महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 3045)
नवमोऽध्यायः
दुर्योधनकी दशा देखकर कृपाचार्य और अश्वत्थामाका विलाप तथा उनके मुखसे पांचालोंके वधका वृत्तान्त जानकर दुर्योधनका प्रसन्न होकर प्राणत्याग करना
संजय उवाच
ते हत्वा सर्वपञ्चालान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ।
आगच्छन् सहितास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! वे तीनों महारथी समस्त पांचालों और द्रौपदीके सभी पुत्रोंका वध करके एक साथ उस स्थानमें आये, जहाँ राजा दुर्योधन मारा गया था ॥ १ ॥
गत्वा चैनमपश्यन्त किञ्चित्प्राणं जनाधिपम् ।
ततो रथेभ्यः प्रस्कन्द्य परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥ २ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने राजा दुर्योधनको देखा, उसकी कुछ-कुछ साँस चल रही थी। फिर वे रथोंसे कूद पड़े और आपके पुत्रके पास जा उसे सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ २ ॥
तं भग्नसक्थं राजेन्द्र कृच्छ्रप्राणमचेतसम् ।
वमन्तं रुधिरं वक्त्रादपश्यन् वसुधातले ॥ ३ ॥
वृतं समन्ताद् बहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः ।
शालावृकगणैश्चैव भक्षयिष्यद्भिरन्तिकात् ॥ ४ ॥
निवारयन्तं कृच्छ्रात्तान् श्वापदांश्च चिखादिषून् ।
विचेष्टमानं मह्यां च सुभृशं गाढवेदनम् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उन्होंने देखा कि राजाकी जाँघें टूट गयी हैं। ये बड़े कष्टसे प्राण धारण करते हैं। इनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी है और ये अपने मुँहसे पृथ्वीपर खून उगल रहे हैं। इन्हें चट कर जानेके लिये बहुत-से भयंकर दिखायी देनेवाले हिंसक जीव और कुत्ते चारों ओरसे घेरकर आसपास ही खड़े हैं। ये अपनेको खा जानेकी इच्छा रखनेवाले उन हिंसक जन्तुओंको बड़ी कठिनाईसे रोकते हैं। इन्हें बड़ी भारी पीड़ा हो रही है, जिसके कारण ये पृथ्वीपर पड़े-पड़े छटपटा रहे हैं ॥
तं शयानं तथा दृष्ट्वा भूमौ सुरुधिरोक्षितम् ।
हतशिष्टास्त्रयो वीराः शोकार्ताः पर्यवारयन् ॥ ६ ॥
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।
दुर्योधनको इस प्रकार खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा देख मरनेसे बचे हुए वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा शोकसे व्याकुल हो उसे तीन ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ६ १/२ ॥
तैस्त्रिभिः शोणितादिग्धैर्निःश्वसद्भिर्महारथैः ॥ ७ ॥
शुशुभे स वृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभिः ।
वे तीनों महारथी वीर खूनसे रँग गये थे और लंबी साँसें खींच रहे थे। उनसे घिरा हुआ राजा दुर्योधन तीन अग्नियोंसे घिरी हुई वेदीके समान सुशोभित हो रहा था ॥
ते तं शयानं सम्प्रेक्ष्य राजानमथथोचितम् ॥ ८ ॥
अविषह्येन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रयः ।
राजाको इस प्रकार अयोग्य अवस्थामें सोया देख वे तीनों असह्य दुःखसे पीड़ित हो रोने लगे ॥ ८ १/२ ॥
ततस्तु रुधिरं हस्तैर्मुखान्निर्मृज्य तस्य हि ।
रणे राज्ञः शयानस्य कृपणं पर्यदेवयन् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् रणभूमिमें सोये हुए राजा दुर्योधनके मुखसे बहते हुए रक्तको हाथोंसे पोंछकर वे तीनों दीन वाणीमें विलाप करने लगे ॥ ९ ॥
कृप उवाच
न दैवस्यातिभारोऽस्ति यदयं रुधिरोक्षितः ।
एकादशचमूभर्ता शेते दुर्योधनो हतः ॥ १० ॥
**कृपाचार्य बोले—**हाय! विधाताके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है। जो कभी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे, वे ही ये राजा दुर्योधन यहाँ मारे जाकर खूनसे लथपथ हुए पड़े हैं ॥ १० ॥
पश्य चामीकराभास्य चामीकरविभूषिताम् ।
गदां गदाप्रियस्येमां समीपे पतितां भुवि ॥ ११ ॥
देखो, सुवर्णके समान कान्तिवाले इन गदाप्रेमी नरेशके समीप यह सुवर्णभूषित गदा पृथ्वीपर पड़ी है ॥
इयमेनं गदा शूरं न जहाति रणे रणे ।
स्वर्गायापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम् ॥ १२ ॥
यह गदा इन शूरवीर भूपालका साथ किसी भी युद्धमें नहीं छोड़ती थी और आज स्वर्गलोकमें जाते समय भी यशस्वी नरेशका साथ नहीं छोड़ रही है ॥
पश्येमां सह वीरेण जाम्बूनदविभूषिताम् ।
शयानां शयने हर्म्ये भार्यां प्रीतिमतीमिव ॥ १३ ॥
देखो, यह सुवर्णभूषित गदा इन वीर भूपालके साथ रणशय्यापर उसी प्रकार सो रही है, जैसे महलमें प्रेम रखनेवाली पत्नी इनके साथ सोया करती थी ॥ १३ ॥
योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे यातः परंतपः । स हतो ग्रसते पांसून् पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १४ ॥ जो ये शत्रुसंतापी नरेश सभी मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चला करते थे, वे ही आज मारे जाकर धरतीपर पड़े-पड़े धूल फाँक रहे हैं। यह समयका उलट-फेर तो देखो ॥ १४ ॥
येनाजौ निहता भूमावशेरत पुरा द्विषः । स भूमौ निहतः शेते कुरुराजः परैरयम् ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें जिनके द्वारा युद्धमें मारे गये शत्रु भूमिपर सोया करते थे, वे ही ये कुरुराज आज शत्रुओंद्वारा स्वयं मारे जाकर भूमिपर शयन करते हैं ॥ १५ ॥
भयान्नमन्ति राजानो यस्य स्म शतसंघशः । स वीरशयने शेते क्रव्याद्भिः परिवारितः ॥ १६ ॥ जिनके आगे सैकड़ों राजा भयसे सिर झुकाते थे, वे ही आज हिंसक जन्तुओंसे घिरे हुए वीर-शय्यापर सो रहे हैं ॥ १६ ॥
उपासत द्विजाः पूर्वमर्थहेतोर्यमीश्वरम् । उपासते च तं ह्यद्य क्रव्यादा मांसहेतवः ॥ १७ ॥ पहले बहुत-से ब्राह्मण धनकी प्राप्तिके लिये जिन नरेशके पास बैठे रहते थे, उन्हींके समीप आज मांसके लिये मांसाहारी जन्तु बैठे हुए हैं ॥ १७ ॥
संजय उवाच
तं शयानं कुरुश्रेष्ठं ततो भरतसत्तम । अश्वत्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवयत् ॥ १८ ॥ **संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुरुकुल-भूषण दुर्योधनको रणशय्यापर पड़ा देख अश्वत्थामा इस प्रकार करुण विलाप करने लगा— ॥ १८ ॥
आहुस्त्वां राजशार्दूल मुख्यं सर्वधनुष्मताम् । धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं संकर्षणस्य च ॥ १९ ॥ कथं विवरमद्राक्षीद् भीमसेनस्तवानघ । बलिनं कृतिनं नित्यं स च पापात्मवान् नृप ॥ २० ॥ ‘निष्पाप राजसिंह! आपको समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कहा जाता था। आप गदायुद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरकी समानता करनेवाले तथा साक्षात् संकर्षणके शिष्य थे तो भी भीमसेनने कैसे आपपर प्रहार करनेका अवसर पा लिया? नरेश्वर! आप तो सदासे ही बलवान् और गदायुद्धके विद्वान् रहे हैं। फिर उस पापात्माने कैसे आपको मार दिया? ॥ १९-२० ॥
