतपर ही आक्रमण किया ।। १०९-११० १/२ ।। ततः शरं मृत्युसमं भारसाधनमुत्तमम् ।। १११ ।। विकृष्य बलवान् भीष्मः समाधत्त दुरासदम् । ब्रह्मास्त्रेण सुसंयुक्तं तं शरं लोमवाहिनम् ।। ११२ ।। तदनन्तर महाबली भीष्मने धनुषको खींचकर उसके ऊपर एक मृत्युके समान भयंकर, भारी-से-भारी लक्ष्यको बेधनेमें समर्थ, उत्तम और दुःसह पंखयुक्त बाण रखा; फिर उसे ब्रह्मास्त्रद्वारा अभिमन्त्रित करके छोड़ दिया ।। १११-११२ ।। ददृशुर्देवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजसः ।। ११३ ।। जगाम धरणीं बाणो महाशनिरिव ज्वलन् । उस समय देवताओं, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों तथा राक्षसोंने भी देखा, वह बाण महान् वज्रके समान प्रज्वलित हो उठा और अमित बलशाली श्वेतके कवच तथा हृदयको भी छेदकर धरतीमें समा गया ।। ११३ १/२ ।। अस्तं गच्छन् यथाऽऽदित्यः प्रभामादाय सत्वरः ।। ११४ ।। एवं जीवितमादाय श्वेतदेहाज्जगाम ह ।

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जैसे डूबता हुआ सूर्य अपनी प्रभा साथ लेकर शीघ्र ही अस्त हो जाता है, उसी प्रकार वह बाण श्वेतके शरीरसे उसके प्राण लेकर चला गया ।। ११४ ½ ।।
तं भीष्मेण नरव्याघ्रं तथा विनिहतं युधि ।। ११५ ।।
प्रपतन्तमपश्याम गिरेः शृङ्गमिव च्युतम् ।
भीष्मके द्वारा मारे गये नरश्रेष्ठ श्वेतको युद्धस्थलमें हमने देखा। वह टूटकर गिरे हुए पर्वतके समान जान पड़ता था ।। ११५ ½ ।।
अशोचन् पाण्डवास्तत्र क्षत्रियाश्च महारथाः ।। ११६ ।।
प्रहृष्टाश्च सुतास्तुभ्यं कुरवश्चापि सर्वशः ।
महारथी पाण्डव तथा उस दलके दूसरे क्षत्रिय श्वेतके लिये शोकमें डूब गये। इधर आपके पुत्र समस्त कौरव हर्षसे उल्लसित हो उठे ।। ११६ ½ ।।
ततो दुःशासनो राजन् श्वेतं दृष्ट्वा निपातितम् ।। ११७ ।।
वादित्रनिनदैर्घोरैर्नृत्यति स्म समन्ततः ।
राजन्! श्वेतको मारा गया देख आपका पुत्र दुःशासन बाजे-गाजेकी भयंकर ध्वनिके साथ चारों ओर नाचने लगा ।। ११७ ½ ।।
तस्मिन् हते महेष्वासे भीष्मेणाहवशोभिना ।। ११८ ।।
प्रावेपन्त महेष्वासाः शिखण्डिप्रमुखा रथाः ।
संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले भीष्मजीके द्वारा महाधनुर्धर श्वेतके मारे जानेपर शिखण्डी आदि महाधनुर्धर रथी भयके मारे काँपने लगे ।। ११८ ½ ।।
ततो धनंजयो राजन् वार्ष्णेयश्चापि सर्वशः ।। ११९ ।।
अवहारं शनैश्चक्रुर्निहते वाहिनीपतौ ।
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ।। १२० ।।
राजन्! तब सेनापति श्वेतके मारे जानेके कारण अर्जुन और श्रीकृष्णने धीरे-धीरे अपनी सेनाको युद्धभूमिसे पीछे हटा लिया। भारत! फिर आपकी और पाण्डवोंकी सेना भी उस समय युद्धसे विरक्त हो गयी ।। ११९-१२० ।।
तावकानां परेषां च नर्दतां च मुहुर्मुहुः ।
पार्था विमनसो भूत्वा न्यवर्तन्त महारथाः ।
चिन्तयन्तो वधं घोरं द्वैरथेन परंतपाः ।। १२१ ।।
उस समय आपके और शत्रुपक्षके सैनिक भी बारंबार गर्जना कर रहे थे। उस द्वैरथ युद्धमें जो भयंकर संहार हुआ था, उसके लिये चिन्ता करते हुए शत्रुसंतापी पाण्डव महारथी उदास मनसे शिविरमें लौट आये ।। १२१ ।।

