महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2472)
षष्ठोऽध्यायः
दुर्योधनके पूछनेपर अश्वत्थामाका शल्यको सेनापति बनानेके लिये प्रस्ताव, दुर्योधनका शल्यसे अनुरोध और शल्यद्वारा उसकी स्वीकृति
संजय उवाच
अथ हैमवते प्रस्थे स्थित्वा युद्धाभिनन्दिनः ।
सर्व एव महायोधास्तत्र तत्र समागताः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! तदनन्तर हिमालयके ऊपरकी चौरस भूमिमें डेरा डालकर युद्धका अभिनन्दन करनेवाले सभी महान् योद्धा वहाँ एकत्र हुए ॥ १ ॥
शल्यश्च चित्रसेनश्च शकुनिश्च महारथः ।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥
सुषेणोऽरिष्टसेनश्च धृतसेनश्च वीर्यवान् ।
जयत्सेनश्च राजानस्ते रात्रिमुषितास्ततः ॥ ३ ॥
शल्य, चित्रसेन, महारथी शकुनि, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, सात्वतवंशी कृतवर्मा, सुषेण, अरिष्टसेन, पराक्रमी धृतसेन और जयत्सेन आदि राजाओंने वहीं रात बितायी ॥ २-३ ॥
रणे कर्णे हते वीरे त्रासिता जितकाशिभिः ।
नालभन् शर्म ते पुत्रा हिमवन्तमृते गिरिम् ॥ ४ ॥
रणभूमिमें वीर कर्णके मारे जानेपर विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा डराये हुए आपके पुत्र हिमालय पर्वतके सिवा और कहीं शान्ति न पा सके ॥ ४ ॥
तेऽब्रुवन् सहितास्तत्र राजानं शल्यसंनिधौ ।
कृतयत्ना रणे राजन् सम्पूज्य विधिवत्तदा ॥ ५ ॥
राजन्! संग्रामभूमिमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सब योद्धाओंने वहाँ एक साथ होकर शल्यके समीप राजा दुर्योधनका विधिपूर्वक सम्मान करके उससे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
कृत्वा सेनाप्रणेतारं परांस्त्वं योद्धुमर्हसि ।
येनाभिगुप्ताः संग्रामे जयेमासुहृदो वयम् ॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! तुम किसीको सेनापति बनाकर शत्रुओंके साथ युद्ध करो, जिससे सुरक्षित होकर हमलोग विपक्षियोंपर विजय प्राप्त करें’ ॥ ६ ॥
ततो दुर्योधनः स्थित्वा रथे रथवरोत्तमम् ।
सर्वयुद्धविभावज्ञमन्तकप्रतिमं युधि ॥ ७ ॥
स्वङ्गं प्रच्छन्नशिरसं कम्बुग्रीवं प्रियंवदम् । व्याकोशपद्मपत्राक्षं व्याघ्रास्यं मेरुगौरवम् ॥ ८ ॥ स्थाणोर्वृषस्य सदृशं स्कन्धनेत्रगतिस्वरैः । पुष्टश्लिष्टायतभुजं सुविस्तीर्णवरोरसम् ॥ ९ ॥ बले जवे च सदृशमरुणानुजवातयोः । आदित्यस्यार्चिषा तुल्यं बुद्ध्या चौशनसा समम् ॥ १० ॥ कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसा समम् । काञ्चनोपलसंघातैः सदृशं श्लिष्टसंधिकम् ॥ ११ ॥ सुवृत्तोरुकटीजङ्घं सुपादं स्वङ्गुलीनखम् । स्मृत्वा स्मृत्वैव तु गुणान् धात्रा यत्नाद् विनिर्मितम् ॥ १२ ॥ सर्वलक्षणसम्पन्नं निपुणं श्रुतिसागरम् । जेतारं तरसारीणामजेयमरिभिर्बलात् ॥ १३ ॥ दशाङ्गं यश्चतुष्पादमिश्वस्त्रं वेद तत्त्वतः । साङ्गांस्तु चतुरो वेदान् सम्यगाख्यानपञ्चमान् ॥ १४ ॥ आराध्य त्र्यम्बकं यत्नाद् व्रतैरुग्रैर्महातपाः । अयोनिजायामुत्पन्नो द्रोणेनायोनिजेन यः ॥ १५ ॥ तमप्रतिमकर्माणं रूपेणाप्रतिमं भुवि । पारगं सर्वविद्यानां गुणार्णवमनिन्दितम् ॥ १६ ॥ तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्वत्थामानमब्रवीत् ।
राजन्! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथपर बैठकर अश्वत्थामाके निकट गया। अश्वत्थामा महारथियोंमें श्रेष्ठ, युद्धविषयक सभी विभिन्न भावोंका ज्ञाता और युद्धमें यमराजके समान भयंकर है। उसके अंग सुन्दर हैं, मस्तक केशोंसे आच्छादित है और कण्ठ शंखके समान सुशोभित होता है। वह प्रिय वचन बोलनेवाला है। उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर और मुख व्याघ्रके समान भयंकर है। उसमें मेरुपर्वतकी-सी गुरुता है। स्कन्ध, नेत्र, गति और स्वरमें वह भगवान् शंकरके वाहन वृषभके समान है। उसकी भुजाएँ पुष्ट, सुगठित एवं विशाल हैं। वक्षःस्थलका उत्तमभाग भी सुविस्तृत है। वह बल और वेगमें गरुड़ एवं वायुकी बराबरी करनेवाला है। तेजमें सूर्य और बुद्धिमें शुक्राचार्यके समान है। कान्ति, रूप तथा मुखकी शोभा—इन तीन गुणोंमें वह चन्द्रमाके तुल्य है। उसका शरीर सुवर्णमय प्रस्तरसमूहके समान सुशोभित होता है। अंगोंका जोड़ या संधिस्थान भी सुगठित है। ऊरु, कटिप्रदेश और पिण्डलियाँ—ये सुन्दर और गोल हैं। उसके दोनों चरण मनोहर हैं। अंगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाताने उत्तम गुणोंका बारंबार स्मरण करके बड़े यत्नसे उसके अंगोंका निर्माण किया हो। वह समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त कार्योंमें कुशल और वेदविद्याका समुद्र है। अश्वत्थामा शत्रुओंपर वेगपूर्वक विजय पानेमें समर्थ है।
