महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिः शल्योऽथ सौबलः ॥ ७ ॥ अन्ये च पार्थिवाः शेषाः समयं चक्रुरादृताः । तदनन्तर आपके सम्पूर्ण सैनिक कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य, शकुनि तथा बचे हुए अन्य नरेशोंने राजा दुर्योधनसे मिलकर आदरपूर्वक यह नियम बनाया— ॥ ७ १/२ ॥
न न एकेन योद्धव्यं कथञ्चिदपि पाण्डवैः ॥ ८ ॥ यो ह्येकः पाण्डवैर्युध्येद् यो वा युध्यन्तमुत्सृजेत् । स पञ्चभिर्भवेद् युक्तः पातकैश्चोपपातकैः ॥ ९ ॥ ‘हमलोगोंमेंसे कोई एक योद्धा अकेला रहकर किसी तरह भी पाण्डवोंके साथ युद्ध न करे। जो अकेला ही पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा अथवा जो पाण्डवोंके साथ जूझते हुए वीरको अकेला छोड़ देगा, वह पाँच पातकों और उपपातकोंसे युक्त होगा ॥ ८-९ ॥
(अद्याचार्यसुतो द्रौणिर्नैको युध्येत शत्रुभिः ।) अन्योन्यं परिरक्षद्भिर्योद्धव्यं सहितैश्च ह । एवं ते समयं कृत्वा सर्वे तत्र महारथाः ॥ १० ॥ मद्रराजं पुरस्कृत्य तूर्णमभ्यद्रवन् परान् । ‘आज आचार्यपुत्र अश्वत्थामा शत्रुओंके साथ अकेले युद्ध न करें। हम सब लोगोंको एक साथ होकर एक-दूसरेकी रक्षा करते हुए युद्ध करना चाहिये। ऐसा नियम बनाकर वे सब महारथी मद्रराज शल्यको आगे करके तुरंत ही शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ १० १/२ ॥
तथैव पाण्डवा राजन् व्यूह्य सैन्यं महारणे ॥ ११ ॥ अभ्ययुः कौरवान् राजन् योत्स्यमानाः समन्ततः । राजन्! इसी प्रकार उस महासमरमें पाण्डव भी अपनी सेनाका व्यूह बनाकर सब ओरसे युद्धके लिये उद्यत हो कौरवोंपर चढ़ आये ॥ ११ १/२ ॥
तद् बलं भरतश्रेष्ठ क्षुब्धार्णवसमस्वनम् ॥ १२ ॥ समुद्भूतार्णवाकारमुद्धूतरथकुञ्जरम् । भरतश्रेष्ठ! वह सेना विक्षुब्ध महासागरके समान कोलाहल कर रही थी। उसके रथ और हाथी बड़े वेगसे आगे बढ़ रहे थे, मानो किसी महासमुद्रमें ज्वार उठ रहा हो ॥ १२ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणस्य चैव भीष्मस्य राधेयस्य च मे श्रुतम् ॥ १३ ॥ पातनं शंस मे भूयः शल्यस्याथ सुतस्य मे । **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मैंने द्रोणाचार्य, भीष्म तथा राधापुत्र कर्णके वधका सारा वृत्तान्त सुन लिया है। अब पुनः मुझे शल्य तथा मेरे पुत्र दुर्योधनके मारे जानेका सारा समाचार कह सुनाओ ॥ १३ १/२ ॥
कथं रणे हतः शल्यो धर्मराजेन संजय ।। १४ ।। भीमेन च महाबाहुः पुत्रो दुर्योधनो मम । संजय! रणभूमिमें राजा शल्य धर्मराजके द्वारा कैसे मारे गये तथा भीमसेनने मेरे महाबाहु पुत्र दुर्योधनका वध कैसे किया? ।। १४ १/२ ।।
संजय उवाच
क्षयं मनुष्यदेहानां तथा नागाश्वसंक्षयम् ।। १५ ।। शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा संग्रामं शंसतो मम । संजयने कहा—राजन्! जहाँ हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंका महान् संहार हुआ था, उस संग्रामका मैं वर्णन करता हूँ; आप सुस्थिर होकर सुनिये ।। १५ १/२ ।। आशा बलवती राजन् पुत्राणां तेऽभवत्तदा ।। १६ ।। हते द्रोणे च भीष्मे च सूतपुत्रे च पातिते । शल्यः पार्थान् रणे सर्वान् निहनिष्यति मारिष ।। १७ ।। माननीय नरेश! द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके पुत्रोंके मनमें यह प्रबल आशा हो गयी कि शल्य रणभूमिमें सम्पूर्ण कुन्तीकुमारोंका वध कर डालेंगे ।। १६-१७ ।। तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत । मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् ।। १८ ।। नाथवन्तं तदाऽऽत्मानममन्यन्त सुतास्तव । भारत! उसी आशाको हृदयमें रखकर आपके पुत्रोंको कुछ आश्वासन मिला और वे समरांगणमें महारथी मद्रराज शल्यका आश्रय ले अपने-आपको सनाथ मानने लगे ।। यदा कर्णे हते पार्थाः सिंहनादं प्रचक्रिरे ।। १९ ।। तदा तु तावकान् राजन्नाविवेश महद् भयम् । राजन्! कर्णके मारे जानेसे प्रसन्न हुए कुन्तीके पुत्र जब सिंहनाद करने लगे, उस समय आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। १९ १/२ ।। तान् समाश्वास्य योधांस्तु मद्रराजः प्रतापवान् ।। २० ।। व्यूह्य व्यूहं महाराज सर्वतोभद्रमृद्धिमत् । प्रत्युद्ययौ रणे पार्थान् मद्रराजः प्रतापवान् ।। २१ ।। विधुन्वन् कार्मुकं चित्रं भारघ्नं वेगवत्तरम् । रथप्रवरमास्थाय सैन्धवाश्वं महारथः ।। २२ ।। महाराज! तब प्रतापी महारथी मद्रराज शल्यने उन योद्धाओंको आश्वासन दे समृद्धिशाली सर्वतोभद्रनामक व्यूह बनाकर भारनाशक, अत्यन्त वेगशाली और विचित्र
धनुषको कँपाते हुए सिंधी घोड़ोंसे युक्त श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पाण्डवोंपर आक्रमण किया॥ २०—२२॥
तस्य सूतो महाराज रथस्थोऽशोभयद् रथम्।
स तेन संवृतो वीरो रथेनामित्रकर्षणः॥ २३॥
तस्थौ शूरो महाराज पुत्राणां ते भयप्रणुत्।
राजाधिराज! शल्यके रथपर बैठा हुआ उनका सारथि उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था। उस रथसे घिरे हुए शत्रुसूदन शूरवीर राजा शल्य आपके पुत्रोंका भय दूर करते हुए युद्धके लिये खड़े हो गये॥ २३ १/२॥