कालो नूनं महाराज लोकेऽस्मिन् बलवत्तरः ।
पश्यामो निहतं त्वां च भीमसेनेन संयुगे ॥ २१ ॥ ‘महाराज! निश्चय ही इस संसारमें समय महाबलवान् है, तभी तो युद्धस्थलमें हम आपको भीमसेनके द्वारा मारा गया देखते हैं ॥ २१ ॥ कथं त्वां सर्वधर्मज्ञं क्षुद्रः पापो वृकोदरः । निकृत्या हतवान् मन्दो नूनं कालो दुरत्ययः ॥ २२ ॥ ‘आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता थे। आपको उस मूर्ख, नीच और पापी भीमसेनने किस तरह धोखेसे मार डाला? अवश्य ही कालका उल्लङ्घन करना सर्वथा कठिन है ॥ २२ ॥ धर्मयुद्धे ह्यधर्मेण समाहूयौजसा मृधे । गदया भीमसेनेन निर्भग्ने सक्थिनी तव ॥ २३ ॥ ‘भीमसेनने आपको धर्मयुद्धके लिये बुलाकर रणभूमिमें अधर्मके बलसे गदाद्वारा आपकी दोनों जाँघें तोड़ डालीं ॥ २३ ॥ अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिरः । य उपेक्षितवान् क्षुद्रं धिक् कृष्णं धिग् युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ ‘एक तो आप रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारे गये। दूसरे भीमसेनने आपके मस्तकपर लात मारी। इतनेपर भी जिन्होंने उस नीचकी उपेक्षा की, उसे कोई दण्ड नहीं दिया, उन श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरको धिक्कार है! ।। युद्धेष्वपवदिष्यन्ति योधा नूनं वृकोदरम् । यावत् स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यसि पातितः ॥ २५ ॥ ‘आप धोखेसे गिराये गये हैं, अतः इस संसारमें जबतक प्राणियोंकी स्थिति रहेगी, तबतक सभी युद्धोंमें सम्पूर्ण योद्धा भीमसेनकी निन्दा ही करेंगे ॥ २५ ॥ ननु रामोऽब्रवीद् राजंस्त्वां सदा यदुनन्दनः । दुर्योधनसमो नास्ति गदया इति वीर्यवान् ॥ २६ ॥ ‘राजन्! पराक्रमी यदुनन्दन बलरामजी आपके विषयमें सदा कहा करते थे कि ‘गदायुद्धकी शिक्षामें दुर्योधनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है’ ॥ श्लाघते त्वां हि वार्ष्णेयो राजसंसत्सु भारत । स शिष्यो मम कौरव्यो गदायुद्ध इति प्रभो ॥ २७ ॥ ‘प्रभो! भरतनन्दन! वे वृष्णिकुलभूषण बलराम राजाओंकी सभामें सदा आपकी प्रशंसा करते हुए कहते थे कि ‘कुरुराज दुर्योधन गदायुद्धमें मेरा शिष्य है’ ॥ यां गतिं क्षत्रियस्याहुः प्रशस्तां परमर्षयः । हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम् ॥ २८ ॥ ‘महर्षियोंने युद्धमें शत्रुा सामना करते हुए मारे जानेवाले क्षत्रियके लिये जो उत्तम गति बतायी है, आपने वही गति प्राप्त की है ॥ २८ ॥ दुर्योधन न शोचामि त्वामहं पुरुषर्षभ ।
हतपुत्रौ तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते ॥ २९ ॥ ‘पुरुषश्रेष्ठ राजा दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिये शोक नहीं करता। मुझे तो माता गान्धारी और आपके पिता धृतराष्ट्रके लिये शोक हो रहा है, जिनके सभी पुत्र मार डाले गये हैं ॥ २९ ॥
