महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना
संजय उवाच
मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः ।
शल्योऽब्रवीत् पुनः कर्णं निदर्शनमिदं वचः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**माननीय नरेश! युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अधिरथपुत्र कर्णकी पूर्वोक्त बात सुनकर फिर शल्यने उससे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही— ॥ १ ॥
जातोऽहं यज्वनां वंशे संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ।
राज्ञां मूर्धाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥ २ ॥
'सूतपुत्र! मैं युद्धमें पीठ न दिखानेवाले यज्ञपरायण, मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और स्वयं भी धर्ममें तत्पर रहता हूँ ॥ २ ॥
यथैव मत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष ।
तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया ॥ ३ ॥
किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम-जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा ॥ ३ ॥
इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे ।
श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥ ४ ॥
ओ नीच कुलांगार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जानेवाले कौएके इस दृष्टान्तको सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो ॥ ४ ॥
नाहमात्मनि किंचिद् वै किल्बिषं कर्ण संस्मरे ।
येन मां त्वं महाबाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥ ५ ॥
महाबाहु कर्ण! मुझे अपना कोई ऐसा अपराध नहीं याद आता है, जिसके कारण तुम मुझ निरपराधको भी मार डालनेकी इच्छा रखते हो ॥ ५ ॥
अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्यता त्वद्धिताहितम् ।
विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥ ६ ॥
मैं राजा दुर्योधनका हितैषी हूँ और विशेषतः रथपर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहितको जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ ॥ ६ ॥
समं च विषमं चैव रथिनश्च बलाबलम् । श्रमः खेदश्च सततं हयानां रथिना सह ॥ ७ ॥ आयुधस्य परिज्ञानं रुतं च मृगपक्षिणाम् । भारश्चाप्यतिभारश्च शल्यानां च प्रतिक्रिया ॥ ८ ॥ अस्त्रयोगश्च युद्धं च निमित्तानि तथैव च । सर्वमेतन्मया ज्ञेयं रथस्यास्य कुटुम्बिना ॥ ९ ॥ अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः । सम और विषम अवस्था, रथीकी प्रबलता और निर्बलता, रथीके साथ ही घोड़ोंके सतत परिश्रम और कष्ट, अस्त्र हैं या नहीं, इसकी जानकारी, जय और पराजयकी सूचना देनेवाली पशु-पक्षियोंकी बोली, भार, अतिभार, शल्य-चिकित्सा, अस्त्रप्रयोग, युद्ध और शुभाशुभ निमित्त—इन सारी बातोंका ज्ञान रखना मेरे लिये आवश्यक है; क्योंकि मैं इस रथका एक कुटुम्बी हूँ। कर्ण! इसीलिये मैं पुनः तुमसे इस दृष्टान्तका वर्णन करता हूँ— ॥ ७—९ १/२ ॥
वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् ॥ १० ॥ यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः । बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ११ ॥ राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः । कहते हैं समुद्रके तटपर किसी धर्मप्रधान राजाके राज्यमें एक प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न वैश्य रहता था। वह यज्ञ-यागादि करनेवाला, दानपति, क्षमाशील, अपने वर्णानुकूल कर्ममें तत्पर, पवित्र, बहुत-से पुत्रवाला, संतानप्रेमी और समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाला था ॥ १०-११ १/२ ॥
पुत्राणां तस्य बालानां कुमाराणां यशस्विनाम् ॥ १२ ॥ काको बहूनामभवदुच्छिष्टकृतभोजनः । उसके जो बहुत-से अल्पवयस्क यशस्वी पुत्र थे, उन सबकी जूठन खानेवाला एक कौआ भी वहाँ रहा करता था ॥ १२ १/२ ॥
तस्मै सदा प्रयच्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः ॥ १३ ॥ मांसौदनं दधि क्षीरं पायसं मधुसर्पिषी । वैश्यके बालक उस कौएको सदा मांस, भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी आदि दिया करते थे ॥ १३ १/२ ॥
स चोच्छिष्टभृतः काको वैश्यपुत्रैः कुमारकैः ॥ १४ ॥ सदृशान् पक्षिणो दृप्तः श्रेयसश्चाधिचिक्षिपे ।
वैश्यके बालकोंद्वारा जूठन खिला-खिलाकर पाला हुआ वह कौआ बड़े घमंडमें भरकर अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पक्षियोंका भी अपमान करने लगा ।। १४ १/२ ।।
अथ हंसाः समुद्रान्ते कदाचिदतिपातिनः ।। १५ ।।
गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः ।
एक दिनकी बात है, उस समुद्रके तटपर गरुड़के समान लंबी उड़ानें भरनेवाले मानसरोवरनिवासी राजहंस आये। उनके अंगोंमें चक्रके चिह्न थे और वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न थे ।। १५ १/२ ।।
