महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 580)
अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे ।
पार्थभूतममन्यन्त जगत् कालेन मोहिताः ॥ १५ ॥
बहुत-से दूसरे सैनिक आपसमें ही एक-दूसरेपर तथा अपने ऊपर भी प्रहार कर बैठते थे। वे कालसे मोहित होकर सारे संसारको अर्जुनमय ही मानने लगे ।।
निष्टनन्तः सरुधिरा विसंज्ञा गाढवेदनाः ।
शयाना बहवो वीराः कीर्तयन्तः स्वबान्धवान् ॥ १६ ॥
बहुत-से वीर रक्तसे भीगे शरीरसे धराशायी होकर गहरी वेदनाके कारण कराहते हुए अपनी चेतना खो बैठते थे और कितने ही योद्धा धरतीपर पड़े-पड़े अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकार रहे थे ।। १६ ।।
श्रीकृष्ण और अर्जुनका दुर्मर्षणकी गजसेनामें प्रवेश
सभिन्दिपालाः सप्रासाः सशक्त्यृष्टिपरश्वधाः ।
सनिव्यूहाः सनिस्त्रिंशाः सशरासनतोमराः ॥ १७ ॥
सबाणवर्माभरणाः सगदाः साङ्गदा रणे ।
महाभुजंगसंकाशा बाहवः परिघोपमाः ॥ १८ ॥ उद्वेष्टन्ति विचेष्टन्ति संचेष्टन्ति च सर्वशः । वेगं कुर्वन्ति संरब्धा निकृत्ताः परमेषुभिः ॥ १९ ॥ अर्जुनके श्रेष्ठ बाणोंसे कटी हुई वीरोंकी परिघके समान मोटी और महान् सर्पके समान दिखायी देनेवाली भिन्दिपाल, प्रास, शक्ति, ऋष्टि, फरसे, निर्व्यूह, खड्ग, धनुष, तोमर, बाण, कवच, आभूषण, गदा और भुजबंद आदिसे युक्त भुजाएँ आवेशमें भरकर अपना महान् वेग प्रकट करती, ऊपरको उछलती, छटपटाती और सब प्रकारकी चेष्टाएँ करती थीं ॥ १७—१९ ॥ यो यः स्म समरे पार्थं प्रतिसंचरते नरः । तस्य तस्यान्तको बाणः शरीरमुपसर्पति ॥ २० ॥ जो-जो मनुष्य उस समरांगणमें अर्जुनका सामना करनेके लिये चलता था, उस-उसके शरीरपर प्राणान्तकारी बाण आ गिरता था ॥ २० ॥ नृत्यतो रथमार्गेषु धनुर्व्यायच्छतस्तथा । न कश्चित् तत्र पार्थस्य ददृशेऽन्तरमण्वपि ॥ २१ ॥ अर्जुन वहाँ इस प्रकार निरन्तर रथके मार्गोंपर विचरते और खींच रहे थे कि उस समय कोई भी उनपर प्रहार करनेका धनुषको थोड़ा-सा भी अवसर नहीं देख पाता था ॥ २१ ॥ यत्तस्य घटमानस्य क्षिप्रं विक्षिपतः शरान् । लाघवात् पाण्डुपुत्रस्य व्यस्मयन्त परे जनाः ॥ २२ ॥ पाण्डुपुत्र अर्जुन पूर्ण सावधान हो विजय पानेकी चेष्टा करते और शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते थे। उस समय उनकी फुर्ती देखकर दूसरे लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था ॥ हस्तिनं हस्तियन्तारमश्वमाश्विकमेव च । अभिनत् फाल्गुनो बाणौ रथिनं च ससारथिम् ॥ २३ ॥ अर्जुनने हाथी और महावतको, घोड़े और घुड़सवारको तथा रथी और सारथिको भी अपने बाणोंसे विदीर्ण कर डाला ॥ २३ ॥ आवर्तमानमावृत्तं युध्यमानं च पाण्डवः । प्रमुखे तिष्ठमानं च न किंचिन्न निहन्ति सः ॥ २४ ॥ जो लौटकर आ रहे थे, जो आ चुके थे, जो युद्ध करते थे और जो सामने खड़े थे—इनमेंसे किसीको भी पाण्डुकुमार अर्जुन मारे बिना नहीं छोड़ते थे ॥ २४ ॥ यथोदयन् वै गगने सूर्यो हन्ति महत् तमः । तथार्जुनो गजानीकमवधीत् कङ्कपत्रिभिः ॥ २५ ॥ जैसे आकाशमें उदित हुआ सूर्य महान् अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार अर्जुनने कंककी पाँखवाले बाणोंद्वारा उस गजसेनाका संहार कर डाला ॥ २५ ॥ हस्तिभिः पतितैर्भिन्नैस्तव सैन्यमदृश्यत ।
अन्तकाले यथा भूमिव्र्यवकीर्णा महीधरैः ॥ २६ ॥
राजन्! बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़े हुए हाथियोंसे आपकी सेना वैसी ही दिखायी देती थी, जैसे प्रलयकालमें यह पृथ्वी इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतोंसे आच्छादित देखी जाती है ॥ २६ ॥
यथा मध्यन्दिने सूर्यो दुष्प्रेक्ष्यः प्राणिभिः सदा ।
तथा धनंजयः क्रुद्धो दुष्प्रेक्ष्यो युधि शत्रुभिः ॥ २७ ॥
जैसे दोपहरके सूर्यकी ओर देखना समस्त प्राणियोंके लिये सदा ही कठिन होता है, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें कुपित हुए अर्जुनकी ओर शत्रुलोग बड़ी कठिनाईसे देख पाते थे ॥ २७ ॥
तत् तथा तव पुत्रस्य सैन्यं युधि परंतप ।
प्रभग्नं द्रुतमाविग्नमतीव शरपीडितम् ॥ २८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! इस प्रकार उस युद्धस्थलमें अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हुई आपके पुत्रकी सेनाके पाँव उखड़ गये और वह अत्यन्त उद्विग्न हो तुरंत ही वहाँसे भाग चली ॥ २८ ॥
मारुतेनेव महता मेघानीकं व्यदीर्यत ।
प्रकाल्यमानं तत् सैन्यं नाशकत् प्रतिवीक्षितुम् ॥ २९ ॥
जैसे बड़े वेगसे उठी हुई वायु बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार दुर्मर्षणकी सेनाका व्यूह टूट गया और वह अर्जुनके खदेड़नेपर इस प्रकार जोर-जोरसे भागने लगी कि उसे पीछे फिरकर देखनेका भी साहस न हुआ ॥ २९ ॥
प्रतोदैश्चापकोटीभिर्हुङ्कारैः साधुवाहितैः ।
