महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 3204)
त्रयोविंशोऽध्यायः
शल्य, भगदत्त, भीष्म और द्रोणको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख गान्धारीका विलाप
गान्धार्युवाच
एष शल्यो हतः शेते साक्षान्नकुलमातुलः ।
धर्मज्ञेन हतस्तात धर्मराजेन संयुगे ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— तात! देखो, ये नकुलके सगे मामा शल्य मरे पड़े हैं। इन्हें धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरने युद्धमें मारा है ॥ १ ॥
यस्त्वया स्पर्धते नित्यं सर्वत्र पुरुषर्षभ ।
स एष निहतः शेते मद्रराजो महाबलः ॥ २ ॥
पुरुषोत्तम! जो सदा और सर्वत्र तुम्हारे साथ होड़ लगाये रहते थे, वे ही ये महाबली मद्रराज शल्य यहाँ मारे जाकर चिरनिद्रामें सो रहे हैं ॥ २ ॥
येन संगृह्णता तात रथमाधिरथेर्युधि ।
जयार्थं पाण्डुपुत्राणां तथा तेजोवधः कृतः ॥ ३ ॥
तात! ये वे ही शल्य हैं, जिन्होंने युद्धमें सूतपुत्र कर्णके रथकी बागडोर सँभालते समय पाण्डवोंकी विजयके लिये उसके तेज और उत्साहको नष्ट किया था ॥ ३ ॥
अहो धिक्पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् ।
मुखं पद्मपलाशाक्षं काकैरादष्टमव्रणम् ॥ ४ ॥
अहो! धिक्कार है। देखो न, शल्यके पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति दर्शनीय तथा कमलदलके सदृश नेत्रोंवाले व्रणरहित मुखको कौओंने कुछ-कुछ काट दिया है ॥ ४ ॥
अस्य चामीकराभस्य तप्तकाञ्चनप्रभा ।
आस्याद् विनिःसृता जिह्वा भक्ष्यते कृष्ण पक्षिभिः ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! सुवर्णके समान कान्तिमान् शल्यके मुखसे तपाये हुए सोनेके समान कान्तिवाली जीभ बाहर निकल आयी है और पक्षी उसे नोच-नोचकर खा रहे हैं ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरेण निहतं शल्यं समितिशोभनम् ।
रुदत्यः पर्युपासन्ते मद्रराजं कुलाङ्गनाः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरके द्वारा मारे गये तथा युद्धमें शोभा पानेवाले मद्रराज शल्यको ये कुलांगनाएँ चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं और रो रही हैं ॥ ६ ॥
एताः सुसूक्ष्मवसना मद्रराजं नरर्षभम् ।
क्रोशन्त्योऽथ समासाद्य क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥ ७ ॥
अत्यन्त महीन वस्त्र पहने हुए ये क्षत्राणियाँ क्षत्रिय-शिरोमणि नरश्रेष्ठ मद्रराजके पास आकर कैसा करुण क्रन्दन कर रही हैं ॥ ७ ॥
शल्यं निपतितं नार्यः परिवार्थ्याभितः स्थिताः ।
वासिता गृष्ट्यः पङ्के परिमग्नमिव द्विपम् ॥ ८ ॥
रणभूमिमें गिरे हुए राजा शल्यको उनकी स्त्रियाँ उसी तरह सब ओरसे घेरे हुए हैं, जैसे एक बारकी ब्यायी हुई हथिनियाँ कीचड़में फँसे हुए गजराजको घेरकर खड़ी हों ॥ ८ ॥
शल्यं शरणदं शूरं पश्येमं वृष्णिनन्दन ।
शयानं वीरशयने शरैर्विशकलीकृतम् ॥ ९ ॥
वृष्णिनन्दन! देखो, ये दूसरोंको शरण देनेवाले शूरवीर शल्य बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर वीरशय्यापर सो रहे हैं ॥ ९ ॥
एष शैलालयो राजा भगदत्तः प्रतापवान् ।
गजाङ्कुशधरः श्रीमान् शेते भुवि निपातितः ॥ १० ॥
ये पर्वतीय, तेजस्वी एवं प्रतापी राजा भगदत्त हाथमें हाथीका अंकुश लिये पृथ्वीपर सो रहे हैं। इन्हें अर्जुनने मार गिराया था ॥ १० ॥
यस्य रुक्ममयी माला शिरस्येषा विराजते ।
श्वापदैर्भक्ष्यमाणस्य शोभयन्तीव मूर्धजान् ॥ ११ ॥
इन्हें हिंसक जीव-जन्तु खा रहे हैं। इनके सिरपर यह सोनेकी माला विराज रही है, जो केशोंकी शोभा बढ़ाती-सी जान पड़ती है ॥ ११ ॥
एतेन किल पार्थस्य युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
रोमहर्षणमत्युग्रं शक्रस्य त्वहिना यथा ॥ १२ ॥
जैसे वृत्रासुरके साथ इन्द्रका अत्यन्त भयंकर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार इन भगदत्तके साथ कुन्तीकुमार अर्जुनका अत्यन्त दारुण एवं रोमांचकारी युद्ध हुआ था ॥ १२ ॥
योधयित्वा महाबाहुरेष पार्थं धनंजयम् ।
संशयं गमयित्वा च कुन्तीपुत्रेण पातितः ॥ १३ ॥
उन महाबाहुने कुन्तीकुमार धनंजयके साथ युद्ध करके उन्हें संशयमें डाल दिया था; परंतु अन्तमें ये उन कुन्तीकुमारके ही हाथसे मारे गये ॥ १३ ॥
यस्य नास्ति समो लोके शौर्ये वीर्ये च कश्चन ।
स एष निहतः शेते भीष्मो भीष्मकृताहवे ॥ १४ ॥
संसारमें शौर्य और बलमें जिनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, वे ही ये युद्धमें भयंकर कर्म करनेवाले भीष्मजी घायल हो बाणशय्यापर सो रहे हैं ॥ १४ ॥
पश्य शान्तनवं कृष्ण शयानं सूर्यवर्चसम् ।
युगान्त इव कालेन पतितं सूर्यमम्बरात् ॥ १५ ॥