परंतु शत्रुओंके लिये बलपूर्वक उसके ऊपर विजय पाना असम्भव है। वह दसों<sup>३</sup> अंगोंसे युक्त चारों<sup>३</sup> चरणोंवाले धनुर्वेदको ठीक-ठीक जानता है। छहों अंगोंसहित चार वेदों और इतिहास-पुराण-स्वरूप पंचम वेदका भी अच्छा ज्ञाता है। महातपस्वी अश्वत्थामाको उसके पिता अयोनिज द्रोणाचार्यने बड़े यत्नसे कठोर व्रतोंद्वारा तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरकी आराधना करके अयोनिजा कृपीके गर्भसे उत्पन्न किया था। उसके कर्मोंकी कहीं तुलना नहीं है। इस भूतलपर वह अनुपम रूप-सौन्दर्यसे युक्त है। सम्पूर्ण विद्याओंका पारंगत विद्वान् और गुणोंका महासागर है। उस अनिन्दित अश्वत्थामाके निकट जाकर आपके पुत्र दुर्योधनने इस प्रकार कहा— ।। ७—१६१/२ ।।
यं पुरस्कृत्य सहिता युधि जेष्याम पाण्डवान् ।। १७ ।।
गुरुपुत्रोऽद्य सर्वेषामस्माकं परमा गतिः ।
भवांस्तस्मान्नियोगात्ते कोऽस्तु सेनापतिर्मम ।। १८ ।।
'ब्रह्मन्! तुम हमारे गुरुपुत्र हो और इस समय तुम्हीं हमारे सबसे बड़े सहारे हो। अतः मैं तुम्हारी आज्ञासे सेनापतिका निर्वाचन करना चाहता हूँ। बताओ, अब कौन मेरा सेनापति हो, जिसे आगे रखकर हम सब लोग एक साथ हो युद्धमें पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करें?' ।। १७-१८ ।।
द्रौणिरुवाच
अयं कुलेन रूपेण तेजसा यशसा श्रिया ।
सर्वैर्गुणैः समुदितः शल्यो नोऽस्तु चमूपतिः ।। १९ ।।
**अश्वत्थामाने कहा—**ये राजा शल्य उत्तम कुल, सुन्दर रूप, तेज, यश, श्री एवं समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये ही हमारे सेनापति हों ।। १९ ।।
भागिनेयान् निजांस्त्यक्त्वा कृतज्ञोऽस्मानुपागतः ।
महासेनो महाबाहुर्महासेन इवापरः ।। २० ।।
ये ऐसे कृतज्ञ हैं कि अपने सगे भानजोंको भी छोड़कर हमारे पक्षमें आ गये हैं। ये महाबाहु शल्य दूसरे महासेन (कार्तिकेय)-के समान महती सेनासे सम्पन्न हैं ।। २० ।।
एनं सेनापतिं कृत्वा नृपतिं नृपसत्तम ।
शक्यः प्राप्तुं जयोऽस्माभिर्देवैः स्कन्दमिवाजितम् ।। २१ ।।
नृपश्रेष्ठ! जैसे देवताओंने किसीसे पराजित न होनेवाले स्कन्दको सेनापति बनाकर असुरोंपर विजय प्राप्त की थी, उसी प्रकार हमलोग भी इन राजा शल्यको सेनापति बनाकर शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर सकते हैं ।। २१ ।।
तथोक्ते द्रोणपुत्रेण सर्व एव नराधिपाः ।
परिवार्य स्थिताः शल्यं जयशब्दांश्च चक्रिरे ।। २२ ।।
युद्धाय च मतिं चक्रूरावेशं च परं ययुः ।
द्रोणपुत्रके ऐसा कहनेपर सभी नरेश राजा शल्यको घेरकर खड़े हो गये और उनकी जय-जयकार करने लगे। उन्होंने युद्धके लिये पूर्ण निश्चय कर लिया और वे अत्यन्त आवेशमें भर गये॥ २२ १/२ ॥
ततो दुर्योधनो भूमौ स्थित्वा रथवरे स्थितम् ॥ २३ ॥
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा द्रोणभीष्मसमं रणे ।
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल ॥ २४ ॥
यत्र मित्रममित्रं वा परीक्षन्ते बुधा जनाः ।
तदनन्तर राजा दुर्योधनने भूमिपर खड़ा हो रथपर बैठे हुए रणभूमिमें द्रोण और भीष्मके समान पराक्रमी राजा शल्यसे हाथ जोड़कर कहा—'मित्रवत्सल! आज आपके मित्रोंके सामने वह समय आ गया है जब कि विद्वान् पुरुष शत्रु या मित्रकी परीक्षा करते हैं॥ २३-२४ १/२ ॥
स भवानस्तु नः शूरः प्रणेता वाहिनीमुखे ॥ २५ ॥
रणं याते च भवति पाण्डवा मन्दचेतसः ।
भविष्यन्ति सहामात्याः पञ्चालाश्च निरुद्यमाः ॥ २६ ॥
'आप हमारे शूरवीर सेनापति होकर सेनाके मुहानेपर खड़े हों। रणभूमिमें आपके जाते ही मन्दबुद्धि पाण्डव और पांचाल अपने मन्त्रियोंसहित उद्योगशून्य हो जायँगे' ॥ २५-२६ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यो मद्राधिपस्तदा ।
उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो राजानं राजसंनिधौ ॥ २७ ॥
उस समय वचनके रहस्यको जाननेवाले मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य दुर्योधनके वचन सुनकर समस्त राजाओंके सम्मुख राजा दुर्योधनसे यह वचन बोले ॥ २७ ॥
शल्य उवाच
यत्तु मां मन्यसे राजन् कुरुराज करोमि तत् ।
त्वत्प्रियार्थं हि मे सर्वं प्राणा राज्यं धनानि च ॥ २८ ॥
**शल्य बोले—**राजन्! कुरुराज! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, मैं उसे पूर्ण करूँगा; क्योंकि मेरे प्राण, राज्य और धन सब तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ही हैं॥
दुर्योधन उवाच
सैनापत्येन वरये त्वामहं मातुलातुलम् ।
सोऽस्मान् पाहि युधां श्रेष्ठ स्कन्दो देवानिवाहवे ॥ २९ ॥
