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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2302)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय-पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता

संजय उवाच

वृषसेनं हतं दृष्ट्वा शोकामर्षसमन्वितः ।
पुत्रशोकोद्भवं वारि नेत्राभ्यां समवासृजत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब कर्णने वृषसेनको मारा गया देखा, तब वह शोक और अमर्षके वशीभूत हो अपने दोनों नेत्रोंसे पुत्रशोकजनित आँसू बहाने लगा ॥ १ ॥

रथेन कर्णस्तेजस्वी जगामाभिमुखो रिपुम् ।
युद्धायामर्शताम्राक्षः समाहूय धनंजयम् ॥ २ ॥
फिर तेजस्वी कर्ण क्रोधसे लाल आँखें करके अपने शत्रु धनंजयको युद्धके लिये ललकारता हुआ रथके द्वारा उनके सामने आया ॥ २ ॥

तौ रथौ सूर्यसंकाशौ वैयाघ्रपरिवारितौ ।
समेतौ ददृशुस्तत्र द्वाविवाकौ समुद्गतौ ॥ ३ ॥
व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और सूर्यके समान तेजस्वी वे दोनों रथ जब एकत्र हुए, तब लोगोंने वहाँ उन्हें इस प्रकार देखा, मानो दो सूर्य उदित हुए हों ॥ ३ ॥

श्वेताश्वौ पुरुषौ दिव्यावास्थितावरिमर्दनौ ।
शुशुभाते महात्मानौ चन्द्रादित्यौ यथा दिवि ॥ ४ ॥
दोनोंके घोड़े सफेद रंगके थे। दोनों ही दिव्य पुरुष और शत्रुओंका मर्दन करनेमें समर्थ थे। वे दोनों महामनस्वी वीर आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यके समान रणभूमिमें शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥

तौ दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुः सर्वसैन्यानि मारिष ।
त्रैलोक्यविजये यत्ताविन्द्रवैरोचनाविव ॥ ५ ॥
मान्यवर! तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये प्रयत्नशील हुए इन्द्र और बलिके समान उन दोनों वीरोंको आमने-सामने देखकर समस्त सेनाओंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ॥

रथज्यातलनिर्ह्रादैर्बाणसिंहरवैस्तथा ।
तौ रथावभिधावन्तौ समालोक्य महीक्षिताम् ॥ ६ ॥
ध्वजौ च दृष्ट्वा संसक्तौ विस्मयः समपद्यत ।

हस्तिकक्षं च कर्णस्य वानरं च किरीटिनः ॥ ७ ॥ रथ, धनुषकी प्रत्यंचा और हथेलीके शब्द, बाणोंकी सनसनाहट तथा सिंहनादके साथ एक-दूसरेके सम्मुख दौड़ते हुए उन दोनों रथोंको देखकर एवं उनकी परस्पर सटी हुई ध्वजाओंका अवलोकन करके वहाँ आये हुए राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ। कर्णकी ध्वजामें हाथीके साँकलका चिह्न था और किरीटधारी अर्जुनकी ध्वजापर मूर्तिमान् वानर बैठा था ॥ ६-७ ॥ तौ रथौ सम्प्रसक्तौ तु दृष्ट्वा भारत पार्थिवाः । सिंहनादवांश्चक्रुः साधुवादांश्च पुष्कलान् ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! उन दोनों रथोंको एक-दूसरेसे सटा देख सब राजा सिंहनाद करने और प्रचुर साधुवाद देने लगे ॥ दृष्ट्वा च द्वैरथं ताभ्यां तत्र योधाः सहस्रशः । चक्रुर्बाहुस्वनांश्चैव तथा चैलावधूननम् ॥ ९ ॥ उन दोनोंका द्वैरथ युद्ध प्रस्तुत देख वहाँ खड़े हुए सहस्रों योद्धा अपनी भुजाओंपर ताल ठोकने और कपड़े हिलाने लगे ॥ ९ ॥ आजघ्नुः कुरवस्तत्र वादित्राणि समन्ततः । कर्णं प्रहर्षयिष्यन्तः शङ्खान् दध्मुश्च सर्वशः ॥ १० ॥ तदनन्तर कर्णका हर्ष बढ़ानेके लिये कौरव-सैनिक वहाँ सब ओर बाजे बजाने और शंखध्वनि करने लगे ॥ तथैव पाण्डवाः सर्वे हर्षयन्तो धनंजयम् । तूर्यशङ्खनिनादेन दिशः सर्वा व्यनादयन् ॥ ११ ॥ इसी प्रकार समस्त पाण्डव भी अर्जुनका हर्ष बढ़ाते हुए वाद्यों और शंखोंकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे ॥ ११ ॥ क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैस्तुमुलं सर्वतोऽभवत् । बाहुशब्दैश्च शूराणां कर्णार्जुनसमागमे ॥ १२ ॥ कर्ण और अर्जुनके उस संघर्षमें शूरवीरोंके सिंहनाद करने, ताली बजाने, गर्जने और भुजाओंपर ताल ठोकनेसे सब ओर भयानक आवाज गूँज उठी ॥ १२ ॥ तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ रथस्थौ रथिनां वरौ । प्रगृहीतमहाचापौ शरशक्तिध्वजायुतौ ॥ १३ ॥ वर्मिणौ बद्धनिस्त्रिंशौ श्वेताश्वौ शङ्खशोभितौ । तूणीरवरसम्पन्नौ द्वावप्येतौ सुदर्शनौ ॥ १४ ॥ रक्तचन्दनदिग्धाङ्गौ समदौ गोवृषाविव । चापविद्युद्ध्वजोपेतौ शस्त्रसम्पत्तियोधिनौ ॥ १५ ॥ चामरव्यजनोपेतौ श्वेतच्छत्रोपशोभितौ ।

कृष्णशल्यरथोपेतौ तुल्यरूपौ महारथौ ॥ १६ ॥ सिंहस्कन्धौ दीर्घभुजौ रक्ताक्षौ हेममालिनौ । सिंहस्कन्धप्रतीकाशौ व्यूढोरस्कौ महाबलौ ॥ १७ ॥ अन्योन्यवधमिच्छन्तावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । अन्योन्यमभिधावन्तौ गोष्ठे गोवृषभाविव । प्रभिन्नाविव मातङ्गौ सुसंरब्धाविवाचलौ ॥ १८ ॥ आशीविषशिशुप्रख्यौ यमकालान्तकोपमौ । इन्द्रवृत्राविव क्रुद्धौ सूर्याचन्द्रसमप्रभौ ॥ १९ ॥ महाग्रहाविव क्रुद्धौ युगान्ताय समुत्थितौ । देवगर्भौ देवबलौ देवतुल्यौ च रूपतः ॥ २० ॥ यदृच्छया समायातौ सूर्याचन्द्रमसौ यथा । बलिनौ समरे दृप्तौ नानाशस्त्रधरौ युधि ॥ २१ ॥ तौ दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रौ शार्दूलाविव धिष्ठितौ । बभूव परमो हर्षस्तावकानां विशाम्पते ॥ २२ ॥