श्रीकृष्ण! देखो, ये सूर्यके समान तेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म कैसे सो रहे हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो प्रलयकालमें कालसे प्रेरित हो सूर्यदेव आकाशसे भूमिपर गिर पड़े हैं॥ १५ ॥ एष तप्त्वा रणे शत्रून् शस्त्रतापेन वीर्यवान् । नरसूर्योऽस्तमभ्येति सूर्योऽस्तमिव केशव ॥ १६ ॥ केशव! जैसे सूर्य सारे जगत्को ताप देकर अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी तरह ये पराक्रमी मानवसूर्य रणभूमिमें अपने शस्त्रोंके प्रतापसे शत्रुओंको संतप्त करके अस्त हो रहे हैं॥ १६ ॥ शरतल्पगतं भीष्ममूर्ध्वरेतसमच्युतम् । शयानं वीरशयने पश्य शूरनिषेविते ॥ १७ ॥ जो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी रहकर कभी मर्यादासे च्युत नहीं हुए हैं, उन भीष्मको शूरसेवित वीरोचित शयन बाणशय्यापर सोते हुए देख लो ॥ १७ ॥ कर्णिनालीकनाराचैरास्तीर्य शयनोत्तमम् । आविश्य शेते भगवान् स्कन्दः शरवणं यथा ॥ १८ ॥ जैसे भगवान् स्कन्द सरकण्डोंके समूहपर सोये थे, उसी प्रकार ये भीष्मजी कर्णी, नालीक और नाराच आदि बाणोंकी उत्तम शय्या बिछाकर उसीका आश्रय ले सो रहे हैं॥ १८ ॥ अतूलपूर्ण गाङ्गेयस्त्रिभिर्बाणैः समन्वितम् । उपधायोपधानाग्र्यं दत्तं गाण्डीवधन्वना ॥ १९ ॥ इन गङ्गानन्दन भीष्मने रूई भरा हुआ तकिया नहीं लिया है। इन्होंने तो गाण्डीवधारी अर्जुनके दिये हुए तीन बाणोंद्वारा निर्मित श्रेष्ठ उपधान (तकिये)-को ही स्वीकार किया है॥ १९ ॥ पालयानः पितुः शास्त्रमूर्ध्वरेता महायशाः । एष शान्तनवः शेते माधवाप्रतिमो युधि ॥ २० ॥ माधव! पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए महायशस्वी नैष्ठिक ब्रह्मचारी ये शान्तनुनन्दन भीष्म जिनकी युद्धमें कहीं तुलना नहीं है, यहाँ सो रहे हैं॥ २० ॥ धर्मात्मा तात सर्वज्ञः पारावर्य्येण निर्णये । अमर्त्य इव मर्त्यः सन्नैष प्राणानधारयत् ॥ २१ ॥ तात! ये धर्मात्मा और सर्वज्ञ हैं। परलोक और इहलोकसम्बन्धी ज्ञानद्वारा सभी आध्यात्मिक प्रश्नोंका निर्णय करनेमें समर्थ हैं तथा मनुष्य होनेपर भी देवताके तुल्य हैं; इन्होंने अभीतक अपने प्राण धारण कर रखे हैं॥ २१ ॥ नास्ति युद्धे कृती कश्चिन्न विद्वान् न पराक्रमी । यत्र शान्तनवो भीष्मः शेतेऽद्य निहतः शरैः ॥ २२ ॥
जब ये शान्तनुनन्दन भीष्म भी आज शत्रुओंके बाणोंसे मारे जाकर सो रहे हैं तो यही कहना पड़ता है कि 'युद्धमें न कोई कुशल है, न विद्वान् है और न पराक्रमी ही है' ।। २२ ।। स्वयमेतेन शूरेण पृच्छ्यमानेन पाण्डवैः । धर्मज्ञेनाहवे मृत्युरादिष्टः सत्यवादिना ।। २३ ।। पाण्डवोंके पूछनेपर इन धर्मज्ञ एवं सत्यवादी शूरवीरने स्वयं ही अपनी मृत्युका उपाय बता दिया था ।। २३ ।। प्रणष्टः कुरुवंशश्च पुनर्येन समुद्धृतः । स गतः कुरुभिः सार्धं महाबुद्धिः पराभवम् ।। २४ ।। जिन्होंने नष्ट हुए कुरुवंशका पुनः उद्धार किया था, वे ही परम बुद्धिमान् भीष्म इन कौरवोंके साथ परास्त हो गये ।। २४ ।। धर्मेषु कुरवः कं नु परिप्रक्ष्यन्ति माधव । गते देवव्रते स्वर्गं देवकल्पे नरर्षभे ।। २५ ।। माधव! इन देवतुल्य नरश्रेष्ठ देवव्रतके स्वर्गलोकमें चले जानेपर अब कौरव किसके पास जाकर धर्मविषयक प्रश्न करेंगे ।। २५ ।। अर्जुनस्य विनेतारमाचार्यं सात्यकेस्तथा । तं पश्य पतितं द्रोणं कुरूणां गुरुमुत्तमम् ।। २६ ।। जो अर्जुनके शिक्षक, सात्यकिके आचार्य तथा कौरवोंके श्रेष्ठ गुरु थे, वे द्रोणाचार्य रणभूमिमें गिरे हुए हैं, उन्हें भी देख लो ।। २६ ।। अस्त्रं चतुर्विधं वेद यथैव त्रिदशेश्वरः । भार्गवो वा महावीर्यस्तथा द्रोणोऽपि माधव ।। २७ ।। माधव! जैसे देवराज इन्द्र अथवा महापराक्रमी परशुरामजी चार प्रकारकी अस्त्रविद्याको जानते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी जानते थे ।। २७ ।। यस्य प्रसादाद् वीभत्सुः पाण्डवः कर्म दुष्करम् । चकार स हतः शेते नैनमस्त्राण्यपालयन् ।। २८ ।। जिनके प्रसादसे पाण्डुनन्दन अर्जुनने दुष्कर कर्म किया है, वे ही आचार्य यहाँ मरे पड़े हैं। उन अस्त्रोंने इनकी रक्षा नहीं की ।। २८ ।। यं पुरोधाय कुरव आह्वयन्ति स्म पाण्डवान् । सोऽयं शस्त्रभृतां श्रेष्ठो द्रोणः शस्त्रैः परिक्षतः ।। २९ ।। जिनको आगे रखकर कौरव पाण्डवोंको ललकारा करते थे, वे ही शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो गये हैं ।। २९ ।। यस्य निर्दहतः सेनां गतिरग्नेरिवाभवत् । स भूमौ निहतः शेते शान्तार्चिरिव पावकः ।। ३० ।।
शत्रुओंकी सेनाको दग्ध करते समय जिनकी गति अग्निके समान होती थी, वे ही बुझी हुई लपटोंवाली आगके समान मरकर पृथ्वीपर पड़े हैं ।। ३० ।। धनुर्मुष्टिरशीर्णाश्च हस्तावापश्च माधव । द्रोणस्य निहतस्याजौ दृश्यते जीवतो यथा ।। ३१ ।। माधव! युद्धमें मारे जानेपर भी द्रोणाचार्यके धनुषके साथ जुड़ी हुई मुट्ठी ढीली नहीं हुई है। दस्ताना भी ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है, मानो वह जीवित पुरुषके हाथमें हो ।। ३१ ।। वेदा यस्माच्च चत्वारः सर्वाण्यस्त्राणि केशव । अनपेतानि वै शूराद् यथैवादौ प्रजापतेः ।। ३२ ।। वन्दनार्हाविमौ तस्य बन्दिभिर्वन्दितौ शुभौ । गोमायवो विकर्षन्ति पादौ शिष्यशतार्चितौ ।। ३३ ।। केशव! जैसे पूर्वकालसे ही प्रजापति ब्रह्मासे वेद कभी अलग नहीं हुए, उसी प्रकार जिन शूरवीर द्रोणसे चारों वेद और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र कभी दूर नहीं हुए, उन्हींके बन्दीजनोंद्वारा वन्दित इन दोनों सुन्दर एवं वन्दनीय चरणारविन्दोंको जिनकी सैकड़ों शिष्य पूजा कर चुके हैं, गीदड़ घसीट रहे हैं ।। ३२-३३ ।। द्रोणं द्रुपदपुत्रेण निहतं मधुसूदन । कृपी कृपणमन्वास्ते दुःखोपहतचेतना ।। ३४ ।। मधुसूदन! द्रुपदपुत्रके द्वारा मारे गये द्रोणाचार्यके पास उनकी पत्नी कृपी बड़े दीनभावसे बैठी है। दुःखसे उसकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है ।। ३४ ।। तां पश्य रुदतीमार्ता मुक्तकेशीमधोमुखीम् । हतं पतिमुपासन्तीं द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ।। ३५ ।। देखो, कृपी केश खोले नीचे मुँह किये रोती हुई अपने मारे गये पति शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यकी उपासना कर रही है ।। ३५ ।। बाणैर्भिन्नतनुत्राणं धृष्टद्युम्नेन केशव । उपास्ते वै मृधे द्रोणं जटिला ब्रह्मचारिणी ।। ३६ ।। केशव! धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंसे जिन आचार्य द्रोणका कवच छिन्न-भिन्न कर दिया है, उन्हींके पास युद्धस्थलमें वह जटाधारिणी ब्रह्मचारिणी कृपी बैठी हुई है ।। ३६ ।। प्रेतकृत्यं च यतते कृपी कृपणमातुरा । हतस्य समरे भर्तुः सुकुमारी यशस्विनी ।। ३७ ।। शोकसे दीन और आतुर हुई यशस्विनी सुकुमारी कृपी समरमें मारे गये पतिदेवका प्रेतकर्म करनेकी चेष्टा कर रही है ।। ३७ ।। अग्नीनाधाय विधिवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वतः । द्रोणमाधाय गायन्ति त्रीणि सामानि सामगाः ।। ३८ ।।
विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करके चिताको सब ओरसे प्रज्वलित कर दिया गया है और उसपर द्रोणाचार्यके शरीरको रखकर सामगान करनेवाले ब्राह्मण त्रिविध सामका गान करते हैं॥ ३८॥
कुर्वन्ति च चितामेते जटिला ब्रह्मचारिणः ।
धनुर्भिः शक्तिभिश्चैव रथनीडैश्च माधव ॥ ३९ ॥
शरैश्च विविधैरन्यैर्धक्ष्यते भूरितेजसम् ।
इति द्रोणं समाधाय शंसन्ति च रुदन्ति च ॥ ४० ॥
सामभिस्त्रिभिरन्तस्थैरनुशंसन्ति चापरे ।
माधव! इन जटाधारी ब्रह्मचारियोंने धनुष, शक्ति, रथकी बैठक और नाना प्रकारके बाण तथा अन्य आवश्यक वस्तुओंसे उस चिताका निर्माण किया है। वे उसीपर महातेजस्वी द्रोणको जलाना चाहते थे; इसलिये द्रोणको चितापर रखकर वे वेदमन्त्र पढ़ते और रोते हैं, कुछ लोग अन्त समयमें उपयोगी त्रिविध सामोंका गान करते हैं॥ ३९-४० १/२ ॥
अग्नावग्निं समाधाय द्रोणं हुत्वा हुताशने ॥ ४१ ॥
गच्छन्त्यभिमुखा गङ्गां द्रोणशिष्या द्विजातयः ।
अपसव्यां चितिं कृत्वा पुरस्कृत्य कृपीं च ते ॥ ४२ ॥
चिताकी अग्निमें अग्निहोत्रसहित द्रोणाचार्यको रखकर उनकी आहुति दे उन्हींके शिष्य द्विजातिगण कृपीको आगे और चिताको दायें करके गंगाजीके तटकी ओर जा रहे हैं॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवचने त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवचनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३॥
अध्याय (पृष्ठ 3210)
चतुर्विंशोऽध्यायः
भूरिश्रवाके पास उसकी पत्नियोंका विलाप, उन सबको तथा शकुनिको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख शोकोद्गार
गान्धार्युवाच
सोमदत्तसुतं पश्य युयुधानेन पातितम् ।
वितुद्यमानं विहगैर्बहुभिर्माधवान्तिके ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— माधव! देखो, सात्यकिने जिन्हें मार गिराया था, वे ही ये सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा पास ही दिखायी दे रहे हैं। इन्हें बहुत-से पक्षी चोंच मार-मारकर नोच रहे हैं॥ १ ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तः सोमदत्तो जनार्दन ।
युयुधानं महेष्वासं गर्हयन्निव दृश्यते ॥ २ ॥
जनार्दन! उधर पुत्रशोकसे संतप्त होकर मरे हुए सोमदत्त महाधनुर्धर सात्यकिकी निन्दा करते हुए-से दिखायी दे रहे हैं॥ २ ॥
असौ हि भूरिश्रवसो माता शोकपरिप्लुता ।
आश्वासयति भर्तारं सोमदत्तमनिन्दिता ॥ ३ ॥
उधर वे शोकमें डूबी हुई भूरिश्रवाकी सती साध्वी माता अपने पतिको मानो आश्वासन देती हुई कहती हैं— ॥ ३ ॥
दिष्ट्या नैनं महाराज दारुणं भरतक्षयम् ।
कुरुसंक्रन्दनं घोरं युगान्तमनुपश्यसि ॥ ४ ॥
‘महाराज! सौभाग्यसे आपको यह भरतवंशियोंका दारुण विनाश, घोर प्रलयके समान कुरुकुलका महासंहार देखनेका अवसर नहीं मिला है॥ ४ ॥
दिष्ट्या यूपध्वजं पुत्रं वीरं भूरिसहस्रदम् ।
अनेकक्रतुयज्वानं निहतं नानुपश्यसि ॥ ५ ॥
‘जिसकी ध्वजामें यूपका चिह्न था, जो सहस्रों स्वर्ण-मुद्राओंकी भूरि-भूरि दक्षिणा दिया करता था और जिसने अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया था, उस वीर पुत्र भूरिश्रवाकी मृत्युका कष्ट सौभाग्यसे आप नहीं देख रहे हैं॥
दिष्ट्या स्नुषाणामाक्रन्दे घोरं विलपितं बहु ।
