महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3220, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः कोपपरीताङ्गी पुत्रशोकपरिप्लुता । जगाम शौरिं दोषेण गान्धारी व्यथितेन्द्रिया ॥ ३८ ॥ तदनन्तर उनके सारे अंगोंमें क्रोध व्याप्त हो गया। पुत्रशोकमें डूब जानेके कारण उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। उस समय गान्धारीने सारा दोष श्रीकृष्णके ही माथे मढ़ दिया ॥ ३८ ॥
गान्धार्युवाच
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च दग्धाः कृष्ण परस्परम् । उपेक्षिता विनश्यन्तस्त्वया कस्माज्जनार्दन ॥ ३९ ॥ गान्धारीने कहा—श्रीकृष्ण! जनार्दन! पाण्डव और धृतराष्ट्रके पुत्र आपसमें लड़कर भस्म हो गये। तुमने इन्हें नष्ट होते देखकर भी इनकी उपेक्षा कैसे कर दी? ॥ ३९ ॥ शक्तेन बहुभृत्येन विपुले तिष्ठता बले । उभयत्र समर्थेन श्रुतवाक्येन चैव ह ॥ ४० ॥ इच्छतोपेक्षितो नाशः कुरूणां मधुसूदन । यस्मात् त्वया महाबाहो फलं तस्मादवाप्नुहि ॥ ४१ ॥ महाबाहु मधुसूदन! तुम शक्तिशाली थे। तुम्हारे पास बहुत-से सेवक और सैनिक थे। तुम महान् बलमें प्रतिष्ठित थे। दोनों पक्षोंसे अपनी बात मनवा लेनेकी सामर्थ्य तुममें मौजूद थी। तुमने वेद-शास्त्रों और महात्माओंकी बातें सुनी और जानी थीं। यह सब होते हुए भी तुमने स्वेच्छासे कुरुकुलके नाशकी उपेक्षा की—जानबूझकर इस वंशका विनाश होने दिया। यह तुम्हारा महान् दोष है, अतः तुम इसका फल प्राप्त करो ॥ ४०-४१ ॥ पतिशुश्रूषया यन्मे तपः किंचिदुपार्जितम् । तेन त्वां दुरवापेन शप्स्ये चक्रगदाधर ॥ ४२ ॥ चक्र और गदा धारण करनेवाले केशव! मैंने पतिकी सेवासे जो कुछ भी तप प्राप्त किया है, उस दुर्लभ तपोबलसे तुम्हें शाप दे रही हूँ ॥ ४२ ॥ यस्मात् परस्परं घ्नन्तो ज्ञातयः कुरुपाण्डवाः । उपेक्षितास्ते गोविन्द तस्माज्ज्ञातीन् वधिष्यसि ॥ ४३ ॥ गोविन्द! तुमने आपसमें मारकाट मचाते हुए कुटुम्बी कौरवों और पाण्डवोंकी उपेक्षा की है; इसलिये तुम अपने भाई-बन्धुओंका भी विनाश कर डालोगे ॥ ४३ ॥ त्वमप्युपस्थिते वर्षे षट्त्रिंशे मधुसूदन । हतज्ञातिर्हतामात्यो हतपुत्रो वनेचरः ॥ ४४ ॥ अनाथवदविज्ञातो लोकेष्वनभिलक्षितः । कुत्सितेनाभ्युपायेन निधनं समवाप्स्यसि ॥ ४५ ॥