कशापाष्र्ण्यभिघातैश्च वाग्भिरुग्राभिरेव च ॥ ३० ॥
चोदयन्तो हयांस्तूर्णं पलायन्ते स्म तावकाः ।
सादिनो रथिनश्चैव पत्तयश्चार्जुनार्दिताः ॥ ३१ ॥
अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हुए आपके पैदल, घुड़सवार और रथी सैनिक चाबुक, धनुषकी कोटि, हुंकार, हाँकनेकी सुन्दर कला, कोड़ोंके प्रहार, चरणोंके आघात तथा भयंकर वाणीद्वारा अपने घोड़ोंको बड़ी उतावलीके साथ हाँकते हुए भाग रहे थे ॥ ३०-३१ ॥
पाष्र्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्नागं चोदयन्तस्तथा परे ।
शरैः सम्मोहिताश्चान्ये तमेवाभिमुखा ययुः ।
तव योधा हतोत्साहा विभ्रान्तमनसस्तदा ॥ ३२ ॥
दूसरे गजारोही सैनिक अपने पैरोंके अँगूठों और अंकुशोंद्वारा हाथियोंको हाँकते हुए रणभूमिसे पलायन कर रहे थे। कितने ही योद्धा अर्जुनके बाणोंसे मोहित होकर उन्हींके
सामने चले जाते थे। उस समय आपके सभी योद्धाओंका उत्साह नष्ट हो गया था और मनमें बड़ी भारी घबराहट पैदा हो गयी थी ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अर्जुनयुद्धे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अर्जुनयुद्धविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 584)
नवतितमोऽध्यायः
अर्जुनके बाणोंसे हताहत होकर सेनासहित दुःशासनका पलायन
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन् प्रभग्ने सैन्याग्रे वध्यमाने किरीटिना ।
के तु तत्र रणे वीराः प्रत्युदीयुर्धनंजयम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! किरीटधारी अर्जुनकी मार खाकर उस अग्रगामी सैन्यदलके पलायन कर जानेपर वहाँ रणक्षेत्रमें किन वीरोंने अर्जुनपर धावा किया था? ॥ १ ॥
आहोस्विच्छकटव्यूहं प्रविष्टा मोघनिश्चयाः ।
द्रोणमाश्रित्य तिष्ठन्तं प्राकारमकुतोभयम् ॥ २ ॥
अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि अपना मनोरथ सफल न होनेपर वे परकोटेकी भाँति खड़े हुए द्रोणाचार्यका आश्रय लेकर सर्वथा निर्भय शकटव्यूहमें घुस गये हों ॥ २ ॥
संजय उवाच
तथार्जुनेन सम्भग्ने तस्मिंस्तव बलेऽनघ ।
हतवीरे हतोत्साहे पलायनकृतक्षणे ॥ ३ ॥
पाकशासनिनाभीक्ष्णं वध्यमाने शरोत्तमैः ।
न तत्र कश्चित् संग्रामे शशाकार्जुनमीक्षितुम् ॥ ४ ॥
संजयने कहा— निष्पाप नरेश! जब इन्द्रपुत्र अर्जुनने पूर्वोक्त प्रकारसे आपकी सेनाके वीरोंको मारकर उसे हतोत्साह एवं भागनेके लिये विवश कर दिया, सभी सैनिक पलायन करनेका ही अवसर देखने लगे तथा उनके ऊपर निरन्तर श्रेष्ठ बाणोंकी मार पड़ने लगी, उस समय वहाँ संग्राममें कोई भी अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख न सका ॥ ३-४ ॥
ततस्तव सुतो राजन् दृष्ट्वा सैन्यं तथागतम् ।
दुःशासनो भृशं क्रुद्धो युद्धायार्जुनमभ्यगात् ॥ ५ ॥
राजन्! सेनाकी वह दुरवस्था देखकर आपके पुत्र दुःशासनको बड़ा क्रोध हुआ और वह युद्धके लिये अर्जुनके सामने जा पहुँचा ॥ ५ ॥
स काञ्चनविचित्रेण कवचेन समावृतः ।
जाम्बूनदशिरस्त्राणः शूरस्तीव्रपराक्रमः ॥ ६ ॥
उसने अपने-आपको सुवर्णमय विचित्र कवचके द्वारा ढक लिया था, उसके मस्तकपर जाम्बूनद सुवर्णका बना हुआ शिरस्त्राण (टोप) शोभा पा रहा था। वह दुःसह पराक्रम करनेवाला शूरवीर था ॥ ६ ॥
नागानीकेन महता ग्रसन्निव महीमिमाम् । दुःशासनो महाराज सव्यसाचिनमावृणोत् ॥ ७ ॥ महाराज! दुःशासनने अपनी विशाल गजसेनाद्वारा अर्जुनको इस प्रकार चारों ओरसे घेर लिया, मानो वह सारी पृथ्वीको ग्रस लेनेके लिये उद्यत हो ॥ ७ ॥ ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च । ज्याक्षेपनिनादैश्चैव विरावेण च दन्तिनाम् ॥ ८ ॥ भूर्दिशश्चान्तरिक्षं च शब्देनासीत् समावृतम् । स मुहूर्तं प्रतिभयो दारुणः समपद्यत ॥ ९ ॥ हाथियोंके घंटोंकी ध्वनि, शंखनाद, धनुषकी टंकार और गजराजोंके चिग्घाड़नेके शब्दसे पृथ्वी, दिशाएँ तथा आकाश—ये सभी गूँज उठे थे। उस समय दुःशासन दो घड़ीके लिये अत्यन्त भयंकर एवं दारुण हो उठा ॥ ८-९ ॥ तान् दृष्ट्वा पततस्तूर्णमङ्कुशैरभिचोदितान् । व्यालम्बहस्तान् संरब्धान् सपक्षानिव पर्वतान् ॥ १० ॥ सिंहनादेन महता नरसिंहो धनंजयः । गजानीकममित्राणामभीतो व्यधमच्छरैः ॥ ११ ॥ महावतोंद्वारा अंकुशोंसे हाँके जानेपर लम्बी सूँड़ उठाये और क्रोधमें भरे, पंखधारी पर्वतोंके समान उन हाथियोंको बड़े वेगसे अपने ऊपर आते देख मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनने बड़े जोरसे सिंहनाद करके शत्रुओंकी उस गजसेनाका बिना किसी भयके बाणोंद्वारा संहार कर डाला ॥ १०-११ ॥ महौर्मिणमिवोद्धूतं श्वसनेन महार्णवम् । किरीटी तद् गजानीकं प्राविशन्मकरो यथा ॥ १२ ॥ वायुद्वारा ऊपर उठाये हुए ऊँची-ऊँची तरंगोंसे युक्त महासागरके समान उस गजसैन्यमें किरीटधारी अर्जुनने मकरके समान प्रवेश किया ॥ १२ ॥ काष्ठातीत इवादित्यः प्रतपन् स युगक्षये । ददृशे दिक्षु सर्वासु पार्थः परपुरंजयः ॥ १३ ॥ जैसे प्रलयकालमें सूर्यदेव सीमाका उल्लंघन करके तपने लगते हैं, उसी प्रकार शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले अर्जुन सम्पूर्ण दिशाओंमें असीम पराक्रम करते हुए दिखायी देने लगे ॥ १३ ॥ खुरशब्देन चाश्वानां नेमिघोषेण तेन च । तेन चोत्कृष्टशब्देन ज्यानिनादेन तेन च ॥ १४ ॥ नानावादित्रशब्देन पाञ्चजन्यस्वनेन च । देवदत्तस्य घोषेण गाण्डीवनिनदेन च ॥ १५ ॥ मन्दवेगा नरा नागा बभूवुस्ते विचेतसः ।