न शृणोषि महाराज सारसीनामिवार्णवे ॥ ६ ॥
'महाराज! समुद्रतटपर चीत्कार करनेवाली सारसियोंके समान इस युद्धस्थलमें आप अपने इन पुत्रवधुओंका अत्यन्त भयानक विलाप नहीं सुन रहे हैं, यह भाग्यकी ही बात है ॥ ६ ॥ एकवस्त्रार्धसंवीताः प्रकीर्णासितमूर्धजाः । स्नुषास्ते परिधावन्ति हतापत्या हतेश्वराः ॥ ७ ॥ 'आपकी पुत्रवधुएँ एक वस्त्र अथवा आधे वस्त्रसे ही शरीरको ढँककर अपनी काली-काली लटें छिटकाये इस युद्धभूमिमें चारों ओर दौड़ रही हैं। इन सबके पुत्र और पति भी मारे जा चुके हैं ॥ ७ ॥ श्वापदैर्भक्ष्यमाणं त्वमहो दिष्ट्या न पश्यसि । छिन्नबाहुं नरव्याघ्रमर्जुनेन निपातितम् ॥ ८ ॥ शलं विनिहतं संख्ये भूरिश्रवसमेव च । स्नुषाश्च विविधाः सर्वा दिष्ट्या नाद्येह पश्यसि ॥ ९ ॥ 'अहो! आपका बड़ा भाग्य है कि अर्जुनने जिसकी एक बाँह काट ली थी और सात्यकिने जिसे मार गिराया था, युद्धमें मारे गये उस भूरिश्रवा और शलको आप हिंसक जन्तुओंका आहार बनते नहीं देखते हैं तथा इन सब अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली पुत्रवधुओंको भी आज यहाँ रणभूमिमें भटकती हुई नहीं देख रहे हैं ॥ ८-९ ॥ दिष्ट्या तत् काञ्चनं छत्रं यूपकेतोर्महात्मनः । विनिकीर्णं रथोपस्थे सौमदत्तेर्न पश्यसि ॥ १० ॥ 'सौभाग्यसे अपने महामनस्वी पुत्र यूपध्वज भूरिश्रवाके रथपर खण्डित होकर गिरे हुए उसके सुवर्णमय छत्रको आप नहीं देख पा रहे हैं' ॥ १० ॥ अमूस्तु भूरिश्रवसो भार्याः सात्यकिना हतम् । परिवार्यानुशोचन्ति भर्तारमसितेक्षणाः ॥ ११ ॥ श्रीकृष्ण! भूरिश्रवाकी कजरारे नेत्रोंवाली वे पत्नियाँ सात्यकिद्वारा मारे गये अपने पतिको सब ओरसे घेरकर बारंबार शोकसे पीड़ित हो रही हैं ॥ ११ ॥ एता विलप्य करुणं भर्तृशोकेन कर्शिताः । पतन्त्यभिमुखा भूमौ कृपणं बत केशव ॥ १२ ॥ केशव! पतिशोकसे पीड़ित हुई ये अबलाएँ करुणाजनक विलाप करके पतिके सामने अत्यन्त दुःखसे पछाड़ खा-खाकर गिर रही हैं ॥ १२ ॥ बीभत्सुरतिबीभत्सं कर्मेदमकरोत् कथम् । प्रमत्तस्य यदच्छैत्सीद् बाहुं शूरस्य यज्वनः ॥ १३ ॥ वे कहती हैं—'अर्जुनने यह अत्यन्त घृणित कर्म कैसे किया? कि दूसरेके साथ युद्धमें लगे रहकर उनकी ओरसे असावधान हुए आप-जैसे यज्ञपरायण शूरवीरकी बाँह काट डाली ॥ १३ ॥
ततः पापतरं कर्म कृतवानपि सात्यकिः ।
यस्मात् प्रायोपविष्टस्य प्राहार्षीत् संशितात्मनः ॥ १४ ॥
‘उनसे भी बढ़कर घोर पापकर्म सात्यकिने किया है; क्योंकि उन्होंने आमरण अनशनके लिये बैठे हुए एक शुद्धात्मा साधुपुरुषके ऊपर खड्गका प्रहार किया है ।।
एको द्वाभ्यां हतः शेषे त्वमधर्मेण धार्मिक ।
किं नु वक्ष्यति वै सत्सु गोष्ठीषु च सभासु च ॥ १५ ॥
अपुण्यमयशस्यं च कर्मेदं सात्यकिः स्वयम् ।
इति यूपध्वजस्यैताः स्त्रियः क्रोशन्ति माधव ॥ १६ ॥
‘धर्मात्मा महापुरुष! तुम अकेले दो महारथियोंद्वारा अधर्मपूर्वक मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हो। भला, सात्यकि साधु पुरुषोंकी सभाओं और बैठकोंमें अपने लिये कलंकका टीका लगानेवाले इस पापकर्मका वर्णन स्वयं अपने ही मुखसे किस प्रकार करेंगे?’ माधव! इस प्रकार यूपध्वजकी ये स्त्रियाँ सात्यकिको कोस रही हैं ॥ १५-१६ ॥
भार्या यूपध्वजस्यैषा करसम्मितमध्यमा ।
कृत्वोत्सङ्गे भुजं भर्तुः कृपणं परिदेवति ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण! देखो, यूपध्वजकी यह पतली कमरवाली भार्या पतिकी कटी हुई बाँहको गोदमें लेकर बड़े दीनभावसे विलाप कर रही है ॥ १७ ॥
अयं स हन्ता शूराणां मित्राणामभयप्रदः ।
प्रदाता गोसहस्राणां क्षत्रियान्तकरः करः ॥ १८ ॥
वह कहती है—‘हाय! यह वही हाथ है, जिसने युद्धमें अनेक शूरवीरोंका वध, मित्रोंको अभयदान, सहस्रों गोदान तथा क्षत्रियोंका संहार किया है ॥ १८ ॥
अयं स रसनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः ।
नाभ्यूरूजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥ १९ ॥
‘यह वही हाथ है, जो हमारी करधनीको खींच लेता, उभरे हुए स्तनोंका मर्दन करता, नाभि, ऊरु और जघन प्रदेशको छूता और नीवीका बन्धन सरका दिया करता था ॥ १९ ॥
वासुदेवस्य सांनिध्ये पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
युध्यतः समरेऽन्येन प्रमत्तस्य निपातितः ॥ २० ॥
‘जब मेरे पति समरांगणमें दूसरेके साथ युद्धमें संलग्न हो अर्जुनकी ओरसे असावधान थे, उस समय भगवान् श्रीकृष्णके निकट अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनने इस हाथको काट गिराया था ॥ २० ॥
किं नु वक्ष्यसि संसत्सु कथासु च जनार्दन ।
अर्जुनस्य महत् कर्म स्वयं वा स किरीटभृत् ॥ २१ ॥
‘जनार्दन! तुम सत्पुरुषोंकी सभाओंमें, बातचीतके प्रसंगमें अर्जुनके महान् कर्मका किस तरह वर्णन करोगे? अथवा स्वयं किरीटधारी अर्जुन ही कैसे इस जघन्य कार्यकी चर्चा
करेंगे?' ।। २१ ।।
इत्येवं गर्हयित्वैषा तूष्णीमास्ते वराङ्गना ।
तामेतामनुशोचन्ति सपत्न्यः स्वामिव स्नुषाम् ।। २२ ।।