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् । धिगस्तु कृष्णं वार्ष्णेयमर्जुनं चापि दुर्मतिम् ॥ ३० ॥ धर्मज्ञमानिनौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम् । ‘अब वे बेचारे शोकमग्न हो भिखारी बनकर इस भूतलपर भीख माँगते फिरेंगे। उस वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण और खोटी बुद्धिवाले अर्जुनको भी धिक्कार है, जिन्होंने अपनेको धर्मज्ञ मानते हुए भी आपके अन्यायपूर्वक वधकी उपेक्षा की ॥ ३० १/२ ॥
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे किं वक्ष्यन्ति नराधिप ॥ ३१ ॥ कथं दुर्योधनोऽस्माभिर्हत इत्यनपत्रपाः । ‘नरेश्वर! क्या वे समस्त पाण्डव भी निर्लज्ज होकर लोगोंके सामने कह सकेंगे कि ‘हमने दुर्योधनको किस प्रकार मारा था?’ ॥ ३१ १/२ ॥
धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमायोधने हतः ॥ ३२ ॥ प्रायशोऽभिमुखः शत्रून् धर्मेण पुरुषर्षभ । ‘पुरुषप्रवर गान्धारीनन्दन! आप धन्य हैं, क्योंकि युद्धमें प्रायः धर्मपूर्वक शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये हैं ॥ ३२ १/२ ॥
हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिबान्धवा ॥ ३३ ॥ प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः कां गतिं प्रतिपत्स्यते । ‘जिनके सभी पुत्र, कुटुम्बी और भाई-बन्धु मारे जा चुके हैं, वे माता गान्धारी तथा प्रज्ञाचक्षु दुर्जय राजा धृतराष्ट्र अब किस दशाको प्राप्त होंगे? ॥ ३३ १/२ ॥
धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम् ॥ ३४ ॥ ये वयं न गताः स्वर्गं त्वां पुरस्कृत्य पार्थिवम् । ‘मुझको, कृतवर्माको तथा महारथी कृपाचार्यको भी धिक्कार है कि हम आप-जैसे महाराजको आगे करके स्वर्गलोकमें नहीं गये ॥ ३४ १/२ ॥
दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम् ॥ ३५ ॥ यद् वयं नानुगच्छाम त्वां धिगस्मान् नराधमान् । ‘आप हमें सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ देते रहे और प्रजाके हितकी रक्षा करते रहे। फिर भी हमलोग जो आपका अनुसरण नहीं कर रहे हैं, इसके लिये हम-जैसे नराधमोंको धिक्कार है! ॥ ३५ १/२ ॥
कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्च मे ॥ ३६ ॥ सभृत्यानां नरव्याघ्र रत्नवन्ति गृहाणि च ।
‘नरश्रेष्ठ! आपके ही बल-पराक्रमसे सेवकोंसहित कृपाचार्यको, मुझको तथा मेरे पिताजीको रत्नोंसे भरे हुए भव्य भवन प्राप्त हुए थे ।। ३६ १/२ ।। तव प्रसादादस्माभिः समित्रैः सह बान्धवैः ।। ३७ ।। अवाप्ताः क्रतवो मुख्या बहवो भूरिदक्षिणाः । ‘आपके ही प्रसादसे मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंने प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक मुख्य-मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ।। ३७ १/२ ।। कुतश्चापीदृशं पापाः प्रवर्तिष्यामहे वयम् ।। ३८ ।। यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गतः सर्वपार्थिवान् । ‘महाराज! आप जिस भावसे समस्त राजाओंको आगे करके स्वर्ग सिधार रहे हैं, हम पापी ऐसा भाव कहाँसे ला सकेंगे? ।। ३८ १/२ ।। वयमेव त्रयो राजन् गच्छन्तं परमां गतिम् ।। ३९ ।। यद् वै त्वां नानुगच्छामस्तेन धक्ष्यामहे वयम् । तत् स्वर्गहीना हीनार्थाः स्मरन्तः सुकृतस्य ते ।। ४० ।। ‘राजन्! परम गतिको जाते समय आपके पीछे-पीछे