शरैराशीविषस्पर्शैर्निर्भिन्नाः सव्यसाचिना ॥ १६ ॥
घोड़ोंकी टापोंके शब्दसे, रथके पहियोंकी उस घरघराहटसे, उच्चस्वरसे किये जानेवाले
गर्जन-तर्जनकी उस आवाजसे, धनुषकी प्रत्यंचाकी उस टंकारसे, भाँति-भाँतिके वाद्योंकी
ध्वनिसे, पांचजन्यके हुंकारसे, देवदत्त नामक शंखके गम्भीर घोषसे तथा गाण्डीवकी टंकार-
ध्वनिसे मनुष्यों और हाथियोंके वेग मन्द पड़ गये और वे सब-के-सब भयके मारे अचेत हो
गये। सव्यसाची अर्जुनने विषधर सर्पके समान भयंकर बाणोंद्वारा उन्हें विदीर्ण कर
दिया ॥ १४-१६ ॥
ते गजा विशिखैस्तीक्ष्णैर्युधि गाण्डीवचोदितैः ।
अनेकशतसाहस्रैः सर्वाङ्गेषु समर्पिताः ॥ १७ ॥
गाण्डीव धनुषद्वारा चलाये हुए लाखों तीखे बाण युद्ध-स्थलमें खड़े हुए उन हाथियोंके
सम्पूर्ण अंगोंमें बिंध गये थे ॥
आरावं परमं कृत्वा वध्यमानाः किरीटिना ।
निपेतुरनिशं भूमौ छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥ १८ ॥
अर्जुनके बाणोंकी मार खाकर बड़े जोरसे चीत्कार करके वे हाथी पंख कटे हुए
पर्वतोंके समान पृथ्वीपर निरन्तर गिर रहे थे ॥ १८ ॥
अपरे दन्तवेष्टेषु कुम्भेषु च कटेषु च ।
शरैः समर्पिता नागाः क्रौञ्चवद् व्यनदन् मुहुः ॥ १९ ॥
कुछ दूसरे गजराज नीचेके ओठोंमें, कुम्भस्थलोंमें और कनपटियोंमें बाणोंसे छिद
जानेके कारण कुरर पक्षीके समान बारंबार आर्तनाद कर रहे थे ॥ १९ ॥
गजस्कन्धगतानां च पुरुषाणां किरीटिना ।
छिद्यन्ते चोत्तमाङ्गानि भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ २० ॥
किरीटधारी अर्जुन झुकी हुई गाँठवाले भल्ल नामक बाणोंद्वारा हाथीकी पीठपर बैठे
हुए पुरुषोंके मस्तक भी धड़ाधड़ काटते जा रहे थे ॥ २० ॥
सकुण्डलानां पततां शिरसां धरणीतले । पद्मानाामिव संघातैः पार्थश्चक्रे निवेदनम् ॥ २१ ॥ पृथ्वीपर गिरते हुए कुण्डलयुक्त मस्तक कमलपुष्पोंके ढेरके समान जान पड़ते थे, मानो अर्जुनने उन मस्तकोंके रूपमें पृथ्वीको पद्मके समूह भेंट किये हों ॥ २१ ॥ यन्त्रबद्धा विकवचा व्रणार्ता रुधिरोक्षिताः । भ्रमत्सु युधि नागेषु मनुष्या विललम्बिरे ॥ २२ ॥ युद्धके मैदानमें चक्कर काटते हुए हाथियोंपर बहुत-से मनुष्य इस प्रकार लटक रहे थे, मानो उन्हें किसी यन्त्रसे वहाँ जड़ दिया गया हो। उनके कवच नष्ट हो गये थे। वे घावसे पीड़ित और खूनसे लथपथ हो रहे थे ॥ केचिदेकेन बाणेन सुयुक्तेन सुपत्रिणा । द्वौ त्रयश्च विनिर्भिन्ना निपेतुर्धरणीतले ॥ २३ ॥ कुछ हाथी तो अच्छी तरहसे चलाये हुए सुन्दर पंखयुक्त एक ही बाणद्वारा दो-दो तीन-तीनकी संख्यामें एक साथ विदीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ २३ ॥ अतिविद्धाश्च नाराचैर्वमन्तो रुधिरं मुखैः । सारोहा न्यपतन् भूमौ द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ २४ ॥
सवारोंसहित कितने ही हाथी नाराचोंसे अत्यन्त घायल होकर मुँहसे रक्त वमन करते हुए वृक्षयुक्त पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे ॥ २४ ॥
मौर्वीं ध्वजं धनुश्चैव युगमीषां तथैव च ।
रथिनां कुट्टयामास भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ २५ ॥
तदनन्तर अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा रथियोंकी प्रत्यंचा, ध्वजा, धनुष, जुआ तथा ईषादण्डके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ २५ ॥
न संदधन् न चाकर्षन् न विमुञ्चन् न चोद्वहन् ।
मण्डलेनैव धनुषा नृत्यन् पार्थः स्म दृश्यते ॥ २६ ॥
उस समय अर्जुन मण्डलाकार धनुषके साथ सब ओर नृत्य करते हुए-से दृष्टिगोचर हो रहे थे। वे कब धनुषपर बाणोंको रखते, कब प्रत्यंचा खींचते, कब बाण छोड़ते और कब उन्हें तरकशसे निकालते हैं, यह कोई नहीं देख पाता था ॥ २६ ॥
अतिविद्धाश्च नाराचैर्वमन्तो रुधिरं मुखैः ।
मुहूर्तान्न्यपतन्नन्ये वारणा वसुधातले ॥ २७ ॥
दो ही घड़ीमें और भी बहुत-से हाथी नाराचोंकी मारसे अत्यन्त क्षत-विक्षत होकर मुँहसे रक्त वमन करते हुए धरतीपर लोटने लगे ॥ २७ ॥
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः ।
अदृश्यन्त महाराज तस्मिन् परमसंकुले ॥ २८ ॥
