महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2486, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिः शल्योऽथ सौबलः ॥ ७ ॥ अन्ये च पार्थिवाः शेषाः समयं चक्रुरादृताः । तदनन्तर आपके सम्पूर्ण सैनिक कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य, शकुनि तथा बचे हुए अन्य नरेशोंने राजा दुर्योधनसे मिलकर आदरपूर्वक यह नियम बनाया— ॥ ७ १/२ ॥
न न एकेन योद्धव्यं कथञ्चिदपि पाण्डवैः ॥ ८ ॥ यो ह्येकः पाण्डवैर्युध्येद् यो वा युध्यन्तमुत्सृजेत् । स पञ्चभिर्भवेद् युक्तः पातकैश्चोपपातकैः ॥ ९ ॥ ‘हमलोगोंमेंसे कोई एक योद्धा अकेला रहकर किसी तरह भी पाण्डवोंके साथ युद्ध न करे। जो अकेला ही पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा अथवा जो पाण्डवोंके साथ जूझते हुए वीरको अकेला छोड़ देगा, वह पाँच पातकों और उपपातकोंसे युक्त होगा ॥ ८-९ ॥
(अद्याचार्यसुतो द्रौणिर्नैको युध्येत शत्रुभिः ।) अन्योन्यं परिरक्षद्भिर्योद्धव्यं सहितैश्च ह । एवं ते समयं कृत्वा सर्वे तत्र महारथाः ॥ १० ॥ मद्रराजं पुरस्कृत्य तूर्णमभ्यद्रवन् परान् । ‘आज आचार्यपुत्र अश्वत्थामा शत्रुओंके साथ अकेले युद्ध न करें। हम सब लोगोंको एक साथ होकर एक-दूसरेकी रक्षा करते हुए युद्ध करना चाहिये। ऐसा नियम बनाकर वे सब महारथी मद्रराज शल्यको आगे करके तुरंत ही शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ १० १/२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् व्यूह्य सैन्यं महारणे ॥ ११ ॥ अभ्ययुः कौरवान् राजन् योत्स्यमानाः समन्ततः । राजन्! इसी प्रकार उस महासमरमें पाण्डव भी अपनी सेनाका व्यूह बनाकर सब ओरसे युद्धके लिये उद्यत हो कौरवोंपर चढ़ आये ॥ ११ १/२ ॥
तद् बलं भरतश्रेष्ठ क्षुब्धार्णवसमस्वनम् ॥ १२ ॥ समुद्भूतार्णवाकारमुद्धूतरथकुञ्जरम् । भरतश्रेष्ठ! वह सेना विक्षुब्ध महासागरके समान कोलाहल कर रही थी। उसके रथ और हाथी बड़े वेगसे आगे बढ़ रहे थे, मानो किसी महासमुद्रमें ज्वार उठ रहा हो ॥ १२ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणस्य चैव भीष्मस्य राधेयस्य च मे श्रुतम् ॥ १३ ॥ पातनं शंस मे भूयः शल्यस्याथ सुतस्य मे । **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मैंने द्रोणाचार्य, भीष्म तथा राधापुत्र कर्णके वधका सारा वृत्तान्त सुन लिया है। अब पुनः मुझे शल्य तथा मेरे पुत्र दुर्योधनके मारे जानेका सारा समाचार कह सुनाओ ॥ १३ १/२ ॥