महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1884, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहंसा ऊचुः
वयं हंसाश्चरामेमां पृथिवीं मानसौकसः ।
पक्षिणां च वयं नित्यं दूरपातेन पूजिताः ॥ २२ ॥
**हंसोंने कहा—**काक! हम मानसरोवरनिवासी हंस हैं, जो सदा इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं। दूरतक उड़नेके कारण हमलोग सदा सभी पक्षियोंमें सम्मानित होते आये हैं ॥ २२ ॥
कथं हंसं नु बलिनं चक्राङ्गं दूरपातिनम् ।
काको भूत्वा निपतने समाह्वयसि दुर्मते ॥ २३ ॥
कथं त्वं पतिता काक सहास्माभिर्ब्रवीहि तत् ।
ओ खोटी बुद्धिवाले काग! तू कौआ होकर लंबी उड़ान भरनेवाले और अपने अंगोंमें चक्रका चिह्न धारण करनेवाले एक बलवान् हंसको अपने साथ उड़नेके लिये कैसे ललकार रहा है? काग! बता तो सही, तू हमारे साथ किस प्रकार उड़ेगा? ॥ २३ १/२ ॥
अथ हंसवचो मूढः कुत्सयित्वा पुनः पुनः ।
प्रजगादोत्तरं काकः कथनो जातिलाघवात् ॥ २४ ॥
हंसकी बात सुनकर बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाले मूर्ख कौएने अपनी जातिगत क्षुद्रताके कारण बारंबार उसकी निन्दा करके उसे इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २४ ॥
काक उवाच
शतमेकं च पातानां पतितास्मि न संशयः ।
शतयोजनमेकैकं विचित्रं विविधं तथा ॥ २५ ॥
**कौआ बोला—**हंस! मैं एक सौ एक प्रकारकी उड़ानें उड़ सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है। उनमेंसे प्रत्येक उड़ान सौ-सौ योजनकी होती है और वे सभी विभिन्न प्रकारकी एवं विचित्र हैं ॥ २५ ॥
उड्डीनमवडीनं च प्रडीनं डीनमेव च ।
निडीनमथ संडीनं तिर्यक् डीनगतानि च ॥ २६ ॥
विडीनं परिडीनं च पराडीनं सुडीनकम् ।
अभिडीनं महाडीनं निर्डीनमतिडीनकम् ॥ २७ ॥
अवडीनं प्रडीनं च संडीनं डीनडीनकम् ।
संडीनोड्डीनडीनं च पुनर्डीनविडीनकम् ॥ २८ ॥
सम्पातं समुदीषं च ततोऽन्यद् व्यतिरिक्तकम् ।
गतागतप्रतिगतं बह्लींश्च निकुलीनकाः ॥ २९ ॥
उनमेंसे कुछ उड़ानोंके, नाम इस प्रकार हैं—उड्डीन (ऊँचा उड़ना), अवडीन (नीचा उड़ना), प्रडीन (चारों ओर उड़ना), डीन (साधारण उड़ना), निडीन (धीरे-धीरे उड़ना),