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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे अत्यन्त वीर सैनिक बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनको मार

डालनेके लिये एक साथ आगे बढ़े। कर्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले वे महारथी योद्धा

युद्धस्थलमें बाणोंद्वारा अर्जुनको चोट पहुँचाने लगे ।। ७३ १/२ ।।

नदीनदं भूरिजलो महार्णवो

यथा तथा तान् समरेऽर्जुनोऽग्रसत् ।। ७४ ।।

न संदधानो न तथा शरोत्तमान्

प्रमुञ्चमानो रिपुभिः प्रदृश्यते ।

धनंजयास्तैस्तु शरैर्विदारिता

हता निपेतुर्नरवाजिकुञ्जराः ।। ७५ ।।

परंतु जैसे प्रचुर जलसे भरा हुआ महासागर नदियों और नदोंके जलको आत्मसात् कर

लेता है, उसी प्रकार अर्जुनने समरांगणमें उन सब वीरोंको ग्रस लिया। वे कब धनुषपर उत्तम

बाणोंका संधान करते और कब उन्हें छोड़ते हैं, यह शत्रुओंको नहीं दिखायी देता था; किंतु

अर्जुनके बाणोंसे विदीर्ण हुए हाथी, घोड़े और मनुष्य प्राणशून्य हो धड़ाधड़ गिरते जा रहे

थे ।। ७४-७५ ।।

शरार्चिषं गाण्डिवचारुमण्डलं

युगान्तसूर्यप्रतिमानतेजसम् ।

न कौरवाः शेकुरुदीक्षितुं जयं

यथा रविं व्याधितचक्षुषो जनाः ।। ७६ ।।

उस समय अर्जुन प्रलयकालके सूर्यकी भाँति तेजस्वी जान पड़ते थे। उनके बाण

किरण-समूहोंके समान सब ओर छिटक रहे थे। खींचा हुआ गाण्डीव धनुष सूर्यके मनोहर

मण्डल-सा प्रतीत होता था। जैसे रोगी नेत्रोंवाले मनुष्य सूर्यकी ओर नहीं देख सकते, उसी

प्रकार कौरव अर्जुनकी ओर देखनेमें असमर्थ हो गये थे ।। ७६ ।।

शरोत्तमान् सम्प्रहितान् महारथै-

श्चिच्छेद पार्थः प्रहसन् शरौघैः ।

भूयश्च तानहनद् बाणसङ्घान्

गाण्डीवधन्वायतपूर्णमण्डलः ।। ७७ ।।

कौरवमहारथियोंके चलाये हुए उत्तम बाणोंको कुन्तीकुमारने अपने शरसमूहोंद्वारा

हँसते-हँसते काट दिया। उनका गाण्डीव धनुष खींचा जाकर पूरा मण्डलाकार बन गया था

और उसके द्वारा वे उन शत्रु-सैनिकोंपर बारंबार बाणसमूहोंका प्रहार करते थे ।। ७७ ।।

यथोग्ररश्मिः शुचिशुक्रमध्यगः

सुखं विवस्वान् हरते जलौघान् ।

तथार्जुनो बाणगणान् निरस्य

ददाह सेनां तव पार्थिवेन्द्र ।। ७८ ।।