भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1897, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1897

कृतो विभेदेन ममोरुमेत्य प्रविश्य कीटस्य तनुं विरूपाम् । ममोरुमेत्य प्रबिभेद कीटः सुप्ते गुरौ तत्र शिरो निधाय ॥ ५ ॥ ‘पूर्वकालकी बात है, मैं दिव्य अस्त्रोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे ब्राह्मणका वेष बनाकर परशुरामजीके पास रहता था। शल्य! वहाँ भी अर्जुनका ही हित चाहनेवाले देवराज इन्द्रने मेरे कार्यमें विघ्न उपस्थित कर दिया था। एक दिन गुरुदेव मेरी जाँघपर अपना मस्तक रखकर सो गये थे। उस समय इन्द्रने एक कीड़ेके भयंकर शरीरमें प्रवेश करके मेरी जाँघके पास आकर उसे काट लिया, काटकर उसमें भारी घाव कर दिया और इस कार्यके द्वारा इन्होंने मेरे मनोरथमें विघ्न डाल दिया ।। ४-५ ।। ऊरुप्रभेदाच्च महान् बभूव शरीरतो मे घनशोणितौघः । गुरोर्भयाच्चापि न चेलिवानहं ततो विबुद्धो ददृशे स विप्रः ॥ ६ ॥ ‘जाँघमें घाव हो जानेके कारण मेरे शरीरसे गाढ़े रक्तका महान् प्रवाह बह चला; परंतु गुरुके जागनेके भयसे मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ। तत्पश्चात् जब गुरुजी जागे, तब उन्होंने यह सब कुछ देखा ।। ६ ।। स धैर्ययुक्तं प्रसमीक्ष्य मां वै न त्वं विप्रः कोऽसि सत्यं वदेति । तस्मै तदाऽऽत्मानमहं यथाव- दाख्यातवान् सूत इत्येव शल्य ॥ ७ ॥ ‘शल्य! उन्होंने मुझे ऐसे धैर्यसे युक्त देखकर पूछा—‘अरे! तू ब्राह्मण तो है नहीं; फिर कौन है? सच-सच बता दे।’ तब मैंने उनसे अपना यथार्थ परिचय देते हुए इस प्रकार कहा—‘भगवन्! मैं सूत हूँ’ ।। ७ ।। स मां निशम्याथ महातपस्वी संशप्तवान् रोषपरीतचेताः । सूतोपधावाप्तमिदं तवास्त्रं न कर्मकाले प्रतिभास्यति त्वाम् ॥ ८ ॥ ‘तदनन्तर मेरा वृत्तान्त सुनकर महातपस्वी परशुरामजीके मनमें मेरे प्रति अत्यन्त रोष भर गया और उन्होंने मुझे शाप देते हुए कहा—‘सूत! तूने छल करके यह ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया है। इसलिये काम पड़नेपर तेरा यह अस्त्र तुझे याद न आयेगा ।। ८ ।। अन्यत्र तस्मात् तव मृत्युकाला- दब्राह्मणे ब्रह्म न हि ध्रुवं स्यात् ।

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