महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1891, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवयं काकाः कुतो नाम चरामः काकवाशिकाः । हंस प्राणैः प्रपद्ये त्वामुदकान्तं नयस्व माम् ॥ ५८ ॥ ‘भाई हंस! हम तो कौए हैं। व्यर्थ काँव-काँव किया करते हैं। हम उड़ना क्या जानें? मैं अपने इन प्राणोंके साथ तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम मुझे जलके किनारेतक पहुँचा दो’ ॥ ५८ ॥ स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च महार्णवे । काको दृढपरिश्रान्तः सहसा निपपात ह ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर अत्यन्त थका-मादा कौआ दोनों पाँखों और चोंचसे जलका स्पर्श करता हुआ सहसा उस महासागरमें गिर पड़ा। उस समय उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५९ ॥ सागराम्भसि तं दृष्ट्वा पतितं दीनचेतसम् । म्रियमाणमिदं काकं हंसो वाक्यमुवाच ह ॥ ६० ॥ समुद्रके जलमें गिरकर अत्यन्त दीनचित्त हो मृत्युके निकट पहुँचे हुए उस कौएसे हंसने इस प्रकार कहा— ॥ ६० ॥ शतमेकं च पातानां पताम्यहमनुस्मर । श्लाघमानस्त्वमात्मानं काक भाषितवानसि ॥ ६१ ॥ ‘काग! तूने अपनी प्रशंसा करते हुए कहा था कि मैं एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता हूँ। अब उन्हें याद कर ॥ ६१ ॥ स त्वमेकशतं पातं पतन्नभ्यधिको मया । कथमेवं परिश्रान्तः पतितोऽसि महार्णवे ॥ ६२ ॥ ‘सौ उड़ानोंसे उड़नेवाला तू तो मुझसे बहुत बढ़ा-चढ़ा है। फिर इस प्रकार थककर महासागरमें कैसे गिर पड़ा?’ ॥ ६२ ॥ प्रत्युवाच ततः काकः सीदमान इदं वचः । उपरिष्टं तदा हंसमभिवीक्ष्य प्रसादयन् ॥ ६३ ॥ तब जलमें अत्यन्त कष्ट पाते हुए कौएने जलके ऊपर ठहरे हुए हंसकी ओर देखकर उसे प्रसन्न करनेके लिये कहा ॥ ६३ ॥
काक उवाच उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् । अवमन्य बहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः ॥ ६४ ॥ कौआ बोला—भाई हंस! मैं जूठन खा-खाकर घमंडमें भर गया था और बहुत-से कौओं तथा दूसरे पक्षियोंका तिरस्कार करके अपने-आपको गरुड़के समान शक्तिशाली समझने लगा था ॥ ६४ ॥ प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्विपान्तं प्रापयस्व माम् ।