वे दोनों पुरुषसिंह रथपर विराजमान और रथियोंमें श्रेष्ठ थे। दोनोंने विशाल धनुष धारण किये थे। दोनों ही बाण, शक्ति और ध्वजसे सम्पन्न थे। दोनों कवचधारी थे और कमरमें तलवार बाँधे हुए थे। उन दोनोंके घोड़े श्वेत रंगके थे। वे दोनों ही शंखसे सुशोभित, उत्तम तरकससे सम्पन्न और देखनेमें सुन्दर थे। दोनोंके ही अंगोंमें लाल चन्दनका अनुलेप लगा हुआ था। दोनों ही साँड़ोंके समान मदमत्त थे। दोनोंके धनुष और ध्वज विद्युत्के समान कान्तिमान् थे। दोनों ही शस्त्रसमूहोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल थे। दोनों ही चँवर और व्यजनोंसे युक्त तथा श्वेत छत्रसे सुशोभित थे। एकके सारथि श्रीकृष्ण थे तो दूसरेके शल्य। उन दोनों महारथियोंके रूप एक-से ही थे। उनके कंधे सिंहके समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और आँखें लाल थीं। दोनोंने सुवर्णकी मालाएँ पहन रखी थीं। दोनों सिंहके समान उन्नत कंधोंसे प्रकाशित होते थे। दोनोंकी छाती चौड़ी थी और दोनों ही महान् बलशाली थे। दोनों एक-दूसरेका वध चाहते और परस्पर विजय पानेकी अभिलाषा रखते थे। गोशालामें लड़नेवाले दो साँड़ोंके समान वे दोनों एक-दूसरेपर धावा करते थे। मद बहानेवाले मदोन्मत्त हाथियोंके समान दोनों ही रोषावेशमें भरे हुए थे। पर्वतके समान अविचल थे। विषधर सर्पोंके शिशुओं-जैसे जान पड़ते थे। यम, काल और अन्तकके समान भयंकर प्रतीत होते थे। इन्द्र और वृत्रासुरके समान वे एक-दूसरेपर कुपित थे। सूर्य और चन्द्रमाके समान अपनी प्रभा बिखेर रहे थे। क्रोधमें भरे हुए दो महान् ग्रहोंके समान प्रलय मचानेके लिये उठ खड़े हुए थे। दोनों ही देवताओंके बालक, देवताओंके समान बली और देवतुल्य रूपवान् थे। दैवेच्छासे भूतलपर उतरे हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे। दोनों ही समरांगणमें बलवान् और अभिमानी थे। युद्धके लिये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए थे।

प्रजानाथ! आमने-सामने खड़े हुए दो सिंहोंके समान उन दोनों नरव्याघ्र वीरोंको देखकर आपके सैनिकोंको महान् हर्ष हुआ ।। १३—२२ ।।
संशयः सर्वभूतानां विजये समपद्यत ।
समेतौ पुरुषव्याघ्रौ प्रेक्ष्य कर्णधनंजयौ ।। २३ ।।
पुरुषसिंह कर्ण और धनंजयको एकत्र हुआ देखकर समस्त प्राणियोंको किसी एककी विजयमें संदेह होने लगा ।। २३ ।।
उभौ वरायुधधरावुभौ रणकृतश्रमौ ।
उभौ च बाहुशब्देन नादयन्तौ नभस्तलम् ।। २४ ।।
दोनोंने श्रेष्ठ आयुध धारण कर रखे थे, दोनोंने ही युद्धकी कला सीखनेमें परिश्रम किया था और दोनों अपनी भुजाओंके शब्दसे आकाशको प्रतिध्वनित कर रहे थे ।। २४ ।।
उभौ विश्रुतकर्माणौ पौरुषेण बलेन च ।
उभौ च सदृशौ युद्धे शम्बरामरराजयोः ।। २५ ।।
दोनोंके कर्म विख्यात थे। युद्धमें पुरुषार्थ और बलकी दृष्टिसे दोनों ही शम्बरासुर और देवराज इन्द्रके समान थे ।।
कार्तवीर्यसमौ चोभौ तथा दाशरथेः समौ ।
विष्णुवीर्यसमौ चोभौ तथा भवसमौ युधि ।। २६ ।।
दोनों ही युद्धमें कार्तवीर्य अर्जुन, दशरथनन्दन श्रीराम, भगवान् विष्णु और भगवान् शंकरके समान पराक्रमी थे ।। २६ ।।
उभौ श्वेतहयौ राजन् रथप्रवरवाहिनौ ।
सारथी प्रवरौ चैव तयोरास्तां महारणे ।। २७ ।।
‘राजन्! दोनोंके घोड़े सफेद रंगके थे। दोनों ही श्रेष्ठ रथपर सवार थे और उस महासमरमें दोनोंके सारथि श्रेष्ठ पुरुष थे ।। २७ ।।
ततो दृष्ट्वा महाराज राजमानौ महारथौ ।
सिद्धचारणसंघानां विस्मयः समपद्यत ।। २८ ।।
महाराज! वहाँ सुशोभित होनेवाले दोनों महारथियों-को देखकर सिद्धों और चारणोंके समुदायोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। २८ ।।
तव पुत्रास्ततः कर्णं सबला भरतर्षभ ।
परिवव्रुर्महात्मानं क्षिप्रमाहवशौभिनम् ।। २९ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर सेनासहित आपके पुत्र युद्धमें शोभा पानेवाले महामनस्वी कर्णको शीघ्र ही सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। २९ ।।
तथैव पाण्डवा हृष्टा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
परिवव्रुर्महात्मानं पार्थमप्रतिमं युधि ।। ३० ।।

इसी प्रकार हर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्न आदि पाण्डववीर युद्धमें अपना सानी न रखनेवाले महात्मा कुन्तीकुमार अर्जुनको घेरकर खड़े हुए ।। ३० ।। (यमौ च चेकितानश्च प्रहृष्टाश्च प्रभद्रकाः । नानादेश्याश्च ये शूराः शिष्टा युद्धाभिनन्दिनः ।। ते सर्वे सहिता हृष्टाः परिवव्रुर्धनंजयम् । रिरक्षिषन्तः शत्रुघ्नं पत्त्यश्वरथकुञ्जरैः ।। धनंजयस्य विजये धृताः कर्णवधेऽपि च । नकुल, सहदेव, चेकितान, हर्षमें भरे हुए प्रभद्रकगण, नाना देशोंके निवासी और युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अवशिष्ट शूरवीर—ये सब-के-सब हर्षमें भरकर एक साथ अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। वे पैदल, घुड़सवार, रथों और हाथियोंद्वारा शत्रुसूदन अर्जुनकी रक्षा करना चाहते थे। उन्होंने अर्जुनकी विजय और कर्णके वधके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था। तथैव तावकाः सर्वे यत्ताः सेनाप्रहारिणः । दुर्योधनमुखा राजन् कर्णं जुगुपुराहवे ।) राजन्! इसी प्रकार दुर्योधन आदि आपके सभी पुत्र सावधान एवं शत्रुसेनाओंपर प्रहार करनेके लिये उद्यत हो युद्धस्थलमें कर्णकी रक्षा करने लगे। तावकानां रणे कर्णो ग्लहो ह्यासीद् विशाम्पते । तथैव पाण्डवेयानां ग्लहः पार्थोऽभवत् तदा ।। ३१ ।। प्रजानाथ! आपकी ओरसे युद्धरूपी जूएमं कर्णको दाँवपर लगा दिया गया था। इसी प्रकार पाण्डवपक्षकी ओरसे कुन्तीकुमार अर्जुन दाँवपर चढ़ गये थे ।। ३१ ।। त एव सभ्यास्तत्रासन् प्रेक्षकाश्चाभवन् स्म ते । तत्रैषां ग्लहमानानां ध्रुवौ जयपराजयौ ।। ३२ ।। जो पहलेके जूएमं दर्शक थे, वे ही वहाँ भी सभासद् बने हुए थे। वहाँ युद्धरूपी जूआ खेलते हुए इन वीरोंमेंसे एककी जय और दूसरेकी पराजय अवश्यम्भावी थी ।। ३२ ।। ताभ्यां द्यूतं समासक्तं विजयायेतराय च । अस्माकं पाण्डवानां च स्थितानां रणमूर्धनि ।। ३३ ।। उन दोनोंने युद्धके मुहानेपर खड़े हुए हमलोगों तथा पाण्डवोंकी विजय अथवा पराजयके लिये रणद्यूत आरम्भ किया था ।। ३३ ।। तौ तु स्थितौ महाराज समरे युद्धशालिनौ । अन्योन्यं प्रतिसंरब्धावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।। ३४ ।। महाराज! युद्धमें शोभा पानेवाले वे दोनों वीर परस्पर कुपित हो एक-दूसरेके वधकी इच्छासे संग्रामके लिये खड़े हुए थे ।। ३४ ।। तावुभौ प्रजिहीर्षन्ताविन्द्रवृत्राविव प्रभो ।