**दुर्योधनने कहा—**योद्धाओंमें श्रेष्ठ मामाजी! आप अनुपम वीर हैं। अतः मैं सेनापति-पद ग्रहण करनेके लिये आपका वरण करता हूँ। जैसे स्कन्दने युद्धस्थलमें देवताओंकी रक्षा की थी, उसी प्रकार आप हमलोगोंका पालन कीजिये॥
अध्याय (पृष्ठ 2476)
शल्यका कौरवोंके सेनापतिपदपर अभिषेक
अभिषिच्यस्व राजेन्द्र देवानाामिव पावकिः ।
जहि शत्रून् रणे वीर महेन्द्रो दानवानिव ॥ ३० ॥
राजाधिराज! वीर! जैसे स्कन्दने देवताओंका सेनापतित्व स्वीकार किया था, उसी प्रकार आप भी हमारे सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक कराइये तथा दानवोंका वध करनेवाले देवराज इन्द्रके समान रणभूमिमें हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्यदुर्योधनसंवादे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्य और दुर्योधनका संवादविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
१. धनुर्वेदके दस अंग इस प्रकार हैं—व्रत, प्राप्ति, धृति, पुष्टि, स्मृति, क्षेप, शत्रुभेदन, चिकित्सा, उद्दीपन और कृष्टि।
२. दीक्षा, शिक्षा, आत्मरक्षा और इसका साधन—ये धनुर्वेदके चार चरण कहे गये हैं।
अध्याय (पृष्ठ 2478)
सप्तमोऽध्यायः
राजा शल्यके वीरोचित उद्गार तथा श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको शल्यवधके लिये उत्साहित करना
संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो मद्रराजः प्रतापवान् ।
दुर्योधनं तदा राजन् वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! राजा दुर्योधनकी यह बात सुनकर प्रतापी मद्रराज शल्यने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
दुर्योधन महाबाहो शृणु वाक्यविदां वर ।
यावेतौ मन्यसे कृष्णौ रथस्थौ रथिनां वरौ ॥ २ ॥
न मे तुल्यावुभावेतौ बाहुवीर्ये कथंचन ।
'वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु दुर्योधन! तुम रथपर बैठे हुए जिन दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुनको रथियोंमें श्रेष्ठ समझते हो, ये दोनों बाहुबलमें किसी प्रकार मेरे समान नहीं हैं ॥ २ १/२ ॥
उद्यतां पृथिवीं सर्वां ससुरासुरमानवाम् ॥ ३ ॥
योधयेयं रणमुखे संक्रुद्धः किमु पाण्डवान् ।
'मैं युद्धके मुहानेपर कुपित हो अपने सामने युद्धके लिये आये हुए देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सारे भूमण्डलके साथ युद्ध कर सकता हूँ। फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ३ १/२ ॥
विजेष्यामि रणे पार्थान् सोमकांश्च समागतान् ॥ ४ ॥
अहं सेनाप्रणेता ते भविष्यामि न संशयः ।
तं च व्यूहं विधास्यामि न तरिष्यन्ति यं परे ॥ ५ ॥
इति सत्यं ब्रवीम्येष दुर्योधन न संशयः ।
'मैं रणभूमिमें कुन्तीके सभी पुत्रों और सामने आये हुए सोमकोंपर भी विजय प्राप्त कर लूँगा। इसमें भी संदेह नहीं कि मैं तुम्हारा सेनापति होऊँगा और ऐसे व्यूहका निर्माण करूँगा, जिसे शत्रु लाँघ नहीं सकेंगे। दुर्योधन! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। इसमें कोई संशय नहीं है' ॥ ४-५ १/२ ॥
एवमुक्तस्ततो राजा मद्राधिपतिमञ्जसा ॥ ६ ॥
अभ्यषिञ्चत सेनाया मध्ये भरतसत्तम ।
विधिना शास्त्रदृष्टेन क्लिष्टरूपो विशाम्पते ॥ ७ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रजानाथ! उनके ऐसा कहनेपर क्लेशसे दबे हुए राजा दुर्योधनने शास्त्रीय विधिके अनुसार सेनाके मध्यभागमें मद्रराज शल्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया॥ ६-७॥ अभिषिक्ते ततस्तस्मिन् सिंहनादो महानभूत्। तव सैन्येऽभ्यवादयन्त वादित्राणि च भारत॥ ८॥ भारत! उनका अभिषेक हो जानेपर आपकी सेनामें बड़े जोरसे सिंहनाद होने लगा और भाँति-भाँतिके बाजे बज उठे॥ ८॥ हृष्टाश्चासंस्तथा योधा मद्रकाश्च महारथाः। तुष्टुवुश्चैव राजानं शल्यमाहवशोभिनम्॥ ९॥ मद्रदेशके महारथी योद्धा हर्षमें भर गये और संग्राममें शोभा पानेवाले राजा शल्यकी स्तुति करने लगे—॥ ९॥ जय राजंश्चिरञ्जीव जहि शत्रून् समागतान्। तव बाहुबलं प्राप्य धार्तराष्ट्रा महाबलाः॥ १०॥ निखिलाः पृथिवीं सर्वां प्रशासन्तु हतद्विषः। 'राजन्! आप चिरंजीवी हों। सामने आये हुए शत्रुओंका संहार कर डालें। आपके बाहुबलको पाकर धृतराष्ट्रके सभी महाबली पुत्र शत्रुओंका नाश करके सारी पृथ्वीका शासन करें॥ १० १/२॥ त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानवान्॥ ११॥ मर्त्यधर्माण इह तु किमु सृञ्जयसोमकान्। 'आप रणभूमिमें सम्पूर्ण देवताओं, असुरों और मनुष्योंको जीत सकते हैं। फिर यहाँ मरणधर्मा सृञ्जयों और सोमकोंपर विजय पाना कौन बड़ी बात है?'॥ ११ १/२॥ एवं सम्पूज्यमानस्तु मद्राणामधिपो बली॥ १२॥ हर्षं प्राप तदा वीरो दुरापमकृतात्मभिः। उनके द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होनेपर बलवान् वीर मद्रराज शल्यको वह हर्ष प्राप्त हुआ जो अकृतात्मा (युद्धकी शिक्षासे रहित) पुरुषोंके लिये दुर्लभ है॥ १२ १/२॥