प्रयाणे मद्रराजोऽभून्मुखं व्यूहस्य दंशितः॥ २४॥
मद्रकैः सहितो वीरैः कर्णपुत्रैश्च दुर्जयैः।
प्रस्थानकालमें कवचधारी मद्रराज शल्य उस सैन्यव्यूहके मुखस्थानमें थे। उनके साथ मद्रदेशीय वीर तथा कर्णके दुर्जय पुत्र भी थे॥ २४ १/२॥
सव्येऽभूत् कृतवर्मा च त्रिगर्तैः परिवारितः॥ २५॥
गौतमो दक्षिणे पार्श्वे शकैश्च यवनैः सह।
अश्वत्थामा पृष्ठतोऽभूत् काम्बोजैः परिवारितः॥ २६॥
व्यूहके वामभागमें त्रिगर्तोंसे घिरा हुआ कृतवर्मा खड़ा था। दक्षिण पार्श्वमें शकों और यवनोंकी सेनाके साथ कृपाचार्य थे और पृष्ठभागमें काम्बोजोंसे घिरकर अश्वत्थामा खड़ा था॥ २५-२६॥
दुर्योधनोऽभवन्मध्ये रक्षितः कुरुपुङ्गवैः।
हयानीकेन महता सौबलश्चापि संवृतः॥ २७॥
प्रययौ सर्वसैन्येन कैतव्यश्च महारथः।
मध्यभागमें कुरुकुलके प्रमुख वीरोंद्वारा सुरक्षित दुर्योधन और घुड़सवारोंकी विशाल सेनासे घिरा हुआ शकुनि भी था। उसके साथ महारथी उलूक भी सम्पूर्ण सेनासहित युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था॥ २७ १/२॥
पाण्डवाश्च महेष्वासा व्यूह्य सैन्यमरिंदमाः॥ २८॥
त्रिधा भूता महाराज तव सैन्यमुपाद्रवन्।
महाराज! शत्रुओंका दमन करनेवाले महाधनुर्धर पाण्डव भी सेनाका व्यूह बनाकर तीन भागोंमें विभक्त हो आपकी सेनापर चढ़ आये॥ २८ १/२॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सात्यकिश्च महारथः॥ २९॥
शल्यस्य वाहिनीं हन्तुमभिदुद्रुवुराहवे।
(उन तीनोंके अध्यक्ष थे—) धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और महारथी सात्यकि। इन लोगोंने युद्धस्थलमें शल्यकी सेनाका वध करनेके लिये उसपर धावा बोल दिया॥ २९ १/२॥
ततो युधिष्ठिरो राजा स्वेनानीकेन संवृतः ॥ ३० ॥
शल्यमेवाभिदुद्राव जिघांसुर्भर्तर्षभः ।
अपनी सेनासे घिरे हुए भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने शल्यको मार डालनेकी इच्छासे उनपर ही आक्रमण किया ॥
हार्दिक्यं च महेष्वासमर्जुनः शत्रुसैन्यहा ॥ ३१ ॥
संशप्तकगणांश्चैव वेगितोऽभिविदुद्रुवे ।
शत्रुसेनाका संहार करनेवाले अर्जुनने महाधनुर्धर कृतवर्मा तथा संशप्तकगणोंपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ ३१ १/२ ॥
गौतमं भीमसेनो वै सोमकाश्च महारथाः ॥ ३२ ॥
अभ्यद्रवन्त राजेन्द्र जिघांसन्तः परान् युधि ।
राजेन्द्र! भीमसेन और महारथी सोमकगणोंने युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेकी इच्छासे कृपाचार्यपर धावा बोल दिया ॥ ३२ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तु शकुनिमूलूकं च महारथम् ॥ ३३ ॥
ससैन्यौ सहसैन्यौ तावुपतस्थतुराहवे ।
सेनासहित माद्रीकुमार नकुल और सहदेव युद्धस्थलमें अपनी सेनाके साथ खड़े हुए महारथी शकुनि और उलूकका सामना करनेके लिये उपस्थित थे ॥ ३३ १/२ ॥
तथैवायुतशो योधास्तावकाः पाण्डवान् रणे ॥ ३४ ॥
अभ्यवर्तन्त संक्रुद्धा विविधा युधपाणयः ।
इसी प्रकार रणभूमिमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये क्रोधमें भरे हुए आपके पक्षके दस हजार योद्धा पाण्डवोंका सामना करने लगे ॥ ३४ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
हते भीष्मे महेष्वासे द्रोणे कर्णे महारथे ॥ ३५ ॥
कुरुष्वल्पावशिष्टेषु पाण्डवेषु च संयुगे ।
सुसंरब्धेषु पार्थेषु पराक्रान्तेषु संजय ॥ ३६ ॥
मामकानां परेषां च किं शिष्टमभवद् बलम् ।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! महाधनुर्धर भीष्म, द्रोण तथा महारथी कर्णके मारे जानेपर जब युद्धस्थलमें कौरव और पाण्डवयोद्धा थोड़े-से ही बच गये थे और कुन्तीके पुत्र अत्यन्त कुपित होकर पराक्रम दिखाने लगे थे, उस समय मेरे और शत्रुओंके पक्षमें कितनी सेना शेष रह गयी थी? ॥
संजय उवाच
यथा वयं परे राजन् युद्धाय समुपस्थिताः ॥ ३७ ॥
यावच्चासीद् बलं शिष्टं संग्रामे तन्निबोध मे ।
संजयने कहा— राजन्! हम और हमारे शत्रु जिस प्रकार युद्धके लिये उपस्थित हुए और उस समय संग्राममें हमलोगोंके पास जितनी सेना शेष रह गयी थी, वह सब बताता हूँ, सुनिये॥ ३७ १/२॥
एकादश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ॥ ३८॥
दश दन्तिसहस्राणि सप्त चैव शतानि च।
पूर्णे शतसहस्रे द्वे हयानां तत्र भारत॥ ३९॥
पत्तिकोट्यस्तथा तिस्रो बलमेतत्तवाभवत्।
भरतश्रेष्ठ! आपके पक्षमें ग्यारह हजार रथ, दस हजार सात सौ हाथी, दो लाख घोड़े तथा तीन करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष रह गयी थी॥ ३८-३९ १/२॥
रथानां षट्सहस्राणि षट्सहस्राश्च कुञ्जराः॥ ४०॥
दश चाश्वसहस्राणि पत्तिकोटी च भारत।
एतद् बलं पाण्डवानामभवच्छेषमाहवे॥ ४१॥
भारत! उस युद्धमें पाण्डवोंके पास छः हजार रथ, छः हजार हाथी, दस हजार घोड़े और दो करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष थी॥ ४०-४१॥
एत एव समाजग्मुर्युद्धाय भरतर्षभ।
एवं विभज्य राजेन्द्र मद्रराजवशे स्थिताः॥ ४२॥
पाण्डवान् प्रत्युदीयुस्ते जयगृद्धाः प्रमन्यवः।