इस तरह अर्जुनकी निन्दा करके यह सुन्दरी चुप हो गयी है। इसकी बड़ी सौतें इसके लिये उसी प्रकार शोक प्रकट कर रही हैं, जैसे सास अपनी बहूके लिये किया करती है ।। २२ ।।
गान्धारराजः शकुनिर्बलवान् सत्यविक्रमः ।
निहतः सहदेवेन भागिनेयेन मातुलः ।। २३ ।।
यह गान्धारदेशका राजा महाबली सत्यपराक्रमी शकुनि पड़ा हुआ है। इसे सहदेवने मारा है। भानजेने मामाके प्राण लिये हैं ।। २३ ।।
यः पुरा हेमदण्डाभ्यां व्यजनाभ्यां स्म वीज्यते ।
स एष पक्षिभिः पक्षैः शयान उपवीज्यते ।। २४ ।।
पहले सोनेके डंडोंसे विभूषित दो-दो व्यजनोंद्वारा जिसको हवा की जाती थी, वही शकुनि आज धरतीपर सो रहा है और पक्षी अपनी पाँखोंसे इसको हवा करते हैं ।।
यः स्वरूपाणि कुरुते शतशोऽथ सहस्रशः ।
तस्य मायाविनो माया दग्धाः पाण्डवतेजसा ।। २५ ।।
जो अपने सैकड़ों और हजारों रूप बना लिया करता था, उस मायावीकी सारी मायाएँ पाण्डुपुत्र सहदेवके तेजसे दग्ध हो गयीं ।। २५ ।।
मायया निकृतिप्रज्ञो जितवान् यो युधिष्ठिरम् ।
सभायां विपुलं राज्यं स पुनर्जीवितं जितः ।। २६ ।।
जो छलविद्याका पण्डित था, जिसने द्यूतसभामें मायाद्वारा युधिष्ठिर तथा उनके विशाल राज्यको जीत लिया था, वही फिर अपना जीवन भी हार गया ।। २६ ।।
शकुन्ताः शकुनिं कृष्ण समन्तात् पर्युपासते ।
कैतवं मम पुत्राणां विनाशायोपशिक्षितम् ।। २७ ।।
श्रीकृष्ण! आज शकुनि (पक्षी) ही इस शकुनिकी चारों ओरसे उपासना करते हैं। इसने मेरे पुत्रोंके विनाशके लिये ही द्यूतविद्या अथवा धूर्तविद्या सीखी थी ।। २७ ।।
एतेनैतन्महद् वैरं प्रसक्तं पाण्डवैः सह ।
वधाय मम पुत्राणामात्मनः सगणस्य च ।। २८ ।।
इसीने सगे-सम्बन्धियोंसहित अपने और मेरे पुत्रोंके वधके लिये पाण्डवोंके साथ महान् वैरकी नींव डाली थी ।। २८ ।।
यथैव मम पुत्राणां लोकाः शस्त्रजिताः प्रभो ।
एवमस्यापि दुर्बुद्धेर्लोकाः शस्त्रेण वै जिताः ।। २९ ।।
प्रभो! जैसे मेरे पुत्रोंको शस्त्रोंद्वारा जीते हुए पुण्यलोक प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार इस दुर्बुद्धि शकुनिको भी शस्त्रद्वारा जीते हुए उत्तम लोक प्राप्त होंगे ॥ २९ ॥
कथं च नायं तत्रापि पुत्रान्मे भ्रातृभिः सह ।
विरोधयेदृजुप्रज्ञाननृजुर्मधुसूदन ॥ ३० ॥
मधुसूदन! मेरे पुत्र सरल बुद्धिके हैं। मुझे भय है कि उन पुण्यलोकोंमें पहुँचकर यह शकुनि फिर किसी प्रकार उन सब भाइयोंमें परस्पर विरोध न उत्पन्न कर दे ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3215)
पञ्चविंशोऽध्यायः
अन्यान्य वीरोंको मरा हुआ देखकर गान्धारीका शोकातुर होकर विलाप करना और क्रोधपूर्वक श्रीकृष्णको यदुवंशविनाशविषयक शाप देना
गान्धार्युवाच
काम्बोजं पश्य दुर्धर्षं काम्बोजास्तरणोचितम् ।
शयानमृभस्कन्धं हतं पांसुषु माधव ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— माधव! जो काबुलके बने हुए मुलायम बिछौनोंपर सोनेके योग्य है, वह बैलके समान हृष्ट-पुष्ट कंधोंवाला दुर्जय वीर काम्बोजराज सुदक्षिण मरकर धूलमें पड़ा हुआ है ॥ १ ॥
यस्य क्षतजसंदिग्धौ बाहू चन्दनभूषितौ ।
अवेक्ष्य करुणं भार्या विलपत्यतिदुःखिता ॥ २ ॥
उसकी चन्दनचर्चित भुजाओंको रक्तमें सनी हुई देख उसकी पत्नी अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक विलाप कर रही है ॥ २ ॥
इमौ तौ परिघप्रख्यौ बाहू शुभतलाङ्गुली ।
ययोर्विवरमापन्नां न रतिर्मां पुराजहात् ॥ ३ ॥
कां गतिं तु गमिष्यामि त्वया हीना जनेश्वर ।
वह कहती है—'प्राणनाथ! सुन्दर हथेली और अंगुलियोंसे युक्त तथा परिघके समान मोटी ये वे ही दोनों भुजाएँ हैं, जिनके भीतर आप मुझे अंकमें भर लेते थे और उस अवस्थामें मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त होती थी, उसने पहले कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा था। जनेश्वर! अब आपके बिना मेरी क्या गति होगी?' ॥ ३ ½ ॥
हतबन्धुरनाथा च वेपन्ती मधुरस्वरा ॥ ४ ॥
आतपे क्लाम्यमानानां विविधानामिव स्रजाम् ।
क्लान्तानामपि नारीणां श्रीर्जहाति न वै तनूः ॥ ५ ॥
श्रीकृष्ण! अपने जीवनबन्धुके मारे जानेसे अनाथ हुई यह रानी काँपती हुई मधुर स्वरसे विलाप कर रही है। घामसे मुरझाती हुई नाना प्रकारकी पुष्पमालाओंके समान ये राज-रानियाँ धूपसे तप गयीं हैं, तो भी इनके शरीरोंको सौन्दर्य—श्री छोड़ नहीं रही है ॥ ४-५ ॥
शयानमभितः शूरं कालिङ्गं मधुसूदन ।
पश्य दीप्ताङ्गदयुगप्रतिनद्धमहाभुजम् ॥ ६ ॥