महाराज! उस अत्यन्त भयानक युद्धमें चारों ओर असंख्य कबन्ध (धड़) उठे दिखायी देते थे ॥ २८ ॥
सचापाः साङ्गुलित्राणाः सखड्गाः साङ्गदा रणे ।
अदृश्यन्त भुजाश्छिन्ना हेमाभरणभूषिताः ॥ २९ ॥
वीरोंकी कटी हुई स्वर्णमय आभूषणोंसे विभूषित भुजाएँ धनुष, दस्ताने, तलवार और भुजबन्दोंसहित कटकर रणभूमिमें पड़ी दिखायी देती थीं ॥ २९ ॥
सूपस्करैरधिष्ठानैरीषादण्डकबन्धुरैः ।
चक्रैर्विमथितैरक्षैर्भग्नैश्च बहुधा युगे ॥ ३० ॥
चर्मचापधरैश्चैव व्यवकीर्णैस्ततस्ततः ।
स्रग्भिराभरणैर्वस्त्रैः पतितैश्च महाध्वजैः ॥ ३१ ॥
निहतैर्वारणैरश्वैः क्षत्रियैश्च निपातितैः ।
अदृश्यत मही तत्र दारुणप्रतिदर्शना ॥ ३२ ॥
सुन्दर उपकरणों, बैठकों, ईषादण्ड, बन्धनरज्जुओँ और पहियोंसहित रथ चूर-चूर हो रहे थे। उनके धुरे टूट गये थे और जूए टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े थे। बहुत-सी ढालों और धनुषोंको लिये-दिये वे टूटे हुए रथ इधर-उधर बिखरे पड़े थे। बहुत-से हार, आभूषण, वस्त्र और बड़े-बड़े ध्वज धरतीपर गिरे हुए थे। अनेक हाथी और घोड़े मारे गये थे तथा बहुत-से
क्षत्रिय भी धराशायी कर दिये गये थे। इन सबके कारण वहाँकी भूमि देखनेमें अत्यन्त भयंकर जान पड़ती थी ॥ ३०—३२ ॥
एवं दुःशासनबलं वध्यमानं किरीटिना ।
सम्प्राद्रवन्महाराज व्यथितं सहनायकम् ॥ ३३ ॥
महाराज! इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनकी मार खाकर अत्यन्त व्यथित हुई दुःशासनकी सेना अपने नायकसहित भाग चली ॥ ३३ ॥
ततो दुःशासनस्त्रस्तः सहानीकः शरार्दितः ।
द्रोणं त्रातारमाकाङ्क्षन् शकटव्यूहमभ्यगात् ॥ ३४ ॥
तब अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित और भयभीत हो सेनाओंसहित दुःशासन अपने रक्षक द्रोणाचार्यके आश्रयमें जानेकी इच्छा रखकर शकटव्यूहके भीतर घुस गया ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुःशासनसैन्यपराभवे
नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुःशासनकी सेनाका पराभवविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥
अध्याय (पृष्ठ 590)
एकनवतितमोऽध्यायः
अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध
संजय उवाच
दुःशासनबलं हत्वा सव्यसाची महारथः ।
सिन्धुराजं परीप्सन् वै द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! दुःशासनकी सेनाका संहार करके सव्यसाची महारथी अर्जुनने सिन्धुराज जयद्रथको पानेकी इच्छा रखकर द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा किया ॥ १ ॥
स तु द्रोणं समासाद्य व्यूहस्य प्रमुखे स्थितम् ।
कृताञ्जलिरिदं वाक्यं कृष्णस्यानुमतेऽब्रवीत् ॥ २ ॥
व्यूहके मुहानेपर खड़े हुए आचार्य द्रोणके पास पहुँचकर अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमति ले हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
शिवेन ध्याहि मां ब्रह्मन् स्वस्ति चैव वदस्व मे ।
भवत्प्रसादादिच्छामि प्रवेष्टुं दुर्भिदां चमूम् ॥ ३ ॥
'ब्रह्मन्! आप मेरा कल्याण चिन्तन कीजिये। मुझे स्वस्ति कहकर आशीर्वाद दीजिये। मैं आपकी कृपासे ही इस दुर्भेद्य सेनाके भीतर प्रवेश करना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भवान् पितृसमो मह्यं धर्मराजसमोऽपि च ।
तथा कृष्णसमश्चैव सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥
'आप मेरे लिये पिता पाण्डु, भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर तथा सखा श्रीकृष्णके समान हैं। यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ४ ॥
अश्वत्थामा यथा तात रक्षणीयस्त्वयानघ ।
तथाहमपि ते रक्ष्यः सदैव द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
'तात! निष्पाप द्विजश्रेष्ठ! जैसे अश्वत्थामा आपके लिये रक्षणीय हैं, उसी प्रकार मैं भी सदैव आपसे संरक्षण पानेका अधिकारी हूँ ॥ ५ ॥
तव प्रसादादिच्छेयं सिन्धुराजानमाहवे ।
निहन्तुं द्विपदां श्रेष्ठ प्रतिज्ञां रक्ष मे प्रभो ॥ ६ ॥
'नरश्रेष्ठ! मैं आपके प्रसादसे इस युद्धमें सिन्धुराज जयद्रथको मारना चाहता हूँ। प्रभो! आप मेरी इस प्रतिज्ञाकी रक्षा कीजिये' ॥ ६ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तदाचार्यः प्रत्युवाच स्मयन्निव ।
मामजित्वा न बीभत्सो शक्यो जेतुं जयद्रथः ॥ ७ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! अर्जुनके ऐसा कहनेपर उस समय द्रोणाचार्यने उन्हें हँसते हुए-से उत्तर दिया—'अर्जुन! मुझे पराजित किये बिना जयद्रथको जीतना असम्भव है' ॥ ७ ॥
एतावदुक्त्वा तं द्रोणः शरव्रातैरवाकिरत् ।
सरथाश्वध्वजं तीक्ष्णैः प्रहसन् वै ससारथिम् ॥ ८ ॥
अर्जुनसे इतना ही कहकर द्रोणाचार्यने हँसते-हँसते रथ, घोड़े, ध्वज तथा सारथिसहित उनके ऊपर तीखे बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८ ॥