शल्य उवाच
अद्य चाहं रणे सर्वान् पञ्चालान् सह पाण्डवैः॥ १३॥ निहनिष्यामि वा राजन् स्वर्गं यास्यामि वा हतः। **शल्यने कहा—**राजन्! आज मैं रणभूमिमें पाण्डवों-सहित समस्त पांचालोंको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचूँगा॥ १३ १/२॥ अद्य पश्यन्तु मां लोका विचरन्तमभीतवत्॥ १४॥ अद्य पाण्डुसुताः सर्वे वासुदेवः ससात्यकिः।
पञ्चालाश्चेदयश्चैव द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥ धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सर्वे चापि प्रभद्रकाः । विक्रमं मम पश्यन्तु धनुषश्च महद् बलम् ॥ १६ ॥ आज सब लोग मुझे रणभूमिमें निर्भय विचरते देखें, आज समस्त पाण्डव, श्रीकृष्ण, सात्यकि, पांचाल और चेदिदेशके योद्धा, द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा समस्त प्रभद्रकगण मेरा पराक्रम तथा मेरे धनुषका महान् बल अपनी आँखों देख लें ॥ १४—१६ ॥
लाघवं चास्त्रवीर्यं च भुजयोश्च बलं युधि । अद्य पश्यन्तु मे पार्थाः सिद्धाश्च सह चारणैः ॥ १७ ॥ यादृशं मे बलं बाह्वोः सम्पदस्त्रेषु या च मे । अद्य मे विक्रमं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ १८ ॥ प्रतीकारपरा भूत्वा चेष्टन्तां विविधाः क्रियाः । आज कुन्तीके सभी पुत्र तथा चारणोंसहित सिद्धगण भी युद्धमें मेरी फुर्ती, अस्त्र-बल और बाहुबलको देखें। मेरी दोनों भुजाओंमें जैसा बल है तथा अस्त्रोंका मुझे जैसा ज्ञान है, उसके अनुसार आज मेरा पराक्रम देखकर पाण्डव महारथी उसके प्रतीकारमें तत्पर हो नाना प्रकारके कार्योंके लिये सचेष्ट हों ॥ १७-१८ १/२ ॥
अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावयिष्ये समन्ततः ॥ १९ ॥ द्रोणभीष्मावति विभो सूतपुत्रं च संयुगे । विचरिष्ये रणे युध्यन् प्रियार्थं तव कौरव ॥ २० ॥ कुरुनन्दन! आज मैं पाण्डवोंकी सेनाओंको चारों ओर भगा दूँगा। प्रभो! युद्धस्थलमें तुम्हारा प्रिय करनेके लिये आज मैं द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णसे भी बढ़कर पराक्रम दिखाता और जूझता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरण करूँगा ॥ १९-२० ॥
संजय उवाच
अभिषिक्ते तथा शल्ये तव सैन्येषु मानद । न कर्णव्यसनं किंचिन्मेनिरे तत्र भारत ॥ २१ ॥ **संजय कहते हैं—**मानद! भरतनन्दन! इस प्रकार आपकी सेनाओंमें राजा शल्यका अभिषेक होनेपर समस्त योद्धाओंको कर्णके मारे जानेका थोड़ा-सा भी दुःख नहीं रह गया ॥ २१ ॥
हृष्टाः सुमनसश्चैव बभूवुस्तत्र सैनिकाः । मेनिरे निहतान् पार्थान् मद्रराजवशं गतान् ॥ २२ ॥ वे सब-के-सब प्रसन्नचित्त होकर हर्षसे भर गये और यह मानने लगे कि कुन्तीके पुत्र मद्रराज शल्यके वशमें पड़कर अवश्य ही मारे जायँगे ॥ २२ ॥
प्रहर्षं प्राप्य सेना तु तावकी भरतर्षभ । तां रात्रिमुषिता सुप्ता हर्षचित्ता च साभवत् ॥ २३ ॥ भरतश्रेष्ठ! आपकी सेना महान् हर्ष पाकर उस रातमें वहीं रही और सो गयी। उसके मनमें बड़ा उत्साह था ॥ २३ ॥
सैन्यस्य तव तं शब्दं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः । वार्ष्णेयमब्रवीद् वाक्यं सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥ २४ ॥ उस समय आपकी सेनाका वह महान् हर्षनाद सुनकर राजा युधिष्ठिरने समस्त क्षत्रियोंके सामने ही भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ॥ २४ ॥
मद्रराजः कृतः शल्यो धार्तराष्ट्रेण माधव । सेनापतिर्महेष्वासः सर्वसैन्येषु पूजितः ॥ २५ ॥ 'माधव! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने समस्त सेनाओंद्धारा सम्मानित महाधनुर्धर मद्रराज शल्यको सेनापति बनाया है ॥
एतज्ज्ञात्वा यथाभूतं कुरु माधव यत्क्षमम् । भवान् नेता च गोप्ता च विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ २६ ॥ 'माधव! यह यथार्थ रूपसे जानकर आप जो उचित हो वैसा करें; क्योंकि आप ही हमारे नेता और संरक्षक हैं। इसलिये अब जो कार्य आवश्यक हो, उसका सम्पादन कीजिये' ॥ २६ ॥
तमब्रवीन्महाराज वासुदेवो जनाधिपम् । आर्तायनिमहं जाने यथातत्त्वेन भारत ॥ २७ ॥ महाराज! तब भगवान् श्रीकृष्णने राजासे कहा—'भारत! मैं ऋतायनकुमार राजा शल्यको अच्छी तरह जानता हूँ ॥ २७ ॥
वीर्यवांश्च महातेजा महात्मा च विशेषतः । कृती च चित्रयोधी च संयुक्तो लाघवेन च ॥ २८ ॥ 'वे बलशाली, महातेजस्वी, महामनस्वी, विद्वान्, विचित्र युद्ध करनेवाले और शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले हैं ॥ २८ ॥