भरतश्रेष्ठ! ये ही सैनिक युद्धके लिये उपस्थित हुए थे। राजेन्द्र! इस प्रकार सेनाका विभाग करके विजयकी अभिलाषासे क्रोधमें भरे हुए आपके सैनिक मद्रराज शल्यके अधीन हो पाण्डवोंपर चढ़ आये॥ ४२ १/२॥
तथैव पाण्डवाः शूराः समरे जितकाशिनः॥ ४३॥
उपयाता नरव्याघ्राः पञ्चालाश्च यशस्विनः।
इसी प्रकार समरांगणमें विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर पुरुषसिंह पाण्डव और यशस्वी पांचाल वीर आपकी सेनाके समीप आ पहुँचे॥ ४३ १/२॥
इमे ते च बलौघेन परस्परवधैषिणः॥ ४४॥
उपयाता नरव्याघ्राः पूर्वा संध्यां प्रति प्रभो।
प्रभो! इस प्रकार परस्पर वधकी इच्छावाले ये और वे पुरुषसिंह योद्धा प्रातःकाल एक-दूसरेके निकट आये॥ ४४ १/२॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयानकम्।
तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम्॥ ४५॥
फिर तो परस्पर प्रहार करते हुए आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भयानक घोर युद्ध छिड़ गया॥ ४५॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि व्यूहनिर्माणोऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें व्यूह-निर्माणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2492)
नवमोऽध्यायः
उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और कौरव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां भयवर्धनम् ।
सृञ्जयैः सह राजेन्द्र घोरं देवासुरोपमम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजेन्द्र! तदनन्तर कौरवोंका सृंजयोंके साथ घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जो देवासुर-संग्रामके समान भय बढ़ानेवाला था ॥ १ ॥
नरा रथा गजौघाश्च सादिनश्च सहस्रशः ।
वाजिनश्च पराक्रान्ताः समाजग्मुः परस्परम् ॥ २ ॥
पैदल, रथी, हाथीसवार तथा सहस्रों घुड़सवार पराक्रम दिखाते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ २ ॥
गजानां भीमरूपाणां द्रवतां निःस्वनो महान् ।
अश्रूयत यथा काले जलदानां नभस्तले ॥ ३ ॥
जैसे वर्षाकालके आकाशमें मेघोंकी गम्भीर गर्जना होती रहती है, उसी प्रकार रणभूमिमें दौड़ लगाते हुए भीमकाय गजराजोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥
नागैरभ्याहताः केचित् सरथा रथिनोऽपतन् ।
व्यद्रवन्त रणे वीरा द्राव्यमाणा मदोत्कटैः ॥ ४ ॥
मदोन्मत्त हाथियोंके आघातसे कितने ही रथी रथसहित धरतीपर लोट गये। बहुत-से वीर उनसे खदेड़े जाकर इधर-उधर भागने लगे ॥ ४ ॥
हयौघान् पादरक्षांश्च रथिनस्तत्र शिक्षिताः ।
शरैः सम्प्रेषयामासुः परलोकाय भारत ॥ ५ ॥
भारत! उस युद्धस्थलमें शिक्षाप्राप्त रथियोंने घुड़सवारों तथा पादरक्षकोंको अपने बाणोंसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ५ ॥
सादिनः शिक्षिता राजन् परिवार्य महारथान् ।
विचरन्तो रणेऽभ्यघ्नन् प्रासशक्त्यृष्टिभिस्तथा ॥ ६ ॥
राजन्! रणभूमिमें विचरते हुए बहुत-से सुशिक्षित घुड़सवार बड़े-बड़े रथोंको घेरकर उनपर प्रास, शक्ति तथा ऋष्टियोंका प्रहार करने लगे ॥ ६ ॥
धन्विनः पुरुषाः केचित् परिवार्य महारथान् ।
एकं बहव आसाद्य प्रययुर्यमसादनम् ॥ ७ ॥
कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥ नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सान्तरायोशिनं/धिनं -> सान्तरायोशिनं? सान्तरायोशिनं? सान्तरायोशिनं? सान्तरायोशिनं? नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सान्तरायोशिनं नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सान्तरायोधिstrike नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सान्तरायोशिनं? नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः । सान्तरायोशिनं
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सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं? सान्तरायोधि strike? In Sanskrit सान्तरायोशिनं is not a word; सान्तरायोधिstrike = सान्तरायोशिनं? It is सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं? सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं?
It is सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं? No, the word is सान्तरायोशिनं? सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोशिनं?
In the Hindi translation: किसीकी ओटमें युद्ध करनेवाले -> सान्तराय (ओट में) + योधिनं (युद्ध करनेवाले) = सान्तरायोशिनं? No, सान्तरायो strike -> सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधि strike -> सान्तरायोशिनं? It's सान्तरायोशिनं? No, सान्तरायोधिstrike -> धिनं!
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कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः ।
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Let's write सान्तरायोशिनं or सान्तरायोधिstrike? Write सान्तरायोधिstrike as सान्तरायोशिनं? No, सान्तरायोशिनं vs सान्तरायोधिstrike -> सान्तरायोधि strike is सान्तरायोशिनं? It's clearly सान्तरायोधि strike = सान्तरायोशिनं? It's सान्तरायोशिनं? No, धिनं.
