भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1882

समं च विषमं चैव रथिनश्च बलाबलम् । श्रमः खेदश्च सततं हयानां रथिना सह ॥ ७ ॥ आयुधस्य परिज्ञानं रुतं च मृगपक्षिणाम् । भारश्चाप्यतिभारश्च शल्यानां च प्रतिक्रिया ॥ ८ ॥ अस्त्रयोगश्च युद्धं च निमित्तानि तथैव च । सर्वमेतन्मया ज्ञेयं रथस्यास्य कुटुम्बिना ॥ ९ ॥ अतस्त्वां कथये कर्ण निदर्शनमिदं पुनः । सम और विषम अवस्था, रथीकी प्रबलता और निर्बलता, रथीके साथ ही घोड़ोंके सतत परिश्रम और कष्ट, अस्त्र हैं या नहीं, इसकी जानकारी, जय और पराजयकी सूचना देनेवाली पशु-पक्षियोंकी बोली, भार, अतिभार, शल्य-चिकित्सा, अस्त्रप्रयोग, युद्ध और शुभाशुभ निमित्त—इन सारी बातोंका ज्ञान रखना मेरे लिये आवश्यक है; क्योंकि मैं इस रथका एक कुटुम्बी हूँ। कर्ण! इसीलिये मैं पुनः तुमसे इस दृष्टान्तका वर्णन करता हूँ— ॥ ७—९ १/२ ॥

वैश्यः किल समुद्रान्ते प्रभूतधनधान्यवान् ॥ १० ॥ यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः । बहुपुत्रः प्रियापत्यः सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ११ ॥ राज्ञो धर्मप्रधानस्य राष्ट्रे वसति निर्भयः । कहते हैं समुद्रके तटपर किसी धर्मप्रधान राजाके राज्यमें एक प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न वैश्य रहता था। वह यज्ञ-यागादि करनेवाला, दानपति, क्षमाशील, अपने वर्णानुकूल कर्ममें तत्पर, पवित्र, बहुत-से पुत्रवाला, संतानप्रेमी और समस्त प्राणियोंपर दया करनेवाला था ॥ १०-११ १/२ ॥

पुत्राणां तस्य बालानां कुमाराणां यशस्विनाम् ॥ १२ ॥ काको बहूनामभवदुच्छिष्टकृतभोजनः । उसके जो बहुत-से अल्पवयस्क यशस्वी पुत्र थे, उन सबकी जूठन खानेवाला एक कौआ भी वहाँ रहा करता था ॥ १२ १/२ ॥

तस्मै सदा प्रयच्छन्ति वैश्यपुत्राः कुमारकाः ॥ १३ ॥ मांसौदनं दधि क्षीरं पायसं मधुसर्पिषी । वैश्यके बालक उस कौएको सदा मांस, भात, दही, दूध, खीर, मधु और घी आदि दिया करते थे ॥ १३ १/२ ॥

स चोच्छिष्टभृतः काको वैश्यपुत्रैः कुमारकैः ॥ १४ ॥ सदृशान् पक्षिणो दृप्तः श्रेयसश्चाधिचिक्षिपे ।