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि श्वेतवधे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।।
४८ ।।

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इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें श्वेतवधविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1749)

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति

धृतराष्ट्र उवाच
श्वेते सेनापतौ तात संग्रामे निहते परैः ।
किमकुर्वन् महेष्वासाः पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—तात! सेनापति श्वेतके शत्रुओंद्वारा युद्धस्थलमें मारे जानेपर महान् धनुर्धर पांचालों और पाण्डवोंने क्या किया? ॥ १ ॥
सेनापतिं समाकर्ण्य श्वेतं युधि निपातितम् ।
तदर्थं यततां चापि परेषां प्रपलायिनाम् ॥ २ ॥
मनः प्रीणाति मे वाक्यं जयं संजय शृण्वतः ।
प्रत्युपायं चिन्तयतो लज्जां प्राप्नोति मे न हि ॥ ३ ॥
स हि वीरोऽनुरक्तश्च वृद्धः कुरुपतिस्तदा ।
संजय! सेनापति श्वेत युद्धमें मारे गये। उनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेपर भी शत्रुओंको पलायन करना पड़ा तथा अपने पक्षकी विजय हुई—से सब बातें सुनकर मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। शत्रुओंके प्रतीकारका उपाय सोचते हुए मुझे अपने पक्षके द्वारा की गयी अनीतिका स्मरण करके भी लज्जा नहीं आती है। वे वृद्ध एवं वीर कुरुराज भीष्म हमपर सदा अनुराग रखते हैं (इस कारण ही उन्होंने श्वेतके साथ ऐसा व्यवहार किया होगा) ॥ २-३ १/२ ॥
कृतं वैरं सदा तेन पितुः पुत्रेण धीमता ॥ ४ ॥
तस्योद्वेगभयाच्चापि संश्रितः पाण्डवान् पुरा ।
उस बुद्धिमान् विराटपुत्र श्वेतने अपने पिताके साथ वैर बाँध रखा था, इस कारण पिताके द्वारा प्राप्त होनेवाले उद्वेग एवं भयसे श्वेतने पहले ही पाण्डवोंकी शरण ले ली थी ॥ ४ १/२ ॥
सर्वं बलं परित्यज्य दुर्गं संश्रित्य तिष्ठति ॥ ५ ॥
पाण्डवानां प्रतापेन दुर्गं देशं निवेश्य च ।
सपत्नान् सततं बाधन्नार्यवृत्तिमनुष्ठितः ॥ ६ ॥
पहले तो वह समस्त सेनाका परित्याग करके (अकेला ही) दुर्गमें छिपा रहता था। फिर पाण्डवोंके प्रतापसे दुर्गम प्रदेशमें रहकर निरन्तर शत्रुओंको बाधा पहुँचाते हुए सदाचारका पालन करने लगा ॥ ५-६ ॥

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आश्चर्यं वै सदा तेषां पुरा राज्ञां सुदुर्मतिः ।
ततो युधिष्ठिरे भक्तः कथं संजय सूदितः ॥ ७ ॥
क्योंकि पूर्वकालमें अपने साथ विरोध करनेवाले उन राजाओंके प्रति उसकी बुद्धिमें दुर्भाव था; पर संजय! आश्चर्य तो यह है कि ऐसा शूरवीर श्वेत, जो युधिष्ठिरका बड़ा भक्त था, मारा कैसे गया? ॥ ७ ॥

