महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1892, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयद्यहं स्वस्तिमान् हंस स्वं देशं प्राप्नुयां प्रभो ।। ६५ ।।
न कंचिदवमन्येऽहमापदो मां समुद्धर ।
हंस! अब मैं अपने प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे द्वीपके पास पहुँचा दो। शक्तिशाली हंस! यदि मैं कुशलपूर्वक अपने देशमें पहुँच जाऊँ तो अब कभी किसीका अपमान नहीं करूँगा। तुम इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो ।। ६५ १/२ ।।
तमेवं वादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् ।। ६६ ।।
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ।
कृपयाऽऽदाय हंसस्तं जलक्लिन्नं सुदुर्द्दशम् ।। ६७ ।।
पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन पृष्ठमारोपयच्छनैः ।
कर्ण! इस प्रकार कहकर कौआ अचेत-सा होकर दीनभावसे विलाप करने और काँव-काँव करते हुए महासागरके जलमें डूबने लगा। उस समय उसकी ओर देखना कठिन हो रहा था। वह पानीसे भीग गया था। हंसने कृपापूर्वक उसे पंजोंसे उठाकर बड़े वेगसे ऊपरको उछाला और धीरेसे अपनी पीठपर चढ़ा लिया ।। ६६-६७ १/२ ।।
आरोप्य पृष्ठं हंसस्तं काकं तूर्णं विचेतनम् ।। ६८ ।।
आजगाम पुनर्द्वीपं स्पर्धया पेततुर्यतः ।
अचेत हुए कौएको पीठपर बिठाकर हंस तुरंत ही फिर उसी द्वीपमें आ पहुँचा, जहाँसे होड़ लगाकर दोनों उड़े थे ।। ६८ १/२ ।।
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् ।। ६९ ।।
गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ।
उस कौएको उसके स्थानपर रखकर उसे आश्वासन दे मनके समान शीघ्रगामी हंस पुनः अपने अभीष्ट देशको चला गया ।। ६९ १/२ ।।
एवमुच्छिष्टपुष्टः स काको हंसपराजितः ।। ७० ।।
बलवीर्यमदं कर्ण त्यक्त्वा क्षान्तिमुपागतः ।
कर्ण! इस प्रकार जूठन खाकर पुष्ट हुआ कौआ उस हंससे पराजित हो अपने महान् बल-पराक्रमका घमंड छोड़कर शान्त हो गया ।। ७० १/२ ।।
उच्छिष्टभोजनः काको यथा वैश्यकुले पुरा ।। ७१ ।।
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशयः ।
सदृशान् श्रेयसश्चापि सर्वान् कर्णावमन्यसे ।। ७२ ।।
पूर्वकालमें वह कौआ जैसे वैश्यकुलमें सबकी जूठन खाकर पला था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जूठन खिला-खिलाकर पाला है, इसमें संशय नहीं है। कर्ण! इसीसे तुम अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंका भी अपमान करते हो ।। ७१-७२ ।।
द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः ।