महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2494, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वी वज्रपातकी आवाजसे गूँजती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १४-१५ ॥ धनुषां कूजमानानां शस्त्रौघानां च दीप्यताम् । कवचानां प्रभाभिश्च न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ १६ ॥ टंकारते हुए धनुष, दमकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंके समुदाय तथा कवचोंकी प्रभासे चकाचौंधके कारण कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ १६ ॥ बहवो बाहवश्छिन्ना नागराजकरोपमाः । उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १७ ॥ हाथीकी सूँड़के समान बहुत-सी भुजाएँ कटकर धरती-पर उछलती, लोटती और भयंकर वेग प्रकट करती थीं ॥ शिरसां च महाराज पततां धरणीतले । च्युतानामिव तालेभ्यस्तालानां श्रूयते स्वनः ॥ १८ ॥ महाराज! पृथ्वीपर गिरते हुए मस्तकोंका शब्द, ताड़के वृक्षोंसे चूकर गिरे हुए फलोंके धमाकेकी आवाजके समान सुनायी देता था ॥ १८ ॥ शिरोभिः पतितैर्भाति रुधिराद्रैर्वसुन्धरा । तपनीयनिभैः काले नलिनैरिव भारत ॥ १९ ॥ भारत! गिरे हुए रक्तरंजित मस्तकोंसे इस पृथ्वीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ सुवर्णमय कमल बिछाये गये हों ॥ १९ ॥ उद्वृत्तनयनैस्तैस्तु गतसत्त्वैः सुविक्षतैः । व्यभ्राजत मही राजन् पुण्डरीकैरिवावृता ॥ २० ॥ राजन्! खुले नेत्रोंवाले प्राणशून्य घायल मस्तकोंसे ढकी हुई पृथ्वी लाल कमलोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पाती थी ॥ बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः सकेयूरैर्महाधनैः । पतितैर्भाति राजेन्द्र महाशक्रध्वजैरिव ॥ २१ ॥ राजेन्द्र! बाजूबंद तथा दूसरे बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, चन्दनचर्चित भुजाएँ कटकर पृथ्वीपर गिरी थीं, जो महान् इन्द्रध्वजके समान जान पड़ती थीं। उनके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ २१ ॥ ऊरुभिश्च नरेन्द्राणां विनिकृत्तैर्महाहवे । हस्तिहस्तोपमैरन्यैः संवृतं तद् रणाङ्गणम् ॥ २२ ॥ उस महासमरमें कटी हुई नरेशोंकी जाँघें हाथीकी सूँड़ोंके समान प्रतीत होती थीं। उनके द्वारा वह सारा समरांगण पट गया था ॥ २२ ॥ कबन्धशतसंकीर्णं छत्रचामरसंकुलम् । सेनावनं तच्छुशुभे वनं पुष्पाचितं यथा ॥ २३ ॥