महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2482, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिखण्ड्यर्जुनभीमानां सात्वतस्य च भारत ।
धृष्टद्युम्नस्य च तथा बलेनाभ्यधिको रणे ॥ ३१ ॥
‘भरतनन्दन! शिखण्डी, अर्जुन, भीम, सात्यकि और धृष्टद्युम्नसे भी वे रणभूमिमें अधिक बलशाली हैं ॥ ३१ ॥
मद्रराजो महाराज सिंहद्विरदविक्रमः ।
विचरिष्यत्यभीः काले कालः क्रुद्धः प्रजास्विव ॥ ३२ ॥
‘महाराज! सिंह और हाथीके समान पराक्रमी मद्रराज शल्य प्रलयकालमें प्रजापर कुपित हुए कालके समान निर्भय होकर रणभूमिमें विचरेंगे ॥ ३२ ॥
तस्याद्य न प्रपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे ।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र शार्दूलसमविक्रमम् ॥ ३३ ॥
‘पुरुषसिंह! आपका पराक्रम सिंहके समान है। आज आपके सिवा युद्धस्थलमें दूसरेको ऐसा नहीं देखता, जो शल्यके सम्मुख होकर युद्ध कर सके ॥ ३३ ॥
सदेवलोके कृत्स्नेऽस्मिन् नान्यस्त्वत्तः पुमान् भवेत् ।
मद्रराजं रणे क्रुद्धं यो हन्यात् कुरुनन्दन ॥ ३४ ॥
‘कुरुनन्दन! देवताओंसहित इस सम्पूर्ण जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो रणमें कुपित हुए मद्रराज शल्यको मार सके ॥ ३४ ॥
अहन्यहनि युध्यन्तं क्षोभयन्तं बलं तव ।
तस्माज्जहि रणे शल्यं मघवानिव शम्बरम् ॥ ३५ ॥
‘इसलिये प्रतिदिन समरांगणमें जूझते और आपकी सेनाको विक्षुब्ध करते हुए राजा शल्यको युद्धमें आप उसी प्रकार मार डालिये, जैसे इन्द्रने शम्बरासुरका वध किया था ॥ ३५ ॥
अजेयश्चाप्यसौ वीरो धार्तराष्ट्रेण सत्कृतः ।
तवैव हि जयो नूनं हते मद्रेश्वरे युधि ॥ ३६ ॥
‘वीर शल्य अजेय हैं। दुर्योधनने उनका बड़ा सम्मान किया है। युद्धमें मद्रराजके मारे जानेपर निश्चय आपकी ही जीत होगी ॥ ३६ ॥
तस्मिन् हते हतं सर्वं धार्तराष्ट्रबलं महत् ।
एतच्छ्रुत्वा महाराज वचनं मम साम्प्रतम् ॥ ३७ ॥
प्रत्युद्याहि रणे पार्थ मद्रराजं महारथम् ।
जहि चैनं महाबाहो वासवो नमुचिं यथा ॥ ३८ ॥
‘महाराज! कुन्तीकुमार! उनके मारे जानेपर आप समझ लें कि दुर्योधनकी सारी विशाल सेना ही मार डाली गयी। इस समय मेरी इस बातको सुनकर महारथी मद्रराजपर चढ़ाई कीजिये और महाबाहो! जैसे इन्द्रने नमुचिका वध किया था, उसी प्रकार आप भी उन्हें मार डालिये ॥ ३७-३८ ॥