महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1899, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जलका स्वामी, वेगवान् और अप्रमेय समुद्र बहुत लोगोंको निमग्न कर देनेके लिये अपना महान् वेग प्रकट करता है; परंतु तटकी भूमि उस अनन्त महासागरको भी रोक लेती है ।। १३ १/२ ।।
प्रमुञ्चन्तं बाणसंघानमेयान् मर्मच्छिदो वीरहणः सुपत्रान् ।। १४ ।। कुन्तीपुत्रं यत्र योत्स्यामि युद्धे ज्यां कर्षतामुत्तममद्य लोके ।
‘उसी प्रकार मैं भी मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले, सुन्दर पंखोंसे युक्त, असंख्य, वीरविनाशक बाण-समूहोंका प्रयोग करनेवाले उन कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ रणभूमिमें युद्ध करूँगा, जो इस जगत्के भीतर प्रत्यंचा खींचनेवाले वीरोंमें सबसे उत्तम हैं ।। १४ १/२ ।।
एवं बलेनातिबलं महास्त्रं समुद्रकल्पं सुदुरापमुग्रम् ।। १५ ।। शरौघिणं पार्थिवान् मज्जयन्तं वेलेव पार्थमिषुभिः संसहिष्ये ।
‘कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त बलशाली, महान् अस्त्रधारी, समुद्रके समान दुर्लङ्घ्य, भयंकर, बाणसमूहोंकी धारा बहानेवाले और बहुसंख्यक भूपालोंको डुबो देनेवाले हैं; तथापि मैं समुद्रको रोकनेवाली तटभूमिके समान अपने बाणोंद्वारा अर्जुनको बलपूर्वक रोकूँगा और उनका वेग सहन करूँगा ।। १५ १/२ ।।
अद्याहवे यस्य न तुल्यमन्यं मन्ये मनुष्यं धनुराददानम् ।। १६ ।। सुरासुरान् युधि वै यो जयेत तेनाद्य मे पश्य युद्धं सुघोरम् ।
‘आज मैं युद्धमें जिनके समान इस समय किसी दूसरे मनुष्यको नहीं मानता, जो हाथमें धनुष लेकर रणभूमिमें देवताओं और असुरोंको भी परास्त कर सकते हैं, उन्हीं वीर अर्जुनके साथ आज मेरा अत्यन्त घोर युद्ध होगा; उसे तुम देखना ।। १६ १/२ ।।
अतीव मानी पाण्डवो युद्धकामो ह्यामानुषैरेष्यति मे महास्त्रैः ।। १७ ।। तस्यास्त्रमस्त्रैः प्रतिहत्य संख्ये बाणोत्तमैः पातयिष्यामि पार्थम् ।
‘अत्यन्त मानी पाण्डुपुत्र अर्जुन युद्धकी इच्छासे महान् दिव्यास्त्रोंद्वारा मेरे सामने आयेंगे। उस समय मैं अपने अस्त्रोंद्वारा उनके अस्त्रका निवारण करके युद्धस्थलमें उत्तम बाणोंसे कुन्तीकुमार अर्जुनको मार गिराऊँगा ।। १७ १/२ ।।