महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3218, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएष चेदिपतिः शूरो धृष्टकेतुर्महारथः । शेते विनिहतः संख्ये हत्वा शत्रून् सहस्रशः ॥ २२ ॥ यह चेदिराज शूरवीर महारथी धृष्टकेतु सहस्रों शत्रुओंको मारकर मारा गया और रणशय्यापर सदाके लिये सो गया ॥ २२ ॥
वितुद्यमानं विहगैस्तं भार्याः पर्युपासिताः । चेदिराजं हृषीकेश हतं सबलबान्धवम् ॥ २३ ॥ हृषीकेश! सेना और बन्धुओंसहित मारे गये इस चेदिराजको पक्षी चोंच मार रहे हैं और उसकी स्त्रियाँ उसे चारों ओरसे घेरकर बैठी हैं ॥ २३ ॥
दाशार्हीपुत्रजं वीरं शयानं सत्यविक्रमम् । आरोप्याङ्के रुदन्त्येताश्चेदिराजवराङ्गनाः ॥ २४ ॥ दशार्हकुलकी कन्या (श्रुतश्रवा)-के पुत्र शिशुपालका यह सत्यपराक्रमी वीर पुत्र रणभूमिमें सो रहा है और इसे अंकमें लेकर ये चेदिराजकी सुन्दरी रानियाँ रो रही हैं ॥ २४ ॥
अस्य पुत्रं हृषीकेश सुवक्त्रं चारुकुण्डलम् । द्रोणेन समरे पश्य निकृत्तं बहुधा शरैः ॥ २५ ॥ हृषीकेश! देखो तो सही, इस धृष्टकेतुके सुन्दर मुख और मनोहर कुण्डलोंवाले पुत्रको द्रोणाचार्यने समरांगणमें अपने बाणोंद्वारा मारकर उसके अनेक टुकड़े कर डाले हैं ॥ २५ ॥
पितरं नूनमाजिस्थं युद्ध्यमानं परैः सह । नाजहात् पितरं वीरमद्यापि मधुसूदन ॥ २६ ॥ मधुसूदन! रणभूमिमें स्थित होकर शत्रुओंके साथ जूझनेवाले अपने पिताका साथ इसने कभी नहीं छोड़ा था, आज युद्धके बाद भी वह पिताको नहीं छोड़ सका है ॥ २६ ॥
एवं ममापि पुत्रस्य पुत्रः पितरमन्वगात् । दुर्योधनं महाबाहो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ २७ ॥ महाबाहो! इसी प्रकार मेरे पुत्रके पुत्र शत्रुवीर-हन्ता लक्ष्मणने भी अपने पिता दुर्योधनका अनुसरण किया है ॥ २७ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पतितौ पश्य माधव । हिमान्ते पुष्पितौ शालौ मरुता गलिताविव ॥ २८ ॥ माधव! जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें हवाके वेगसे दो खिले हुए शालवृक्ष गिर गये हों, उसी प्रकार अवन्तीदेशके दोनों वीर राजपुत्र विन्द और अनुविन्द धराशायी हो गये हैं, इनपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
काञ्चनाङ्गदवर्माणौ बाणखड्गधनुर्धरौ । ऋषभप्रतिरूपाक्षौ शयानौ विमलस्रजौ ॥ २९ ॥ इन दोनोंने सोनेके कवच धारण किये हैं, बाण, खड्ग और धनुष लिये हैं तथा बैलके समान बड़ी-बड़ी आँखोंवाले ये दोनों वीर चमकीले हार पहने हुए सो रहे हैं ॥ २९ ॥