भीमरूपधरावास्तां महाधूमाविव ग्रहौ ॥ ३५ ॥
प्रभो! इन्द्र और वृत्रासुरके समान वे दोनों एक-दूसरेपर प्रहारकी इच्छा रखते थे। उस समय उन दोनोंने दो महान् केतु—ग्रहोंके समान अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर लिया था ॥ ३५ ॥
ततोऽन्तरिक्षे साक्षेपा विवादा भरतर्षभ ।
मिथो भेदाश्च भूतानामासन् कर्णार्जुनन्तरे ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अन्तरिक्षमें स्थित हुए समस्त भूतोंमें कर्ण और अर्जुनकी जय-पराजयको लेकर परस्पर आक्षेपयुक्त विवाद और मतभेद पैदा हो गया ॥ ३६ ॥
व्यश्रूयन्त मिथो भिन्नाः सर्वलोकास्तु मारिष ।
देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः ॥ ३७ ॥
प्रतिपक्षग्रहं चक्रुः कर्णार्जुनसमागमे ।
मान्यवर! सब लोग परस्पर भिन्न विचार व्यक्त करते सुनायी देते थे। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस—इन सबने कर्ण और अर्जुनके युद्धके विषयमें पक्ष और विपक्ष ग्रहण कर लिया ॥ ३७ १/२ ॥
द्यौरासीत् सूतपुत्रस्य पक्षे मातेव धिष्ठिता ॥ ३८ ॥
भूमिर्धनंजयस्यासीन्मातेव जयकाङ्क्षिणी ।
द्यौ (आकाशकी अधिष्ठात्री देवी) माताके समान सूतपुत्र कर्णके पक्षमें खड़ी थी; परंतु भूदेवी माताकी भाँति धनंजयकी विजय चाहती थी ॥ ३८ १/२ ॥
गिरयः सागराश्चैव नद्यश्च सजलास्तथा ॥ ३९ ॥
वृक्षाश्चौषधयश्चैव व्याश्रयन्त किरीटिनम् ।
पर्वत, समुद्र, सजल नदियाँ, वृक्ष तथा ओषधियाँ—इन सबने अर्जुनके पक्षका आश्रय ले रखा था ॥ ३९ १/२ ॥
असुरा यातुधानाश्च गुह्यकाश्च परंतप ॥ ४० ॥
ते कर्णं समपद्यन्त हृष्टरूपाः समन्ततः ।
शत्रुओंको तपानेवाले वीर! असुर, यातुधान और गुह्यक—ये सब ओरसे प्रसन्नचित्त हो कर्णके ही पक्षमें आ गये थे ॥ ४० १/२ ॥
मुनयश्चारणाः सिद्धा वैनतेया वयांसि च ॥ ४१ ॥
रत्नानि निधयः सर्वे वेदाश्चाख्यानपञ्चमाः ।
सोपवेदोपनिषदः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥ ४२ ॥
वासुकिश्चित्रसेनश्च तक्षको मणिकस्तथा ।
सर्पाश्चैव तथा सर्वे काद्रवेयाश्च सान्वयाः ॥ ४३ ॥
विषवन्तो महाराज नागाश्चार्जुनतोऽभवन् ।
ऐरावताः सौरभेया वैशालेयाश्च भोगिनः ॥ ४४ ॥

एतेऽभवन्नर्जुनतः क्षुद्रसर्पाश्च कर्णतः । महाराज! मुनि, चारण, सिद्ध, गरुड़, पक्षी, रत्न, निधियाँ, उपवेद, उपनिषद्, रहस्य, संग्रह और इतिहास-पुराणसहित सम्पूर्ण वेद, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, मणिक, सम्पूर्ण सर्पगण, अपने वंशजोंसहित कद्रूकी संतानें, विषैले नाग, ऐरावत, सौरभेय और वैशालेय सर्प—ये सब अर्जुनके पक्षमें हो गये। छोटे-छोटे सर्प कर्णका साथ देने लगे ॥ ४१—४४ १/२ ॥

ईहामृगा व्यालमृगा माङ्गल्याश्च मृगद्विजाः ॥ ४५ ॥ पार्थस्य विजये राजन् सर्व एवाभिसंसृताः । राजन्! ईहामृग, व्यालमृग, मंगलसूचक मृग, पशु और पक्षी, सिंह तथा व्याघ्र—ये सब-के-सब अर्जुनकी ही विजयका आग्रह रखने लगे ॥ ४५ १/२ ॥

वसवो मरुतः साध्या रुद्रा विश्वेऽश्विनौ तथा ॥ ४६ ॥ अग्निरिन्द्रश्च सोमश्च पवनोऽथ दिशो दश । धनंजयस्य ते पक्षे आदित्याः कर्णतोऽभवन् ॥ ४७ ॥ विशः शूद्राश्च सूताश्च ये च संकरजातयः । सर्वशस्ते महाराज राधेयमभजंस्तदा ॥ ४८ ॥ वसु, मरुद्गण, साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, अग्नि, इन्द्र, सोम, पवन और दसों दिशाएँ अर्जुनके पक्षमें हो गये एवं (इन्द्रके सिवा अन्य) आदित्यगण कर्णके पक्षमें हो गये। महाराज! वैश्य, शूद्र, सूत तथा संकर जातिके लोग सब प्रकारसे उस समय राधापुत्र कर्णको ही अपनाने लगे ॥ ४६—४८ ॥

देवास्तु पितृभिः सार्धं सगणाः सपदानुगाः । यमो वैश्रवणश्चैव वरुणश्च यतोऽर्जुनः ॥ ४९ ॥ ब्रह्म क्षत्रं च यज्ञाश्च दक्षिणाश्चार्जुनं श्रिताः । अपने गणों और सेवकोंसहित देवता, पितर, यम, कुबेर और वरुण अर्जुनके पक्षमें थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, यज्ञ और दक्षिणा आदिने भी अर्जुनका ही साथ दिया ॥ ४९ १/२ ॥

प्रेताश्चैव पिशाचाश्च क्रव्यादाश्च मृगाण्डजाः ॥ ५० ॥ राक्षसाः सह यादोभिः श्वसृगालाश्च कर्णतः । प्रेत, पिशाच, मांसभोजी पशु-पक्षी, राक्षस, जल-जन्तु, कुत्ते और सियार—ये कर्णके पक्षमें हो गये ॥ ५० १/२ ॥

देवब्रह्मन्नृपर्षीणां गणाः पाण्डवतोऽभवन् ॥ ५१ ॥ तुम्बुरुप्रमुखा राजन् गन्धर्वाश्च यतोऽर्जुनः । प्राधेयाः सहमौनेया गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ ५२ ॥ राजन्! देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंके समुदाय पाण्डुपुत्र अर्जुनके पक्षमें थे। तुम्बुरु आदि गन्धर्व, प्राधा और मुनिसे उत्पन्न हुए गन्धर्व एवं अप्सराओंके समुदाय भी अर्जुनकी

