महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 594, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतद् दृष्ट्वा तादृशं युद्धं द्रोणपाण्डवयोरस्तदा । वासुदेवो महाबुद्धिः कार्यवत्तामचिन्तयत् ॥ २९ ॥ उस समय द्रोणाचार्य और अर्जुनका वैसा युद्ध देखकर परम बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने मन-ही-मन कर्तव्यका निश्चय कर लिया ॥ २९ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धनंजयमिदं वचः । पार्थ पार्थ महाबाहो न नः कालात्ययो भवेत् ॥ ३० ॥ द्रोणमुत्सृज्य गच्छामः कृत्यमेतन्महत्तरम् । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अर्जुनसे इस प्रकार बोले—‘अर्जुन! अर्जुन! महाबाहो! हमारा अधिक समय यहाँ न बीत जाय, इसलिये द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे चलें; यही इस समय सबसे महान् कार्य है’ ॥ ३० १/२ ॥ पार्थश्चाप्यब्रवीत् कृष्णं यथेष्टमिति केशवम् ॥ ३१ ॥ ततः प्रदक्षिणं कृत्वा द्रोणं प्रायान्महाभुजम् । परिवृत्तश्च बीभत्सुरगच्छद् विसृजन् शरान् ॥ ३२ ॥ तब अर्जुनने भी सच्चिदानन्दस्वरूप केशवसे कहा— ‘प्रभो! आपकी जैसी रुचि हो, वैसा कीजिये।’ तत्पश्चात् अर्जुन महाबाहु द्रोणाचार्यकी परिक्रमा करके लौट पड़े और बाणोंकी वर्षा करते हुए आगे चले गये ॥ ३१-३२ ॥ ततोऽब्रवीत् स्वयं द्रोणः क्वेवं पाण्डव गम्यते । ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा न निवर्तसे ॥ ३३ ॥ यह देख द्रोणाचार्यने स्वयं कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम इस प्रकार कहाँ चले जा रहे हो? तुम तो रणक्षेत्रमें शत्रुको पराजित किये बिना कभी नहीं लौटते थे’ ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
गुरुर्भवान् न मे शत्रुः शिष्यः पुत्रसमोऽस्मि ते । न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजयेत् ॥ ३४ ॥ अर्जुन बोले—ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। शत्रु नहीं हैं। मैं आपका पुत्रके समान प्रिय शिष्य हूँ। इस जगत्में ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो युद्धमें आपको पराजित कर सके ॥ ३४ ॥
संजय उवाच
एवं ब्रुवाणो बीभत्सुर्जयद्रथवधोत्सुकः । त्वरायुक्तो महाबाहुस्त्वत्सैन्यं समुपाद्रवत् ॥ ३५ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! ऐसा कहते हुए महाबाहु अर्जुनने जयद्रथ-वधके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ आपकी सेनापर धावा किया ॥ ३५ ॥ तं चक्ररक्षौ पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।