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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1886

हंस बोला- काग! तू अवश्य एक सौ एक उड़ानोंद्वारा उड़ सकता है। परंतु मैं तो

जिस एक उड़ानको सारे पक्षी जानते हैं उसीसे उड़ सकता हूँ, दूसरी किसी उड़ानका मुझे

पता नहीं है। लाल नेत्रवाले कौए? तू भी जिस उड़ानसे उचित समझे, उसीसे

उड़ ।। ३३-३४ १/२ ।।

अथ काकाः प्रजहसुर्ये तत्रासन् समागताः ।। ३५ ।।

कथमेकेन पातेन हंसः पातशतं जयेत् ।

एकेनैव शतस्यैष पातेनाभिभविष्यति ।। ३६ ।।

हंसस्य पतितं काको बलवानाशुविक्रमः ।

तब वहाँ आये हुए सारे कौए जोर-जोरसे हँसने लगे और आपसमें बोले- 'भला यह

हंस एक ही उड़ानसे सौ प्रकारकी उड़ानोंको कैसे जीत सकता है? यह कौआ बलवान् और

शीघ्रतापूर्वक उड़नेवाला है; अतः सौमेंसे एक ही उड़ानद्वारा हंसकी उड़ानको पराजित कर

देगा' ।। ३५-३६ १/२ ।।

प्रपेततुः स्पर्धया च ततस्तौ हंसवायसौ ।। ३७ ।।

एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ।

पेतिवानथ चक्राङ्गः पेतिवानथ वायसः ।। ३८ ।।

तदनन्तर हंस और कौआ दोनों होड़ लगाकर उड़े। चक्रांग हंस एक ही गतिसे

उड़नेवाला था और कौआ सौ उड़ानोंसे। इधरसे चक्रांग उड़ा और उधरसे

कौआ ।। ३७-३८ ।।

विसिस्मापयिषुः पातैराचक्षाणोऽऽत्मनः क्रियाः ।

अथ काकस्य चित्राणि पतितानि मुहुर्मुहुः ।। ३९ ।।

दृष्ट्वा प्रमुदिताः काका विनेदुरधिकैः स्वरैः ।

कौआ विभिन्न उड़ानोंद्वारा दर्शकोंको आश्चर्य-चकित करनेकी इच्छासे अपने कार्योंका

बखान करता जा रहा था। उस समय कौएकी विचित्र उड़ानोंको बारंबार देखकर दूसरे कौए

बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे काँव-काँव करने लगे ।। ३९ १/२ ।।

हंसांश्चावहसन्ति स्म प्रावदन्नप्रियाणि च ।। ४० ।।

उत्पत्योत्पत्य च मुहुर्मुहूर्तमिति चेति च ।

वृक्षाग्रेभ्यः स्थलेभ्यश्च निपतन्त्युतन्ति च ।। ४१ ।।

कुर्वाणा विविधान् रावानाशंसन्तो जयं तथा ।

वे दो-दो घड़ीपर बारंबार उड़-उड़कर कहते— 'देखो, कौएकी यह उड़ान, वह उड़ान'।

ऐसा कहकर वे हंसोंका उपहास करते और उन्हें कटु वचन सुनाते थे। साथ ही कौएकी

विजयके लिये शुभाशंसा करते और भाँति-भाँतिकी बोली बोलते हुए वे कभी वृक्षोंकी

शाखाओंसे भूतलपर और कभी भूतलसे वृक्षोंकी शाखाओंपर नीचे-ऊपर उड़ते रहते

थे ।। ४०-४१ १/२ ।।