महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2312, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब ब्रह्मा और महादेवजीने देवेश्वर इन्द्रसे कहा—‘महात्मा अर्जुनकी विजय तो निश्चित ही है। इन्द्र! इन्हीं सव्यसाची अर्जुनने खाण्डववनमें अग्निदेवको संतुष्ट किया और स्वर्गलोकमें जाकर तुम्हारी भी सहायता की।। ६८-६९½ ।। कर्णश्च दानवः पक्ष अतः कार्यः पराजयः ॥ ७० ॥ एवं कृते भवेत् कार्यं देवानामेव निश्चितम् । आत्मकार्यं च सर्वेषां गरीयस्त्रिदशेश्वर ॥ ७१ ॥ ‘कर्ण दानव-पक्षका पुरुष है; अतः उसकी पराजय करनी चाहिये—ऐसा करनेपर निश्चितरूपसे देवताओंका ही कार्य सिद्ध होगा। देवेश्वर! अपना कार्य सभीके लिये गुरुतर होता है।। ७०-७१ ।। महात्मा फाल्गुनश्चापि सत्यधर्मरतः सदा । विजयस्तस्य नियतं जायते नात्र संशयः ॥ ७२ ॥ ‘महात्मा अर्जुन सदा सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं; अतः उनकी विजय अवश्य होगी, इसमें संशय नहीं है।। ७२ ।। तोषिता भगवान् येन महात्मा वृषभध्वजः । कथं वा तस्य न जयो जायते शतलोचन ॥ ७३ ॥ ‘शतलोचन! जिन्होंने महात्मा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट किया है, उनकी विजय कैसे नहीं होगी।। ७३ ।। यस्य चक्रे स्वयं विष्णुः सारथ्यं जगतः प्रभुः । मनस्वी बलवान् शूरः कृतास्त्रोऽथ तपोधनः ॥ ७४ ॥ ‘साक्षात् जगदीश्वर भगवान् विष्णुने जिनका सारथ्य किया है, जो मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और तपस्याके धनी हैं, उनकी विजय क्यों न होगी?।। बिभर्ति च महातेजा धनुर्वेदमशेषतः । पार्थः सर्वगुणोपेतो देवकार्यमिदं यतः ॥ ७५ ॥ ‘सर्वगुणसम्पन्न महातेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन सम्पूर्ण धनुर्वेदको धारण करते हैं; अतः उनकी विजय होगी ही; क्योंकि यह देवताओंका ही कार्य है।। ७५ ।। क्लिश्यन्ते पाण्डवा नित्यं वनवासादिभिर्भृशम् । सम्पन्नस्तपसा चैव पर्याप्तः पुरुषर्षभः ॥ ७६ ॥ ‘पाण्डव वनवास आदिके द्वारा सदा महान् कष्ट उठाते आये हैं। पुरुषप्रवर अर्जुन तपोबलसे सम्पन्न और पर्याप्त शक्तिशाली हैं।। ७६ ।। अतिक्रमेच्च माहात्म्याद् दिष्टमप्यर्थपर्ययम् । अतिक्रान्ते च लोकानामभावो नियतं भवेत् ॥ ७७ ॥ ‘ये अपनी महिमासे दैवके भी निश्चित विधानको पलट सकते हैं; यदि ऐसा हुआ तो सम्पूर्ण लोकोंका अवश्य ही अन्त हो जायगा।। ७७ ।।