यादृग् भीष्मस्तथा द्रोणो यादृक् कर्णश्च संयुगे । तादृशस्तद्विशिष्टो वा मद्रराजो मतो मम ॥ २९ ॥ 'भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण—ये सब लोग युद्धमें जैसे पराक्रमी थे, वैसे ही या उनसे भी बढ़कर पराक्रमी मैं मद्रराज शल्यको मानता हूँ ॥ २९ ॥
युद्ध्यमानस्य तस्याहं चिन्तयानश्च भारत । योद्धारं नाधिगच्छामि तुल्यरूपं जनाधिप ॥ ३० ॥ 'भारत! नरेश्वर! मैं बहुत सोचनेपर भी युद्धपरायण शल्यके अनुरूप दूसरे किसी योद्धाको नहीं पा रहा हूँ ॥
शिखण्ड्यर्जुनभीमानां सात्वतस्य च भारत ।
धृष्टद्युम्नस्य च तथा बलेनाभ्यधिको रणे ॥ ३१ ॥
‘भरतनन्दन! शिखण्डी, अर्जुन, भीम, सात्यकि और धृष्टद्युम्नसे भी वे रणभूमिमें अधिक बलशाली हैं ॥ ३१ ॥
मद्रराजो महाराज सिंहद्विरदविक्रमः ।
विचरिष्यत्यभीः काले कालः क्रुद्धः प्रजास्विव ॥ ३२ ॥
‘महाराज! सिंह और हाथीके समान पराक्रमी मद्रराज शल्य प्रलयकालमें प्रजापर कुपित हुए कालके समान निर्भय होकर रणभूमिमें विचरेंगे ॥ ३२ ॥
तस्याद्य न प्रपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे ।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र शार्दूलसमविक्रमम् ॥ ३३ ॥
‘पुरुषसिंह! आपका पराक्रम सिंहके समान है। आज आपके सिवा युद्धस्थलमें दूसरेको ऐसा नहीं देखता, जो शल्यके सम्मुख होकर युद्ध कर सके ॥ ३३ ॥
सदेवलोके कृत्स्नेऽस्मिन् नान्यस्त्वत्तः पुमान् भवेत् ।
मद्रराजं रणे क्रुद्धं यो हन्यात् कुरुनन्दन ॥ ३४ ॥
‘कुरुनन्दन! देवताओंसहित इस सम्पूर्ण जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो रणमें कुपित हुए मद्रराज शल्यको मार सके ॥ ३४ ॥
अहन्यहनि युध्यन्तं क्षोभयन्तं बलं तव ।
तस्माज्जहि रणे शल्यं मघवानिव शम्बरम् ॥ ३५ ॥
‘इसलिये प्रतिदिन समरांगणमें जूझते और आपकी सेनाको विक्षुब्ध करते हुए राजा शल्यको युद्धमें आप उसी प्रकार मार डालिये, जैसे इन्द्रने शम्बरासुरका वध किया था ॥ ३५ ॥
अजेयश्चाप्यसौ वीरो धार्तराष्ट्रेण सत्कृतः ।
तवैव हि जयो नूनं हते मद्रेश्वरे युधि ॥ ३६ ॥
‘वीर शल्य अजेय हैं। दुर्योधनने उनका बड़ा सम्मान किया है। युद्धमें मद्रराजके मारे जानेपर निश्चय आपकी ही जीत होगी ॥ ३६ ॥
तस्मिन् हते हतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् ।
एतच्छ्रुत्वा महाराज वचनं मम साम्प्रतम् ॥ ३७ ॥
प्रत्युद्याहि रणे पार्थ मद्रराजं महारथम् ।
जहि चैनं महाबाहो वासवो नमुचिं यथा ॥ ३८ ॥
‘महाराज! कुन्तीकुमार! उनके मारे जानेपर आप समझ लें कि दुर्योधनकी सारी विशाल सेना ही मार डाली गयी। इस समय मेरी इस बातको सुनकर महारथी मद्रराजपर चढ़ाई कीजिये और महाबाहो! जैसे इन्द्रने नमुचिका वध किया था, उसी प्रकार आप भी उन्हें मार डालिये ॥ ३७-३८ ॥
न चैवात्र दया कार्या मातुलोऽयं ममेति वै ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य जहि मद्रजनेश्वरम् ॥ ३९ ॥
‘ये मेरे मामा हैं’ ऐसा समझकर आपको उनपर दया नहीं करनी चाहिये। आप क्षत्रियधर्मको सामने रखते हुए मद्रराज शल्यको मार डालें ॥ ३९ ॥
द्रोणभीष्मार्णवं तीर्त्वा कर्णपातालसम्भवम् ।
मा निमज्जस्व सगणः शल्यमासाद्य गोष्पदम् ॥ ४० ॥
‘भीष्म, द्रोण और कर्णरूपी महासागरको पार करके आप अपने सेवकोंसहित शल्यरूपी गायकी खुरीमें न डूब जाइये ॥ ४० ॥
यच्च ते तपसो वीर्यं यच्च क्षात्रं बलं तव ।
तद् दर्शय रणे सर्वं जहि चैनं महारथम् ॥ ४१ ॥
‘राजन्! आपका जो तपोबल और क्षात्रबल है, वह सब रणभूमिमें दिखाइये और इन महारथी शल्यको मार डालिये’ ॥ ४१ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं केशवः परवीरहा ।
जगाम शिविरं सायं पूज्यमानोऽथ पाण्डवैः ॥ ४२ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण यह बात कहकर सायंकाल पाण्डवोंसे सम्मानित हो अपने शिविरमें चले गये ॥ ४२ ॥
केशवे तु तदा याते धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
विसृज्य सर्वान् भ्रातॄंश्च पञ्चालानथ सोमकान् ॥ ४३ ॥
सुष्वाप रजनीं तां तु विशल्य इव कुञ्जरः ।
श्रीकृष्णके चले जानेपर उस समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अपने सब भाइयों तथा पांचालों और सोमकोंको भी विदा करके रातमें अंकुशरहित हाथीके समान शयन किया ॥
ते च सर्वे महेष्वासाः पञ्चालाः पाण्डवास्तथा ॥ ४४ ॥
कर्णस्य निधने हृष्टाः सुषुपुस्तां निशां तदा ।
वे सभी महाधनुर्धर पांचाल और पाण्डवयोद्धा कर्णके मारे जानेसे हर्षमें भरकर रात्रिमें सुखकी नींद सोये ॥ ४४ १/२ ॥
गतज्वरं महेष्वासं तीर्णपारं महारथम् ॥ ४५ ॥
बभूव पाण्डवेयानां सैन्यं च मुदितं नृप ।
सूतपुत्रस्य निधने जयं लब्ध्वा च मारिष ॥ ४६ ॥