कुमारकास्तदा हंसान् दृष्ट्वा काकमथाब्रुवन् ।। १६ ।।
भवानेव विशिष्टो हि पतत्रिभ्यो विहङ्गम ।
(एतेऽतिपातिनः पश्य विहङ्गान् वियदाश्रितान् ।
एभिस्त्वमपि शक्तो हि कामान्न पतितं त्वया ।।)
उस समय उन हंसोंको देखकर कुमारोंने कौएसे इस प्रकार कहा—‘विहंगम! तुम्हीं समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ हो। देखो, ये आकाशचारी हंस आकाशमें जाकर बड़ी दूरकी उड़ानें भरते हैं। तुम भी इन्हींके समान दूरतक उड़नेमें समर्थ हो। तुमने अपनी इच्छासे ही अबतक वैसी उड़ान नहीं भरी’ ।। १६ १/२ ।।
प्रतार्यमाणस्तैः सर्वैरल्पबुद्धिभिरण्डजः ।। १७ ।।
तद्वचः सत्यमित्येव मौर्ख्याद् दर्पाच्च मन्यते ।
उन सारे अल्पबुद्धि बालकोंद्वारा ठगा गया वह पक्षी मूर्खता और अभिमानसे उनकी बातको सत्य मानने लगा ।। १७ १/२ ।।
तान् सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति ।। १८ ।।
उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनां दूरपातिनाम् ।
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् ।। १९ ।।
तमाह्वयत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् ।
फिर वह जूठनपर घमंड करनेवाला कौआ इन हंसोंमें सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जाननेकी इच्छासे उड़कर उनके पास गया और दूरतक उड़नेवाले उन बहुसंख्यक हंसोंमेंसे जिस पक्षीको उसने श्रेष्ठ समझा, उसीको उस दुर्बुद्धिने ललकारते हुए कहा—‘चलो, हम दोनों उड़ें’ ।। १८-१९ १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा प्राहसन् हंसा ये तत्रासन् समागताः ।। २० ।।
भाषतो बहु काकस्य बलिनः पततां वराः ।
इदमूचुः स्म चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ।। २१ ।।
बहुत काँव-काँव करनेवाले उस कौएकी वह बात सुनकर वहाँ आये हुए वे पक्षियोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी बलवान् चक्रांग हँस पड़े और कौएसे इस प्रकार बोले ।। २०-२१ ।।
हंसा ऊचुः
वयं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः ।
पक्षिणां च वयं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ॥ २२ ॥
**हंसोंने कहा—**काक! हम मानसरोवरनिवासी हंस हैं, जो सदा इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं। दूरतक उड़नेके कारण हमलोग सदा सभी पक्षियोंमें सम्मानित होते आये हैं ॥ २२ ॥
कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् ।
काको भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते ॥ २३ ॥
कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् ।
ओ खोटी बुद्धिवाले काग! तू कौआ होकर लंबी उड़ान भरनेवाले और अपने अंगोंमें चक्रका चिह्न धारण करनेवाले एक बलवान् हंसको अपने साथ उड़नेके लिये कैसे ललकार रहा है? काग! बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा? ॥ २३ १/२ ॥
अथ हंसवचो मूढः कुत्सयित्वा पुनः पुनः ।
प्रजगादोत्तरं काकः कथनो जातिलाघवात् ॥ २४ ॥
हंसकी बात सुनकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले मूर्ख कौएने अपनी जातिगत क्षुद्रताके कारण बारंबार उसकी निन्दा करके उसे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २४ ॥
काक उवाच
शतमेकं च पातानां पतितास्मि न संशयः ।
शतयोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ॥ २५ ॥
**कौआ बोला—**हंस! मैं एक सौ एक प्रकारकी उड़ानें उड़ सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। उनमेंसे प्रत्येक उड़ान सौ-सौ योजनकी होती है और वे सभी विभिन्न प्रकारकी एवं विचित्र हैं ॥ २५ ॥
उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च ।
निडीनमथ संडीनं तिर्यक् डीनगतानि च ॥ २६ ॥
विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् ।
अभिडीनं महाडीनं निर्डीनमतिडीनकम् ॥ २७ ॥
अवडीनं प्रडीनं च संडीनं डीनडीनकम् ।
संडीनोड्डीनडीनं च पुनर्डीनविडीनकम् ॥ २८ ॥
सम्पातं समुदीषं च ततोऽन्यद् व्यतिरिक्तकम् ।
गतागतप्रतिगतं बह्लींश्च निकुलीनकाः ॥ २९ ॥
उनमेंसे कुछ उड़ानोंके, नाम इस प्रकार हैं—उड्डीन (ऊँचा उड़ना), अवडीन (नीचा उड़ना), प्रडीन (चारों ओर उड़ना), डीन (साधारण उड़ना), निडीन (धीरे-धीरे उड़ना),
