महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंजयने कहा— राजन्! हम और हमारे शत्रु जिस प्रकार युद्धके लिये उपस्थित हुए और उस समय संग्राममें हमलोगोंके पास जितनी सेना शेष रह गयी थी, वह सब बताता हूँ, सुनिये॥ ३७ १/२॥
एकादश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ॥ ३८॥
दश दन्तिसहस्राणि सप्त चैव शतानि च।
पूर्णे शतसहस्रे द्वे हयानां तत्र भारत॥ ३९॥
पत्तिकोट्यस्तथा तिस्रो बलमेतत्तवाभवत्।
भरतश्रेष्ठ! आपके पक्षमें ग्यारह हजार रथ, दस हजार सात सौ हाथी, दो लाख घोड़े तथा तीन करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष रह गयी थी॥ ३८-३९ १/२॥
रथानां षट्सहस्राणि षट्सहस्राश्च कुञ्जराः॥ ४०॥
दश चाश्वसहस्राणि पत्तिकोटी च भारत।
एतद् बलं पाण्डवानामभवच्छेषमाहवे॥ ४१॥
भारत! उस युद्धमें पाण्डवोंके पास छः हजार रथ, छः हजार हाथी, दस हजार घोड़े और दो करोड़ पैदल—इतनी सेना शेष थी॥ ४०-४१॥
एत एव समाजग्मुर्युद्धाय भरतर्षभ।
एवं विभज्य राजेन्द्र मद्रराजवशे स्थिताः॥ ४२॥
पाण्डवान् प्रत्युदीयुस्ते जयगृद्धाः प्रमन्यवः।
भरतश्रेष्ठ! ये ही सैनिक युद्धके लिये उपस्थित हुए थे। राजेन्द्र! इस प्रकार सेनाका विभाग करके विजयकी अभिलाषासे क्रोधमें भरे हुए आपके सैनिक मद्रराज शल्यके अधीन हो पाण्डवोंपर चढ़ आये॥ ४२ १/२॥
तथैव पाण्डवाः शूराः समरे जितकाशिनः॥ ४३॥
उपयाता नरव्याघ्राः पञ्चालाश्च यशस्विनः।
इसी प्रकार समरांगणमें विजयसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर पुरुषसिंह पाण्डव और यशस्वी पांचाल वीर आपकी सेनाके समीप आ पहुँचे॥ ४३ १/२॥
इमे ते च बलौघेन परस्परवधैषिणः॥ ४४॥
उपयाता नरव्याघ्राः पूर्वा संध्यां प्रति प्रभो।
प्रभो! इस प्रकार परस्पर वधकी इच्छावाले ये और वे पुरुषसिंह योद्धा प्रातःकाल एक-दूसरेके निकट आये॥ ४४ १/२॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयानकम्।
तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम्॥ ४५॥
फिर तो परस्पर प्रहार करते हुए आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भयानक घोर युद्ध छिड़ गया॥ ४५॥