माननीय नरेश! सूतपुत्र कर्णके मारे जानेसे विजय पाकर महान् धनुष एवं विशाल रथोंसे सुशोभित पाण्डव-सेना बहुत प्रसन्न हुई थी, मानो वह युद्धसे पार होकर निश्चिन्त हो गयी हो ॥ ४५-४६ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्यसेनापत्याभिषेके सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्यका सेनापतिके पदपर अभिषेकविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७ ।।
उभयपक्षकी सेनाओंका समरांगणमें उपस्थित होना एवं बची हुई दोनों सेनाओंकी संख्याका वर्णन
अष्टमोऽध्यायः
उभयपक्षकी सेनाओंका समरांगणमें उपस्थित होना एवं बची हुई दोनों सेनाओंकी संख्याका वर्णन
संजय उवाच
व्यतीतायां रजन्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा ।
अब्रवीत् तावकान् सर्वान् संनह्यन्तां महारथाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— जब रात व्यतीत हो गयी, तब राजा दुर्योधनने आपके समस्त सैनिकोंसे कहा—'महारथीगण कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो जायें' ॥ १ ॥
राज्ञश्च मतमाज्ञाय समनह्यत सा चमूः ।
अयोजयन् रथांस्तूर्णं पर्यधावंस्तथा परे ॥ २ ॥
अकल्प्यन्त च मातङ्गाः समनह्यन्त पत्तयः ।
रथानास्तरणोपेतांश्चक्रुरन्ये सहस्रशः ॥ ३ ॥
राजाका यह अभिप्राय जानकर सारी सेना युद्धके लिये सुसज्जित होने लगी। कुछ लोगोंने तुरंत ही रथ जोत दिये। दूसरे चारों ओर दौड़ने लगे। हाथी सुसज्जित किये जाने लगे। पैदल सैनिक कवच बाँधने लगे तथा अन्य सहस्रों सैनिकोंने रथोंपर आवरण डाल दिये ॥ २-३ ॥
वादित्राणां च निनदः प्रादुरासीद् विशाम्पते ।
आयोधनार्थं योधानां बलानां चाप्युदीर्यताम् ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! उस समय सब ओरसे भाँति-भाँतिके वाद्योंकी गम्भीर ध्वनि प्रकट होने लगी। युद्धके लिये उद्यत योद्धाओं और आगे बढ़ती हुई सेनाओंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ४ ॥
ततो बलानि सर्वाणि हतशिष्टानि भारत ।
प्रस्थितानि व्यदृश्यन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ५ ॥
भारत! तत्पश्चात् मरनेसे बची हुई सारी सेनाएँ मृत्युको ही युद्धसे लौटनेका निमित्त बनाकर प्रस्थान करती दिखायी दीं ॥ ५ ॥
शल्यं सेनापतिं कृत्वा मद्रराजं महारथाः ।
प्रविभज्य बलं सर्वमनीकेषु व्यवस्थिताः ॥ ६ ॥
समस्त महारथी मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर और सारी सेनाको अनेक भागोंमें विभक्त करके भिन्न-भिन्न दलोंमें खड़े हुए ॥ ६ ॥
ततः सर्वे समागम्य पुत्रेण तव सैनिकाः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिः शल्योऽथ सौबलः ॥ ७ ॥ अन्ये च पार्थिवाः शेषाः समयं चक्रुरादृताः । तदनन्तर आपके सम्पूर्ण सैनिक कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य, शकुनि तथा बचे हुए अन्य नरेशोंने राजा दुर्योधनसे मिलकर आदरपूर्वक यह नियम बनाया— ॥ ७ १/२ ॥
न न एकेन योद्धव्यं कथञ्चिदपि पाण्डवैः ॥ ८ ॥ यो ह्येकः पाण्डवैर्युध्येद् यो वा युध्यन्तमुत्सृजेत् । स पञ्चभिर्भवेद् युक्तः पातकैश्चोपपातकैः ॥ ९ ॥ ‘हमलोगोंमेंसे कोई एक योद्धा अकेला रहकर किसी तरह भी पाण्डवोंके साथ युद्ध न करे। जो अकेला ही पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा अथवा जो पाण्डवोंके साथ जूझते हुए वीरको अकेला छोड़ देगा, वह पाँच पातकों और उपपातकोंसे युक्त होगा ॥ ८-९ ॥
(अद्याचार्यसुतो द्रौणिर्नैको युध्येत शत्रुभिः ।) अन्योन्यं परिरक्षद्भिर्योद्धव्यं सहितैश्च ह । एवं ते समयं कृत्वा सर्वे तत्र महारथाः ॥ १० ॥ मद्रराजं पुरस्कृत्य तूर्णमभ्यद्रवन् परान् । ‘आज आचार्यपुत्र अश्वत्थामा शत्रुओंके साथ अकेले युद्ध न करें। हम सब लोगोंको एक साथ होकर एक-दूसरेकी रक्षा करते हुए युद्ध करना चाहिये। ऐसा नियम बनाकर वे सब महारथी मद्रराज शल्यको आगे करके तुरंत ही शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ १० १/२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् व्यूह्य सैन्यं महारणे ॥ ११ ॥ अभ्ययुः कौरवान् राजन् योत्स्यमानाः समन्ततः । राजन्! इसी प्रकार उस महासमरमें पाण्डव भी अपनी सेनाका व्यूह बनाकर सब ओरसे युद्धके लिये उद्यत हो कौरवोंपर चढ़ आये ॥ ११ १/२ ॥
तद् बलं भरतश्रेष्ठ क्षुब्धार्णवसमस्वनम् ॥ १२ ॥ समुद्भूतार्णवाकारमुद्धूतरथकुञ्जरम् । भरतश्रेष्ठ! वह सेना विक्षुब्ध महासागरके समान कोलाहल कर रही थी। उसके रथ और हाथी बड़े वेगसे आगे बढ़ रहे थे, मानो किसी महासमुद्रमें ज्वार उठ रहा हो ॥ १२ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणस्य चैव भीष्मस्य राधेयस्य च मे श्रुतम् ॥ १३ ॥ पातनं शंस मे भूयः शल्यस्याथ सुतस्य मे । **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मैंने द्रोणाचार्य, भीष्म तथा राधापुत्र कर्णके वधका सारा वृत्तान्त सुन लिया है। अब पुनः मुझे शल्य तथा मेरे पुत्र दुर्योधनके मारे जानेका सारा समाचार कह सुनाओ ॥ १३ १/२ ॥
