BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
Page 3233Permalink

कर्णमेवानुशोचन्तो भूयः क्लान्ततराभवन् ।
माताका यह अप्रिय वचन सुनकर समस्त पाण्डव कर्णके लिये ही बारंबार शोक करते हुए अत्यन्त कष्टमें पड़ गये ॥ १३ ½ ॥
ततः स पुरुषव्याघ्रः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥
उवाच मातरं वीरो निःश्वसन्निव पन्नगः ।
तदनन्तर पुरुषसिंह वीर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए अपनी मातासे बोले— ॥
यः शरोर्मिर्ध्वजावर्तो महाभुजमहाग्रहः ॥ १५ ॥
तलशब्दानुनदितो महारथमहाह्रदः ।
यस्येषुपातमासाद्य नान्यस्तिष्ठेद् धनंजयात् ॥ १६ ॥
कथं पुत्रो भवत्याः स देवगर्भः पुराभवत् ।
‘माँ! जो बड़े-बड़े महारथियोंको डुबो देनेके लिये अत्यन्त गहरे जलाशयके समान थे, बाण ही जिनकी लहर, ध्वजा भँवर, बड़ी-बड़ी भुजाएँ महान् ग्राह और हथेलीका शब्द ही गम्भीर गर्जन था, जिनके बाणोंके गिरनेकी सीमामें आकर अर्जुनके सिवा दूसरा कोई वीर नहीं टिक सकता था, वे सूर्यकुमार तेजस्वी कर्ण पूर्वकालमें आपके पुत्र कैसे हुए? ॥ १५-१६ ½ ॥
यस्य बाहुप्रतापेन तापिताः सर्वतो वयम् ॥ १७ ॥
तमग्निमिव वस्त्रेण कथं छादितवत्यसि ।
‘जिनकी भुजाओंके प्रतापसे हम सब ओरसे संतप्त रहते थे, कपड़ेमें ढकी हुई आगके समान उन्हें अबतक आपने कैसे छिपा रखा था? ॥ १७ ½ ॥
यस्य बाहुबलं नित्यं धार्तराष्ट्रैरुपासितम् ॥ १८ ॥
उपासितं यथास्माभिर्बलं गाण्डीवधन्वनः ।
‘धृतराष्ट्रके पुत्रोंने सदा उन्हींके बाहुबलका भरोसा कर रखा था, जैसे कि हमलोगोंंने गाण्डीवधारी अर्जुनके बलका आश्रय लिया था ॥ १८ ½ ॥
भूमिपानां च सर्वेषां बलं बलवतां वरः ॥ १९ ॥
नान्यः कुन्तीसुतात् कर्णादगृह्लाद् रथिनां रथी ।
‘कुन्तीपुत्र कर्णके सिवा दूसरा कोई रथी ऐसा बड़ा बलवान् नहीं हुआ है, जिसने समस्त राजाओंकी सेनाको रोक दिया हो ॥ १९ ½ ॥
स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २० ॥
असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ।
‘वे समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण क्या सचमुच हमारे बड़े भाई थे? आपने पहले उन अद्भुत पराक्रमी वीरको कैसे उत्पन्न किया था? ॥ २० ½ ॥