मधुसूदन! देखो, पास ही वह शूरवीर कलिंगराज सो रहा है, जिसकी दोनों विशाल भुजाओंमें चमकीले अंगद (बाजूबन्द) बँधे हुए हैं ॥ ६ ॥ मागधानामधिपतिं जयत्सेनं जनार्दन । आवार्य सर्वतः पत्न्यः प्ररुदत्यः सुविह्वलाः ॥ ७ ॥ जनार्दन! उधर मगधराज जयत्सेन पड़ा है, जिसे चारों ओरसे घेरकर उसकी पत्नियाँ अत्यन्त व्याकुल हो फूट-फूटकर रो रही हैं ॥ ७ ॥ आसामायतनेत्राणां सुस्वराणां जनार्दन । मनःश्रुतिहरो नादो मनो मोहयतीव मे ॥ ८ ॥ श्रीकृष्ण! मधुर स्वरवाली इन विशाललोचना रानियोंका मन और कानोंको मोह लेनेवाला आर्तनाद मेरे मनको मूर्च्छित-सा किये देता है ॥ ८ ॥ प्रकीर्णवस्त्राभरणा रुदत्यः शोककर्शिताः । स्वास्तीर्णशयनोपेता मागध्यः शेरते भुवि ॥ ९ ॥ इनके वस्त्र और आभूषण अस्त-व्यस्त हो रहे हैं। सुन्दर बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर शयन करनेके योग्य ये मगधदेशकी रानियाँ शोकसे व्याकुल हो रोती हुई भूमिपर लोट रही हैं ॥ ९ ॥ कोसलानामधिपतिं राजपुत्रं बृहद्बलम् । भर्तारं परिवार्यैताः पृथक् प्ररुदिताः स्त्रियः ॥ १० ॥ अपने पति कोसलनरेश राजकुमार बृहद्बलको भी चारों ओरसे घेरकर उनकी रानियाँ अलग-अलग रो रही हैं ॥ अस्य गात्रगतान् बाणान् कार्ष्णिबाहुबलार्पितान् । उद्धरन्त्यसुखाविष्टा मूर्च्छमानाः पुनः पुनः ॥ ११ ॥ अभिमन्युके बाहुबलसे प्रेरित होकर कोसल-नरेशके अंगोंमें धँसे हुए बाणोंको ये रानियाँ अत्यन्त दुःखी होकर निकालती हैं और बारंबार मूर्च्छित हो जाती हैं ॥ ११ ॥ आसां सर्वानवद्यानामातपेन परिश्रमात् । प्रम्लाननलिनाभानि भान्ति वक्त्राणि माधव ॥ १२ ॥ माधव! इन सर्वांगसुन्दरी राजमहिलाओंके सुन्दर मुख धूप और परिश्रमके कारण मुरझाये हुए कमलोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ १२ ॥ द्रोणेन निहताः शूराः शेरते रुचिराङ्गदाः । धृष्टद्युम्नसुताः सर्वे शिशवो हेममालिनः ॥ १३ ॥ ये द्रोणाचार्यके मारे हुए धृष्टद्युम्नके सभी छोटे-छोटे शूरवीर बालक सो रहे हैं। इनकी भुजाओंमें सुन्दर अंगद और गलेमें सोनेके हार शोभा पाते हैं ॥ १३ ॥ रथाग्न्यगारं चापार्चिःशरशक्तिगदेन्धनम् । द्रोणमासाद्य निर्दग्धाः शलभा इव पावकम् ॥ १४ ॥
द्रोणाचार्य प्रज्वलित अग्निके समान थे, उनका रथ ही अग्निशाला था, धनुष ही उस अग्निकी लपट था, बाण, शक्ति और गदाएँ समिधाका काम दे रही थीं, धृष्टद्युम्नके पुत्र पतंगोंके समान उस द्रोणरूपी अग्निमें चलकर भस्म हो गये ॥
तथैव निहताः शूराः शेरते रुचिराङ्गदाः ।
द्रोणेनाभिमुखाः सर्वे भ्रातरः पञ्च केकयाः ॥ १५ ॥
इसी प्रकार सुन्दर अंगदोंसे विभूषित पाँचों शूरवीर भाई केकय राजकुमार समरांगणमें सम्मुख होकर जूझ रहे थे। वे सब-के-सब आचार्य द्रोणके हाथसे मारे जाकर सो रहे हैं ॥ १५ ॥
तप्तकाञ्चनवर्मांणस्तालध्वजरथव्रजाः ।
भासयन्ति महीं भासा ज्वलिता इव पावकाः ॥ १६ ॥
इन सबके कवच तपाये हुए सुवर्णके बने हैं और इनके रथसमूह तालचिह्नित ध्वजाओंसे सुशोभित हैं। ये राजकुमार अपनी प्रभासे प्रज्वलित अग्निके समान भूतलको प्रकाशित कर रहे हैं ॥ १६ ॥
द्रोणेन द्रुपदं संख्ये पश्य माधव पातितम् ।
महाद्वीपमिवारण्ये सिंहेन महता हतम् ॥ १७ ॥
माधव! देखो, युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यने जिन्हें मार गिराया था, वे राजा द्रुपद सो रहे हैं, मानो किसी वनमें विशाल सिंहके द्वारा कोई महान् गजराज मारा गया हो ॥
पाञ्चालराज्ञो विमलं पुण्डरीकाक्ष पाण्डुरम् ।
आतपत्रं समाभाति शरदीव निशाकरः ॥ १८ ॥
कमलनयन! पांचालराजका वह निर्मल श्वेत छत्र शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हो रहा है ॥ १८ ॥
एतास्तु द्रुपदं वृद्धं स्नुषा भार्याश्च दुःखिताः ।
दग्ध्वा गच्छन्ति पाञ्चाल्यं राजानमपसव्यतः ॥ १९ ॥
इन बूढ़े पांचालराज द्रुपदको इनकी दुःखी रानियाँ और पुत्रवधुएँ चितामें जलाकर इनकी प्रदक्षिणा करके जा रही हैं ॥ १९ ॥
धृष्टकेतुं महात्मानं चेदिपुङ्गवमङ्गनाः ।
द्रोणेन निहतं शूरं हरन्ति हतचेतसः ॥ २० ॥
चेदिराज महामना शूरवीर धृष्टकेतुको जो द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया है, उसकी रानियाँ अचेत-सी होकर दाह-संस्कारके लिये ले जा रही हैं ॥ २० ॥
द्रोणास्त्रमभिहत्यैष विमर्दे मधुसूदन ।
महेष्वासो हतः शेते नद्या हत इव द्रुमः ॥ २१ ॥
मधुसूदन! यह महाधनुर्धर वीर संग्राममें द्रोणाचार्यके अस्त्र-शस्त्रोंका नाश करके नदीके वेगसे कटे हुए वृक्षके समान मरकर धराशायी हो गया ॥ २१ ॥
एष चेदिपतिः शूरो धृष्टकेतुर्महारथः । शेते विनिहतः संख्ये हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ २२ ॥ यह चेदिराज शूरवीर महारथी धृष्टकेतु सहस्रों शत्रुओंको मारकर मारा गया और रणशय्यापर सदाके लिये सो गया ॥ २२ ॥
वितुद्यमानं विहगैस्तं भार्याः पर्युपासिताः । चेदिराजं हृषीकेश हतं सबलबान्धवम् ॥ २३ ॥ हृषीकेश! सेना और बन्धुओंसहित मारे गये इस चेदिराजको पक्षी चोंच मार रहे हैं और उसकी स्त्रियाँ उसे चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं ॥ २३ ॥
दाशार्हीपुत्रजं वीरं शयानं सत्यविक्रमम् । आरोप्याङ्के रुदन्त्येताश्चेदिराजवराङ्गनाः ॥ २४ ॥ दशार्हकुलकी कन्या (श्रुतश्रवा)-के पुत्र शिशुपालका यह सत्यपराक्रमी वीर पुत्र रणभूमिमें सो रहा है और इसे अंकमें लेकर ये चेदिराजकी सुन्दरी रानियाँ रो रही हैं ॥ २४ ॥
अस्य पुत्रं हृषीकेश सुवक्त्रं चारुकुण्डलम् । द्रोणेन समरे पश्य निकृत्तं बहुधा शरैः ॥ २५ ॥ हृषीकेश! देखो तो सही, इस धृष्टकेतुके सुन्दर मुख और मनोहर कुण्डलोंवाले पुत्रको द्रोणाचार्यने समरांगणमें अपने बाणोंद्वारा मारकर उसके अनेक टुकड़े कर डाले हैं ॥ २५ ॥