ही ओर थे ॥ ५१-५२ ॥
(सहाप्सरोभिः शुद्धाभिर्देवदूताश्च गुह्यकाः ।
किरीटिनं संश्रिताः स्म पुण्यगन्धा मनोरमाः ॥
अमनोज्ञाश्च ये गन्धास्ते सर्वे कर्णमाश्रिताः ।

शुद्ध अप्सराओंसहित देवदूत, गुह्यक और मनोरम पवित्र सुगन्ध—ये सब किरीटधारी अर्जुनके पक्षमें आ गये तथा मनको प्रिय न लगनेवाले जो दुर्गन्धयुक्त पदार्थ थे, उन सबने कर्णका आश्रय लिया था।
विपरीतान्यरिष्टानि भवन्ति विनशिष्यताम् ॥
ये त्वन्तकाले पुरुषं विपरीतमुपाश्रितम् ।
प्रविशन्ति नरं क्षिप्रं मृत्युकालेऽभ्युपागते ॥
ते भावाः सहिताः कर्णं प्रविष्टाः सूतनन्दनम् ।

विनाशोन्मुख प्राणियोंके समक्ष जो विपरीत अनिष्ट प्रकट होते हैं, अन्तकालमें विपरीतभावका आश्रय लेनेवाले पुरुषमें उसकी मृत्युकी घड़ी आनेपर जो भाव प्रवेश करते हैं, वे सभी भाव और अरिष्ट एक साथ सूतपुत्र कर्णके भीतर प्रविष्ट हुए।
ओजस्तेजश्च सिद्धिश्च प्रहर्षः सत्यविक्रमौ ॥
मनस्तुष्टिर्जयश्चापि तथाऽऽनन्दो नृपोत्तम ।
ईदृशानि नरव्याघ्र तस्मिन् संग्रामसागरे ॥
निमित्तानि च शुभ्राणि विविशुर्जिष्णुमाहवे ।

नरव्याघ्र! नृपश्रेष्ठ! ओज, तेज, सिद्धि, हर्ष, सत्य, पराक्रम, मानसिक संतोष, विजय तथा आनन्द—ऐसे ही भाव और शुभ निमित्त उस युद्धसागरमें विजयशील अर्जुनके भीतर प्रविष्ट हुए थे।
ऋषयो ब्राह्मणैः सार्धमभजन्त किरीटिनम् ॥
ततो देवगणैः सार्धं सिद्धाश्च सह चारणैः ।
द्विधाभूता महाराज व्याश्रयन्त नरोत्तमौ ॥

ब्राह्मणोंसहित ऋषियोंने किरीटधारी अर्जुनका साथ दिया। महाराज! देवसमुदायों और चारणोंके साथ सिद्धगण दो दलोंमें विभक्त होकर उन दोनों नरश्रेष्ठ अर्जुन और कर्णका पक्ष लेने लगे।
विमानानि विचित्राणि गुणवन्ति च सर्वशः ।
समारुह्य समाजग्मुर्द्वैरथं कर्णपार्थयोः ॥)

वे सब लोग विचित्र एवं गुणवान् विमानोंपर बैठकर कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्ध देखनेके लिये आये थे।
ईहामृगाः पक्षिगणा द्विपाश्चरथपत्तिभिः ।
उह्यमानास्तथा मेघैर्वायुना च मनीषिणः ॥ ५३ ॥

दिदृक्षवः समाजग्मुः कर्णार्जुनसमागमम् । क्रीड़ामृग, पक्षीसमुदाय तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंसहित दिव्य मनीषी पुरुष वायु तथा बादलोंको वाहन बनाकर कर्ण और अर्जुनका युद्ध देखनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ५३ १/२ ॥ देवदानवगन्धर्वा नागयक्षाः पतत्रिणः ॥ ५४ ॥ महर्षयो वेदविदः पितरश्च स्वधाभुजः । तपोविद्यास्तथौषध्यो नानारूपबलान्विताः ॥ ५५ ॥ अन्तरिक्षे महाराज विनदन्तोऽवतस्थिरे । महाराज! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग, यक्ष, पक्षी, वेदज्ञ महर्षि, स्वधाभोजी पितर, तप, विद्या तथा नाना प्रकारके रूप और बलसे सम्पन्न ओषधियाँ—ये सब-के-सब कोलाहल मचाते हुए अन्तरिक्षमें खड़े हुए थे॥ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च ॥ ५६ ॥ भवश्चैव स्थितो याने दिव्ये तं देशमागमत् । ब्रह्मर्षियों तथा प्रजापतियोंके साथ ब्रह्मा और महादेवजी भी दिव्य विमानपर स्थित हो उस प्रदेशमें आये॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ ॥ ५७ ॥ अर्जुनो जयतां कर्णमिति शक्रोऽब्रवीत्तदा । उन दोनों महामनस्वी वीर कर्ण और अर्जुनको एकत्र हुआ देख उस समय इन्द्र बोल उठे—‘अर्जुन कर्णपर विजय प्राप्त करें’॥ ५७ १/२ ॥ जयतामर्जुनं कर्ण इति सूर्योऽभ्यभाषत ॥ ५८ ॥ हत्वार्जुनं मम सुतः कर्णो जयतु संयुगे । हत्वा कर्णं जयत्वद्य मम पुत्रो धनंजयः ॥ ५९ ॥ यह सुनकर सूर्यदेव कहने लगे—‘नहीं, कर्ण ही अर्जुनको जीत ले। मेरा पुत्र कर्ण युद्धस्थलमें अर्जुनको मारकर विजय प्राप्त करे।’ (इन्द्र बोले—) ‘नहीं, मेरा पुत्र अर्जुन ही आज कर्णका वध करके विजयश्रीका वरण करे’॥ ५८-५९॥ इति सूर्यस्य चैवासीद् विवादो वासवस्य च । पक्षसंस्थितयोस्तत्र तयोर्विबुधसिंहयोः । द्वैपक्ष्यमासीद् देवानामसुराणां च भारत ॥ ६० ॥ इस प्रकार सूर्य और इन्द्रमें विवाद होने लगा। वे दोनों देवश्रेष्ठ वहाँ एक-एक पक्षमें खड़े थे। भारत! देवताओं और असुरोंमें भी वहाँ दो पक्ष हो गये थे॥ समेतौ तौ महात्मानौ दृष्ट्वा कर्णधनंजयौ । अकम्पन्त त्रयो लोकाः सहदेवर्षिचारणाः ॥ ६१ ॥

महामना कर्ण और अर्जुनको युद्धके लिये एकत्र हुआ देख देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंसहित तीनों लोकके प्राणी काँपने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वे देवगणाश्चैव सर्वभूतानि यानि च ।
यतः पार्थस्ततो देवा यतः कर्णस्ततोऽसुराः ॥ ६२ ॥
सम्पूर्ण देवता तथा समस्त प्राणी भी भयभीत हो उठे थे। जिस ओर अर्जुन थे, उधर देवता और जिस ओर कर्ण था, उधर असुर खड़े थे ॥ ६२ ॥

रथयूथपयोः पक्षौ कुरुपाण्डववीरयोः ।
दृष्ट्वा प्रजापतिं देवाः स्वयम्भुवमचोदयन् ॥ ६३ ॥
रथयूथपति कर्ण और अर्जुन कौरव तथा पाण्डव दलके प्रमुख वीर थे। उनके विषयमें दो पक्ष देखकर देवताओंने प्रजापति स्वयम्भू ब्रह्माजीसे पूछा— ॥ ६३ ॥