Everything transcribed:
पृथ्वी वज्रपातकी आवाजसे गूँजती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १४-१५ ॥ धनुषां कूजमानानां शस्त्रौघानां च दीप्यताम् । कवचानां प्रभाभिश्च न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ १६ ॥ टंकारते हुए धनुष, दमकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंके समुदाय तथा कवचोंकी प्रभासे चकाचौंधके कारण कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ १६ ॥ बहवो बाहवश्छिन्ना नागराजकरोपमाः । उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १७ ॥ हाथीकी सूँड़के समान बहुत-सी भुजाएँ कटकर धरती-पर उछलती, लोटती और भयंकर वेग प्रकट करती थीं ॥ शिरसां च महाराज पततां धरणीतले । च्युतानामिव तालेभ्यस्तालानां श्रूयते स्वनः ॥ १८ ॥ महाराज! पृथ्वीपर गिरते हुए मस्तकोंका शब्द, ताड़के वृक्षोंसे चूकर गिरे हुए फलोंके धमाकेकी आवाजके समान सुनायी देता था ॥ १८ ॥ शिरोभिः पतितैर्भाति रुधिराद्रैर्वसुन्धरा । तपनीयनिभैः काले नलिनैरिव भारत ॥ १९ ॥ भारत! गिरे हुए रक्तरंजित मस्तकोंसे इस पृथ्वीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ सुवर्णमय कमल बिछाये गये हों ॥ १९ ॥ उद्वृत्तनयनैस्तैस्तु गतसत्त्वैः सुविक्षतैः । व्यभ्राजत मही राजन् पुण्डरीकैरिवावृता ॥ २० ॥ राजन्! खुले नेत्रोंवाले प्राणशून्य घायल मस्तकोंसे ढकी हुई पृथ्वी लाल कमलोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पाती थी ॥ बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः सकेयूरैर्महाधनैः । पतितैर्भाति राजेन्द्र महाशक्रध्वजैरिव ॥ २१ ॥ राजेन्द्र! बाजूबंद तथा दूसरे बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, चन्दनचर्चित भुजाएँ कटकर पृथ्वीपर गिरी थीं, जो महान् इन्द्रध्वजके समान जान पड़ती थीं। उनके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ २१ ॥ ऊरुभिश्च नरेन्द्राणां विनिकृत्तैर्महाहवे । हस्तिहस्तोपमैरन्यैः संवृतं तद् रणाङ्गणम् ॥ २२ ॥ उस महासमरमें कटी हुई नरेशोंकी जाँघें हाथीकी सूँड़ोंके समान प्रतीत होती थीं। उनके द्वारा वह सारा समरांगण पट गया था ॥ २२ ॥ कबन्धशतसंकीर्णं छत्रचामरसंकुलम् । सेनावनं तच्छुशुभे वनं पुष्पाचितं यथा ॥ २३ ॥
वहाँ सैकड़ों कबन्ध सब ओर बिखरे पड़े थे। छत्र और चँवर भरे हुए थे। उन सबसे वह सेनारूपी वन फूलोंसे व्याप्त हुए विशाल विपिनके समान सुशोभित होता था।।
तत्र योधा महाराज विचरन्तो ह्यभीतवत् । दृश्यन्ते रुधिराक्ताङ्गाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ २४ ॥ महाराज! वहाँ खूनसे लथपथ शरीर लेकर निर्भय-से विचरनेवाले योद्धा फूले हुए पलाशवृक्षोंके समान दिखायी देते थे ॥ २४ ॥
मातङ्गाश्चाप्यदृश्यन्त शरतोमरपीडिताः । पतन्तस्तत्र तत्रैव छिन्नाभ्रसदृशा रणे ॥ २५ ॥ रणभूमिमें बाणों और तोमरोंकी मारसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ गिरते हुए मतवाले हाथी भी कटे हुए बादलोंके समान दिखायी देते थे ॥ २५ ॥
गजानीकं महाराज वध्यमानं महात्मभिः । व्यदीर्यत दिशः सर्वा वातनुन्ना घना इव ॥ २६ ॥ महाराज! वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान महामनस्वी वीरोंके बाणोंसे घायल हुई गजसेना सम्पूर्ण दिशाओंमें विदीर्ण हो रही थी ॥ २६ ॥
ते गजा घनसंकाशाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः । वज्रनुन्ना इव बभुः पर्वता युगसंक्षये ॥ २७ ॥ मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाले हाथी चारों ओरसे पृथ्वीपर पड़े थे, जो प्रलयकालमें वज्रके आघातसे विदीर्ण होकर गिरे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥
हयानां सादिभिः सार्धं पतितानां महीतले । राशयः स्म प्रदृश्यन्ते गिरिमात्रास्ततस्ततः ॥ २८ ॥ सवारोंसहित धरतीपर गिरे हुए घोड़ोंके पहाड़ों-जैसे ढेर यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते थे ॥ २८ ॥
संजज्ञे रणभूमौ तु परलोकवहा नदी । शोणितोदा रथावर्ता ध्वजवृक्षास्थिशर्करा ॥ २९ ॥ भुजनक्रा धनुःस्रोता हस्तिशैला हयोपला । मेदोमज्जाकर्दमिनी छत्रहंसा गदोडुपा ॥ ३० ॥ कवचोष्णीषसंछन्ना पताकारुचिरद्रुमा । चक्रचक्रावलीजुष्टा त्रिवेणूरगसंवृता ॥ ३१ ॥ उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ
नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे ।। २९–३१ ।।
शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धनी ।
प्रावर्तत नदी रौद्रा कुरुसृञ्जयसंकुला ।। ३२ ।।
वह भयंकर नदी शूरवीरोंके लिये हर्षजनक तथा कायरोंके लिये भय बढ़ानेवाली थी। कौरवों और सृञ्जयोंके समुदायसे वह व्याप्त हो रही थी ।। ३२ ।।
तां नदीं परलोकाय वहन्तीमतिभैरवाम् ।
तेरुर्वाहननौभिस्तैः शूराः परिघबाहवः ।। ३३ ।।
परलोककी ओर ले जानेवाली उस अत्यन्त भयंकर नदीको परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले शूरवीर योद्धा अपने-अपने वाहनरूपी नौकाओंद्वारा पार करते थे ।। ३३ ।।