प्रक्षिप्तः सम्मतः क्षुद्रः पुत्रो मे पुरुषाधमः ।
न युद्धं रोचयेद् भीष्मो न चाचार्यः कथंचन ॥ ८ ॥
न कृपो न च गान्धारी नाहं संजय रोचये ।
मेरा पुत्र दुर्योधन क्षुद्र स्वभावका है। वह कर्ण आदिका प्रिय तथा चंचल बुद्धिवाला है। मेरी दृष्टिमें वह समस्त पुरुषोंमें अधम है (इसीलिये उसके मनमें युद्धके लिये आग्रह है)। संजय! मैं, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा गान्धारी—इनमेंसे कोई भी युद्ध नहीं चाहता था ॥ ८ १/२ ॥

न वासुदेवो वार्ष्णेयो धर्मराजश्च पाण्डवः ॥ ९ ॥
न भीमो नार्जुनश्चैव न यमौ पुरुषर्षभौ ।
वृष्णिवंशी भगवान् वासुदेव, पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा पुरुषरत्न नकुल-सहदेव भी युद्ध नहीं पसंद करते थे ॥ ९ १/२ ॥

वार्यमाणो मया नित्यं गान्धार्या विदुरेण च ॥ १० ॥
जामदग्न्येन रामेण व्यासेन च महात्मना ।
दुर्योधनो युध्यमानो नित्यमेव हि संजय ॥ ११ ॥
कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च पापकृत् ।
दुःशासनस्य च तथा पाण्डवान् नान्त्वचिन्तयत् ॥ १२ ॥
मैंने, गान्धारीने और विदुरने तो सदा ही उसे मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुरामने तथा महात्मा व्यासजीने भी उसे युद्धसे रोकनेका प्रयत्न किया है; तथापि कर्ण, शकुनि तथा दुःशासनके मतमें आकर पापी दुर्योधन सदा युद्धका ही निश्चय रखता आया है। उसने पाण्डवोंको कभी कुछ नहीं समझा ॥ १०—१२ ॥

तस्याहं व्यसनं घोरं मन्ये प्राप्तं तु संजय ।
श्वेतस्य च विनाशेन भीष्मस्य विजयेन च ॥ १३ ॥
संक्रुद्धः कृष्णसहितः पार्थः किमकरोद् युधि ।
संजय! मेरा तो विश्वास है कि दुर्योधनपर घोर संकट प्राप्त होनेवाला है। श्वेतके मारे जाने और भीष्मकी विजय होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीकृष्णसहित अर्जुनने युद्धस्थलमें क्या किया? ॥ १३ १/२ ॥

अर्जुनाद्धि भयं भूयस्तन्मे तात न शाम्यति ॥ १४ ॥
स हि शूरश्च कौन्तेयः क्षिप्रकारी धनंजयः ।

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मन्ये शरैः शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यति ॥ १५ ॥ तात! अर्जुनसे मुझे अधिक भय बना रहता है और वह भय कभी शान्त नहीं होता; क्योंकि कुन्ती-नन्दन अर्जुन शूरवीर तथा शीघ्रतापूर्वक अस्त्र संचालन करनेवाला है। मैं समझता हूँ कि वह अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके शरीरोंको मथ डालेगा ॥ १४-१५ ॥

ऐन्द्रिमिन्द्रानुजसमं महेन्द्रसदृशं बले । अमोघक्रोधसंकल्पं दृष्ट्वा वः किमभून्मनः ॥ १६ ॥ इन्द्रकुमार अर्जुन भगवान् विष्णुके समान पराक्रमी और महेन्द्रके समान बलवान् है। उसका क्रोध और संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता। उसे देखकर तुमलोगोंके मनमें क्या विचार उठा था? ॥ १६ ॥