कथं रणे हतः शल्यो धर्मराजेन संजय ।। १४ ।। भीमेन च महाबाहुः पुत्रो दुर्योधनो मम । संजय! रणभूमिमें राजा शल्य धर्मराजके द्वारा कैसे मारे गये तथा भीमसेनने मेरे महाबाहु पुत्र दुर्योधनका वध कैसे किया? ।। १४ १/२ ।।
संजय उवाच
क्षयं मनुष्यदेहानां तथा नागाश्वसंक्षयम् ।। १५ ।। शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा संग्रामं शंसतो मम । संजयने कहा—राजन्! जहाँ हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंका महान् संहार हुआ था, उस संग्रामका मैं वर्णन करता हूँ; आप सुस्थिर होकर सुनिये ।। १५ १/२ ।। आशा बलवती राजन् पुत्राणां तेऽभवत्तदा ।। १६ ।। हते द्रोणे च भीष्मे च सूतपुत्रे च पातिते । शल्यः पार्थान् रणे सर्वान् निहनिष्यति मारिष ।। १७ ।। माननीय नरेश! द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके पुत्रोंके मनमें यह प्रबल आशा हो गयी कि शल्य रणभूमिमें सम्पूर्ण कुन्तीकुमारोंका वध कर डालेंगे ।। १६-१७ ।। तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत । मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् ।। १८ ।। नाथवन्तं तदाऽऽत्मानममन्यन्त सुतास्तव । भारत! उसी आशाको हृदयमें रखकर आपके पुत्रोंको कुछ आश्वासन मिला और वे समरांगणमें महारथी मद्रराज शल्यका आश्रय ले अपने-आपको सनाथ मानने लगे ।। यदा कर्णे हते पार्थाः सिंहनादं प्रचक्रिरे ।। १९ ।। तदा तु तावकान् राजन्नाविवेश महद् भयम् । राजन्! कर्णके मारे जानेसे प्रसन्न हुए कुन्तीके पुत्र जब सिंहनाद करने लगे, उस समय आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। १९ १/२ ।। तान् समाश्वास्य योधांस्तु मद्रराजः प्रतापवान् ।। २० ।। व्यूह्य व्यूहं महाराज सर्वतोभद्रमृद्धिमत् । प्रत्युद्ययौ रणे पार्थान् मद्रराजः प्रतापवान् ।। २१ ।। विधुन्वन् कार्मुकं चित्रं भारघ्नं वेगवत्तरम् । रथप्रवरमास्थाय सैन्धवाश्वं महारथः ।। २२ ।। महाराज! तब प्रतापी महारथी मद्रराज शल्यने उन योद्धाओंको आश्वासन दे समृद्धिशाली सर्वतोभद्रनामक व्यूह बनाकर भारनाशक, अत्यन्त वेगशाली और विचित्र
धनुषको कँपाते हुए सिंधी घोड़ोंसे युक्त श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पाण्डवोंपर आक्रमण किया॥ २०—२२॥
तस्य सूतो महाराज रथस्थोऽशोभयद् रथम्।
स तेन संवृतो वीरो रथेनामित्रकर्षणः॥ २३॥
तस्थौ शूरो महाराज पुत्राणां ते भयप्रणुत्।
राजाधिराज! शल्यके रथपर बैठा हुआ उनका सारथि उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था। उस रथसे घिरे हुए शत्रुसूदन शूरवीर राजा शल्य आपके पुत्रोंका भय दूर करते हुए युद्धके लिये खड़े हो गये॥ २३ १/२॥
प्रयाणे मद्रराजोऽभून्मुखं व्यूहस्य दंशितः॥ २४॥
मद्रकैः सहितो वीरैः कर्णपुत्रैश्च दुर्जयैः।
प्रस्थानकालमें कवचधारी मद्रराज शल्य उस सैन्यव्यूहके मुखस्थानमें थे। उनके साथ मद्रदेशीय वीर तथा कर्णके दुर्जय पुत्र भी थे॥ २४ १/२॥
सव्येऽभूत् कृतवर्मा च त्रिगर्तैः परिवारितः॥ २५॥
गौतमो दक्षिणे पार्श्वे शकैश्च यवनैः सह।
अश्वत्थामा पृष्ठतोऽभूत् काम्बोजैः परिवारितः॥ २६॥
व्यूहके वामभागमें त्रिगर्तोंसे घिरा हुआ कृतवर्मा खड़ा था। दक्षिण पार्श्वमें शकों और यवनोंकी सेनाके साथ कृपाचार्य थे और पृष्ठभागमें काम्बोजोंसे घिरकर अश्वत्थामा खड़ा था॥ २५-२६॥
दुर्योधनोऽभवन्मध्ये रक्षितः कुरुपुङ्गवैः।
हयानीकेन महता सौबलश्चापि संवृतः॥ २७॥
प्रययौ सर्वसैन्येन कैतव्यश्च महारथः।
मध्यभागमें कुरुकुलके प्रमुख वीरोंद्वारा सुरक्षित दुर्योधन और घुड़सवारोंकी विशाल सेनासे घिरा हुआ शकुनि भी था। उसके साथ महारथी उलूक भी सम्पूर्ण सेनासहित युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था॥ २७ १/२॥
पाण्डवाश्च महेष्वासा व्यूह्य सैन्यमरिंदमाः॥ २८॥
त्रिधा भूता महाराज तव सैन्यमुपाद्रवन्।
महाराज! शत्रुओंका दमन करनेवाले महाधनुर्धर पाण्डव भी सेनाका व्यूह बनाकर तीन भागोंमें विभक्त हो आपकी सेनापर चढ़ आये॥ २८ १/२॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः॥ २९॥
शल्यस्य वाहिनीं हन्तुमभिदुद्रुवुराहवे।
(उन तीनोंके अध्यक्ष थे—) धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और महारथी सात्यकि। इन लोगोंने युद्धस्थलमें शल्यकी सेनाका वध करनेके लिये उसपर धावा बोल दिया॥ २९ १/२॥