वर्तमाने तदा युद्धे निर्मर्यादे विशाम्पते ।
चतुरङ्गक्षये घोरे पूर्वदेवासुरोपमे ।। ३४ ।।
व्याक्रोशन् बान्धवानन्ये तत्र तत्र परंतप ।
क्रोशद्भिर्दयितैरन्ये भयार्ता न निवर्तिरे ।। ३५ ।।
प्रजानाथ! परंतप! प्राचीन देवासुर-संग्रामके समान चतुरंगिणी सेनाका विनाश करनेवाला वह मर्यादाशून्य घोर युद्ध जब चलने लगा; तब भयसे पीड़ित हुए कितने ही सैनिक अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकारने लगे और बहुत-से योद्धा प्रियजनोंके पुकारनेपर भी पीछे नहीं लौटते थे ।। ३४-३५ ।।
निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने भयानके ।
अर्जुनो भीमसेनश्च मोहयांचक्रतुः परान् ।। ३६ ।।
इस प्रकार वह भयानक युद्ध सारी मर्यादाको तोड़कर चल रहा था। उस समय अर्जुन और भीमसेनने शत्रुओंको मूर्च्छित कर दिया था ।। ३६ ।।
सा वध्यमाना महती सेना तव नराधिप ।
अमुह्यत् तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव ।। ३७ ।।
नरेश्वर! उनकी मार पड़नेसे आपकी विशाल सेना मदमत्त युवतीकी भाँति जहाँ-की-तहाँ बेहोश हो गयी ।।
मोहयित्वा च तां सेनां भीमसेनधनंजयौ ।
दध्मतुर्वारिजौ तत्र सिंहनादांश्च चक्रतुः ।। ३८ ।।
उस कौरव-सेनाको मूर्च्छित करके भीमसेन और अर्जुन शंख बजाने तथा सिंहनाद करने लगे ।। ३८ ।।
श्रुत्वैव तु महाशब्दं धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।
धर्मराजं पुरस्कृत्य मद्रराजमभिद्रुतौ ॥ ३९ ॥
उस महान् शब्दको सुनते ही धृष्टद्युम्न और शिखण्डीने धर्मराज युधिष्ठिरको आगे करके मद्रराज शल्यपर धावा कर दिया ॥ ३९ ॥
तत्राश्चर्यमपश्याम घोररूपं विशाम्पते ।
शल्येन सङ्गताः शूरा यदयुध्यन्त भागशः ॥ ४० ॥
प्रजानाथ! वहाँ हमने यह भयंकर आश्चर्यकी बात देखी कि पृथक्-पृथक् दल बनाकर आये हुए सभी शूरवीर अकेले शल्यके साथ ही जूझते रहे ॥ ४० ॥
माद्रीपुत्रौ तु रभसौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ।
अभ्ययातां त्वरायुक्तौ जिगीषन्तौ परंतप ॥ ४१ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! अस्त्रोंके ज्ञाता, रणदुर्मद और वेगशाली वीर माद्रीकुमार नकुल-सहदेव विजयकी अभिलाषा लेकर बड़ी उतावलीके साथ राजा शल्यपर चढ़ आये ॥ ४१ ॥
ततो न्यवर्तत बलं तावकं भरतर्षभ ।
शरैः प्रणुन्नं बहुधा पाण्डवैर्जितकाशिभिः ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंने अपने बाणोंकी मारसे आपकी सेनाको बारंबार घायल किया ॥
वध्यमाना चमूः सा तु पुत्राणां प्रेक्षतां तव ।
भेजे दिशो महाराज प्रणुन्ना शरवृष्टिभिः ॥ ४३ ॥
महाराज! इस प्रकार चोट सहती हुई वह सेना बाणोंकी वर्षासे क्षत-विक्षत हो आपके पुत्रोंके देखते-देखते सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली ॥ ४३ ॥
हाहाकारो महाञ्जज्ञे योधानां तव भारत ।
तिष्ठ तिष्ठेति चाप्यासीद् द्रावितानां महात्मनाम् ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन! वहाँ आपके योद्धाओंमें महान् हाहाकार मच गया। भागे हुए योद्धाओंके पीछे महामनस्वी पाण्डव वीरोंकी 'ठहरो, ठहरो' की आवाज सुनायी देने लगी ॥ ४४ ॥
क्षत्रियाणां तदान्योन्यं संयुगे जयमिच्छताम् ।
प्राद्रवन्नेव सम्भग्नाः पाण्डवैस्तव सैनिकाः ॥ ४५ ॥
त्यक्त्वा युद्धे प्रियान् पुत्रान् भ्रातॄनथ पितामहान् ।
मातुलान् भागिनेयांश्च वयस्यानपि भारत ॥ ४६ ॥
भारत! युद्धमें परस्पर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले क्षत्रियोंमेंसे पाण्डवोंद्वारा पराजित होकर आपके सैनिक युद्धमें अपने प्यारे पुत्रों, भाइयों, पितामहों, मामाओं, भानजों और मित्रोंको भी छोड़कर भाग गये ॥ ४५-४६ ॥
हयान् द्विपांस्त्वरयन्तो योधा जग्मुः समन्ततः ।
आत्मत्राणकृतोत्साहास्तावका भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
भरतश्रेष्ठ! अपनी रक्षामात्रके लिये उत्साह रखनेवाले आपके सैनिक घोड़ों और हाथियोंको तीव्र गतिसे हाँकते हुए सब ओर भाग चले ।। ४७ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2499)
दशमोऽध्यायः
नकुलद्वारा कर्णके तीन पुत्रोंका वध तथा उभयपक्षकी सेनाओंका भयानक युद्ध
संजय उवाच
तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा मद्रराजः प्रतापवान् ।
उवाच सारथिं तूर्णं चोदयाश्वान् महाजवान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! उस सेनाको इस तरह भागती देख प्रतापी मद्रराज शल्यने अपने सारथिसे कहा—'सूत! मेरे महावेगशाली घोड़ोंको शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ाओ ॥ १ ॥
एष तिष्ठति वै राजा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।
छत्रेण ध्रियमाणेण पाण्डुरेण विराजता ॥ २ ॥
'देखो, ये सामने मस्तकपर शोभाशाली श्वेत छत्र लगाये हुए पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं ॥ २ ॥
अत्र मां प्रापय क्षिप्रं पश्य मे सारथे बलम् ।
न समर्थो हि मे पार्थः स्थातुमद्य पुरो युधि ॥ ३ ॥