ततोऽर्जुनः शरव्रातान् द्रोणस्यावार्य सायकैः ।
द्रोणमभ्यद्रवद् बाणैर्घोररूपैर्महत्तरैः ॥ ९ ॥
तब अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यके बाण-समूहोंका निवारण करके बड़े-बड़े भयंकर बाणोंद्वारा उनपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
विव्याध चरणे द्रोणमनुमान्य विशाम्पते ।
क्षत्रधर्मं समास्थाय नवभिः सायकैः पुनः ॥ १० ॥
प्रजानाथ! उन्होंने द्रोणाचार्यका समादर करते हुए क्षत्रियधर्मका आश्रय ले पुनः नौ बाणोंद्वारा उनके चरणोंमें आघात किया ॥ १० ॥
तस्येषूनिषुभिश्छित्त्वा द्रोणो विव्याध तावुभौ ।
विषाग्निज्वलितप्रख्यैरिषुभिः कृष्णपाण्डवौ ॥ ११ ॥
द्रोणाचार्यने अपने बाणोंद्वारा अर्जुनके उन बाणोंको काटकर प्रज्वलित विष एवं अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको घायल कर दिया ॥ ११ ॥
इयेष पाण्डवस्तस्य बाणैश्छेत्तुं शरासनम् ।
तस्य चिन्तयतस्त्वेवं फाल्गुनस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
द्रोणः शरैरसम्भ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान् ।
विव्याध च हयानस्य ध्वजं सारथिमेव च ॥ १३ ॥
तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यके धनुषको काट देनेकी इच्छा की। महामना अर्जुन अभी इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि पराक्रमी द्रोणाचार्यने बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा शीघ्र ही उनके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली और अर्जुनके घोड़ों, ध्वज और सारथिको भी बींध डाला ॥ १२-१३ ॥
अर्जुनं च शरैर्वीरः स्मयमानोऽभ्यवाकिरत् ।
एतस्मिन्नन्तरे पार्थः सज्यं कृत्वा महद् धनुः ॥ १४ ॥
विशेषयिष्यन्नाचार्यं सर्वास्त्रविदुषां वरः ।
मुमोच षट्शतान् बाणान् गृहीत्वैकमिव द्रुतम् ।। १५ ।।
इतना ही नहीं, वीर द्रोणाचार्यने मुसकराकर अर्जुनको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित कर दिया। इसी बीचमें सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने विशाल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और आचार्यसे बढ़कर पराक्रम दिखानेकी इच्छासे तुरंत छः सौ बाण छोड़े। उन बाणोंको उन्होंने इस प्रकार हाथमें ले लिया था, मानो एक ही बाण हो ।। १४-१५ ।।
पुनः सप्तशतान्यान् सहस्रं चानिवर्तिनः ।
चिक्षेपायुतशश्चान्यांस्तेऽघ्नन् द्रोणस्य तां चमूम् ।। १६ ।।
तत्पश्चात् सात सौ और फिर एक हजार ऐसे बाण छोड़े जो किसी प्रकार प्रतिहत होनेवाले नहीं थे। तदनन्तर अर्जुनने दस-दस हजार बाणोंद्वारा प्रहार किया। उन सभी बाणोंने द्रोणाचार्यकी उस सेनाका संहार कर डाला ।। १६ ।।
तैः सम्यगस्तैर्बलिना कृतिना चित्रयोधिना ।
मनुष्यवाजिमातङ्गा विद्धाः पेतुर्गतासवः ।। १७ ।।
विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले अस्त्रवेत्ता महाबली अर्जुनके द्वारा भलीभाँति चलाये हुए उन बाणोंसे घायल हो बहुत-से मनुष्य, घोड़े और हाथी प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १७ ।।
विसूताश्वध्वजाः पेतुः संछिन्नायुधजीविताः ।
रथिनो रथमुख्येभ्यः सहसा शरपीडिताः ।। १८ ।।
अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हुए बहुतेरे रथी सारथि, अश्व, ध्वज, अस्त्र-शस्त्र और प्राणोंसे भी वंचित हो सहसा श्रेष्ठ रथोंसे नीचे जा गिरे ।। १८ ।।
चूर्णिताक्षिप्तदग्धानां वज्रानिलहुताशनैः ।
तुल्यररूपा गजाः पेतुर्गिर्यम्बुदवेश्मनाम् ।। १९ ।।
वज्रके आघातसे चूर-चूर हुए पर्वतों, वायुके द्वारा संचालित हुए भयंकर बादलों तथा आगमें जले हुए गृहोंके समान रूपवाले बहुत-से हाथी धराशायी हो रहे थे ।। १९ ।।
पेतुरश्वसहस्राणि प्रहतान्यर्जुनेषुभिः ।
हंसा हिमवतः पृष्ठे वारिविप्रहता इव ।। २० ।।
अर्जुनके बाणोंसे मारे गये सहस्रों घोड़े रणभूमिमें उसी प्रकार पड़े थे, जैसे वर्षाके जलसे आहत हुए बहुत-से हंस हिमालयकी तलहटीमें पड़े हुए हों ।। २० ।।
रथाश्वद्विपपत्त्योघाः सलिलौघा इवाद्भुताः ।
युगान्तादित्यरश्म्याभैः पाण्डवास्त्रशरैर्हताः ।। २१ ।।
प्रलयकालके सूर्यकी किरणोंके समान अर्जुनके तेजस्वी बाणोंद्वारा मारे गये रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंके समूह सूर्यकिरणोंद्वारा सोखे गये अद्भुत जलप्रवाहके समान जान पड़ते थे ।। २१ ।।
तं पाण्डवादित्यशरांशुजालं कुरुप्रवीरान् युधि निष्टपन्तम् । स द्रोणमेघः शरवृष्टिवेगैः प्राच्छादयन्मेघ इवार्करश्मीन् ॥ २२ ॥ जैसे बादल सूर्यकी किरणोंको छिपा देता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यरूपी मेघने अपनी बाण-वर्षाके वेगसे अर्जुनरूपी सूर्यके इस बाणरूपी किरणसमूहको आच्छादित कर दिया, जो युद्धमें मुख्य-मुख्य कौरव वीरोंको संतप्त कर रहा था ॥ २२ ॥
