भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1883

वैश्यके बालकोंद्वारा जूठन खिला-खिलाकर पाला हुआ वह कौआ बड़े घमंडमें भरकर अपने समान तथा अपनेसे श्रेष्ठ पक्षियोंका भी अपमान करने लगा ।। १४ १/२ ।।
अथ हंसाः समुद्रान्ते कदाचिदतिपातिनः ।। १५ ।।
गरुडस्य गतौ तुल्याश्चक्राङ्गा हृष्टचेतसः ।
एक दिनकी बात है, उस समुद्रके तटपर गरुड़के समान लंबी उड़ानें भरनेवाले मानसरोवरनिवासी राजहंस आये। उनके अंगोंमें चक्रके चिह्न थे और वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न थे ।। १५ १/२ ।।
कुमारकास्तदा हंसान् दृष्ट्वा काकमथाब्रुवन् ।। १६ ।।
भवानेव विशिष्टो हि पतत्रिभ्यो विहङ्गम ।
(एतेऽतिपातिनः पश्य विहङ्गान् वियदाश्रितान् ।
एभिस्त्वमपि शक्तो हि कामान्न पतितं त्वया ।।)
उस समय उन हंसोंको देखकर कुमारोंने कौएसे इस प्रकार कहा—‘विहंगम! तुम्हीं समस्त पक्षियोंमें श्रेष्ठ हो। देखो, ये आकाशचारी हंस आकाशमें जाकर बड़ी दूरकी उड़ानें भरते हैं। तुम भी इन्हींके समान दूरतक उड़नेमें समर्थ हो। तुमने अपनी इच्छासे ही अबतक वैसी उड़ान नहीं भरी’ ।। १६ १/२ ।।
प्रतार्यमाणस्तैः सर्वैरल्पबुद्धिभिरण्डजः ।। १७ ।।
तद्वचः सत्यमित्येव मौर्ख्याद् दर्पाच्च मन्यते ।
उन सारे अल्पबुद्धि बालकोंद्वारा ठगा गया वह पक्षी मूर्खता और अभिमानसे उनकी बातको सत्य मानने लगा ।। १७ १/२ ।।
तान् सोऽभिपत्य जिज्ञासुः क एषां श्रेष्ठभागिति ।। १८ ।।
उच्छिष्टदर्पितः काको बहूनां दूरपातिनाम् ।
तेषां यं प्रवरं मेने हंसानां दूरपातिनाम् ।। १९ ।।
तमाह्वयत दुर्बुद्धिः पताव इति पक्षिणम् ।
फिर वह जूठनपर घमंड करनेवाला कौआ इन हंसोंमें सबसे श्रेष्ठ कौन है? यह जाननेकी इच्छासे उड़कर उनके पास गया और दूरतक उड़नेवाले उन बहुसंख्यक हंसोंमेंसे जिस पक्षीको उसने श्रेष्ठ समझा, उसीको उस दुर्बुद्धिने ललकारते हुए कहा—‘चलो, हम दोनों उड़ें’ ।। १८-१९ १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा प्राहसन् हंसा ये तत्रासन् समागताः ।। २० ।।
भाषतो बहु काकस्य बलिनः पततां वराः ।
इदमूचुः स्म चक्राङ्गा वचः काकं विहङ्गमाः ।। २१ ।।
बहुत काँव-काँव करनेवाले उस कौएकी वह बात सुनकर वहाँ आये हुए वे पक्षियोंमें श्रेष्ठ आकाशचारी बलवान् चक्रांग हँस पड़े और कौएसे इस प्रकार बोले ।। २०-२१ ।।