कोऽनयोर्विजयी देव कुरुपाण्डवयोधयोः ।
समोऽस्तु विजयो देव एतयोर्नरसिंहयोः ॥ ६४ ॥
‘देव! इन कौरव-पाण्डव योद्धाओंमें कौन विजयी होगा? भगवन्! हम चाहते हैं कि इन दोनों पुरुषसिंहोंकी एक-सी ही विजय हो ॥ ६४ ॥

कर्णार्जुनविवादेन सर्वं संशयितं जगत् ।
स्वयम्भो ब्रूहि नस्तथ्यमेतयोर्विजयं प्रभो ॥ ६५ ॥
स्वयम्भो ब्रूहि तद्वाक्यं समोऽस्तु विजयोऽनयोः ।
‘प्रभो! कर्ण और अर्जुनके विवादसे सारा संसार संशयमें पड़ गया। स्वयम्भू! आप हमें इनके विजयके सम्बन्धमें सच्ची बात बताइये। आप ऐसा वचन बोलिये, जिससे इन दोनोंकी समान विजय सूचित हो’ ॥ ६५ ½ ॥

तदुपश्रुत्य मघवा प्रणिपत्य पितामहम् ॥ ६६ ॥
व्यज्ञापयत देवेशमिदं मतिमतां वरः ।
देवताओंकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ इन्द्रने देवेश्वर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके यह निवेदन किया ॥

पूर्वं भगवता प्रोक्तं कृष्णयोर्विजयो ध्रुवः ॥ ६७ ॥
तत् तथास्तु नमस्तेऽस्तु प्रसीद भगवन् मम ।
‘भगवन्! आपने पहले कहा था कि ‘इन दोनों कृष्णोंकी विजय अटल है।’ आपका वह कथन सत्य हो। आपको नमस्कार है। आप मुझपर प्रसन्न होइये’ ॥ ६७ ½ ॥

ब्रह्मेशानावथो वाक्यमूचतुस्त्रिदशेश्वरम् ॥ ६८ ॥
विजयो ध्रुवमेवास्य विजयस्य महात्मनः ।
खाण्डवे येन हुतभुक्तोषितः सव्यसाचिना ॥ ६९ ॥
स्वर्गं च समनुप्राप्य साहाय्यं शक्र ते कृतम् ।

तब ब्रह्मा और महादेवजीने देवेश्वर इन्द्रसे कहा—‘महात्मा अर्जुनकी विजय तो निश्चित ही है। इन्द्र! इन्हीं सव्यसाची अर्जुनने खाण्डववनमें अग्निदेवको संतुष्ट किया और स्वर्गलोकमें जाकर तुम्हारी भी सहायता की।। ६८-६९½ ।। कर्णश्च दानवः पक्ष अतः कार्यः पराजयः ॥ ७० ॥ एवं कृते भवेत् कार्यं देवानामेव निश्चितम् । आत्मकार्यं च सर्वेषां गरीयस्त्रिदशेश्वर ॥ ७१ ॥ ‘कर्ण दानव-पक्षका पुरुष है; अतः उसकी पराजय करनी चाहिये—ऐसा करनेपर निश्चितरूपसे देवताओंका ही कार्य सिद्ध होगा। देवेश्वर! अपना कार्य सभीके लिये गुरुतर होता है।। ७०-७१ ।। महात्मा फाल्गुनश्चापि सत्यधर्मरतः सदा । विजयस्तस्य नियतं जायते नात्र संशयः ॥ ७२ ॥ ‘महात्मा अर्जुन सदा सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः उनकी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है।। ७२ ।। तोषिता भगवान् येन महात्मा वृषभध्वजः । कथं वा तस्य न जयो जायते शतलोचन ॥ ७३ ॥ ‘शतलोचन! जिन्होंने महात्मा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट किया है, उनकी विजय कैसे नहीं होगी।। ७३ ।। यस्य चक्रे स्वयं विष्णुः सारथ्यं जगतः प्रभुः । मनस्वी बलवान् शूरः कृतास्त्रोऽथ तपोधनः ॥ ७४ ॥ ‘साक्षात् जगदीश्वर भगवान् विष्णुने जिनका सारथ्य किया है, जो मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और तपस्याके धनी हैं, उनकी विजय क्यों न होगी?।। बिभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः । पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः ॥ ७५ ॥ ‘सर्वगुणसम्पन्न महातेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्वेदको धारण करते हैं; अतः उनकी विजय होगी ही; क्योंकि यह देवताओंका ही कार्य है।। ७५ ।। क्लिश्यन्ते पाण्डवा नित्यं वनवासादिभिर्भृशम् । सम्पन्नस्तपसा चैव पर्याप्तः पुरुषर्षभः ॥ ७६ ॥ ‘पाण्डव वनवास आदिके द्वारा सदा महान् कष्ट उठाते आये हैं। पुरुषप्रवर अर्जुन तपोबलसे सम्पन्न और पर्याप्त शक्तिशाली हैं।। ७६ ।। अतिक्रमेच्च माहात्म्याद् दिष्टमप्यर्थपर्ययम् । अतिक्रान्ते च लोकानामभावो नियतं भवेत् ॥ ७७ ॥ ‘ये अपनी महिमासे दैवके भी निश्चित विधानको पलट सकते हैं; यदि ऐसा हुआ तो सम्पूर्ण लोकोंका अवश्य ही अन्त हो जायगा।। ७७ ।।

न विद्यते व्यवस्थानं क्रुद्धयोः कृष्णयोः क्वचित् । स्रष्टारौ जगतश्चैव सततं पुरुषर्षभौ ॥ ७८ ॥ 'श्रीकृष्ण और अर्जुनके कुपित होनेपर यह संसार कहीं टिक नहीं सकता; पुरुषप्रवर श्रीकृष्ण और अर्जुन ही निरन्तर जगत्की सृष्टि करते हैं ॥ ७८ ॥

नरनारायणावेतौ पुराणावृषिसत्तमौ । अनियम्यौ नियन्तारावेतौ तस्मात् परंतपौ ॥ ७९ ॥ 'ये ही प्राचीन ऋषिश्रेष्ठ नर और नारायण हैं; इनपर किसीका शासन नहीं चलता। ये ही सबके नियन्ता हैं; अतः ये शत्रुओंको संताप देनेमें समर्थ हैं ॥ ७९ ॥

नैतयोस्तु समः कश्चिद् दिवि वा मानुषेषु वा । अनुगम्यास्त्रयो लोकाः सह देवर्षिचारणैः ॥ ८० ॥ सर्वदेवगणाश्चापि सर्वभूतानि यानि च । अनयोस्तु प्रभावेण वर्तते निखिलं जगत् ॥ ८१ ॥ 'देवलोक अथवा मनुष्यलोकमें कोई भी इन दोनोंकी समानता करनेवाला नहीं है। देवता, ऋषि और चारणोंके साथ तीनों लोक, समस्त देवगण और सम्पूर्ण भूत इनके ही नियन्त्रणमें रहनेवाले हैं। इन्हींके प्रभावसे सम्पूर्ण जगत् अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त होता है ॥ ८०-८१ ॥

कर्णो लोकानयं मुख्यानाप्नोतु पुरुषर्षभः । कर्णो वैकर्तनः शूरो विजयस्त्वस्तु कृष्णयोः ॥ ८२ ॥ 'शूरवीर पुरुषप्रवर वैकर्तन कर्ण श्रेष्ठ लोक प्राप्त करे; परंतु विजय तो श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ही हो ॥ ८२ ॥

वसूनां समलोकत्वं मरुतां वा समाप्नुयात् । सहितो द्रोणभीष्माभ्यां नाकलोकमवाप्नुयात् ॥ ८३ ॥ 'कर्ण द्रोणाचार्य और भीष्मजीके साथ वसुओं अथवा मरुद्गणोंके लोकमें जाय अथवा स्वर्गलोक ही प्राप्त करे' ॥ ८३ ॥

