महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतन्महोदधिसंकाशं निरानन्दमनुत्सवम् ॥ ५ ॥
वीरपत्नीभिराकीर्णं गङ्गातीरमशोभत ।
महासागरके समान विशाल वह गंगातट आनन्द और उत्सवसे शून्य होनेपर भी उन वीर-पत्नियोंसे व्याप्त होनेके कारण बड़ी शोभा पाने लगा ॥ ५१/२ ॥
ततः कुन्ती महाराज सहसा शोककर्शिता ॥ ६ ॥
रुदती मन्दया वाचा पुत्रान् वचनमब्रवीत् ।
महाराज! तदनन्तर कुन्तीदेवी सहसा शोकसे कातर हो रोती हुई मन्द वाणीमें अपने पुत्रोंसे बोलीं— ॥ ६१/२ ॥
यः स वीरो महेष्वासो रथयूथपयूथपः ॥ ७ ॥
अर्जुनेन जितः संख्ये वीरलक्षणलक्षितः ।
यं सूतपुत्रं मन्यध्वं राधेयमिति पाण्डवाः ॥ ८ ॥
यो व्यराजच्च मूमध्ये दिवाकर इव प्रभुः ।
प्रत्ययुध्यत वः सर्वान् पुरा यः सपदानुगान् ॥ ९ ॥
दुर्योधनबलं सर्वं यः प्रकर्षन् व्यरोचत ।
यस्य नास्ति समो वीर्ये पृथिव्यामपि पार्थिवः ॥ १० ॥
योऽवृणीत यशः शूरः प्राणैरपि सदा भुवि ।
कर्णस्य सत्यसंधस्य संग्रामेष्वपलायिनः ॥ ११ ॥
कुरुध्वमुदकं तस्य भ्रातुरक्लिष्टकर्मणः ।
स हि वः पूर्वजो भ्राता भास्करान्मय्यजायत ॥ १२ ॥
कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ।
'पाण्डवो! जो महाधनुर्धर वीर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति तथा वीरोचित शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था, जिसे युद्धमें अर्जुनने परास्त किया है तथा जिसे तुमलोग सूतपुत्र एवं राधापुत्रके रूपमें मानते-जानते हो, जो सेनाके मध्यभागमें भगवान् सूर्यके समान प्रकाशित होता था, जिसने पहले सेवकोंसहित तुम सब लोगोंका अच्छी तरह सामना किया था, जो दुर्योधनकी सारी सेनाको अपने पीछे खींचता हुआ बड़ी शोभा पाता था, बल और पराक्रममें जिसकी समानता करनेवाला इस भूतलपर दूसरा कोई राजा नहीं है, जिस शूरवीरने अपने प्राणोंकी बाजी लगाकर भी भूमण्डलमें सदा यशका ही उपार्जन किया है, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अपने उस सत्यप्रतिज्ञ भ्राता कर्णके लिये भी तुमलोग जल-दान करो। वह तुमलोगोंका बड़ा भाई था। भगवान् सूर्यके अंशसे वह वीर मेरे ही गर्भसे उत्पन्न हुआ था। जन्मके साथ ही उस शूरवीरके शरीरमें कवच-कुंडल शोभा पाते थे। वह सूर्यदेवके समान ही तेजस्वी था ॥ ७—१२१/२ ॥
श्रुत्वा तु पाण्डवाः सर्वे मातृवचनमप्रियम् ॥ १३ ॥