महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1885, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंडीन (ललित गतिसे उड़ना), तिर्यग्डीन (तिरछा उड़ना), विडीन (दूसरोंकी चालकी नकल करते हुए उड़ना), परिडीन (सब ओर उड़ना), पराडीन (पीछेकी ओर उड़ना), सुडीन (स्वर्गकी ओर उड़ना), अभिडीन (सामनेकी ओर उड़ना), महाडीन (बहुत वेगसे उड़ना), निर्डीन (परोंको हिलाये बिना ही उड़ना), अतिडीन (प्रचण्डतासे उड़ना), संडीन डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर नीचेकी ओर उड़ना), संडीनोड्डीनडीन (सुन्दर गतिसे आरम्भ करके फिर चक्कर काटकर ऊँचा उड़ना), डीनविडीन (एक प्रकारकी उड़ानमें दूसरी उड़ान दिखाना), सम्पात (क्षणभर सुन्दरतासे उड़कर फिर पंख फड़फड़ाना), समुदीष (कभी ऊपरकी ओर और कभी नीचेकी ओर उड़ना) और व्यतिरिक्तक (किसी लक्ष्यका संकल्प करके उड़ना), —ये छब्बीस उड़ानें हैं। इनमेंसे महाडीनके सिवा अन्य सब उड़ानोंके, ‘गत’ (किसी लक्ष्यकी ओर जाना), ‘आगत’ (लक्ष्यतक पहुँचकर लौट आना) और ‘प्रतिगत’ (पलटा खाना)—ये तीन भेद हैं (इस प्रकार कुल छिहत्तर भेद हुए)। इसके सिवा बहुत-से (अर्थात् पचीस) निपात भी हैं।* (ये सब मिलकर एक सौ एक उड़ानें होती हैं) ।।
कर्तास्मि मिषतां वोऽद्य ततो द्रक्ष्यथ मे बलम् ।
तेषामन्यतमेनाहं पतिष्यामि विहायसम् ।। ३० ।।
प्रदिशध्वं यथान्यायं केन हंसाः पताम्यहम् ।
आज मैं तुमलोगोंके देखते-देखते जब इतनी उड़ानें भरूँगा, उस समय मेरा बल तुम देखोगे। मैं इनमेंसे किसी भी उड़ानसे आकाशमें उड़ सकूँगा। हंसो! तुमलोग यथोचितरूपसे विचार करके बताओ कि ‘मैं किस उड़ानसे उड़ूँ?’ ।। ३०१/२ ।।
ते वै ध्रुवं विनिश्चित्य पतध्वं न मया सह ।। ३१ ।।
पातैरेभिः खलु खगाः पतितुं खे निराश्रये ।
अतः पक्षियो! तुम सब लोग दृढ़ निश्चय करके आश्रयरहित आकाशमें इन विभिन्न उड़ानोंद्वारा उड़नेके लिये मेरे साथ चलो न ।। ३११/२ ।।
एवमुक्ते तु काकेन प्रहस्यैको विहंगमः ।। ३२ ।।
उवाच काकं राधेय वचनं तन्निबोध मे ।
राधापुत्र! कौएके ऐसा कहनेपर एक आकाशचारी हंसने हँसकर उससे जो कुछ कहा, वह मुझसे सुनो ।। ३२१/२ ।।
हंस उवाच
शतमेकं च पातानां त्वं काक पतिता ध्रुवम् ।। ३३ ।।
एकमेव तु यं पातं विदुः सर्वे विहंगमाः ।
तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन ।। ३४ ।।
पत त्वमपि ताम्राक्ष येन पातेन मन्यसे ।