तथैव वेदविच्छूरो ज्वलनार्कसमद्युतिः । इन्द्रास्त्रविदमेयात्मा प्रपतन् समितिंजयः ॥ १७ ॥ वज्रसंस्पर्शरूपाणामस्त्राणां च प्रयोजकः । स खड्गाक्षेपहस्तस्तु घोषं चक्रे महारथः ॥ १८ ॥ अर्जुन वेदज्ञ, शौर्यसम्पन्न, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, इन्द्रास्त्रका ज्ञाता, अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, वेगपूर्वक आक्रमण करनेवाला और बड़े-बड़े संग्रामोंमें विजय पानेवाला है। वह ऐसे-ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग करता है, जिनका हल्का-सा स्पर्श भी वज्रके समान कठोर है। महारथी अर्जुन अपने हाथमें सदा तलवार खींचे ही रहता है और उसका प्रहार करके विकट गर्जना करता है ॥ १७-१८ ॥

स संजय महाप्राज्ञो द्रुपदस्यात्मजो बली । धृष्टद्युम्नः किमकरोच्छ्वेते युधि निपातिते ॥ १९ ॥ संजय! द्रुपदके परम बुद्धिमान् पुत्र बलवान् धृष्टद्युम्नने श्वेतके युद्धमें मारे जानेपर क्या किया? ॥ १९ ॥

पुरा चैवापराधेन वधेन च चमूपतेः । मन्ये मनः प्रजज्वाल पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ २० ॥ पहले भी कौरवोंद्वारा पाण्डवोंका अपराध हुआ है; उससे तथा सेनापतिके वधसे महामना पाण्डवोंके हृदयमें आग-सी लग गयी होगी, यह मेरा विश्वास है ॥ २० ॥

तेषां क्रोधं चिन्तयंस्तु अहःसु च निशासु च । न शान्तिमधिगच्छामि दुर्योधनकृतेन हि । कथं चाभून्महायुद्धं सर्वमाचक्ष्व संजय ॥ २१ ॥ दुर्योधनके कारण पाण्डवोंके मनमें जो क्रोध है, उसका चिन्तन करके मुझे न तो दिनमें शान्ति मिलती है, न रात्रिमें ही। संजय! वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ, यह सब मुझे बताओ ॥ २१ ॥

संजय उवाच

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शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा तवापनयनो महान् । न च दुर्योधने दोषमिममाधातुमर्हसि ॥ २२ ॥ संजयने कहा— राजन्! स्थिर होकर सुनिये। इस युद्धके होनेमें सबसे बड़ा अन्याय आपका ही है। इसका सारा दोष आपको दुर्योधनके ही माथे नहीं मढ़ना चाहिये ॥ २२ ॥

गतोदके सेतुबन्धो यादृक् तादृङ्मतिस्तव । संदीप्ते भवने यद्वत् कूपस्य खननं तथा ॥ २३ ॥ जैसे पानीकी बाढ़ निकल जानेपर पुल बाँधनेका प्रयास किया जाय अथवा घरमें आग लग जानेपर उसे बुझानेके लिये कुआँ खोदनेकी चेष्टा की जाय, उसी प्रकार आपकी यह समझ है ॥ २३ ॥

गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे । तावकानां परेषां च पुनर्युद्धमवर्तत ॥ २४ ॥ उस भयंकर दिनके पूर्वभागका अधिकांश व्यतीत हो जानेपर आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २४ ॥

श्वेतं तु निहतं दृष्ट्वा विराटस्य चमूपतिम् । कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥ २५ ॥ शङ्खः क्रोधात् प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव । विराटके सेनापति श्वेतको मारा गया और राजा शल्यको कृतवर्माके साथ रथपर बैठा हुआ देख शंख क्रोधसे जल उठा, मानो अग्निमें घीकी आहुति पड़ गयी हो ॥ २५ १/२ ॥

स विस्फार्य महच्चापं शक्रचापोपमं बली ॥ २६ ॥ अभ्यधावज्जिघांसन् वै शल्यं मद्राधिपं युधि । उस बलवान् वीरने इन्द्रधनुषके समान अपने विशाल शरासनको कानोंतक खींचकर मद्रराज शल्यको युद्धमें मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया ॥ २६ १/२ ॥