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वेनानीकेन संवृतः ॥ ३० ॥
शल्यमेवाभिदुद्राव जिघांसुर्भर्तर्षभः ।
अपनी सेनासे घिरे हुए भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने शल्यको मार डालनेकी इच्छासे उनपर ही आक्रमण किया ॥
हार्दिक्यं च महेष्वासमर्जुनः शत्रुसैन्यहा ॥ ३१ ॥
संशप्तकगणांश्चैव वेगितोऽभिविदुद्रुवे ।
शत्रुसेनाका संहार करनेवाले अर्जुनने महाधनुर्धर कृतवर्मा तथा संशप्तकगणोंपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ३१ १/२ ॥
गौतमं भीमसेनो वै सोमकाश्च महारथाः ॥ ३२ ॥
अभ्यद्रवन्त राजेन्द्र जिघांसन्तः परान् युधि ।
राजेन्द्र! भीमसेन और महारथी सोमकगणोंने युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेकी इच्छासे कृपाचार्यपर धावा बोल दिया ॥ ३२ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तु शकुनिमूलूकं च महारथम् ॥ ३३ ॥
ससैन्यौ सहसैन्यौ तावुपतस्थतुराहवे ।
सेनासहित माद्रीकुमार नकुल और सहदेव युद्धस्थलमें अपनी सेनाके साथ खड़े हुए महारथी शकुनि और उलूकका सामना करनेके लिये उपस्थित थे ॥ ३३ १/२ ॥
तथैवायुतशो योधास्तावकाः पाण्डवान् रणे ॥ ३४ ॥
अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धा विविधा युधपाणयः ।
इसी प्रकार रणभूमिमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये क्रोधमें भरे हुए आपके पक्षके दस हजार योद्धा पाण्डवोंका सामना करने लगे ॥ ३४ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
हते भीष्मे महेष्वासे द्रोणे कर्णे महारथे ॥ ३५ ॥
कुरुष्वल्पावशिष्टेषु पाण्डवेषु च संयुगे ।
सुसंरब्धेषु पार्थेषु पराक्रान्तेषु संजय ॥ ३६ ॥
मामकानां परेषां च किं शिष्टमभवद् बलम् ।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! महाधनुर्धर भीष्म, द्रोण तथा महारथी कर्णके मारे जानेपर जब युद्धस्थलमें कौरव और पाण्डवयोद्धा थोड़े-से ही बच गये थे और कुन्तीके पुत्र अत्यन्त कुपित होकर पराक्रम दिखाने लगे थे, उस समय मेरे और शत्रुओंके पक्षमें कितनी सेना शेष रह गयी थी? ॥
संजय उवाच
यथा वयं परे राजन् युद्धाय समुपस्थिताः ॥ ३७ ॥
यावच्चासीद् बलं शिष्टं संग्रामे तन्निबोध मे ।
संजयने कहा— राजन्! हम और हमारे शत्रु जिस प्रकार युद्धके लिये उपस्थित हुए और उस समय संग्राममें हमलोगोंके पास जितनी सेना शेष रह गयी थी, वह सब बताता हूँ, सुनिये॥ ३७ १/२॥
एकादश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ॥ ३८॥
दश दन्तिसहस्राणि सप्त चैव शतानि च।
पूर्णे शतसहस्रे द्वे हयानां तत्र भारत॥ ३९॥
पत्तिकोट्यस्तथा तिस्रो बलमेतत्तवाभवत्।
भरतश्रेष्ठ! आपके पक्षमें ग्यारह हजार रथ, दस हजार सात सौ हाथी, दो लाख घोड़े तथा तीन करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष रह गयी थी॥ ३८-३९ १/२॥
रथानां षट्सहस्राणि षट्सहस्राश्च कुञ्जराः॥ ४०॥
दश चाश्वसहस्राणि पत्तिकोटी च भारत।
एतद् बलं पाण्डवानामभवच्छेषमाहवे॥ ४१॥
भारत! उस युद्धमें पाण्डवोंके पास छः हजार रथ, छः हजार हाथी, दस हजार घोड़े और दो करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष थी॥ ४०-४१॥
एत एव समाजग्मुर्युद्धाय भरतर्षभ।
एवं विभज्य राजेन्द्र मद्रराजवशे स्थिताः॥ ४२॥
पाण्डवान् प्रत्युदीयुस्ते जयगृद्धाः प्रमन्यवः।
भरतश्रेष्ठ! ये ही सैनिक युद्धके लिये उपस्थित हुए थे। राजेन्द्र! इस प्रकार सेनाका विभाग करके विजयकी अभिलाषासे क्रोधमें भरे हुए आपके सैनिक मद्रराज शल्यके अधीन हो पाण्डवोंपर चढ़ आये॥ ४२ १/२॥
तथैव पाण्डवाः शूराः समरे जितकाशिनः॥ ४३॥
उपयाता नरव्याघ्राः पञ्चालाश्च यशस्विनः।
इसी प्रकार समरांगणमें विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर पुरुषसिंह पाण्डव और यशस्वी पांचाल वीर आपकी सेनाके समीप आ पहुँचे॥ ४३ १/२॥
इमे ते च बलौघेन परस्परवधैषिणः॥ ४४॥
उपयाता नरव्याघ्राः पूर्वा संध्यां प्रति प्रभो।
प्रभो! इस प्रकार परस्पर वधकी इच्छावाले ये और वे पुरुषसिंह योद्धा प्रातःकाल एक-दूसरेके निकट आये॥ ४४ १/२॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयानकम्।
तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम्॥ ४५॥
फिर तो परस्पर प्रहार करते हुए आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भयानक घोर युद्ध छिड़ गया॥ ४५॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि व्यूहनिर्माणोऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें व्यूह-निर्माणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/२ श्लोक हैं।)