इत्युक्तो देवदेवाभ्यां सहस्राक्षोऽब्रवीद् वचः । आमन्त्र्य सर्वभूतानि ब्रह्मेशानानुशासनम् ॥ ८४ ॥ देवाधिदेव ब्रह्मा और महादेवजीके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सम्पूर्ण प्राणियोंको बुलाकर उन दोनोंकी आज्ञा सुनायी ॥

श्रुतं भवद्भैर्यत् प्रोक्तं भगवद्भ्यां जगद्धितम् । तत्तथा नान्यथा तद्धि तिष्ठध्वं विगतज्वराः ॥ ८५ ॥ वे बोले—'हमारे पूज्य प्रभुओंने संसारके हितके लिये जो कुछ कहा है, वह सब तुमलोगोंने सुन ही लिया होगा। वह वैसे ही होगा। उसके विपरीत होना असम्भव है; अतः अब निश्चिन्त हो जाओ' ॥ ८५ ॥

इति श्रुत्वेन्द्रवचनं सर्वभूतानि मारिष । विस्मितान्यभवन् राजन् पूजयांचक्रिरे तदा ॥ ८६ ॥ व्यसृजंश्च सुगन्धीनि पुष्पवर्षाणि हर्षिताः । नानारूपाणि विबुधा देवतूर्याण्यवादयन् ॥ ८७ ॥ माननीय नरेश! इन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त प्राणी विस्मित हो गये और हर्षमें भरकर श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे। साथ ही उन दोनोंके ऊपर उन्होंने दिव्य सुगन्धित फूलोंकी वर्षा की। देवताओंने नाना प्रकारके दिव्य बाजे बजाने आरम्भ कर दिये ॥

दिदृक्षवश्चाप्रतिमं द्वैरथं नरसिंहयोः । देवदानवगन्धर्वाः सर्व एवावतस्थिरे ॥ ८८ ॥ पुरुषसिंह कर्ण और अर्जुनका अनुपम द्वैरथ युद्ध देखनेकी इच्छासे देवता, दानव और गन्धर्व सभी वहाँ खड़े हो गये ॥ ८८ ॥

रथौ तयोः श्वेतहयौ दिव्यौ युक्तौ महात्मनोः । यौ तौ कर्णार्जुनौ राजन् प्रहृष्टावभ्यतिष्ठताम् ॥ ८९ ॥ राजन्! कर्ण और अर्जुन हर्षमें भरकर जिन रथोंपर बैठे हुए थे, उन महामनस्वी वीरोंके वे दोनों रथ श्वेत घोड़ोंसे युक्त, दिव्य और आवश्यक सामग्रियोंसे सम्पन्न थे ॥ ८९ ॥

समागता लोकवीराः शंखान् दध्मुः पृथक् पृथक् । वासुदेवार्जुनौ वीरौ कर्णशल्यौ च भारत ॥ ९० ॥ भरतनन्दन! वहाँ एकत्र हुए सम्पूर्ण जगत्के वीर पृथक्-पृथक् शंखध्वनि करने लगे। वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनने तथा शल्य और कर्णने भी अपना-अपना शंख बजाया ॥

तद् भीरुसंत्रासकरं युद्धं समभवत्तदा । अन्योन्यस्पर्धिनोरुग्रं शक्रशम्बरयोरिव ॥ ९१ ॥ इन्द्र और शम्बरासुरके समान एक-दूसरेसे डाह रखनेवाले उन दोनों वीरोंमें उस समय घोर युद्ध आरम्भ हुआ, जो कायरोंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥

तयोर्ध्वजौ वीतमलौ शुशुभाते रथे स्थितौ । राहुकेतू यथाऽऽकाशे उदितौ जगतः क्षये ॥ ९२ ॥ उन दोनोंके रथोंपर निर्मल ध्वजाएँ शोभा पा रही थीं, मानो संसारके प्रलयकालमें आकाशमें राहु और केतु दोनों ग्रह उदित हुए हों ॥ ९२ ॥

कर्णस्याशीविषनिभा रत्नसारमयी दृढा । पुरन्दरधनुःप्रख्या हस्तिकक्ष्या व्यराजत ॥ ९३ ॥ कर्णके ध्वजकी पताकामें हाथीकी साँकलका चिह्न था, वह साँकल रत्नसारमयी, सुदृढ़ और विषधर सर्पके समान आकारवाली थी। वह आकाशमें इन्द्रधनुषके समान शोभा पाती थी ॥ ९३ ॥

कपिश्रेष्ठस्तु पार्थस्य व्यादितास्य इवान्तकः । दंष्ट्राभिर्भीषयन् भाभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा ॥ ९४ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनके रथपर मुँह बाये हुए यमराजके समान एक श्रेष्ठ वानर बैठा हुआ था, जो अपनी दाढ़ोंसे सबको डराया करता था। वह अपनी प्रभासे सूर्यके समान जान पड़ता था। उसकी ओर देखना कठिन था ॥ ९४ ॥

युद्धाभिलाषुको भूत्वा ध्वजो गाण्डीवधन्वनः । कर्णध्वजमुपातिष्ठत् स्वस्थानाद् वेगवान् कपिः ॥ ९५ ॥ उत्पपात महावेगः कक्ष्यामभ्याहनत्तदा । नखैश्च दशनैश्चैव गरुडः पन्नगं यथा ॥ ९६ ॥ गाण्डीवधारी अर्जुनका ध्वज मानो युद्धका इच्छुक होकर कर्णके ध्वजपर आक्रमण करने लगा। अर्जुनकी ध्वजाका महान् वेगशाली वानर उस समय अपने स्थानसे उछला और कर्णकी ध्वजाकी साँकलपर चोट करने लगा, जैसे गरुड़ अपने पंजों और चोंचसे सर्पपर प्रहार कर रहे हों ॥

सा किङ्किणीकाभरणा कालपाशोपमाऽऽयसी । अभ्यद्रवत् सुसंरब्धा हस्तिकक्ष्याथ तं कपिम् ॥ ९७ ॥ कर्णके ध्वजपर जो हाथीकी साँकल थी, वह कालपाशके समान जान पड़ती थी। वह लोहनिर्मित हाथीकी साँकल छोटी-छोटी घण्टियोंसे विभूषित थी। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस वानरपर धावा किया ॥

तयोर्घोरतरे युद्धे द्वैरथे द्यूत आहिते । प्रकुर्वाते ध्वजौ युद्धं पूर्वं पूर्वतरं तदा ॥ ९८ ॥ उन दोनोंमें घोरतर द्वैरथ युद्धरूपी जूएका अवसर उपस्थित था, इसीलिये उन दोनोंकी ध्वजाओंने पहले स्वयं ही युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ९८ ॥

हया हयानभ्यहेषन् स्पर्धमानाः परस्परम् । अविध्यत् पुण्डरीकाक्षः शल्यं नयनसायकैः ॥ ९९ ॥ एकके घोड़े दूसरेके घोड़ोंको देखकर परस्पर लाग-डाँट रखते हुए हिनहिनाने लगे। इसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने शल्यकी ओर त्यौरी चढ़ाकर देखा, मानो वे उसे नेत्ररूपी बाणोंसे बींध रहे हों ॥ ९९ ॥

शल्यश्च पुण्डरीकाक्षं तथैवाभिसमैक्षत । तत्राजयद् वासुदेवः शल्यं नयनसायकैः ॥ १०० ॥ इसी प्रकार शल्यने भी कमलनयन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया; परंतु वहाँ विजय श्रीकृष्णकी ही हुई। उन्होंने अपने नेत्ररूपी बाणोंसे शल्यको पराजित कर दिया ॥