संडीन (ललित गतिसे उड़ना), तिर्यग्डीन (तिरछा उड़ना), विडीन (दूसरोंकी चालकी नकल करते हुए उड़ना), परिडीन (सब ओर उड़ना), पराडीन (पीछेकी ओर उड़ना), सुडीन (स्वर्गकी ओर उड़ना), अभिडीन (सामनेकी ओर उड़ना), महाडीन (बहुत वेगसे उड़ना), निर्डीन (परोंको हिलाये बिना ही उड़ना), अतिडीन (प्रचण्डतासे उड़ना), संडीन डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर नीचेकी ओर उड़ना), संडीनोड्डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर ऊँचा उड़ना), डीनविडीन (एक प्रकारकी उड़ानमें दूसरी उड़ान दिखाना), सम्पात (क्षणभर सुन्दरतासे उड़कर फिर पंख फड़फड़ाना), समुदीष (कभी ऊपरकी ओर और कभी नीचेकी ओर उड़ना) और व्यतिरिक्तक (किसी लक्ष्यका संकल्प करके उड़ना), —ये छब्बीस उड़ानें हैं। इनमेंसे महाडीनके सिवा अन्य सब उड़ानोंके, ‘गत’ (किसी लक्ष्यकी ओर जाना), ‘आगत’ (लक्ष्यतक पहुँचकर लौट आना) और ‘प्रतिगत’ (पलटा खाना)—ये तीन भेद हैं (इस प्रकार कुल छिहत्तर भेद हुए)। इसके सिवा बहुत-से (अर्थात् पचीस) निपात भी हैं।* (ये सब मिलकर एक सौ एक उड़ानें होती हैं) ।।
कर्तास्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् ।
तेषामन्यतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम् ।। ३० ।।
प्रदिशध्वं यथान्यायं केन हंसाः पताम्यहम् ।
आज मैं तुमलोगोंके देखते-देखते जब इतनी उड़ानें भरूँगा, उस समय मेरा बल तुम देखोगे। मैं इनमेंसे किसी भी उड़ानसे आकाशमें उड़ सकूँगा। हंसो! तुमलोग यथोचितरूपसे विचार करके बताओ कि ‘मैं किस उड़ानसे उड़ूँ?’ ।। ३०१/२ ।।
ते वै ध्रुवं विनिश्चित्य पतध्वं न मया सह ।। ३१ ।।
पातैरेभिः खलु खगाः पतितुं खे निराश्रये ।
अतः पक्षियो! तुम सब लोग दृढ़ निश्चय करके आश्रयरहित आकाशमें इन विभिन्न उड़ानोंद्वारा उड़नेके लिये मेरे साथ चलो न ।। ३११/२ ।।
एवमुक्ते तु काकेन प्रहस्यैको विहंगमः ।। ३२ ।।
उवाच काकं राधेय वचनं तन्निबोध मे ।
राधापुत्र! कौएके ऐसा कहनेपर एक आकाशचारी हंसने हँसकर उससे जो कुछ कहा, वह मुझसे सुनो ।। ३२१/२ ।।
हंस उवाच
शतमेकं च पातानां त्वं काक पतिता ध्रुवम् ।। ३३ ।।
एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहंगमाः ।
तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन ।। ३४ ।।
पत त्वमपि ताम्राक्ष येन पातेन मन्यसे ।
हंस बोला- काग! तू अवश्य एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता है। परंतु मैं तो
जिस एक उड़ानको सारे पक्षी जानते हैं उसीसे उड़ सकता हूँ, दूसरी किसी उड़ानका मुझे
पता नहीं है। लाल नेत्रवाले कौए? तू भी जिस उड़ानसे उचित समझे, उसीसे
उड़ ।। ३३-३४ १/२ ।।
अथ काकाः प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागताः ।। ३५ ।।
कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् ।
एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति ।। ३६ ।।
हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रमः ।
तब वहाँ आये हुए सारे कौए जोर-जोरसे हँसने लगे और आपसमें बोले- 'भला यह
हंस एक ही उड़ानसे सौ प्रकारकी उड़ानोंको कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान् और
शीघ्रतापूर्वक उड़नेवाला है; अतः सौमेंसे एक ही उड़ानद्वारा हंसकी उड़ानको पराजित कर
देगा' ।। ३५-३६ १/२ ।।
प्रपेततुः स्पर्धया च ततस्तौ हंसवायसौ ।। ३७ ।।
एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ।
पेतिवानथ चक्राङ्गः पेतिवानथ वायसः ।। ३८ ।।
तदनन्तर हंस और कौआ दोनों होड़ लगाकर उड़े। चक्रांग हंस एक ही गतिसे
उड़नेवाला था और कौआ सौ उड़ानोंसे। इधरसे चक्रांग उड़ा और उधरसे
कौआ ।। ३७-३८ ।।
विसिस्मापयिषुः पातैराचक्षाणोऽऽत्मनः क्रियाः ।
अथ काकस्य चित्राणि पतितानि मुहुर्मुहुः ।। ३९ ।।
दृष्ट्वा प्रमुदिताः काका विनेदुरधिकैः स्वरैः ।
कौआ विभिन्न उड़ानोंद्वारा दर्शकोंको आश्चर्य-चकित करनेकी इच्छासे अपने कार्योंका
बखान करता जा रहा था। उस समय कौएकी विचित्र उड़ानोंको बारंबार देखकर दूसरे कौए
बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे काँव-काँव करने लगे ।। ३९ १/२ ।।
हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रियाणि च ।। ४० ।।
उत्पत्योत्पत्य च मुहुर्मुहूर्तमिति चेति च ।
वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युतन्ति च ।। ४१ ।।
कुर्वाणा विविधान् रावानाशंसन्तो जयं तथा ।
वे दो-दो घड़ीपर बारंबार उड़-उड़कर कहते— 'देखो, कौएकी यह उड़ान, वह उड़ान'।
ऐसा कहकर वे हंसोंका उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे। साथ ही कौएकी
विजयके लिये शुभाशंसा करते और भाँति-भाँतिकी बोली बोलते हुए वे कभी वृक्षोंकी
शाखाओंसे भूतलपर और कभी भूतलसे वृक्षोंकी शाखाओंपर नीचे-ऊपर उड़ते रहते
थे ।। ४०-४१ १/२ ।।
हंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे ।। ४२ ।। प्रत्यहीयत काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष । आर्य! हंसने एक ही मृदुल गतिसे उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ीतक वह कौएसे हारता-सा प्रतीत हुआ ।। ४२ १/२ ।। अवमन्य च हंसांस्तानिदं वचनमब्रुवन् ।। ४३ ।। योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेवं प्रहीयते । तब कौओंने हंसोंका अपमान करके इस प्रकार कहा—‘वह जो हंस उड़ा था, वह तो इस प्रकार कौएसे पिछड़ता जा रहा है!’ ।। ४३ १/२ ।। अथ हंसः स तच्छ्रुत्वा प्रापतत् पश्चिमां दिशम् ।। ४४ ।। उपर्युपरि वेनेन सागरं मकरालयम् । उड़नेवाले हंसने कौओंकी वह बात सुनकर बड़े वेगसे मकरालय समुद्रके ऊपर-ऊपर पश्चिम दिशाकी ओर उड़ना आरम्भ किया ।। ४४ १/२ ।। ततो भीः प्राविशत् काकं तदा तत्र विचेतसम् ।। ४५ ।। द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम् । इधर कौआ थक गया था। उसे कहीं आश्रय लेनेके लिये द्वीप या वृक्ष नहीं दिखायी दे रहे थे; अतः उसके मनमें भय समा गया और वह घबराकर अचेत-सा हो उठा ।। ४५ १/२ ।। निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ।। ४६ ।। अविषह्यः समुद्रो हि बहुसत्त्वगणालयः । महासत्त्वशतोद्भासी नभसोऽपि विशिष्यते ।। ४७ ।। कौआ सोचने लगा, ‘मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत-से जल-जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है। असंख्य महाप्राणियोंसे उद्भासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है’ ।। ४६-४७ ।। गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं हि सूतज । दिगम्बराम्भसः कर्ण समुद्रस्था विदुर्जनाः ।। ४८ ।। विदूरपातात् तोयस्य किं पुनः कर्ण वायसः । सूतपुत्र कर्ण! समुद्रमें विचरनेवाले मनुष्य भी उसकी गम्भीरताके कारण दिशाओंद्वारा आवृत उसकी जलराशिकी थाह नहीं जान पाते, फिर वह कौआ कुछ दूरतक उड़ने मात्रसे उस समुद्रके जलसमूहका पार कैसे पा सकता था? ।। ४८ १/२ ।। अथ हंसोऽप्यतिक्रम्य मुहूर्तमिति चेति च ।। ४९ ।। अवेक्षमाणस्तं काकं नाशकद् व्यपसर्पितुम् । उधर हंस दो घड़ीतक उड़कर इधर-उधर देखता हुआ कौएकी प्रतीक्षामें आगे न जा सका ।। ४९ १/२ ।।
अतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ।। ५० ।। यावद् गत्वा पतत्येष काको मामिति चिन्तयन् । चक्रांग कौएको लाँघकर आगे बढ़ चुका था तो भी यह सोचकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा कि यह कौआ भी उड़कर मेरे पास आ जाय ।। ५० १/२ ।।
ततः काको भृशं श्रान्तो हंसमभ्यागमत्तदा ।। ५१ ।। तं तथा हीयमानं तु हंसो दृष्ट्वाब्रवीदिदम् । उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन् सत्पुरुषव्रतम् ।। ५२ ।। तदनन्तर उस समय अत्यन्त थका-मादा कौआ हंसके समीप आया। हंसने देखा, कौएकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी है। अब यह पानीमें डूबनेहीवाला है। तब उसने सत्पुरुषोंके व्रतका स्मरण करके उसके उद्धारकी इच्छा मनमें लेकर इस प्रकार कहा ।। ५१-५२ ।।
हंस उवाच
बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः । पातस्य व्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ।। ५३ ।। हंस बोला—काग! तू तो बारंबार अपनी बहुत-सी उड़ानोंका बखान कर रहा था; परंतु उन उड़ानोंका वर्णन करते समय उनमेंसे इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ानकी बात तो तूने नहीं बतायी थी ।। ५३ ।।
किं नाम पतितं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् । जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ।। ५४ ।। कौए! बता तो सही, तू इस समय जिस उड़ानसे उड़ रहा है, उसका क्या नाम है? इस उड़ानमें तो तू अपने दोनों पंखों और चोंचके द्वारा जलका बार-बार स्पर्श करने लगा है ।। ५४ ।।
प्रब्रूहि कतमे तत्र पाते वर्तसि वायस । एह्येहि काक शीघ्रं त्वमेष त्वां प्रतिपालये ।। ५५ ।। वायस! बता, बता। इस समय तू कौन-सी उड़ानमें स्थित है। कौए! आ, शीघ्र आ। मैं अभी तेरी रक्षा करता हूँ ।। ५५ ।।
शल्य उवाच
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा । दृष्टो हंसेन दुष्टात्मन्निदं हंसं ततोऽब्रवीत् ।। ५६ ।। अपश्यन्नम्भसः पारं निपतंश्च श्रमान्वितः । पातवेगप्रमथितो हंसं काकोऽब्रवीदिदम् ।। ५७ ।।
**शल्य कहते हैं—**दुष्टात्मा कर्ण! वह कौआ अत्यन्त पीड़ित हो जब अपनी दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करने लगा, उस अवस्थामें हंसने उसे देखा। वह उड़ानके वेगसे थककर शिथिलांग हो गया था और जलका कहीं आर-पार न देखकर नीचे गिरता जा रहा था। उस समय उसने हंससे इस प्रकार कहा— ।। ५६-५७ ।।
शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं
शल्य कर्णको हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर अपमानित कर रहे हैं