महता रथसंघेन समन्तात् परिरक्षितः ॥ २७ ॥ सृजन् बाणमयं वर्षं प्रायाच्छल्यरथं प्रति । विशाल रथसेनाके द्वारा सब ओरसे घिरकर बाणोंकी वर्षा करते हुए उसने शल्यके रथपर आक्रमण किया ॥ २७ १/२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥ २८ ॥ तावकानां रथाः सप्त समन्तात् पर्यवारयन् । मद्रराजं परीप्सन्तो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतम् ॥ २९ ॥ मतवाले हाथीके समान पराक्रम प्रकट करनेवाले शंखको धावा करते देख आपके सात रथियोंने मौतके दाँतोंमें फँसे हुए मद्रराज शल्यको बचानेकी इच्छा रखकर उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ २८-२९ ॥

बृहद्बलश्च कौसल्यो जयत्सेनश्च मागधः ।

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तथा रुक्मरथो राजन् पुत्रः शल्यस्य मानितः ।। ३० ।। विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः । बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ।। ३१ ।। राजन्! उन रथियोंके नाम ये हैं—कोसलनरेश बृहद्बल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्ति-के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ ।। ३०-३१ ।। नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम् । विस्फारितान्यदृश्यन्त तोयदेष्विव विद्युतस् ।। ३२ ।। इन महामना वीरोंके फैलाये हुए अनेक रूप-रंगके विचित्र धनुष बादलोंमें बिजलियोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ।। ३२ ।। ते तु बाणमयं वर्षं शङ्खमूर्ध्नि न्यपातयन् । निदाघान्तेऽनिलोद्भूता मेघा इव नगे जलम् ।। ३३ ।। उन सबने शंखके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें वायुद्वारा उठाये हुए मेघ पर्वतपर जल बरसा रहे हों ।। ३३ ।। ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः । धनूंषि तेषामाच्छिद्य ननर्द पृतनापतिः ।। ३४ ।। उस समय महान् धनुर्धर सेनापति शंखने कुपित होकर तेज किये हुए भल्ल नामक सात बाणोंद्वारा उन सातों रथियोंके धनुष काटकर गर्जना की ।। ३४ ।। ततो भीष्मो महाबाहुर्विर्नद्य जलदो यथा । तालमात्रं धनुर्गृह्य शङ्खमभ्यद्रवद् रणे ।। ३५ ।। तदनन्तर महाबाहु भीष्मने मेघके समान गर्जना करके चार हाथ लंबा धनुष लेकर रणभूमिमें शंखपर धावा किया ।। ३५ ।। तमुद्यन्तमुदीक्ष्याथ महेष्वासं महाबलम् । संत्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौः ।। ३६ ।। उस समय महाधनुर्धर महाबली भीष्मको युद्धके लिये उद्यत देख पाण्डवसेना वायुके वेगसे डगमग होनेवाली नौकाकी भाँति काँपने लगी ।। ३६ ।। ततोऽर्जुनः संत्वरितः शङ्खस्यासीत् पुरःसरः । भीष्माद् रक्ष्योऽयमद्येति ततो युद्धमवर्तत ।। ३७ ।। यह देख अर्जुन तुरंत ही शंखके आगे आ गये। उनके आगे आनेका उद्देश्य यह था कि आज भीष्मके हाथसे शंखको बचाना चाहिये। फिर तो महान् युद्ध आरम्भ हुआ ।। ३७ ।। हाहाकारो महानासीद् योधानां युधि युध्यताम् । तेजस्तेजसि सम्पृक्तमित्येवं विस्मयं ययुः ।। ३८ ।।

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उस समय रणक्षेत्रमें जूझनेवाले योद्धाओंका महान् हाहाकार सब ओर फैल गया। तेजके साथ तेज टक्कर ले रहा है, यह कहते हुए सब लोग बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ ३८ ॥

अथ शल्यो गदापाणिरवतीर्य महारथात् ।
शङ्खस्य चतुरो वाहनाहनद् भरतर्षभ ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय राजा शल्यने हाथमें गदा लिये अपने विशाल रथसे उतरकर शंखके चारों घोड़ोंको मार डाला ॥ ३९ ॥