अथात्यर्थं विसृष्टेन द्विषतामसुभोजिना । आजघ्ने वक्षसि द्रोणो नाराचेन धनंजयम् ॥ २३ ॥ तत्पश्चात् शत्रुओंके प्राण लेनेवाले एक नाराचका प्रहार करके द्रोणाचार्यने अर्जुनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २३ ॥
स विह्वलितसर्वाङ्गः क्षितिकम्पे यथाचलः । धैर्यमालम्ब्य बीभत्सुर्द्रोणं विव्याध पत्रिभिः ॥ २४ ॥ उस आघातसे अर्जुनका सारा शरीर विह्वल हो गया, मानो भूकम्प होनेपर पर्वत हिल उठा हो। तथापि अर्जुनने धैर्य धारण करके पंखयुक्त बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया ॥ २४ ॥
द्रोणस्तु पञ्चभिर्बाणैर्वासुदेवमताडयत् । अर्जुनं च त्रिसप्तत्या ध्वजं चास्य त्रिभिः शरैः ॥ २५ ॥ फिर द्रोणने भी पाँच बाणोंसे भगवान् श्रीकृष्णको, तिहत्तर बाणोंसे अर्जुनको और तीन बाणोंद्वारा उनके ध्वजको भी चोट पहुँचायी ॥ २५ ॥
विशेषयिष्यन् शिष्यं च द्रोणो राजन् पराक्रमी । अदृश्यमर्जुनं चक्रे निमेषाच्छरवृष्टिभिः ॥ २६ ॥ राजन्! पराक्रमी द्रोणाचार्यने अपने शिष्य अर्जुनसे अधिक पराक्रम प्रकट करनेकी इच्छा रखकर पलक मारते-मारते अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा अर्जुनको अदृश्य कर दिया ॥ २६ ॥
प्रसक्तान् पततोऽद्राक्षम भारद्वाजस्य सायकान् । मण्डलीकृतमेवास्य धनुश्चादृश्यताद्भुतम् ॥ २७ ॥ हमने देखा, द्रोणाचार्यके बाण परस्पर सटे हुए गिरते थे। उनका अद्भुत धनुष सदा मण्डलाकार ही दिखायी देता था ॥ २७ ॥
तेऽभ्ययुः समरे राजन् वासुदेवधनंजयौ । द्रोणसृष्टाः सुबहवः कङ्कपत्रपरिच्छदाः ॥ २८ ॥ राजन्! उस समरांगणमें द्रोणाचार्यके छोड़े हुए कंकपत्रविभूषित बहुत-से बाण श्रीकृष्ण और अर्जुनपर पड़ने लगे ॥ २८ ॥
तद् दृष्ट्वा तादृशं युद्धं द्रोणपाण्डवयोरस्तदा । वासुदेवो महाबुद्धिः कार्यवत्तामचिन्तयत् ॥ २९ ॥ उस समय द्रोणाचार्य और अर्जुनका वैसा युद्ध देखकर परम बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने मन-ही-मन कर्तव्यका निश्चय कर लिया ॥ २९ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धनंजयमिदं वचः । पार्थ पार्थ महाबाहो न नः कालात्ययो भवेत् ॥ ३० ॥ द्रोणमुत्सृज्य गच्छामः कृत्यमेतन्महत्तरम् । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अर्जुनसे इस प्रकार बोले—‘अर्जुन! अर्जुन! महाबाहो! हमारा अधिक समय यहाँ न बीत जाय, इसलिये द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे चलें; यही इस समय सबसे महान् कार्य है’ ॥ ३० १/२ ॥ पार्थश्चाप्यब्रवीत् कृष्णं यथेष्टमिति केशवम् ॥ ३१ ॥ ततः प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्रायान्महाभुजम् । परिवृत्तश्च बीभत्सुरगच्छद् विसृजन् शरान् ॥ ३२ ॥ तब अर्जुनने भी सच्चिदानन्दस्वरूप केशवसे कहा— ‘प्रभो! आपकी जैसी रुचि हो, वैसा कीजिये।’ तत्पश्चात् अर्जुन महाबाहु द्रोणाचार्यकी परिक्रमा करके लौट पड़े और बाणोंकी वर्षा करते हुए आगे चले गये ॥ ३१-३२ ॥ ततोऽब्रवीत् स्वयं द्रोणः क्वेवं पाण्डव गम्यते । ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा न निवर्तसे ॥ ३३ ॥ यह देख द्रोणाचार्यने स्वयं कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम इस प्रकार कहाँ चले जा रहे हो? तुम तो रणक्षेत्रमें शत्रुको पराजित किये बिना कभी नहीं लौटते थे’ ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
गुरुर्भवान् न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते । न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत् ॥ ३४ ॥ अर्जुन बोले—ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। शत्रु नहीं हैं। मैं आपका पुत्रके समान प्रिय शिष्य हूँ। इस जगत्में ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो युद्धमें आपको पराजित कर सके ॥ ३४ ॥
संजय उवाच
एवं ब्रुवाणो बीभत्सुर्जयद्रथवधोत्सुकः । त्वरायुक्तो महाबाहुस्त्वत्सैन्यं समुपाद्रवत् ॥ ३५ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! ऐसा कहते हुए महाबाहु अर्जुनने जयद्रथ-वधके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ आपकी सेनापर धावा किया ॥ ३५ ॥ तं चक्ररक्षौ पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।
अन्वयातां महात्मानौ विशन्तं तावकं बलम् ॥ ३६ ॥
आपकी सेनामें प्रवेश करते समय उनके पीछे-पीछे पांचाल वीर महामना युधामन्यु
और उत्तमौजा चक्र-रक्षक होकर गये ॥ ३६ ॥
ततो जयो महाराज कृतवर्मा च सात्वतः ।
काम्बोजश्च श्रुतायुश्च धनंजयमवारयन् ॥ ३७ ॥
महाराज! तब जय, सात्वतवंशी कृतवर्मा, काम्बोज-नरेश तथा श्रुतायुने सामने आकर