वयं काकाः कुतो नाम चरामः काकवाशिकाः । हंस प्राणैः प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम् ॥ ५८ ॥ ‘भाई हंस! हम तो कौए हैं। व्यर्थ काँव-काँव किया करते हैं। हम उड़ना क्या जानें? मैं अपने इन प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे जलके किनारेतक पहुँचा दो’ ॥ ५८ ॥ स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च महार्णवे । काको दृढपरिश्रान्तः सहसा निपपात ह ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर अत्यन्त थका-मादा कौआ दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करता हुआ सहसा उस महासागरमें गिर पड़ा। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५९ ॥ सागराम्भसि तं दृष्ट्वा पतितं दीनचेतसम् । म्रियमाणमिदं काकं हंसो वाक्यमुवाच ह ॥ ६० ॥ समुद्रके जलमें गिरकर अत्यन्त दीनचित्त हो मृत्युके निकट पहुँचे हुए उस कौएसे हंसने इस प्रकार कहा— ॥ ६० ॥ शतमेकं च पातानां पताम्यहमनुस्मर । श्लाघमानस्त्वमात्मानं काक भाषितवानसि ॥ ६१ ॥ ‘काग! तूने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा था कि मैं एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता हूँ। अब उन्हें याद कर ॥ ६१ ॥ स त्वमेकशतं पातं पतन्नभ्यधिको मया । कथमेवं परिश्रान्तः पतितोऽसि महार्णवे ॥ ६२ ॥ ‘सौ उड़ानोंसे उड़नेवाला तू तो मुझसे बहुत बढ़ा-चढ़ा है। फिर इस प्रकार थककर महासागरमें कैसे गिर पड़ा?’ ॥ ६२ ॥ प्रत्युवाच ततः काकः सीदमान इदं वचः । उपरिष्टं तदा हंसमभिवीक्ष्य प्रसादयन् ॥ ६३ ॥ तब जलमें अत्यन्त कष्ट पाते हुए कौएने जलके ऊपर ठहरे हुए हंसकी ओर देखकर उसे प्रसन्न करनेके लिये कहा ॥ ६३ ॥
काक उवाच उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् । अवमन्य बहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः ॥ ६४ ॥ कौआ बोला—भाई हंस! मैं जूठन खा-खाकर घमंडमें भर गया था और बहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियोंका तिरस्कार करके अपने-आपको गरुड़के समान शक्तिशाली समझने लगा था ॥ ६४ ॥ प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्विपान्तं प्रापयस्व माम् ।
यद्यहं स्वस्तिमान् हंस स्वं देशं प्राप्नुयां प्रभो ।। ६५ ।।
न कंचिदवमन्येऽहमापदो मां समुद्धर ।
हंस! अब मैं अपने प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे द्वीपके पास पहुँचा दो। शक्तिशाली हंस! यदि मैं कुशलपूर्वक अपने देशमें पहुँच जाऊँ तो अब कभी किसीका अपमान नहीं करूँगा। तुम इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो ।। ६५ १/२ ।।
तमेवं वादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् ।। ६६ ।।
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ।
कृपयाऽऽदाय हंसस्तं जलक्लिन्नं सुदुर्द्दशम् ।। ६७ ।।
पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन पृष्ठमारोपयच्छनैः ।
कर्ण! इस प्रकार कहकर कौआ अचेत-सा होकर दीनभावसे विलाप करने और काँव-काँव करते हुए महासागरके जलमें डूबने लगा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। वह पानीसे भीग गया था। हंसने कृपापूर्वक उसे पंजोंसे उठाकर बड़े वेगसे ऊपरको उछाला और धीरेसे अपनी पीठपर चढ़ा लिया ।। ६६-६७ १/२ ।।
आरोप्य पृष्ठं हंसस्तं काकं तूर्णं विचेतनम् ।। ६८ ।।
आजगाम पुनर्द्वीपं स्पर्धया पेततुर्यतः ।
अचेत हुए कौएको पीठपर बिठाकर हंस तुरंत ही फिर उसी द्वीपमें आ पहुँचा, जहाँसे होड़ लगाकर दोनों उड़े थे ।। ६८ १/२ ।।
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् ।। ६९ ।।
गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ।
उस कौएको उसके स्थानपर रखकर उसे आश्वासन दे मनके समान शीघ्रगामी हंस पुनः अपने अभीष्ट देशको चला गया ।। ६९ १/२ ।।
एवमुच्छिष्टपुष्टः स काको हंसपराजितः ।। ७० ।।
बलवीर्यमदं कर्ण त्यक्त्वा क्षान्तिमुपागतः ।
कर्ण! इस प्रकार जूठन खाकर पुष्ट हुआ कौआ उस हंससे पराजित हो अपने महान् बल-पराक्रमका घमंड छोड़कर शान्त हो गया ।। ७० १/२ ।।
उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा ।। ७१ ।।
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ।
सदृशान् श्रेयसश्चापि सर्वान् कर्णावमन्यसे ।। ७२ ।।
पूर्वकालमें वह कौआ जैसे वैश्यकुलमें सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है। कर्ण! इसीसे तुम अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका भी अपमान करते हो ।। ७१-७२ ।।
द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः ।
विराटनगरे पार्थमेकं किं नावधीस्तदा ॥ ७३ ॥
विराटनगरमें तो द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, भीष्म तथा अन्य कौरव वीर भी तुम्हारी रक्षा कर रहे थे। फिर उस समय तुमने अकेले सामने आये हुए अर्जुनका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥ ७३ ॥
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना ।
शृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत् तदा ॥ ७४ ॥
वहाँ तो किरीटधारी अर्जुनने अलग-अलग और सब लोगोंसे एक साथ लड़कर भी तुमलोगोंको उसी प्रकार परास्त कर दिया था, जैसे एक ही सिंहने बहुत-से सियारोंको मार भगाया हो। कर्ण! उस समय तुम्हारा पराक्रम कहाँ था? ॥ ७४ ॥