'सारथे! मुझे शीघ्र उनके पास पहुँचा दो। फिर मेरा बल देखो। आज युद्धमें कुन्तीकुमार युधिष्ठिर मेरे सामने कदापि नहीं ठहर सकते' ॥ ३ ॥
एवमुक्तस्ततः प्रायान्मद्रराजस्य सारथिः ।
यत्र राजा सत्यसंधो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
उनके ऐसा कहनेपर मद्रराजका सारथि वहीं जा पहुँचा, जहाँ सत्यप्रतिज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर खड़े थे ॥ ४ ॥
प्रापतत् तच्च सहसा पाण्डवानां महद् बलम् ।
दधारैको रणे शल्यो वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् ॥ ५ ॥
साथ ही पाण्डवोंकी वह विशाल सेना भी सहसा वहाँ आ पहुँची। परंतु जैसे तट उमड़ते हुए समुद्रको रोक देता है, उसी प्रकार अकेले राजा शल्यने रणभूमिमें उस सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ५ ॥
पाण्डवानां बलौघस्तु शल्यमासाद्य मारिष ।
व्यतिष्ठत तदा युद्धे सिन्धोर्वेग इवाचलम् ॥ ६ ॥
माननीय नरेश! जैसे किसी नदीका वेग किसी पर्वतके पास पहुँचकर अवरुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार पाण्डवोंकी सेनाका वह समुदाय युद्धमें राजा शल्यके पास पहुँचकर खड़ा हो गया ॥ ६ ॥
मद्रराजं तु समरे दृष्ट्वा युद्धाय धिष्ठितम् । कुरवः संन्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ७ ॥ समरांगणमें मद्रराज शल्यको युद्धके लिये डटा हुआ देख कौरव-सैनिक मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिकी सीमा नियत करके पुनः रणभूमिमें लौट आये ॥ ७ ॥ तेषु राजन् निवृत्तेषु व्यूढानीकेषु भागशः । प्रावर्तत महारौद्रः संग्रामः शोणितोदकः ॥ ८ ॥ राजन्! पृथक्-पृथक् सेनाओंकी व्यूह-रचना करके जब वे सभी सैनिक लौट आये, तब दोनों दलोंमें महाभयंकर संग्राम छिड़ गया, जहाँ पानीकी तरह खून बहाया जा रहा था ॥ ८ ॥ समाच्छर्च्चित्रसेनं तु नकुलो युद्धदुर्मदः । तौ परस्परमासाद्य चित्रकार्मुकधारिणौ ॥ ९ ॥ मेघाविव यथोद्वृत्तौ दक्षिणोत्तरवर्षिणौ । शरतोयैः सिषिचतुस्तौ परस्परमाहवे ॥ १० ॥ इसी समय रणदुर्मद नकुलने कर्णपुत्र चित्रसेनपर आक्रमण किया। विचित्र धनुष धारण करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे भिड़कर दक्षिण तथा उत्तरकी ओरसे आये हुए दो बड़े जलवर्षक मेघोंके समान परस्पर बाणरूपी जलकी बौछार करने लगे ॥ ९-१० ॥ नान्तरं तत्र पश्यामि पाण्डवस्येतरस्य च । उभौ कृतास्त्रौ बलिनौ रथचर्याविशारदौ ॥ ११ ॥ परस्परवधे यत्तौ छिद्रान्वेषणतत्परौ । उस समय वहाँ पाण्डुपुत्र नकुल और कर्णकुमार चित्रसेनमें मुझे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दोनों ही अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान्, बलवान् तथा रथयुद्धमें कुशल थे। परस्पर घातमें लगे हुए वे दोनों वीर एक-दूसरेके छिद्र (प्रहारके योग्य अवसर) ढूँढ़ रहे थे ॥ ११ १/२ ॥ चित्रसेनस्तु भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥ १२ ॥ नकुलस्य महाराज मुष्टिदेशेऽच्छिनद् धनुः । महाराज! इतनेहीमें चित्रसेनने एक पानीदार पैने भल्लके द्वारा नकुलके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया ॥ १२ १/२ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ १३ ॥ त्रिभिः शरैरसम्भ्रान्तो ललाटे वै समर्पयत् । धनुष कट जानेपर उनके ललाटमें शिलापर तेज किये हुए सुनहरे पंखवाले तीन बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। उस समय चित्रसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई ॥ हयांश्चास्य शरैस्तीक्ष्णैः प्रेषयामास मृत्यवे ॥ १४ ॥
तथा ध्वजं सारथिं च त्रिभिस्त्रिभिरपातयत् । उसने अपने तीखे बाणोंद्वारा नकुलके घोड़ोंको भी मृत्युके हवाले कर दिया तथा तीन-तीन बाणोंसे उनके ध्वज और सारथिको भी काट गिराया ।। १४ १/२ ।।
स शत्रुभुजनिर्मुक्तैर्ललाटस्थैस्त्रिभिः शरैः ।। १५ ।। नकुलः शुशुभे राजंस्त्रिशृङ्ग इव पर्वतः । राजन्! शत्रु की भुजाओंसे छूटकर ललाटमें धँसे हुए उन तीन बाणोंके द्वारा नकुल तीन शिखरोंवाले पर्वतके समान शोभा पाने लगे ।। १५ १/२ ।।
स च्छिन्नधन्वा विरथः खड्गमादाय चर्म च ।। १६ ।। रथादवातरद् वीरः शैलाग्रादिव केसरी । धनुष कट जानेपर रथहीन हुए वीर नकुल हाथमें ढाल-तलवार लेकर पर्वतके शिखरसे उतरनेवाले सिंहके समान रथसे नीचे आ गये ।। १६ १/२ ।।
पद्भ्यामापततस्तस्य शरवृष्टिं समासृजत् ।। १७ ।। नकुलोऽप्यग्रसत् तां वै चर्मणा लघुविक्रमः । उस समय चित्रसेन पैदल आक्रमण करनेवाले नकुलके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा। परंतु शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नकुलने ढालके द्वारा ही रोककर उस बाण-वर्षाको नष्ट कर दिया ।। १७ १/२ ।।
चित्रसेनरथं प्राप्य चित्रयोधी जितश्रमः ।। १८ ।। आरुरोह महाबाहुः सर्वसैन्यस्य पश्यतः । विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले महाबाहु नकुल परिश्रमको जीत चुके थे। वे सारी सेनाके देखते-देखते चित्रसेनके रथके समीप जा उसपर चढ़ गये ।। १८ १/२ ।।