कर्णं चाप्यजयद् दृष्ट्या कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अथाब्रवीत् सूतपुत्रः शल्यमाभाष्य सस्मितम् ॥ १०१ ॥

यदि पार्थो रणे हन्यादद्य मामिह कर्हिचित् ।
किं करिष्यसि संग्रामे शल्य सत्यमथोच्यताम् ॥ १०२ ॥
इसी तरह कुन्तीनन्दन धनंजयने भी अपनी दृष्टिद्वारा कर्णको परास्त कर दिया। तदनन्तर कर्णने शल्यसे मुसकराते हुए कहा—‘शल्य! सच बताओ, यदि कदाचित् आज रणभूमिमें कुन्तीपुत्र अर्जुन मुझे यहाँ मार डालें तो तुम इस संग्राममें क्या करोगे?’ ॥ १०१-१०२ ॥

शल्य उवाच
यदि कर्ण रणे हन्यादद्य त्वां श्वेतवाहनः ।
उभावेकरथेनाहं हन्यां माधवपाण्डवौ ॥ १०३ ॥
शल्यने कहा— कर्ण! यदि श्वेतवाहन अर्जुन आज युद्धमें तुझे मार डालें तो मैं एकमात्र रथके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंका वध कर डालूँगा ॥ १०३ ॥

संजय उवाच
एवमेव तु गोविन्दमर्जुनः प्रत्यभाषत ।
तं प्रहस्याब्रवीत् कृष्णः सत्यं पार्थमिदं वचः ॥ १०४ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! इसी प्रकार अर्जुनने भी श्रीकृष्णसे पूछा। तब श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे यह सत्य बात कही— ॥ १०४ ॥
पतेद् दिवाकरः स्थानाच्छुष्येदपि महोदधिः ।
शैत्यमग्निरियान्न त्वां हन्यात् कर्णो धनंजय ॥ १०५ ॥
‘धनंजय! सूर्य अपने स्थानसे गिर जाय, समुद्र सूख जाय और अग्नि सदाके लिये शीतल हो जाय तो भी कर्ण तुम्हें मार नहीं सकता ॥ १०५ ॥
यदि चैतत् कथञ्चित् स्याल्लोकपर्यासनं भवेत् ।
हन्यां कर्णं तथा शल्यं बाहुभ्यामेव संयुगे ॥ १०६ ॥
‘यदि किसी तरह ऐसा हो जाय तो संसार उलट जायगा। मैं अपनी दोनों भुजाओंसे ही युद्धभूमिमें कर्ण तथा शल्यको मसल डालूँगा’ ॥ १०६ ॥
इति कृष्णवचः श्रुत्वा प्रहसन् कपिकेतनः ।
अर्जुनः प्रत्युवाचेदं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥ १०७ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर कपिध्वज अर्जुन हँस पड़े और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ १०७ ॥
मम तावदपर्याप्तौ कर्णशल्यौ जनार्दन ।
सपताकध्वजं कर्णं सशल्यरथवाजिनम् ॥ १०८ ॥
सच्छत्रकवचं चैव सशक्तिशरकार्मुकम् ।
द्रष्टास्यद्य रणे कृष्ण शरैश्छिन्नमनेकधा ॥ १०९ ॥

‘जनार्दन! ये कर्ण और शल्य तो मेरे ही लिये पर्याप्त नहीं हैं। श्रीकृष्ण! आज रणभूमिमें आप देखियेगा, मैं कवच, छत्र, शक्ति, धनुष, बाण, ध्वजा, पताका, रथ, घोड़े तथा राजा शल्यके सहित कर्णको अपने बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा ॥ १०८-१०९ ॥

अद्यैव सरथं साश्वं सशक्तिककवचायुधम् ।
संचूर्णितमिवारण्ये पादपं दन्तिना यथा ॥ ११० ॥
‘जैसे जंगलमें दन्तार हाथी किसी पेड़को टूक-टूक कर देता है, उसी प्रकार आज ही मैं रथ, घोड़े, शक्ति, कवच तथा अस्त्र-शस्त्रोंसहित कर्णको चूर-चूर कर डालूँगा ॥

अद्य राधेयभार्याणां वैधव्यं समुपस्थितम् ।
ध्रुवं स्वप्नेष्वनिष्टानि ताभिर्दृष्टानि माधव ॥ १११ ॥
‘माधव! आज राधापुत्र कर्णकी स्त्रियोंके विधवा होनेका अवसर उपस्थित है। निश्चय ही, उन्होंने स्वप्नमें अनिष्ट वस्तुओंके दर्शन किये हैं ॥ १११ ॥

द्रष्टासि ध्रुवमद्यैव विधवाः कर्णयोषितः ।
न हि मे शाम्यते मन्युर्यदनेन पुरा कृतम् ॥ ११२ ॥
कृष्णां सभागतां दृष्ट्वा मूढेनादीर्घदर्शिना ।
अस्मांस्तथावहसता क्षिपता च पुनः पुनः ॥ ११३ ॥
‘आप निश्चय ही, आज कर्णकी स्त्रियोंको विधवा हुई देखेंगे। इस अदूरदर्शी मूर्खने सभामें द्रौपदीको आयी देख बारंबार उसकी तथा हमलोगोंकी हँसी उड़ायी और हम सब लोगोंपर आक्षेप किया। ऐसा करते हुए इस कर्णने पहले जो कुकृत्य किया है, उसे याद करके मेरा क्रोध शान्त नहीं होता है ॥ ११२-११३ ॥

अद्य द्रष्टासि गोविन्द कर्णमुन्मथितं मया ।
वारणेनेव मत्तेन पुष्पितं जगतीरुहम् ॥ ११४ ॥
‘गोविन्द! जैसे मतवाला हाथी फले-फूले वृक्षको तोड़ डालता है, उसी प्रकार आज मैं इस कर्णको मथ डालूँगा। आप यह सब कुछ अपनी आँखों देखेंगे ॥

अद्य ता मधुरा वाचः श्रोतासि मधुसूदन ।
दिष्ट्या जयसि वार्ष्णेय इति कर्णे निपातिते ॥ ११५ ॥
‘मधुसूदन! आज कर्णके मारे जानेपर आपको मधुर बातें सुननेको मिलेंगी। हमलोग कहेंगे—‘वृष्णिनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज आपकी विजय हुई’ ॥

अद्याभिमन्युजननीं प्रहृष्टः सान्त्वयिष्यसि ।
कुन्तीं पितृष्वसारं च प्रहृष्टः सञ्जनार्दन ॥ ११६ ॥
‘जनार्दन! आज आप अत्यन्त प्रसन्न होकर अभिमन्युकी माता सुभद्राको और अपनी बुआ कुन्तीदेवीको सान्त्वना देंगे ॥ ११६ ॥

अद्य बाष्पमुखीं कृष्णां सान्त्वयिष्यसि माधव ।
वाग्भिश्चामृतकल्पाभिर्धर्मराजं च पाण्डवम् ॥ ११७ ॥

‘माधव! आज आप मुखपर आँसुओंकी धारा बहानेवाली द्रुपदकुमारी कृष्णा तथा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको अमृतके समान मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना प्रदान करेंगे’ ।। ११७ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनसमागमे द्वैरथे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ।। ८७ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागमविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८७ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२८ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 2319)

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा कौरव-सेनाका संहार, अश्वत्थामाका दुर्योधनसे संधिंके लिये प्रस्ताव और दुर्योधनद्वारा उसकी अस्वीकृति