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा समरे सव्यसाचिना ।
पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७५ ॥
सव्यसाची अर्जुनके द्वारा समरांगणमें अपने भाईको मारा गया देखकर कौरव वीरोंके समक्ष सबसे पहले तुम्हीं भागे थे ॥ ७५ ॥
तथा द्वैतवने कर्ण गन्धर्वैः समभिद्रुतः ।
कुरून् समग्रानुत्सृज्य प्रथमं त्वं पलायितः ॥ ७६ ॥
कर्ण! इसी प्रकार जब द्वैतवनमें गन्धर्वोंने आक्रमण किया था, उस समय समस्त कौरवोंको छोड़कर पहले तुमने ही पीठ दिखायी थी ॥ ७६ ॥
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान् रणे ।
कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभार्यं सममोक्षयत् ॥ ७७ ॥
कर्ण! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने ही रणभूमिमें चित्रसेन आदि गन्धर्वोंको मार-पीटकर उनपर विजय पायी थी और स्त्रियोंसहित दुर्योधनको उनकी कैदसे छुड़ाया था ॥ ७७ ॥
पुनः प्रभावः पार्थस्य पौराणः केशवस्य च ।
कथितः कर्ण रामेण सभायां राजसंसदि ॥ ७८ ॥
कर्ण! पुनः तुम्हारे गुरु परशुरामजीने भी उस दिन राजसभामें अर्जुन और श्रीकृष्णके पुरातन प्रभावका वर्णन किया था ॥ ७८ ॥
सततं च त्वमश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मयोः ।
अवध्यौ वदतः कृष्णौ संनिधौ च महीक्षिताम् ॥ ७९ ॥
तुमने समस्त भूपालोंके समीप द्रोणाचार्य और भीष्मकी कही हुई बातें सदा सुनी हैं। वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुनको अवध्य बताया करते थे ॥ ७९ ॥
कियत् तत् तत् प्रवक्ष्यामि येन येन धनंजयः ।
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ब्राह्मणो यथा ॥ ८० ॥
मैं कहाँतक गिन-गिनकर बताऊँ कि किन-किन गुणोंके कारण अर्जुन तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियोंसे श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार अर्जुन तुमसे श्रेष्ठ हैं ॥ ८० ॥
इदानीमेव द्रष्टासि प्रधाने स्यन्दने स्थितौ । पुत्रं च वसुदेवस्य कुन्तीपुत्रं च पाण्डवम् ॥ ८१ ॥ तुम इसी समय प्रधान रथपर बैठे हुए वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखोगे ॥ ८१ ॥ यथाश्रयत चक्राङ्गं वायसो बुद्धिमास्थितः । तथाश्रयस्व वार्ष्णेयं पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ८२ ॥ जैसे कौआ उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर चक्रांगकी शरणमें गया था, उसी प्रकार तुम भी वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनकी शरण लो ॥ ८२ ॥ यदा त्वं युधि विक्रान्तौ वासुदेवधनंजयौ । द्रष्टास्येकरथे कर्ण तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ८३ ॥ कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनको एक रथपर बैठे देखोगे, तब ऐसी बातें नहीं बोल सकोगे ॥ ८३ ॥ यदा शरशतैः पार्थो दर्पं तव वधिष्यति । तदा त्वमन्तरं द्रष्टा आत्मनश्चार्जुनस्य च ॥ ८४ ॥ जब अर्जुन अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा तुम्हारा घमंड चूर-चूर कर देंगे, तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुनमें कितना अन्तर है? ॥ ८४ ॥ देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरोत्तमौ । तौ मावमंस्था मौर्ख्यात् त्वं खद्योत इव रोचनौ ॥ ८५ ॥ जैसे जुगनू प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमाका तिरस्कार करे, उसी प्रकार तुम देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी विख्यात उन दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनका मूर्खतावश अपमान न करो ॥ ८५ ॥ सूर्याचन्द्रमसौ यद्वत् तद्वदर्जुनकेशवौ । प्रकाशयेनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ॥ ८६ ॥ जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं, वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं। वे दोनों अपने तेजसे सर्वत्र विख्यात हैं; परंतु तुम तो मनुष्योंमें जुगनूके ही समान हो ॥ ८६ ॥ एवं विद्वान् मावमंस्थाः सूतपुत्राच्युतार्जुनौ । नृसिंहौ तौ महात्मानौ जोषमास्व विकत्थने ॥ ८७ ॥ सूतपुत्र! तुम महात्मा पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको ऐसा जानकर उनका अपमान न करो। बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करके चुपचाप बैठे रहो ॥ ८७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे हंसकाकीयोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण-शल्य-संवादके अन्तर्गत हंसकाकीयोपाख्यान- विषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८८ श्लोक हैं)
* महाडीनके सिवा, जो अन्य पचीस उड़ानें कही गयी हैं, उन सबका पृथक्-पृथक् एक-एक संपात (पंख फड़फड़ानेकी क्रिया) भी है, ये पचीस संपात जोड़नेसे एक सौ एक संख्याकी पूर्ति होती है।
कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंक
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
कर्णका श्रीकृष्ण और अर्जुनके प्रभावको स्वीकार करते हुए अभिमानपूर्वक शल्यको फटकारना और उनसे अपनेको परशुरामजीद्वारा और ब्राह्मणद्वारा प्राप्त हुए शापोंकी कथा सुनाना
संजय उवाच
मद्राधिपस्याधिरथिर्महात्मा
वचो निशम्याप्रियमप्रतीतः।
उवाच शल्यं विदितं ममैतद्
यथाविधावर्जुनवासुदेवौ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! मद्रराज शल्यकी ये अप्रिय बातें सुनकर महामनस्वी अधिरथपुत्र कर्णने असंतुष्ट होकर उनसे कहा—‘शल्य! अर्जुन और श्रीकृष्ण कैसे हैं, यह बात मुझे अच्छी तरह ज्ञात है ॥ १ ॥
शौरे रथं वाहयतोऽर्जुनस्य
बलं महास्त्राणि च पाण्डवस्य।
अहं विजानामि यथावदद्य
परोक्षभूतं तव तत् तु शल्य ॥ २ ॥
‘मद्रराज! अर्जुनका रथ हाँकनेवाले श्रीकृष्णके बल और पाण्डुपुत्र अर्जुनके महान् दिव्यास्त्रोंको इस समय मैं भलीभाँति जानता हूँ। तुम स्वयं उनसे अपरिचित हो ॥ २ ॥
तौ चाप्यहं शस्त्रभृतां वरिष्ठौ
व्यपेतभीर्योधयिष्यामि कृष्णौ।
संतापयत्यभ्यधिकं नु रामा-
च्छापोऽद्य मां ब्राह्मणसत्तमाच्च ॥ ३ ॥
‘वे दोनों कृष्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तो भी मैं उनके साथ निर्भय होकर युद्ध करूँगा। परंतु परशुरामजीसे तथा एक ब्राह्मणशिरोमणिसे मुझे जो शाप प्राप्त हुआ है, वह आज मुझे अधिक संताप दे रहा है ॥ ३ ॥
अवसं वै ब्राह्मणच्छद्मनाहं
रामे पुरा दिव्यमस्त्रं चिकीर्षुः।
तत्रापि मे देवराजेन विघ्नो
हितार्थिना फाल्गुनस्यैव शल्य ॥ ४ ॥
कृतो विभेदेन ममोरुमेत्य प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम् । ममोरुमेत्य प्रबिभेद कीटः सुप्ते गुरौ तत्र शिरो निधाय ॥ ५ ॥ ‘पूर्वकालकी बात है, मैं दिव्य अस्त्रोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्राह्मणका वेष बनाकर परशुरामजीके पास रहता था। शल्य! वहाँ भी अर्जुनका ही हित चाहनेवाले देवराज इन्द्रने मेरे कार्यमें विघ्न उपस्थित कर दिया था। एक दिन गुरुदेव मेरी जाँघपर अपना मस्तक रखकर सो गये थे। उस समय इन्द्रने एक कीड़ेके भयंकर शरीरमें प्रवेश करके मेरी जाँघके पास आकर उसे काट लिया, काटकर उसमें भारी घाव कर दिया और इस कार्यके द्वारा इन्होंने मेरे मनोरथमें विघ्न डाल दिया ।। ४-५ ।। ऊरुप्रभेदाच्च महान् बभूव शरीरतो मे घनशोणितौघः । गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं ततो विबुद्धो ददृशे स विप्रः ॥ ६ ॥ ‘जाँघमें घाव हो जानेके कारण मेरे शरीरसे गाढ़े रक्तका महान् प्रवाह बह चला; परंतु गुरुके जागनेके भयसे मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ। तत्पश्चात् जब गुरुजी जागे, तब उन्होंने यह सब कुछ देखा ।। ६ ।। स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै न त्वं विप्रः कोऽसि सत्यं वदेति । तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव- दाख्यातवान् सूत इत्येव शल्य ॥ ७ ॥ ‘शल्य! उन्होंने मुझे ऐसे धैर्यसे युक्त देखकर पूछा—‘अरे! तू ब्राह्मण तो है नहीं; फिर कौन है? सच-सच बता दे।’ तब मैंने उनसे अपना यथार्थ परिचय देते हुए इस प्रकार कहा—‘भगवन्! मैं सूत हूँ’ ।। ७ ।। स मां निशम्याथ महातपस्वी संशप्तवान् रोषपरीतचेताः । सूतोपधावाप्तमिदं तवास्त्रं न कर्मकाले प्रतिभास्यति त्वाम् ॥ ८ ॥ ‘तदनन्तर मेरा वृत्तान्त सुनकर महातपस्वी परशुरामजीके मनमें मेरे प्रति अत्यन्त रोष भर गया और उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा—‘सूत! तूने छल करके यह ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया है। इसलिये काम पड़नेपर तेरा यह अस्त्र तुझे याद न आयेगा ।। ८ ।। अन्यत्र तस्मात् तव मृत्युकाला- दब्राह्मणे ब्रह्म न हि ध्रुवं स्यात् ।
तदद्य पर्याप्तमतीव चास्त्र- मस्मिन् संग्रामे तुमुलेऽतीव भीमे ॥ ९ ॥ ‘तेरी मृत्युके समयको छोड़कर अन्य अवसरोंपर ही यह अस्त्र तेरे काम आ सकता है; क्योंकि ब्राह्मणेतर मनुष्यमें यह ब्रह्मास्त्र सदा स्थिर नहीं रह सकता।’ वह अस्त्र आज इस अत्यन्त भयंकर तुमुल संग्राममें पर्याप्त काम दे सकता है ॥ ९ ॥
योऽयं शल्य भरतेषूपपन्नः प्रकर्षणः सर्वहरोऽतिभीमः । सोऽभिमन्ये क्षत्रियाणां प्रवीरान् प्रतापिता बलवान् वै विमर्दः ॥ १० ॥ ‘शल्य! वीरोंको आकृष्ट करनेवाला, सर्वसंहारक और अत्यन्त भयंकर जो यह प्रबल संग्राम भरतवंशी क्षत्रियोंपर आ पड़ा है, वह क्षत्रिय-जातिके प्रधान-प्रधान वीरोंको निश्चय ही संतप्त करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १० ॥
