महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextमद्रेश युद्धं प्रति पाण्डवस्य । नैतच्चिरादाशु भविष्यतीद- मत्यद्भुतं चित्रमतुल्यरूपम् ॥ ६९ ॥ एतौ च हत्वा युधि पातयिष्ये मां वापि कृष्णौ निहनिष्यतोऽद्य । मद्रराज! अर्जुनके साथ युद्धके विषयमें जो आज मेरा मनोरथ है, वह अविलम्ब और शीघ्र सफल होगा। यह युद्ध अत्यन्त अद्भुत, विचित्र और अनुपम होगा। मैं युद्धस्थलमें इन दोनोंको मार गिराऊँगा अथवा वे दोनों ही कृष्ण मुझे मार डालेंगे ॥ ६९ १/२ ॥
इति ब्रुवन् शल्यममित्रहन्ता कर्णो रणे मेघ इवोन्ननाद ॥ ७० ॥ अभ्येत्य पुत्रेण तवाभिनन्दितः समेत्य चोवाच कुरुप्रवीरम् । कृपं च भोजं च महाभुजावुभौ तथैव गान्धारपतिं सहानुजम् ॥ ७१ ॥ गुरोः सुतं चावरजं तथाऽऽत्मनः पदातिनोऽथ द्विपसादिनश्च तान् । निरुध्यतामभिद्रवताच्युतार्जुनौ श्रमेण संयोजयताशु सर्वशः ॥ ७२ ॥ यथा भवद्भिर्भृशविक्षितावुभौ सुखेन हन्यामहमद्य भूमिपाः । राजन्! शत्रुहन्ता कर्ण शल्यसे ऐसा कहकर रणभूमिमें मेघके समान उच्चस्वरसे गर्जना करने लगा। उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने निकट आकर उसका अभिनन्दन किया। उससे मिलकर कर्णने कुरुकुलके उस प्रमुख वीरसे, महाबाहु कृपाचार्य और कृतवर्मासे, भाइयोंसहित गान्धारराज शकुनिसे, गुरुपुत्र अश्वत्थामासे, अपने छोटे भाईसे तथा पैदल और गजारोही सैनिकोंसे इस प्रकार कहा—'वीरो! श्रीकृष्ण और अर्जुनपर धावा करो, उन्हें आगे बढ़नेसे रोको तथा शीघ्र ही सब प्रकारसे प्रयत्न करके उन्हें परिश्रमसे थका दो। भूमिपालो! ऐसा करो, जिससे तुम्हारेद्वारा अत्यन्त क्षत-विक्षत हुए उन दोनों कृष्णोंको आज मैं सुखपूर्वक मार सकूँ' ॥ ७०—७२ १/२ ॥
तथेति चोक्त्वा त्वरिताः स्म तेऽर्जुनं जिघांसवो वीरतराः समभ्ययुः ॥ ७३ ॥ शरैश्च जघ्नुर्युधि तं महारथा धनंजयं कर्णनिदेशकारिणः ।