अर्जुनको रोका ॥ ३७ ॥
तेषां दश सहस्राणि रथानामनुयायिनाम् ।
अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥ ३८ ॥
मावेल्लका ललित्थाश्च केकया मद्रकास्तथा ।
नारायणाश्च गोपालाः काम्बोजानां च ये गणाः ॥ ३९ ॥
कर्णेन विजिताः पूर्वं संग्रामे शूरसम्मताः ।
भारद्वाजं पुरस्कृत्य हृष्टात्मानोऽर्जुनं प्रति ॥ ४० ॥
इनके पीछे दस हजार रथी, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, मावेल्लक, ललित्थ,
केकय, मद्रक, नारायण नामक गोपालगण तथा काम्बोजदेशीय सैनिकगण भी थे। इन
सबको पूर्वकालमें कर्णने रणभूमिमें जीतकर अपने अधीन कर लिया था। ये सब-के-सब
शूरवीरोंद्वारा सम्मानित योद्धा थे और प्रसन्नचित्त हो द्रोणाचार्यको आगे करके अर्जुनपर चढ़
आये थे ॥ ३८-४० ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् ।
त्यजन्तं तुमुले प्राणान् संनद्धं चित्रयोधिनम् ॥ ४१ ॥
गाहमानमनीकानि मातङ्गमिव यूथपम् ।
महेष्वासं पराक्रान्तं नरव्याघ्रमवारयन् ॥ ४२ ॥
अर्जुन पुत्रशोकसे संतप्त एवं कुपित हुए प्राणान्तक मृत्युके समान प्रतीत होते थे। वे
उस भयंकर युद्धमें अपने प्राणोंको निछावर करनेके लिये उद्यत, कवच आदिसे सुसज्जित
और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। जैसे यूथपति गजराज गजसमूहमें प्रवेश करता है,
उसी प्रकार आपकी सेनाओंमें घुसते हुए महाधनुर्धर परम पराक्रमी उन नरश्रेष्ठ अर्जुनको
पूर्वोक्त योद्धाओंने आकर रोका ॥ ४१-४२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
अन्योन्यं वै प्रार्थयतां योधानामर्जुनस्य च ॥ ४३ ॥
तदनन्तर एक-दूसरेको ललकारते हुए कौरव-योद्धाओं तथा अर्जुनमें रोमांचकारी एवं
भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ ४३ ॥
जयद्रथवधप्रेप्सुमायान्तं पुरुषर्षभम् ।
न्यवारयन्त सहिताः क्रिया व्याधिमिवोत्थितम् ॥ ४४ ॥
जैसे चिकित्साकी क्रिया उभरते हुए रोगको रोक देती है, उसी प्रकार जयद्रथका वध करनेकी इच्छासे आते हुए पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनको समस्त कौरव-वीरोंने एक साथ मिलकर रोक दिया ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणातिक्रमे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोणातिक्रमण-विषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 597)
द्विनवतितमोऽध्यायः
अर्जुनका द्रोणाचार्य और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए कौरव-सेनामें प्रवेश तथा श्रुतायुधका अपनी गदासे और सुदक्षिणका अर्जुनद्वारा वध
संजय उवाच
संनिरुद्धस्तु तैः पार्थो महाबलपराक्रमः ।
द्रुतं समनुयातश्च द्रोणेन रथिनां वरः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**रथियोंमें श्रेष्ठ एवं महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न अर्जुन जब उन कौरव सैनिकोंद्वारा रोक दिये गये, उस समय द्रोणाचार्यने भी तुरंत ही उनका पीछा किया ॥ १ ॥
किरन्निषुगणांस्तीक्ष्णान् स रश्मीनिव भास्करः ।
तापयामास तत् सैन्यं देहं व्याधिगणो यथा ॥ २ ॥
जैसे रोगोंका समुदाय शरीरको संतप्त कर देता है, उसी प्रकार अर्जुनने कौरवोंकी उस सेनाको अत्यन्त संताप दिया। जैसे सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणोंका प्रसार करते हैं, उसी प्रकार वे तीखे बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥
अश्वो विद्धो रथश्छिन्नः सारोहः पातितो गजः ।
छत्राणि चापविद्धानि रथाश्चक्रैर्विना कृताः ॥ ३ ॥
उन्होंने घोड़ोंको घायल कर दिया, रथके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, गजारोहियोंसहित हाथीको मार गिराया, छत्र इधर-उधर बिखेर दिये तथा रथोंको पहियोंसे सूना कर दिया ॥ ३ ॥
विद्रुतानि च सैन्यानि शरतार्तानि समन्ततः ।
इत्यासीत् तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ ४ ॥
उनके बाणोंसे पीड़ित होकर सारे सैनिक सब ओर भाग चले। वहाँ इस प्रकार भयंकर युद्ध हो रहा था कि किसीको कुछ भी भान नहीं हो रहा था ॥ ४ ॥
तेषां संयच्छतां संख्ये परस्परमजिह्मगैः ।
अर्जुनो ध्वजिनीं राजन्नभीक्ष्णं समकम्पयत् ॥ ५ ॥
राजन्! उस युद्धस्थलमें कौरव-सैनिक एक-दूसरेको काबूमें रखनेका प्रयत्न करते थे और अर्जुन अपने बाणोंद्वारा उनकी सेनाको बारंबार कम्पित कर रहे थे ॥ ५ ॥
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां सत्यसंगरः ।
अभ्यद्रवद् रथश्रेष्ठं शोणाश्वं श्वेतवाहनः ॥ ६ ॥
सत्यप्रतिज्ञ श्वेतवाहन अर्जुनने अपनी प्रतिज्ञा सच्ची करनेकी इच्छासे लाल घोड़ोंवाले रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यपर धावा किया ।। ६ ।।
तं द्रोणः पञ्चविंशत्या मर्मभिद्भिरजिह्मगैः ।