संजय उवाच

तद् देवनागासुरसिद्धयक्षै-
र्गन्धर्वरक्षोऽप्सरसां च संघैः ।
ब्रह्मर्षिराजर्षिसुपर्णजुष्टं
बभौ वियद् विस्मयनीयरूपम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं—महाराज! उस समय आकाशमें देवता, नाग, असुर, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, अप्सराओंके समुदाय, ब्रह्मर्षि, राजर्षि और गरुड़—ये सब जुटे हुए थे। इनके कारण आकाशका स्वरूप अत्यन्त आश्चर्यमय प्रतीत होता था ॥ १ ॥

नानद्यमानं निनदैर्मनोज्ञै-
र्वादित्रगीतस्तुतिनृत्यहासैः ।
सर्वेऽन्तरिक्षं ददृशुर्मनुष्याः
खस्थाश्च तद् विस्मयनीयरूपम् ॥ २ ॥

नाना प्रकारके मनोरम शब्दों, वाद्यों, गीतों, स्तोत्रों, नृत्यों और हास्य आदिसे आकाश मुखरित हो उठा। उस समय भूतलके मनुष्य और आकाशचारी प्राणी सभी उस आश्चर्यमय अन्तरिक्षकी ओर देख रहे थे ॥

ततः प्रहृष्टाः कुरुपाण्डुयोधा
वादित्रशङ्खस्वनसिंहनादैः ।
विनादयन्तो वसुधां दिशश्च
स्वनेन सर्वान् द्विषतो निजघ्नुः ॥ ३ ॥

तदनन्तर कौरव और पाण्डवपक्षके समस्त योद्धा बड़े हर्षमें भरकर वाद्य, शंखध्वनि, सिंहनाद और कोलाहलसे रणभूमि एवं सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए समस्त शत्रुओंका संहार करने लगे ॥ ३ ॥

नराश्वमातङ्गरथैः समाकुलं
शरासिशक्त्यृष्टिनिपातदुःसहम् ।
अभीरुजुष्टं हतदेहसंकुलं
रणाजिरं लोहितमाबभौ तदा ॥ ४ ॥

उस समय हाथी, अश्व, रथ और पैदल सैनिकोंसे भरा हुआ बाण, खड्ग, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे दुःसह प्रतीत होनेवाला एवं मृतकोंके शरीरोंसे व्याप्त हुआ वह वीरसेवित समरांगण खूनसे लाल दिखायी देने लगा ॥ ४ ॥

बभूव युद्धं कुरुपाण्डवानां यथा सुराणामसुरैः सहाभवत् । तथा प्रवृत्ते तुमुले सुदारुणे धनंजयस्याधिरथेश्च सायकैः ॥ ५ ॥ दिशश्च सैन्यं च शितैरजिह्मगैः परस्परं प्रावृणुतां सुदंशितौ । जैसे पूर्वकालमें देवताओंका असुरोंके साथ संग्राम हुआ था, उसी प्रकार पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध होने लगा। अर्जुन और कर्णके बाणोंसे वह अत्यन्त दारुण तुमुल युद्ध आरम्भ होनेपर वे दोनों कवचधारी वीर अपने पैने बाणोंसे परस्पर सम्पूर्ण दिशाओं तथा सेनाको आच्छादित करने लगे ॥ ५ १/२ ॥

ततस्त्वदीयाश्च परे च सायकैः कृतेऽन्धकारे ददृशुर्न किंचन ॥ ६ ॥ भयातुरा एकरथौ समाश्रयं- स्ततोऽभवत् त्वद्भुतमेव सर्वतः । तत्पश्चात् आपके और शत्रुपक्षके सैनिक जब बाणोंसे फैले हुए अन्धकारमें कुछ भी देख न सके, तब भयसे आतुर हो उन दोनों प्रधान रथियोंकी शरणमें आ गये। फिर तो चारों ओर अद्भुत युद्ध होने लगा ॥ ६ १/२ ॥

ततोऽस्त्रमस्त्रेण परस्परं तौ विधूय वाताविव पूर्वपश्चिमौ ॥ ७ ॥ घनान्धकारे वितते तमोनुदौ यथोदितौ तद्वदतीव रेजतुः । तदनन्तर जैसे पूर्व और पश्चिमकी हवाएँ एक-दूसरीको दबाती हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर एक-दूसरेके अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा नष्ट करके फैले हुए प्रगाढ़ अन्धकारमें उदित हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान अत्यन्त प्रकाशित होने लगे ॥ ७ १/२ ॥

न चाभिसर्तव्यमिति प्रचोदिताः परे त्वदीयाश्च तथावतस्थिरे ॥ ८ ॥ महारथौ तौ परिवार्य सर्वतः सुरासुराः शम्बरवासवाविव । ‘किसीको युद्धसे मुँह मोड़कर भागना नहीं चाहिये' इस नियमसे प्रेरित होकर आपके और शत्रुपक्षके सैनिक उन दोनों महारथियोंको चारों ओरसे घेरकर उसी प्रकार युद्धमें डटे

रहे, जैसे पूर्वकालमें देवता और असुर, इन्द्र और शम्बरासुरको घेरकर खड़े हुए थे ॥ मृदङ्गभेरीपणवानकस्वनैः ससिंहनादैर्नदतुर्नरोत्तमौ ॥ ९ ॥ शशाङ्कसूर्याविव मेघनिःस्वनै- र्विरजतुस्तौ पुरुषर्षभौ तदा । दोनों दलोंमें होती हुई मृदंग, भेरी, पणव और आनक आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे दोनों नरश्रेष्ठ जोर-जोरसे सिंहनाद कर रहे थे, उस समय वे दोनों पुरुषरत्न मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ उदित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ९ ½ ॥

महाधनुर्मण्डलमध्यगावुभौ सुवर्चसौ बाणसहस्रदीधिती ॥ १० ॥ दिधक्षमाणौ सचराचरं जगद् युगान्तसूर्याविव दुःसहौ रणे । रणभूमिमें वे दोनों वीर चराचर जगत्‌को दग्ध करनेकी इच्छासे प्रकट हुए प्रलयकालके दो सूर्योंके समान शत्रुओंके लिये दुःसह हो रहे थे। कर्ण और अर्जुनरूप वे दोनों सूर्य अपने विशाल धनुषरूपी मण्डलके मध्यमें प्रकाशित होते थे। सहस्रों बाण ही उनकी किरण थे और वे दोनों ही महान् तेजसे सम्पन्न दिखायी देते थे ॥ १० ½ ॥

उभावजेयावहितान्तकावुभा- वुभौ जिघांसू कृतिनौ परस्परम् ॥ ११ ॥ महाहवे वीतभयौ समीयतु- र्महेन्द्रजम्भाविव कर्णपाण्डवौ । दोनों ही अजेय और शत्रुओंका विनाश करनेवाले थे। दोनों ही अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् और एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले थे। कर्ण और अर्जुन दोनों वीर इन्द्र और जम्भासुरके समान उस महासमरमें निर्भय विचरते थे ॥ ११ ½ ॥

ततो महास्त्राणि महाधनुर्धरौ विमुञ्चमानाविषुभिर्भयानकैः ॥ १२ ॥ नराश्वनागानमितान् निजघ्नतुः परस्परं चापि महारथौ नृप । नरेश्वर! वे महाधनुर्धर और महारथी वीर महान् अस्त्रोंका प्रयोग करते हुए अपने भयानक बाणोंद्वारा असंख्य मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंका संहार करते और आपसमें भी एक-दूसरेको चोट पहुँचाते थे ॥ १२ ½ ॥

ततो विसस्रुः पुनरर्दिता नरा नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाश्रयाः ॥ १३ ॥ सनागपत्त्यश्वरथा दिशो दश