पितरं नूनमाजिस्थं युद्ध्यमानं परैः सह । नाजहात् पितरं वीरमद्यापि मधुसूदन ॥ २६ ॥ मधुसूदन! रणभूमिमें स्थित होकर शत्रुओंके साथ जूझनेवाले अपने पिताका साथ इसने कभी नहीं छोड़ा था, आज युद्धके बाद भी वह पिताको नहीं छोड़ सका है ॥ २६ ॥
एवं ममापि पुत्रस्य पुत्रः पितरमन्वगात् । दुर्योधनं महाबाहो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ २७ ॥ महाबाहो! इसी प्रकार मेरे पुत्रके पुत्र शत्रुवीर-हन्ता लक्ष्मणने भी अपने पिता दुर्योधनका अनुसरण किया है ॥ २७ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पतितौ पश्य माधव । हिमान्ते पुष्पितौ शालौ मरुता गलिताविव ॥ २८ ॥ माधव! जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें हवाके वेगसे दो खिले हुए शालवृक्ष गिर गये हों, उसी प्रकार अवन्तीदेशके दोनों वीर राजपुत्र विन्द और अनुविन्द धराशायी हो गये हैं, इनपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
काञ्चनाङ्गदवर्माणौ बाणखड्गधनुर्धरौ । ऋषभप्रतिरूपाक्षौ शयानौ विमलस्रजौ ॥ २९ ॥ इन दोनोंने सोनेके कवच धारण किये हैं, बाण, खड्ग और धनुष लिये हैं तथा बैलके समान बड़ी-बड़ी आँखोंवाले ये दोनों वीर चमकीले हार पहने हुए सो रहे हैं ॥ २९ ॥
अवध्याः पाण्डवाः कृष्ण सर्व एव त्वया सह ।
ये मुक्ता द्रोणभीष्माभ्यां कर्णाद् वैकर्तनात् कृपात् ॥ ३० ॥
दुर्योधनाद् द्रोणसुतात् सैन्धवाच्च जयद्रथात् ।
सोमदत्ताद् विकर्णाच्च शूराच्च कृतवर्मणः ॥ ३१ ॥
श्रीकृष्ण! तुम्हारे साथ ही ये समस्त पाण्डव अवध्य जान पड़ते हैं, जो कि द्रोण, भीष्म, वैकर्तन कर्ण, कृपाचार्य, दुर्योधन, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, सिंधुराज जयद्रथ, सोमदत्त, विकर्ण और शूरवीर कृतवर्माके हाथसे जीवित बच गये हैं॥ ३०-३१ ॥
ये हन्युः शस्त्रवेगेन देवानपि नरर्षभाः ।
त इमे निहताः संख्ये पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ३२ ॥
जो नरश्रेष्ठ अपने शस्त्रके वेगसे देवताओंको भी नष्ट कर सकते थे, वे ही ये युद्धमें मार डाले गये हैं; यह कालका उलट-फेर तो देखो॥ ३२ ॥
नातिभारोऽस्ति दैवस्य ध्रुवं माधव कश्चन ।
यदिमे निहताः शूराः क्षत्रियैः क्षत्रियर्षभाः ॥ ३३ ॥
माधव! निश्चय ही दैवके लिये कोई भी कार्य अधिक कठिन नहीं है; क्योंकि उसने क्षत्रियोंद्वारा ही इन शूरवीर क्षत्रियशिरोमणियोंका संहार कर डाला है॥
तदैव निहताः कृष्ण मम पुत्रास्तरस्विनः ।
यदैवाकृतकामस्त्वमुपप्लव्यं गतः पुनः ॥ ३४ ॥
श्रीकृष्ण! मेरे वेगशाली पुत्र तो उसी दिन मार डाले गये, जब कि तुम अपूर्णमनोरथ होकर पुनः उपप्लव्यको लौट गये थे॥ ३४ ॥
शान्तनोश्चैव पुत्रेण प्राज्ञेन विदुरेण च ।
तदैवोक्तास्मि मा स्नेहं कुरुष्वात्मसुतेष्विति ॥ ३५ ॥
मुझे तो शान्तनुनन्दन भीष्म तथा ज्ञानी विदुरने उसी दिन कह दिया था ‘कि अब तुम अपने पुत्रोंपर स्नेह न करो’॥ ३५ ॥
तयोर्हि दर्शनं नैतन्मिथ्या भवितुमर्हति ।
अचिरेणैव मे पुत्रा भस्मीभूता जनार्दन ॥ ३६ ॥
जनार्दन! उन दोनोंकी यह दृष्टि मिथ्या नहीं हो सकती थी; अतः थोड़े ही समयमें मेरे सारे पुत्र युद्धकी आगमें जलकर भस्म हो गये॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा न्यपतद् भूमौ गान्धारी शोकमूर्च्छिता ।
दुःखोपहतविज्ञाना धैर्यमुत्सृज्य भारत ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! ऐसा कहकर शोकसे मूर्च्छित हुई गान्धारी धैर्य छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़ीं, दुःखसे उनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी॥ ३७ ॥
ततः कोपपरीताङ्गी पुत्रशोकपरिप्लुता । जगाम शौरिं दोषेण गान्धारी व्यथितेन्द्रिया ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उनके सारे अंगोंमें क्रोध व्याप्त हो गया। पुत्रशोकमें डूब जानेके कारण उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। उस समय गान्धारीने सारा दोष श्रीकृष्णके ही माथे मढ़ दिया ॥ ३८ ॥
गान्धार्युवाच
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च दग्धाः कृष्ण परस्परम् । उपेक्षिता विनश्यन्तस्त्वया कस्माज्जनार्दन ॥ ३९ ॥ गान्धारीने कहा—श्रीकृष्ण! जनार्दन! पाण्डव और धृतराष्ट्रके पुत्र आपसमें लड़कर भस्म हो गये। तुमने इन्हें नष्ट होते देखकर भी इनकी उपेक्षा कैसे कर दी? ॥ ३९ ॥ शक्तेन बहुभृत्येन विपुले तिष्ठता बले । उभयत्र समर्थेन श्रुतवाक्येन चैव ह ॥ ४० ॥ इच्छतोपेक्षितो नाशः कुरूणां मधुसूदन । यस्मात् त्वया महाबाहो फलं तस्मादवाप्नुहि ॥ ४१ ॥ महाबाहु मधुसूदन! तुम शक्तिशाली थे। तुम्हारे पास बहुत-से सेवक और सैनिक थे। तुम महान् बलमें प्रतिष्ठित थे। दोनों पक्षोंसे अपनी बात मनवा लेनेकी सामर्थ्य तुममें मौजूद थी। तुमने वेद-शास्त्रों और महात्माओंकी बातें सुनी और जानी थीं। यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छासे कुरुकुलके नाशकी उपेक्षा की—जानबूझकर इस वंशका विनाश होने दिया। यह तुम्हारा महान् दोष है, अतः तुम इसका फल प्राप्त करो ॥ ४०-४१ ॥ पतिशुश्रूषया यन्मे तपः किंचिदुपार्जितम् । तेन त्वां दुरवापेन शप्स्ये चक्रगदाधर ॥ ४२ ॥ चक्र और गदा धारण करनेवाले केशव! मैंने पतिकी सेवासे जो कुछ भी तप प्राप्त किया है, उस दुर्लभ तपोबलसे तुम्हें शाप दे रही हूँ ॥ ४२ ॥ यस्मात् परस्परं घ्नन्तो ज्ञातयः कुरुपाण्डवाः । उपेक्षितास्ते गोविन्द तस्माज्ज्ञातीन् वधिष्यसि ॥ ४३ ॥ गोविन्द! तुमने आपसमें मारकाट मचाते हुए कुटुम्बी कौरवों और पाण्डवोंकी उपेक्षा की है; इसलिये तुम अपने भाई-बन्धुओंका भी विनाश कर डालोगे ॥ ४३ ॥ त्वमप्युपस्थिते वर्षे षट्त्रिंशे मधुसूदन । हतज्ञातिर्हतामात्यो हतपुत्रो वनेचरः ॥ ४४ ॥ अनाथवदविज्ञातो लोकेष्वनभिलक्षितः । कुत्सितेनाभ्युपायेन निधनं समवाप्स्यसि ॥ ४५ ॥
मधुसूदन! आजसे छत्तीसवाँ वर्ष उपस्थित होनेपर तुम्हारे कुटुम्बी, मन्त्री और पुत्र सभी आपसमें लड़कर मर जायँगे। तुम सबसे अपरिचित और लोगोंकी आँखोंसे ओझल होकर अनाथके समान वनमें विचरोगे और किसी निन्दित उपायसे मृत्युको प्राप्त होओगे॥ ४४-४५॥
तवाप्येवं हतसुता निहतज्ञातिबान्धवाः।
स्त्रियः परिपतिष्यन्ति यथैता भरतस्त्रियः॥ ४६॥
इन भरतवंशकी स्त्रियोंके समान तुम्हारे कुलकी स्त्रियाँ भी पुत्रों तथा भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर इसी तरह सगे-सम्बन्धियोंकी लाशोंपर गिरेंगी॥ ४६॥
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं घोरं वासुदेवो महामनाः।
उवाच देवीं गान्धारीमीषदभ्युत्स्मयन्निव॥ ४७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! वह घोर वचन सुनकर महामनस्वी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने कुछ मुसकराते हुए-से गान्धारीदेवीसे कहा— ॥ ४७॥
जानेऽहमेतदप्येवं चीर्णं चरसि क्षत्रिये।
दैवादेव विनश्यन्ति वृष्णयो नात्र संशयः॥ ४८॥
‘क्षत्राणी! मैं जानता हूँ, यह ऐसा ही होनेवाला है। तुम तो किये हुएको ही कर रही हो। इसमें संदेह नहीं कि वृष्णिवंशके यादव दैवसे ही नष्ट होंगे॥ ४८॥
संहर्ता वृष्णिचक्रस्य नान्यो मद् विद्यते शुभे।
अवध्यास्ते नरैरन्यैरपि वा देवदानवैः॥ ४९॥
परस्परकृतं नाशमतः प्राप्स्यन्ति यादवाः।
‘शुभे! वृष्णिकुलका संहार करनेवाला मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है। यादव दूसरे मनुष्यों तथा देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य हैं; अतः आपसमें ही लड़कर नष्ट होंगे’॥ ४९ १/२ ॥
इत्युक्तवति दाशार्हे पाण्डवास्त्रस्तचेतसः।
बभूवुर्भृशसंविग्ना निराशाश्चापि जीविते॥ ५०॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पाण्डव मन-ही-मन भयभीत हो उठे। उन्हें बड़ा उद्वेग हुआ। वे सब-के-सब अपने जीवनसे निराश हो गये॥ ५०॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीशापदाने पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीका शापदानविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५॥
(श्राद्धपर्व)
(श्राद्धपर्व)
षड्विंशोऽध्यायः
प्राप्त अनुस्मृतिविद्या और दिव्यदृष्टिके प्रभावसे युधिष्ठिरका महाभारतयुद्धमें मारे गये लोगोंकी संख्या और गतिका वर्णन तथा युधिष्ठिरकी आज्ञासे सबका दाह-संस्कार
श्रीभगवानुवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारि मा च शोके मनः कृथाः ।
तवैव ह्यपराधेन कुरवो निधनं गताः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—गान्धारी! उठो, उठो। शोकमें मनको न डुबाओ। तुम्हारे ही अपराधसे कौरवोंका विनाश हुआ है ॥ १ ॥
यत् त्वं पुत्रं दुरात्मानमीर्षुमत्यन्तमानिनम् ।
दुर्योधनं पुरस्कृत्य दुष्कृतं साधु मन्यसे ॥ २ ॥
निष्ठुरं वैरपुरुषं वृद्धानां शासनातिगम् ।
कथमात्मकृतं दोषं मय्याधातुमिहेच्छसि ॥ ३ ॥
तुम्हारा पुत्र दुर्योधन दुरात्मा, दूसरोंसे ईर्ष्या एवं जलन रखनेवाला और अत्यन्त अभिमानी था। दुष्कर्मपरायण, निष्ठुर, वैरका मूर्तिमान् स्वरूप और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला था। तुमने उसको अगुआ बनाकर जो अपराध किया है, उसे क्या तुम अच्छा समझती हो? अपने ही किये हुए दोषको यहाँ मुझपर कैसे लादना चाहती हो? ॥ २-३ ॥
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति ।
दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ॥ ४ ॥
यदि कोई मनुष्य किसी मरे हुए सम्बन्धी, नष्ट हुई वस्तु अथवा बीती हुई बातके लिये शोक करता है तो वह एक दुःखसे दूसरे दुःखका भागी होता है, इस प्रकार वह दो अनर्थोंको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
तपोर्थियं ब्राह्मणी धत्त गर्भं
** गौर्वोढारं धावितारं तुरङ्गी ।
शूद्रा दासं पशुपालं च वैश्या
** वधार्थियं त्वद्विधा राजपुत्री ॥ ५ ॥