स हताश्वाद् रथात् तूर्णं खड्गमादाय विद्रुतः ।
बीभत्सोश्च रथं प्राप्य पुनः शान्तिमविन्दत ॥ ४० ॥
घोड़े मारे जानेपर शंख तुरंत ही तलवार लेकर रथसे कूद पड़ा और अर्जुनके रथपर चढ़कर उसने पुनः शान्तिकी साँस ली ॥ ४० ॥

ततो भीष्मरथात् तूर्णमुत्पतन्ति पतत्रिणः ।
यैरन्तरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृता ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् भीष्मके रथसे शीघ्रतापूर्वक पंखयुक्त बाण पक्षीके समान उड़ने लगे, जिन्होंने पृथ्वी और आकाश सबको आच्छादित कर लिया ॥ ४१ ॥

पञ्चालानाथ मत्स्यांश्च केकयांश्च प्रभद्रकान् ।
भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः पातयामास पत्रिभिः ॥ ४२ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म पांचाल, मत्स्य, केकय तथा प्रभद्रक वीरोंको अपने बाणोंसे मार-मारकर गिराने लगे ॥ ४२ ॥

उत्सृज्य समरे राजन् पाण्डवं सव्यसाचिनम् ।
अभ्यद्रवत पाञ्चाल्यं द्रुपदं सेनया वृतम् ॥ ४३ ॥
प्रियं सम्बन्धिनं राजन् शरानवकिरन् बहून् ।
राजन्! भीष्मने समरभूमिमें सव्यसाची अर्जुनको छोड़कर सेनासे घिरे हुए पांचालराज द्रुपदपर धावा किया और अपने प्रिय सम्बन्धीपर बहुत-से बाणोंकी वर्षा की ॥ ४३ १/२ ॥

अग्निनेव प्रदग्धानि वनानि शिशिरात्यये ॥ ४४ ॥
शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह ।
जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें आग लगनेसे सारे वन दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार द्रुपदकी सारी सेनाएँ भीष्मके बाणोंसे दग्ध दिखायी देने लगीं ॥ ४४ १/२ ॥

अत्यतिष्ठद् रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥ ४५ ॥
मध्यंदिने यथाऽऽदित्यं तपन्तमिव तेजसा ।
न शेकुः पाण्डवेयस्य योधा भीष्मं निरीक्षितुम् ॥ ४६ ॥
उस समय भीष्म रणभूमिमें धूमरहित अग्निके समान खड़े थे। जैसे दुपहरीमें अपने तेजसे तपते हुए सूर्यकी ओर देखना कठिन है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाके सैनिक भीष्मकी ओर दृष्टिपात करनेमें भी असमर्थ हो गये ॥ ४५-४६ ॥