शल्योग्रधन्वानमहं वरिष्ठं तरस्विनं भीममसह्यवीर्यम् । सत्यप्रतिज्ञं युधि पाण्डवेयं धनंजयं मृत्युमुखं नयिष्ये ॥ ११ ॥ ‘शल्य! आज मैं युद्धमें भयंकर धनुष धारण करनेवाले सर्वश्रेष्ठ, वेगवान्, भयंकर, असह्यपराक्रमी और सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र अर्जुनको मौतके मुखमें भेज दूँगा ॥ ११ ॥
अस्त्रं ततोऽन्यत् प्रतिपन्नमद्य येन क्षेप्स्ये समरे शत्रुपूगान् । प्रतापिनं बलवन्तं कृतास्त्रं तमुग्रधन्वानममितौजसं च ॥ १२ ॥ क्रूरं शूरं रौद्रममित्रसाहं धनंजयं संयुगेऽहं हनिष्ये । ‘उस ब्रह्मास्त्रसे भिन्न एक दूसरा अस्त्र भी मुझे प्राप्त है, जिससे आज समरांगणमें मैं शत्रुसमूहोंको मार भगाऊँगा तथा उन भयंकर धनुर्धर, अमिततेजस्वी, प्रतापी, बलवान्, अस्त्रवेत्ता, क्रूर, शूर, रौद्ररूपधारी तथा शत्रुओंका वेग सहन करनेमें समर्थ अर्जुनको भी युद्धमें मार डालूँगा ॥ १२ १/२ ॥
अपां पतिर्वेगवानप्रमेयो निमज्जयिष्यन् बहुलाः प्रजाश्च ॥ १३ ॥ महावेगं संकुरुते समुद्रो वेला चैनं धारयत्यप्रमेयम् ।
‘जलका स्वामी, वेगवान् और अप्रमेय समुद्र बहुत लोगोंको निमग्न कर देनेके लिये अपना महान् वेग प्रकट करता है; परंतु तटकी भूमि उस अनन्त महासागरको भी रोक लेती है ।। १३ १/२ ।।
प्रमुञ्चन्तं बाणसंघानमेयान् मर्मच्छिदो वीरहणः सुपत्रान् ।। १४ ।। कुन्तीपुत्रं यत्र योत्स्यामि युद्धे ज्यां कर्षतामुत्तममद्य लोके ।
‘उसी प्रकार मैं भी मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले, सुन्दर पंखोंसे युक्त, असंख्य, वीरविनाशक बाण-समूहोंका प्रयोग करनेवाले उन कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ रणभूमिमें युद्ध करूँगा, जो इस जगत्के भीतर प्रत्यंचा खींचनेवाले वीरोंमें सबसे उत्तम हैं ।। १४ १/२ ।।
एवं बलेनातिबलं महास्त्रं समुद्रकल्पं सुदुरापमुग्रम् ।। १५ ।। शरौघिणं पार्थिवान् मज्जयन्तं वेलेव पार्थमिषुभिः संसहिष्ये ।
‘कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त बलशाली, महान् अस्त्रधारी, समुद्रके समान दुर्लङ्घ्य, भयंकर, बाणसमूहोंकी धारा बहानेवाले और बहुसंख्यक भूपालोंको डुबो देनेवाले हैं; तथापि मैं समुद्रको रोकनेवाली तटभूमिके समान अपने बाणोंद्वारा अर्जुनको बलपूर्वक रोकूँगा और उनका वेग सहन करूँगा ।। १५ १/२ ।।
अद्याहवे यस्य न तुल्यमन्यं मन्ये मनुष्यं धनुराददानम् ।। १६ ।। सुरासुरान् युधि वै यो जयेत तेनाद्य मे पश्य युद्धं सुघोरम् ।
‘आज मैं युद्धमें जिनके समान इस समय किसी दूसरे मनुष्यको नहीं मानता, जो हाथमें धनुष लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी परास्त कर सकते हैं, उन्हीं वीर अर्जुनके साथ आज मेरा अत्यन्त घोर युद्ध होगा; उसे तुम देखना ।। १६ १/२ ।।
अतीव मानी पाण्डवो युद्धकामो ह्यामानुषैरेष्यति मे महास्त्रैः ।। १७ ।। तस्यास्त्रमस्त्रैः प्रतिहत्य संख्ये बाणोत्तमैः पातयिष्यामि पार्थम् ।
‘अत्यन्त मानी पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्धकी इच्छासे महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा मेरे सामने आयेंगे। उस समय मैं अपने अस्त्रोंद्वारा उनके अस्त्रका निवारण करके युद्धस्थलमें उत्तम बाणोंसे कुन्तीकुमार अर्जुनको मार गिराऊँगा ।। १७ १/२ ।।
सहस्ररश्मिप्रतिमं ज्वलन्तं दिशश्च सर्वाः प्रतपन्तमुग्रम् ॥ १८ ॥ तमोनुदं मेघ इवातिमात्रं धनंजयं छादयिष्यामि बाणैः । ‘सहस्रों किरणोंवाले सूर्यके सदृश प्रकाशित हो सम्पूर्ण दिशाओंको ताप देते हुए भयंकर वीर अर्जुनको मैं अपने बाणोंद्वारा उसी प्रकार अत्यन्त आच्छादित कर दूँगा, जैसे मेघ अन्धकारनाशक सूर्यदेवको ढक देता है ॥
वैश्वानरं धूमशिखं ज्वलन्तं तेजस्विनं लोकमिदं दहन्तम् ॥ १९ ॥ पर्जन्यभूतः शरवर्षैरथाग्निं तथा पार्थं शमयिष्यामि युद्धे । ‘जैसे प्रलयकालका मेघ इस जगत्को दग्ध करनेवाले तेजस्वी एवं प्रज्वलित धूममयी शिखावाले संवर्तक अग्निको बुझा देता है, उसी प्रकार मैं मेघ बनकर बाणोंकी वर्षाद्वारा युद्धमें अग्निरूपी अर्जुनको शान्त कर दूँगा ॥ १९½ ॥
आशीविषं दुर्धरमप्रमेयं सुतीक्ष्णदंष्ट्रं ज्वलनप्रभावम् ॥ २० ॥ क्रोधप्रदीप्तं त्वहितं महान्तं कुन्तीपुत्रं शमयिष्यामि भल्लैः । ‘तीखे दाढ़ोंवाले विषधर सर्पके समान दुर्धर्ष, अप्रमेय, अग्निके समान प्रभावशाली तथा क्रोधसे प्रज्वलित अपने महान् शत्रु कुन्तीपुत्र अर्जुनको मैं भल्लोंद्वारा शान्त कर दूँगा ॥ २०½ ॥
प्रमाथिनं बलवन्तं प्रहारिणं प्रभञ्जनं मातरिश्वानमुग्रम् ॥ २१ ॥ युद्धे सहिष्ये हिमवानिवाचलो धनंजयं क्रुद्धममृष्यमाणम् । ‘वृक्षोंको तोड़-उखाड़ देनेवाली प्रचण्ड वायुके समान प्रमथनशील, बलवान्, प्रहारकुशल, तोड़-फोड़ करनेवाले तथा अमर्षशील क्रुद्ध अर्जुनका वेग आज मैं युद्धस्थलमें हिमालय पर्वतके समान अचल रहकर सहन करूँगा ॥ २१½ ॥
विशारदं रथमार्गेषु शक्तं धुर्यं नित्यं समरेषु प्रवीरम् ॥ २२ ॥ लोके वरं सर्वधनुर्धराणां धनंजयं संयुगे संसहिष्ये ।