महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextकर्णमेवानुशोचन्तो भूयः क्लान्ततराभवन् ।
माताका यह अप्रिय वचन सुनकर समस्त पाण्डव कर्णके लिये ही बारंबार शोक करते हुए अत्यन्त कष्टमें पड़ गये ॥ १३ ½ ॥
ततः स पुरुषव्याघ्रः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥
उवाच मातरं वीरो निःश्वसन्निव पन्नगः ।
तदनन्तर पुरुषसिंह वीर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए अपनी मातासे बोले— ॥
यः शरोर्मिर्ध्वजावर्तो महाभुजमहाग्रहः ॥ १५ ॥
तलशब्दानुनदितो महारथमहाह्रदः ।
यस्येषुपातमासाद्य नान्यस्तिष्ठेद् धनंजयात् ॥ १६ ॥
कथं पुत्रो भवत्याः स देवगर्भः पुराभवत् ।
‘माँ! जो बड़े-बड़े महारथियोंको डुबो देनेके लिये अत्यन्त गहरे जलाशयके समान थे, बाण ही जिनकी लहर, ध्वजा भँवर, बड़ी-बड़ी भुजाएँ महान् ग्राह और हथेलीका शब्द ही गम्भीर गर्जन था, जिनके बाणोंके गिरनेकी सीमामें आकर अर्जुनके सिवा दूसरा कोई वीर नहीं टिक सकता था, वे सूर्यकुमार तेजस्वी कर्ण पूर्वकालमें आपके पुत्र कैसे हुए? ॥ १५-१६ ½ ॥
यस्य बाहुप्रतापेन तापिताः सर्वतो वयम् ॥ १७ ॥
तमग्निमिव वस्त्रेण कथं छादितवत्यसि ।
‘जिनकी भुजाओंके प्रतापसे हम सब ओरसे संतप्त रहते थे, कपड़ेमें ढकी हुई आगके समान उन्हें अबतक आपने कैसे छिपा रखा था? ॥ १७ ½ ॥
यस्य बाहुबलं नित्यं धार्तराष्ट्रैरुपासितम् ॥ १८ ॥
उपासितं यथास्माभिर्बलं गाण्डीवधन्वनः ।
‘धृतराष्ट्रके पुत्रोंने सदा उन्हींके बाहुबलका भरोसा कर रखा था, जैसे कि हमलोगोंंने गाण्डीवधारी अर्जुनके बलका आश्रय लिया था ॥ १८ ½ ॥
भूमिपानां च सर्वेषां बलं बलवतां वरः ॥ १९ ॥
नान्यः कुन्तीसुतात् कर्णादगृह्लाद् रथिनां रथी ।
‘कुन्तीपुत्र कर्णके सिवा दूसरा कोई रथी ऐसा बड़ा बलवान् नहीं हुआ है, जिसने समस्त राजाओंकी सेनाको रोक दिया हो ॥ १९ ½ ॥
स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २० ॥
असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ।
‘वे समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण क्या सचमुच हमारे बड़े भाई थे? आपने पहले उन अद्भुत पराक्रमी वीरको कैसे उत्पन्न किया था? ॥ २० ½ ॥