महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3206, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण! देखो, ये सूर्यके समान तेजस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म कैसे सो रहे हैं, ऐसा जान पड़ता है, मानो प्रलयकालमें कालसे प्रेरित हो सूर्यदेव आकाशसे भूमिपर गिर पड़े हैं॥ १५ ॥ एष तप्त्वा रणे शत्रून् शस्त्रतापेन वीर्यवान् । नरसूर्योऽस्तमभ्येति सूर्योऽस्तमिव केशव ॥ १६ ॥ केशव! जैसे सूर्य सारे जगत्को ताप देकर अस्ताचलको चले जाते हैं, उसी तरह ये पराक्रमी मानवसूर्य रणभूमिमें अपने शस्त्रोंके प्रतापसे शत्रुओंको संतप्त करके अस्त हो रहे हैं॥ १६ ॥ शरतल्पगतं भीष्ममूर्ध्वरेतसमच्युतम् । शयानं वीरशयने पश्य शूरनिषेविते ॥ १७ ॥ जो ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी रहकर कभी मर्यादासे च्युत नहीं हुए हैं, उन भीष्मको शूरसेवित वीरोचित शयन बाणशय्यापर सोते हुए देख लो ॥ १७ ॥ कर्णिनालीकनाराचैरास्तीर्य शयनोत्तमम् । आविश्य शेते भगवान् स्कन्दः शरवणं यथा ॥ १८ ॥ जैसे भगवान् स्कन्द सरकण्डोंके समूहपर सोये थे, उसी प्रकार ये भीष्मजी कर्णी, नालीक और नाराच आदि बाणोंकी उत्तम शय्या बिछाकर उसीका आश्रय ले सो रहे हैं॥ १८ ॥ अतूलपूर्ण गाङ्गेयस्त्रिभिर्बाणैः समन्वितम् । उपधायोपधानाग्र्यं दत्तं गाण्डीवधन्वना ॥ १९ ॥ इन गङ्गानन्दन भीष्मने रूई भरा हुआ तकिया नहीं लिया है। इन्होंने तो गाण्डीवधारी अर्जुनके दिये हुए तीन बाणोंद्वारा निर्मित श्रेष्ठ उपधान (तकिये)-को ही स्वीकार किया है॥ १९ ॥ पालयानः पितुः शास्त्रमूर्ध्वरेता महायशाः । एष शान्तनवः शेते माधवाप्रतिमो युधि ॥ २० ॥ माधव! पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए महायशस्वी नैष्ठिक ब्रह्मचारी ये शान्तनुनन्दन भीष्म जिनकी युद्धमें कहीं तुलना नहीं है, यहाँ सो रहे हैं॥ २० ॥ धर्मात्मा तात सर्वज्ञः पारावर्य्येण निर्णये । अमर्त्य इव मर्त्यः सन्नैष प्राणानधारयत् ॥ २१ ॥ तात! ये धर्मात्मा और सर्वज्ञ हैं। परलोक और इहलोकसम्बन्धी ज्ञानद्वारा सभी आध्यात्मिक प्रश्नोंका निर्णय करनेमें समर्थ हैं तथा मनुष्य होनेपर भी देवताके तुल्य हैं; इन्होंने अभीतक अपने प्राण धारण कर रखे हैं॥ २१ ॥ नास्ति युद्धे कृती कश्चिन्न विद्वान् न पराक्रमी । यत्र शान्तनवो भीष्मः शेतेऽद्य निहतः शरैः ॥ २२ ॥