सकुण्डलं समुकुटं सुनसं स्वायतेक्षणम् ।। १९ ।। चित्रसेनशिरः कायादपाहरत पाण्डवः । तत्पश्चात् पाण्डुकुमारने सुन्दर नासिका और विशाल नेत्रोंसे युक्त कुण्डल और मुकुटसहित चित्रसेनके मस्तकको धड़से काट लिया ।। १९ १/२ ।।
स पपात रथोपस्थे दिवाकरसमद्युतिः ।। २० ।। चित्रसेनं विशस्तं तु दृष्ट्वा तत्र महारथाः । साधुवादस्वनांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् ।। २१ ।। सूर्यके समान तेजस्वी चित्रसेन रथके पिछले भागमें गिर पड़ा। चित्रसेनको मारा गया देख वहाँ खड़े हुए पाण्डव महारथी नकुलको साधुवाद देने और प्रचुरमात्रामें सिंहनाद करने लगे ।। २०-२१ ।।
विशस्तं भ्रातरं दृष्ट्वा कर्णपुत्रौ महारथौ । सुषेणः सत्यसेनश्च मुञ्चन्तौ विविधान् शरान् ।। २२ ।।
ततोऽभ्यधावतां तूर्णं पाण्डवं रथिनां वरम् ।
अपने भाईको मारा गया देख कर्णके दो महारथी पुत्र सुषेण और सत्यसेन नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुपुत्र नकुलपर तुरंत ही चढ़ आये ।। २२ १/२ ।।
जिघांसन्तौ यथा नागं व्याघ्रौ राजन् महावने ।। २३ ।।
तावभ्यधावतां तीक्ष्णौ द्वावप्येनं महारथम् ।
शरौघान् सम्यगस्यन्तौ जीमूतौ सलिलं यथा ।। २४ ।।
राजन्! जैसे विशाल वनमें दो व्याघ्र किसी एक हाथीको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर दौड़ें, उसी प्रकार तीखे स्वभाववाले वे दोनों भाई इन महारथी नकुलपर अपने बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे, मानो दो मेघ पानीकी धारावाहिक वृष्टि करते हों ।। २३-२४ ।।
स शरैः सर्वतो विद्धः प्रहृष्ट इव पाण्डवः ।
अन्यत् कार्मुकमादाय रथमारुह्य वेगवान् ।। २५ ।।
अतिष्ठत रणे वीरः क्रुद्धरूप इवान्तकः ।
सब ओरसे बाणोंद्वारा विद्ध होनेपर भी पाण्डुकुमार नकुल हर्ष और उत्साहमें भरे हुए वीर योद्धाकी भाँति दूसरा धनुष हाथमें लेकर बड़े वेगसे दूसरे रथपर जा चढ़े और कुपित हुए कालके समान रणभूमिमें खड़े हो गये ।। २५ १/२ ।।
तस्य तौ भ्रातरौ राजन् शरैः संनतपर्वभिः ।। २६ ।।
रथं विशकलीकर्तुं समारब्धौ विशाम्पते ।
राजन्! प्रजानाथ! उन दोनों भाइयोंने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा नकुलके रथके टुकड़े-टुकड़े करनेकी चेष्टा आरम्भ की ।। २६ १/२ ।।
ततः प्रहस्य नकुलश्चतुर्भिश्चतुरो रणे ।। २७ ।।
जघान निशितैर्बाणैः सत्यसेनस्य वाजिनः ।
तब नकुलने हँसकर रणभूमिमें चार पैने बाणोंद्वारा सत्यसेनके चारों घोड़ोंको मार डाला ।। २७ १/२ ।।
ततः संधाय नाराचं रुक्मपुङ्खं शिलाशितम् ।। २८ ।।
धनुश्चिच्छेद राजेन्द्र सत्यसेनस्य पाण्डवः ।
राजेन्द्र! तत्पश्चात् सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले एक नाराचका संधान करके पाण्डुपुत्र नकुलने सत्यसेनका धनुष काट दिया ।। २८ १/२ ।।
अथान्यं रथमास्थाय धनुरादाय चापरम् ।। २९ ।।
सत्यसेनः सुषेणश्च पाण्डवं पर्यधावताम् ।
इसके बाद दूसरे रथपर सवार हो दूसरा धनुष हाथमें लेकर सत्यसेन और सुषेण दोनोंने पाण्डुकुमार नकुलपर धावा किया ॥ २९१/२ ॥
अविध्यत् तावसम्भ्रान्तो माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ॥ ३० ॥
द्वाभ्यां द्वाभ्यां महाराज शराभ्यां रणमूर्धनि ।
महाराज! माद्रीके प्रतापी पुत्र नकुलने बिना किसी घबराहटके युद्धके मुहानेपर दो-दो बाणोंसे उन दोनों भाइयोंको घायल कर दिया ॥ ३०१/२ ॥
सुषेणस्तु ततः क्रुद्धः पाण्डवस्य महत् धनुः ॥ ३१ ॥
चिच्छेद प्रहसन् युद्धे क्षुरप्रेण महारथः ।
इससे सुषेणको बड़ा क्रोध हुआ। उस महारथीने हँसते-हँसते युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा पाण्डुकुमार नकुलके विशाल धनुषको काट डाला ॥ ३११/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय नकुलः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३२ ॥
सुषेणं पञ्चभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ।
फिर तो नकुल क्रोधसे तमतमा उठे और दूसरा धनुष लेकर उन्होंने पाँच बाणोंसे सुषेणको घायल करके एकसे उसकी ध्वजाको भी काट डाला ॥ ३२१/२ ॥
सत्यसेनस्य च धनुर्हस्तावापं च मारिष ॥ ३३ ॥
चिच्छेद तरसा युद्धे तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ।
आर्य! इसके बाद रणभूमिमें सत्यसेनके धनुष और दस्तानेके भी नकुलने वेगपूर्वक टुकड़े-टुकड़े कर डाले। इससे सब लोग जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे ॥ ३३१/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय वेगघ्नं भारसाधनम् ॥ ३४ ॥
शरैः संछादयामास समन्तात् पाण्डुनन्दनम् ।
तब सत्यसेनने शत्रुsingle वेग नष्ट करनेवाले दूसरे भारसाधक धनुषको हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा पाण्डुनन्दन नकुलको ढक दिया ॥ ३४१/२ ॥
संनिवार्य तु तान् बाणान् नकुलः परवीरहा ॥ ३५ ॥
सत्यसेनं सुषेणं च द्वाभ्यां द्वाभ्यामविध्यत ।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने उन बाणोंका निवारण करके सत्यसेन और सुषेणको भी दो-दो बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ३५१/२ ॥