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वीक्षांचक्रुः समन्तात् ते पाण्डवा भयपीडिताः ।
त्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः शीतार्दिता इव ॥ ४७ ॥
पाण्डव योद्धा भयसे पीड़ित हो सब ओर देखने लगे; परंतु सर्दीसे पीड़ित हुई गौओंकी भाँति उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं मिला ॥ ४७ ॥
सा तु यौधिष्ठिरी सेना गाङ्गेयशरपीडिता ।
सिंहेनेव विनिर्भिन्ना शुक्ला गौरिव गोपते ॥ ४८ ॥
राजन्! गंगानन्दन भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हुई वह युधिष्ठिरकी (श्वेत-परिधानविभूषित) सेना सिंहके द्वारा सतायी हुई सफेद गायके समान प्रतीत होने लगी ॥ ४८ ॥
हते विप्रद्रुते सैन्ये निरुत्साहे विमर्दिते ।
हाहाकारो महानासीत् पाण्डुसैन्येषु भारत ॥ ४९ ॥
भारत! पाण्डव-सेनाके सैनिक बहुत-से मारे गये, बहुतेरे भाग गये, कितने रौंद डाले गये और कितने ही उत्साहशून्य हो गये। इस प्रकार पाण्डवदलमें बड़ा हाहाकार मच गया था ॥ ४९ ॥
ततो भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः ।
मुमोच बाणान् दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव ॥ ५० ॥
उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म अपने धनुषको खींचकर गोल बना देते और उसके द्वारा विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर प्रज्वलित अग्रभागवाले बाणोंकी निरन्तर वर्षा करते थे ॥ ५० ॥
शरैरेकायनीकुर्वन् दिशः सर्वा यतव्रतः ।
जघान पाण्डवरथानादिश्यादिश्य भारत ॥ ५१ ॥
भारत! नियमपूर्वक व्रतोंका पालन करनेवाले भीष्म सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणोंसे एक रास्ता बना देते और पाण्डवरथियोंको चुन-चुनकर—उनके नाम ले-लेकर मारते थे ॥ ५१ ॥
ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वशः ।
प्राप्ते चास्तं दिनकरे न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५२ ॥
इस प्रकार सारी सेना मथित हो उठी, व्यूह भंग हो गया और सूर्य अस्ताचलको चले गये; उस समय अँधेरेमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५२ ॥
भीष्मं च समुदीर्यन्तं दृष्ट्वा पार्था महाहवे ।
अवहारमकुर्वन्त सैन्यानां भरतर्षभ ॥ ५३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इधर, उस महान् युद्धमें भीष्मका वेग अधिकाधिक प्रचण्ड होता जा रहा था, यह देख कुन्तीके पुत्रोंने अपनी सेनाओंको युद्धक्षेत्रसे पीछे हटा लिया ॥ ५३ ॥

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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि शङ्खयुद्धे प्रथमदिवसावहारे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें शंखका युद्ध तथा प्रथम दिनके युद्धका उपसंहारविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1757)

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पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण

संजय उवाच

कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रथमे भरतर्षभ ।
भीष्मे च युद्धसंरब्धे हृष्टे दुर्योधने तथा ॥ १ ॥
धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दनम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः सर्वैश्चैव जनेश्वरैः ॥ २ ॥
शुचा परमया युक्तश्चिन्तयानः पराजयम् ।
वार्ष्णेयमब्रवीद् राजन् दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥

**संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! प्रथम दिनके युद्धमें जब पाण्डव-सेना पीछे हटा दी गयी, भीष्मजीका युद्धविषयक उत्साह बढ़ता ही गया और दुर्योधन हर्षातिरेकसे उल्लसित हो उठा, उस समय धर्मराज युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों और सम्पूर्ण राजाओंके साथ तुरंत भगवान् श्रीकृष्णके पास गये और अत्यन्त शोकसे संतप्त हो भीष्मका पराक्रम देखकर अपनी पराजयके लिये चिन्ता करते हुए भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १—३ ॥

कृष्ण पश्य महेष्वासं भीष्मं भीमपराक्रमम् ।
शरैर्दहन्तं सैन्यं मे ग्रीष्मे कक्षमिवानलम् ॥ ४ ॥

'श्रीकृष्ण! देखिये, महान् धनुर्धर और भयंकर पराक्रमी भीष्म अपने बाणोंद्वारा मेरी सेनाको उसी प्रकार दग्ध कर रहे हैं, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें लगी हुई आग घास-फूँसको जलाकर भस्म कर डालती है ॥ ४ ॥

कथमेनं महात्मानं शक्ष्यामः प्रतिवीक्षितुम् ।
लेलिह्यमानं सैन्यं मे हविष्मन्तमिवानलम् ॥ ५ ॥

'जैसे अग्निदेव प्रज्वलित होकर हविष्यकी आहुति ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार ये महामना भीष्म अपनी बाणरूपी जिह्वासे मेरी सेनाको चाटते जा रहे हैं। हमलोग कैसे इनकी ओर देख सकेंगे—किस प्रकार इनका सामना कर सकेंगे? ॥ ५ ॥

एतं हि पुरुषव्याघ्रं धनुष्मन्तं महाबलम् ।
दृष्ट्वा विप्रद्रुतं सैन्यं समरे मार्गणाहतम् ॥ ६ ॥