अन्तेवासिनमाचार्यो महेष्वासं समर्पयत् ।। ७ ।।
उस समय आचार्य द्रोणने अपने महाधनुर्धर शिष्य अर्जुनको पचीस मर्मभेदी बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ७ ।।
तं तूर्णमिव बीभत्सुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
अभ्यधावदिषून्स्यन्न्त्रिषुवेगविघातकान् ।। ८ ।।
तब सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने भी तुरंत ही उनके बाणोंके वेगका विनाश करनेवाले भल्लोंका प्रहार करते हुए उनपर आक्रमण किया ।। ८ ।।
तस्याशुक्षिप्तान् भल्लान् हि भल्लैः संनतपर्वभिः ।
प्रत्यविध्यदमेयात्मा ब्रह्मास्त्रं समुदीरयन् ।। ९ ।।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न द्रोणाचार्यने अर्जुनके तुरंत चलाये हुए उन भल्लोंको झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा ही काट दिया और ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ।। ९ ।।
तदद्भुतमपश्याम द्रोणस्याचार्यकं युधि ।
यतमानो युवा नैनं प्रत्यविध्यद् यदर्जुनः ।। १० ।।
उस युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यकी अद्भुत अस्त्रशिक्षा हमने देखी कि नवयुवक अर्जुन प्रयत्नशील होनेपर भी उन्हें अपने बाणोंद्वारा चोट न पहुँचा सके ।। १० ।।
क्षरन्निव महामेघो वारिधाराः सहस्रशः ।
द्रोणमेघः पार्थशैलं ववर्ष शरवृष्टिभिः ।। ११ ।।
जैसे महान् मेघ झलकी सहस्रों धाराएँ बरसाता रहता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यरूपी मेघने अर्जुनरूपी पर्वतपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ११ ।।
अर्जुनः शरवर्षं तद् ब्रह्मास्त्रेणैव मारिष ।
प्रतिजग्राह तेजस्वी बाणैर्बाणान् निशातयन् ।। १२ ।।
पूजनीय नरेश! उस समय अपने बाणोंद्वारा उनके बाणोंको काटते हुए तेजस्वी अर्जुनने भी ब्रह्मास्त्रद्वारा ही आचार्यकी उस बाण-वर्षाको रोका ।। १२ ।।
द्रोणस्तु पञ्चविंशत्या श्वेतवाहनमर्दयत् ।
वासुदेवं च सप्तत्या बाह्वोरुरसि चाशुगैः ।। १३ ।।
तब द्रोणाचार्यने पचीस बाण मारकर श्वेतवाहन अर्जुनको पीड़ित कर दिया। साथ ही श्रीकृष्णकी भुजाओं तथा वक्षःस्थलमें भी उन्होंने सत्तर बाण मारे ।। १३ ।।
पार्थस्तु प्रहसन् धीमानाचार्यं सशरौघिणम् ।
विसृजन्तं शितान् बाणानवारयत तं युधि ।। १४ ।।
परम बुद्धिमान् अर्जुनने हँसते हुए ही युद्धस्थलमें तीखे बाणोंकी बौछार करनेवाले द्रोणाचार्यको उनकी बाण-वर्षासहित रोक दिया ॥ १४ ॥
अथ तौ वध्यमानौ तु द्रोणेन रथसत्तमौ ।
आवर्जयेतां दुर्धर्षं युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ॥ १५ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यके द्वारा घायल किये जाते हुए वे दोनों रथिश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन उस समय प्रलयकालकी अग्निके समान उठे हुए उन दुर्धर्ष आचार्यको छोड़कर अन्यत्र चल दिये ॥ १५ ॥
वर्जयन् निशितान् बाणान् द्रोणचापविनिःसृतान् ।
किरीटमाली कौन्तेयो भोजानीकं व्यशातयत् ॥ १६ ॥
द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंका निवारण करते हुए किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुनने कृतवर्माकी सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ १६ ॥
सोऽन्तरा कृतवर्माणं काम्बोजं च सुदक्षिणम् ।
अभ्ययाद् वर्जयन् द्रोणं मैनाकमिव पर्वतम् ॥ १७ ॥
वे मैनाक पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थित द्रोणाचार्यको छोड़ते हुए कृतवर्मा तथा काम्बोजराज सुदक्षिणके बीचसे होकर निकले ॥ १७ ॥
ततो भोजो नरव्याघ्रो दुर्धर्षं कुरुसत्तमम् ।
अविध्यत् तूर्णमव्यग्रो दशभिः कङ्कपत्रिभिः ॥ १८ ॥
तब पुरुषसिंह कृतवर्माने कुरुकुलके श्रेष्ठ एवं दुर्धर्ष वीर अर्जुनको कंकपत्रयुक्त दस बाणोंद्वारा तुरंत ही घायल कर दिया। उस समय उसके मनमें तनिक भी व्यग्रता नहीं हुई ॥ १८ ॥
तमर्जुनः शतेनाजौ राजन् विव्याध पत्रिणाम् ।
पुनश्चान्यैस्त्रिभिर्बाणैर्मोहयन्निव सात्वतम् ॥ १९ ॥
राजन्! अर्जुनने कृतवर्माको उस युद्धस्थलमें सौ बाणोंद्वारा बींध डाला। फिर उसे मोहित-सा करते हुए उन्होंने तीन बाण और मारे ॥ १९ ॥
भोजस्तु प्रहसन् पार्थं वासुदेवं च माधवम् ।
एकैकं पञ्चविंशत्या सायकानां समर्पयत् ॥ २० ॥
तब कृतवर्माने भी हँसकर कुन्तीकुमार अर्जुन और मधुवंशी भगवान् वासुदेवमेंसे प्रत्येकको पचीस-पचीस बाण मारे ॥ २० ॥
तस्यार्जुनो धनुश्छित्त्वा विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ।
शरैरग्निशिखाकारैः क्रुद्धाशीविषसंनिभैः ॥ २१ ॥
यह देख अर्जुनने उसके धनुषको काटकर क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान भयंकर और आगकी लपटोंके समान तेजस्वी इक्कीस बाणोंद्वारा उसे भी घायल कर दिया ॥ २१ ॥