Page 3234Permalink

अहो भवत्या मन्त्रस्य गूहनेन वयं हताः ॥ २१ ॥
निधनेन हि कर्णस्य पीडितास्तु सबान्धवाः ।
‘अहो! आपने इस गूढ़ रहस्यको छिपाकर हमलोगोंको मार डाला। कर्णकी मृत्युसे भाइयोंसहित हमें बड़ी पीड़ा हो रही है॥ २१ १/२॥’
अभिमन्योर्विनाशेन द्रौपदेयवधेन च ॥ २२ ॥
पञ्चालानां विनाशेन कुरूणां पतनेन च ।
ततः शतगुणं दुःखमिदं मामस्पृशद् भृशम् ॥ २३ ॥
‘अभिमन्यु, द्रौपदीके पुत्र और पांचालोंके विनाशसे तथा कुरुकुलके इस पतनसे हमें जितना दुःख हुआ था, उससे सौ गुना यह दुःख इस समय मुझे अत्यन्त व्यथित कर रहा है॥ २२-२३॥’
कर्णमेवानुशोचामि दह्याम्यग्नाविवाहितः ।
नेह स्म किंचिदप्राप्यं भवेदपि दिवि स्थितम् ॥ २४ ॥
न चेदं वैशसं घोरं कौरवान्तकरं भवेत् ।
‘अब तो मैं केवल कर्णके ही शोकमें डूब गया हूँ और इस तरह जल रहा हूँ, मानो मुझे किसीने जलती आगमें रख दिया हो। यदि पहले ही यह बात मुझे मालूम हो गयी होती तो कर्णको पाकर हमारे लिये इस जगत्‌में कोई स्वर्गीय वस्तु भी अलभ्य नहीं होती तथा कुरुकुलका अन्त कर देनेवाला यह घोर संग्राम भी नहीं हुआ होता’॥ २४ १/२॥
एवं विलप्य बहुलं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
व्यरुदच्छनकै राजंश्चकारास्योदकं प्रभुः ।
ततो विनेदुः सहसा स्त्रियस्ताः खलु सर्वशः ॥ २६ ॥
अभितो याः स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि ।
राजन्! इस प्रकार बहुत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर फूट-फूटकर रोने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने धीरे-धीरे कर्णके लिये जलदान किया। यह सब सुनकर वहाँ एकत्र हुई सारी स्त्रियाँ, जो वहाँ जलांजलि देनेके लिये सब ओर खड़ी थीं, सहसा जोर-जोरसे रोने लगीं॥ २५-२६ १/२॥
तत आनाययामास कर्णस्य सपरिच्छदाः ॥ २७ ॥
स्त्रियः कुरुपतिर्धीमान् भ्रातुः प्रेम्णा युधिष्ठिरः ।
स ताभिः सह धर्मात्मा प्रेतकृत्यमनन्तरम् ॥ २८ ॥
चकार विधिवद् धीमान् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तदनन्तर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरने भाईके प्रेमसे कर्णकी स्त्रियोंको परिवारसहित बुलवा लिया और उन सबके साथ रहकर उन धर्मात्मा बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने विधिपूर्वक कर्णका प्रेतकृत्य सम्पन्न किया॥ २७-२८ १/२॥
पापेनासौ मया श्रेष्ठो भ्राता ज्ञातिर्निपातितः ।

।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।

Page 3235Permalink

अतो मनसि यद् गुह्यं स्त्रीणां तन्न भविष्यति ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे बोले—'मुझ पापीने इस रहस्यको न जाननेके कारण अपने बड़े भाईको मरवा दिया; अतः आजसे स्त्रियोंके मनमें कोई गुप्त रहस्य नहीं छिपा रह सकेगा' ॥ २९ ॥

इत्युक्त्वा स तु गङ्गाया उत्ताराकुलेन्द्रियः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्गङ्गातीरमुपेयिवान् ॥ ३० ॥ ऐसा कहकर व्याकुल इन्द्रियोंवाले राजा युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे निकले और समस्त भाइयोंके साथ तटपर आये ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि श्राद्धपर्वणि कर्णगूढजत्वकथने सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत श्राद्धपर्वमें कर्णके जन्मके गूढ़ रहस्यका कथनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।


अनुष्टुप्,बड़े श्लोकबड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपरकुल
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये८२२(५)६ ।। । =८२८ ।। । =
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये..........
स्त्रीपर्वकी कुल श्लोकसंख्या८२९ ।। । =
Page 3236Permalink

गीताप्रेस गोरखपुर

GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923]

गीताप्रेस, गोरखपुर—२७३००५
फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१

Page 3237Permalink

(The provided page contains no text to transcribe.)