भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2487, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2487

कथं रणे हतः शल्यो धर्मराजेन संजय ।। १४ ।। भीमेन च महाबाहुः पुत्रो दुर्योधनो मम । संजय! रणभूमिमें राजा शल्य धर्मराजके द्वारा कैसे मारे गये तथा भीमसेनने मेरे महाबाहु पुत्र दुर्योधनका वध कैसे किया? ।। १४ १/२ ।।

संजय उवाच

क्षयं मनुष्यदेहानां तथा नागाश्वसंक्षयम् ।। १५ ।। शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा संग्रामं शंसतो मम । संजयने कहा—राजन्! जहाँ हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंका महान् संहार हुआ था, उस संग्रामका मैं वर्णन करता हूँ; आप सुस्थिर होकर सुनिये ।। १५ १/२ ।। आशा बलवती राजन् पुत्राणां तेऽभवत्तदा ।। १६ ।। हते द्रोणे च भीष्मे च सूतपुत्रे च पातिते । शल्यः पार्थान् रणे सर्वान् निहनिष्यति मारिष ।। १७ ।। माननीय नरेश! द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके पुत्रोंके मनमें यह प्रबल आशा हो गयी कि शल्य रणभूमिमें सम्पूर्ण कुन्तीकुमारोंका वध कर डालेंगे ।। १६-१७ ।। तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत । मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् ।। १८ ।। नाथवन्तं तदाऽऽत्मानममन्यन्त सुतास्तव । भारत! उसी आशाको हृदयमें रखकर आपके पुत्रोंको कुछ आश्वासन मिला और वे समरांगणमें महारथी मद्रराज शल्यका आश्रय ले अपने-आपको सनाथ मानने लगे ।। यदा कर्णे हते पार्थाः सिंहनादं प्रचक्रिरे ।। १९ ।। तदा तु तावकान् राजन्नाविवेश महद् भयम् । राजन्! कर्णके मारे जानेसे प्रसन्न हुए कुन्तीके पुत्र जब सिंहनाद करने लगे, उस समय आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। १९ १/२ ।। तान् समाश्वास्य योधांस्तु मद्रराजः प्रतापवान् ।। २० ।। व्यूह्य व्यूहं महाराज सर्वतोभद्रमृद्धिमत् । प्रत्युद्ययौ रणे पार्थान् मद्रराजः प्रतापवान् ।। २१ ।। विधुन्वन् कार्मुकं चित्रं भारघ्नं वेगवत्तरम् । रथप्रवरमास्थाय सैन्धवाश्वं महारथः ।। २२ ।। महाराज! तब प्रतापी महारथी मद्रराज शल्यने उन योद्धाओंको आश्वासन दे समृद्धिशाली सर्वतोभद्रनामक व्यूह बनाकर भारनाशक, अत्यन्त वेगशाली और विचित्र