तावेनं प्रत्यविध्येतां पृथक् पृथगजिह्मगैः ॥ ३६ ॥
सारथिं चास्य राजेन्द्र शितैर्विध्यधतुः शरैः ।
राजेन्द्र! फिर उन दोनों भाइयोंने भी पृथक्-पृथक् अनेक बाणोंसे नकुलको बींध डाला और पैने बाणोंद्वारा उनके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ ३६१/२ ॥
सत्यसेनो रथेषां तु नकुलस्य धनुस्तथा ॥ ३७ ॥
पृथक् शराभ्यां चिच्छेद कृतहस्तः प्रतापवान् ।
तत्पश्चात् सिद्धहस्त और प्रतापी वीर सत्यसेनने पृथक्-पृथक् दो-दो बाणोंसे नकुलका धनुष और उनके रथके ईषादण्ड भी काट डाले ।। ३७ १/२ ।।
स रथेऽतिरथस्तिष्ठन् रथशक्तिं परामृशत् ।। ३८ ।।
स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां तैलधौतां सुनिर्मलाम् ।
लेलिहानामिव विभो नागकन्यां महाविषाम् ।। ३९ ।।
समुद्यम्य च चिक्षेप सत्यसेनस्य संयुगे ।
तदनन्तर रथपर खड़े हुए अतिरथी वीर नकुलने एक रथशक्ति हाथमें ली, जिसमें सोनेका डंडा लगा हुआ था। उसका अग्रभाग कहीं भी कुण्ठित होनेवाला नहीं था। प्रभो! तेलमें धोकर साफ की हुई वह निर्मल शक्ति जीभ लपलपाती हुई महाविषैली नागिनके समान प्रतीत होती थी। नकुलने युद्धस्थलमें सत्यसेनको लक्ष्य करके ऊपर उठाकर वह रथशक्ति चला दी ।। ३८-३९ १/२ ।।
सा तस्य हृदयं संख्ये बिभेद च तथा नृप ।। ४० ।।
स पपात रथाद् भूमिं गतसत्त्वोऽल्पचेतनः ।
नरेश्वर! उस शक्ति ने रणभूमिमें उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया। सत्यसेनकी चेतना जाती रही और वह प्राणशून्य होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ४० १/२ ।।
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा सुषेणः क्रोधमूर्च्छितः ।। ४१ ।।
अभ्यवर्षच्छरैस्तूर्णं पादातं पाण्डुनन्दनम् ।
भाईको मारा गया देख सुषेण क्रोधसे व्याकुल हो उठा और तुरंत ही हरसा कट जानेसे पैदल हुए-से पाण्डुनन्दन नकुलपर बाणोंकी वर्षा करने लगा ।। ४१ १/२ ।।
चतुर्भिंश्चतुरो वाहान् ध्वजं छित्त्वा च पञ्चभिः ।। ४२ ।।
त्रिभिर्वै सारथिं हत्वा कर्णपुत्रो ननाद ह ।
उसने चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको मार डाला और पाँचसे उनकी ध्वजा काटकर तीनसे सारथिके भी प्राण ले लिये। इसके बाद कर्णपुत्र जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ।। ४२ १/२ ।।
नकुलं विरथं दृष्ट्वा द्रौपदेयो महारथम् ।। ४३ ।।
सुतसोमोऽभिदुद्राव परीप्सन् पितरं रणे ।
महारथी नकुलको रथहीन हुआ देख द्रौपदीका पुत्र सुतसोम अपने चाचाकी रक्षाके लिये वहाँ दौड़ा आया ।।
ततोऽधिरुह्य नकुलः सुतसोमस्य तं रथम् ।। ४४ ।।
शुशुभे भरतश्रेष्ठो गिरिस्थ इव केसरी ।
तब सुतसोमके उस रथपर आरूढ़ हो भरतश्रेष्ठ नकुल पर्वतपर बैठे हुए सिंहके समान सुशोभित होने लगे ।।
अन्यत् कार्मुकमादाय सुषेणं समयोधयत् ॥ ४५ ॥
तावुभौ शरवर्षाभ्यां समासाद्य परस्परम् ।
परस्परवधे यत्नं चक्रतुः सुमहारथौ ॥ ४६ ॥
उन्होंने दूसरा धनुष हाथमें लेकर सुषेणके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। वे दोनों महारथी वीर बाणोंकी वर्षाद्वारा एक-दूसरेसे टक्कर लेकर परस्पर वधके लिये प्रयत्न करने लगे ॥ ४५-४६ ॥
सुषेणस्तु ततः क्रुद्धः पाण्डवं विशिखैस्त्रिभिः ।
सुतसोमं तु विंशत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ४७ ॥
उस समय सुषेणने कुपित होकर तीन बाणोंसे पाण्डुपुत्र नकुलको बींध डाला और सुतसोमकी दोनों भुजाओं एवं छातीमें बीस बाण मारे ॥ ४७ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज नकुलः परवीरहा ।
शरैस्तस्य दिशः सर्वाश्छादयामास वीर्यवान् ॥ ४८ ॥
महाराज! तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी नकुलने कुपित हो बाणोंकी वर्षासे सुषेणकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ४८ ॥
ततो गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रमर्धचन्द्रं सुतेजनम् ।
सुवेगवन्तं चिक्षेप कर्णपुत्राय संयुगे ॥ ४९ ॥
इसके बाद तीखी धारवाले एक अत्यन्त तेज और वेगशाली अर्धचन्द्राकार बाण लेकर उसे समरांगणमें कर्णपुत्रपर चला दिया ॥ ४९ ॥
तस्य तेन शिरः कायाज्जहार नृपसत्तम ।
पश्यतां सर्वसैन्यानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५० ॥
नृपश्रेष्ठ! उस बाणसे नकुलने सम्पूर्ण सेनाओंके देखते-देखते सुषेणका मस्तक धड़से काट गिराया। वह अद्भुत-सी घटना हुई ॥ ५० ॥
स हतः प्रापतद् राजन् नकुलेन महात्मना ।
नदीवेगादिवारुग्णस्तीरजः पादपो महान् ॥ ५१ ॥
महामनस्वी नकुलके हाथसे मारा जाकर सुषेण पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो नदीके वेगसे कटकर महान् तटवर्ती वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ ५१ ॥
कर्णपुत्रवधं दृष्ट्वा नकुलस्य च विक्रमम् ।
प्रदुद्राव भयात् सेना तावकी भरतर्षभ ॥ ५२ ॥
भरतश्रेष्ठ! कर्णपुत्रोंका वध और नकुलका पराक्रम देखकर आपकी सेना भयसे भाग चली ॥ ५२ ॥
तां तु सेनां महाराज मद्रराजः प्रतापवान् ।
अपालयद् रणे शूरः सेनापतिररिंदमः ॥ ५३ ॥