महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2479, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! प्रजानाथ! उनके ऐसा कहनेपर क्लेशसे दबे हुए राजा दुर्योधनने शास्त्रीय विधिके अनुसार सेनाके मध्यभागमें मद्रराज शल्यका सेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया॥ ६-७॥ अभिषिक्ते ततस्तस्मिन् सिंहनादो महानभूत्। तव सैन्येऽभ्यवादयन्त वादित्राणि च भारत॥ ८॥ भारत! उनका अभिषेक हो जानेपर आपकी सेनामें बड़े जोरसे सिंहनाद होने लगा और भाँति-भाँतिके बाजे बज उठे॥ ८॥ हृष्टाश्चासंस्तथा योधा मद्रकाश्च महारथाः। तुष्टुवुश्चैव राजानं शल्यमाहवशोभिनम्॥ ९॥ मद्रदेशके महारथी योद्धा हर्षमें भर गये और संग्राममें शोभा पानेवाले राजा शल्यकी स्तुति करने लगे—॥ ९॥ जय राजंश्चिरञ्जीव जहि शत्रून् समागतान्। तव बाहुबलं प्राप्य धार्तराष्ट्रा महाबलाः॥ १०॥ निखिलाः पृथिवीं सर्वां प्रशासन्तु हतद्विषः। 'राजन्! आप चिरंजीवी हों। सामने आये हुए शत्रुओंका संहार कर डालें। आपके बाहुबलको पाकर धृतराष्ट्रके सभी महाबली पुत्र शत्रुओंका नाश करके सारी पृथ्वीका शासन करें॥ १० १/२॥ त्वं हि शक्तो रणे जेतुं ससुरासुरमानवान्॥ ११॥ मर्त्यधर्माण इह तु किमु सृञ्जयसोमकान्। 'आप रणभूमिमें सम्पूर्ण देवताओं, असुरों और मनुष्योंको जीत सकते हैं। फिर यहाँ मरणधर्मा सृञ्जयों और सोमकोंपर विजय पाना कौन बड़ी बात है?'॥ ११ १/२॥ एवं सम्पूज्यमानस्तु मद्राणामधिपो बली॥ १२॥ हर्षं प्राप तदा वीरो दुरापमकृतात्मभिः। उनके द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होनेपर बलवान् वीर मद्रराज शल्यको वह हर्ष प्राप्त हुआ जो अकृतात्मा (युद्धकी शिक्षासे रहित) पुरुषोंके लिये दुर्लभ है॥ १२ १/२॥
शल्य उवाच
अद्य चाहं रणे सर्वान् पञ्चालान् सह पाण्डवैः॥ १३॥ निहनिष्यामि वा राजन् स्वर्गं यास्यामि वा हतः। **शल्यने कहा—**राजन्! आज मैं रणभूमिमें पाण्डवों-सहित समस्त पांचालोंको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर स्वर्गलोकमें जा पहुँचूँगा॥ १३ १/२॥ अद्य पश्यन्तु मां लोका विचरन्तमभीतवत्॥ १४॥ अद्य पाण्डुसुताः सर्वे वासुदेवः ससात्यकिः।