महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1888, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतिक्रम्य च चक्राङ्गः काकं तं समुदैक्षत ।। ५० ।। यावद् गत्वा पतत्येष काको मामिति चिन्तयन् । चक्रांग कौएको लाँघकर आगे बढ़ चुका था तो भी यह सोचकर उसकी प्रतीक्षा करने लगा कि यह कौआ भी उड़कर मेरे पास आ जाय ।। ५० १/२ ।।
ततः काको भृशं श्रान्तो हंसमभ्यागमत्तदा ।। ५१ ।। तं तथा हीयमानं तु हंसो दृष्ट्वाब्रवीदिदम् । उज्जिहीर्षुर्निमज्जन्तं स्मरन् सत्पुरुषव्रतम् ।। ५२ ।। तदनन्तर उस समय अत्यन्त थका-मादा कौआ हंसके समीप आया। हंसने देखा, कौएकी दशा बड़ी शोचनीय हो गयी है। अब यह पानीमें डूबनेहीवाला है। तब उसने सत्पुरुषोंके व्रतका स्मरण करके उसके उद्धारकी इच्छा मनमें लेकर इस प्रकार कहा ।। ५१-५२ ।।
हंस उवाच
बहूनि पतितानि त्वमाचक्षाणो मुहुर्मुहुः । पातस्य व्याहरंश्चेदं न नो गुह्यं प्रभाषसे ।। ५३ ।। हंस बोला—काग! तू तो बारंबार अपनी बहुत-सी उड़ानोंका बखान कर रहा था; परंतु उन उड़ानोंका वर्णन करते समय उनमेंसे इस गोपनीय रहस्ययुक्त उड़ानकी बात तो तूने नहीं बतायी थी ।। ५३ ।।
किं नाम पतितं काक यत्त्वं पतसि साम्प्रतम् । जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ।। ५४ ।। कौए! बता तो सही, तू इस समय जिस उड़ानसे उड़ रहा है, उसका क्या नाम है? इस उड़ानमें तो तू अपने दोनों पंखों और चोंचके द्वारा जलका बार-बार स्पर्श करने लगा है ।। ५४ ।।
प्रब्रूहि कतमे तत्र पाते वर्तसि वायस । एह्येहि काक शीघ्रं त्वमेष त्वां प्रतिपालये ।। ५५ ।। वायस! बता, बता। इस समय तू कौन-सी उड़ानमें स्थित है। कौए! आ, शीघ्र आ। मैं अभी तेरी रक्षा करता हूँ ।। ५५ ।।
शल्य उवाच
स पक्षाभ्यां स्पृशन्नार्तस्तुण्डेन च जलं तदा । दृष्टो हंसेन दुष्टात्मन्निदं हंसं ततोऽब्रवीत् ।। ५६ ।। अपश्यन्नम्भसः पारं निपतंश्च श्रमान्वितः । पातवेगप्रमथितो हंसं काकोऽब्रवीदिदम् ।। ५७ ।।