जो हम तीनों भी नहीं चल रहे हैं, इसके कारण हम स्वर्ग और अर्थ दोनोंसे वंचित हो आपके सुकृतोंका स्मरण करते हुए दिन-रात शोकाग्निमें जलते रहेंगे ।। ३९-४० ।। किं नाम तद् भवेत् कर्म येन त्वां न व्रजाम वै । दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्याम महीमिमाम् ।। ४१ ।। ‘कुरुश्रेष्ठ! न जाने वह कौन-सा कर्म है, जिससे विवश होकर हम आपके साथ नहीं चल रहे हैं। निश्चय ही इस पृथ्वीपर हमें निरन्तर दुःख भोगना पड़ेगा ।। हीनानां नस्त्वया राजन् कुतः शान्तिः कुतः सुखम् । गत्वैव तु महाराज समेत्य च महारथान् ।। ४२ ।। यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयेर्वचनान्मम । ‘महाराज! आपसे बिछुड़ जानेपर हमें शान्ति और सुख कैसे मिल सकते हैं? राजन्! स्वर्गमें जाकर सब महारथियोंसे मिलनेपर आप मेरी ओरसे बड़े-छोटेके क्रमसे उन सबका आदर-सत्कार करें ।। ४२ १/२ ।। आचार्यं पूजयित्वा च केतुं सर्वधनुष्मताम् ।। ४३ ।। हतं मयाद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप । ‘नरेश्वर! फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके ध्वजस्वरूप आचार्यका पूजन करके उनसे कह दें कि ‘आज अश्वत्थामाके द्वारा धृष्टद्युम्न मार डाला गया’ ।। ४३ १/२ ।। परिष्वजेथा राजानं बाह्लिकं सुमहारथम् ।। ४४ ।। सैन्धवं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ।
'महारथी राजा बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, सोमदत्त तथा भूरिश्रवाका भी आप मेरी ओरसे आलिंगन करें ।।
तथा पूर्वगतानन्यान् स्वर्गे पार्थिवसत्तमान् ।। ४५ ।। अस्मद्वाक्यात् परिष्वज्य सम्पृच्छेस्त्वमनामयम् ।। ४६ ।। 'दूसरे-दूसरे भी जो नृपश्रेष्ठ पहलेसे ही स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं, उन सबको मेरे कथनानुसार हृदयसे लगाकर उनकी कुशल पूछें' ।। ४५-४६ ।।
संजय उवाच
इत्येवमुक्त्वा राजानं भग्नसक्थमचेतनम् । अश्वत्थामा समुद्वीक्ष्य पुनर्वचनमब्रवीत् ।। ४७ ।। **संजय कहते हैं—**महाराज! जिसकी जाँघें टूट गयी थीं, उस अचेत पड़े हुए राजा दुर्योधनसे ऐसा कहकर अश्वत्थामाने पुनः उसकी ओर देखा और इस प्रकार कहा — ।। ४७ ।।
दुर्योधन जीवसि त्वं वाक्यं श्रोत्रसुखं शृणु । सप्त पाण्डवतः शेषा धार्तराष्ट्रास्त्रयो वयम् ।। ४८ ।। 'राजा दुर्योधन! यदि आप जीवित हों तो यह कानोंको सुख देनेवाली बात सुनें। पाण्डवपक्षमें केवल सात और कौरवपक्षमें सिर्फ हम तीन ही व्यक्ति बच गये हैं ।।
ते चैव भ्रातरः पञ्च वासुदेवोऽथ सात्यकिः । अहं च कृतवर्मा च कृपः शारद्वतस्तथा ।। ४९ ।। 'उधर तो पाँचों भाई पाण्डव, श्रीकृष्ण और सात्यकि बचे हैं और इधर मैं, कृतवर्मा तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य शेष रह गये हैं ।। ४९ ।।
द्रौपदेया हताः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः । पञ्चाला निहताः सर्वे मत्स्यशेषं च भारत ।। ५० ।। 'भरतनन्दन! द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्नके सभी पुत्र मारे गये, समस्त पांचालोंका संहार कर दिया गया और मत्स्य देशकी अवशिष्ट सेना भी समाप्त हो गयी ।। ५० ।।
कृते प्रतिकृतं पश्य हतपुत्रा हि पाण्डवाः । सौप्तिके शिबिरं तेषां हतं सनरवाहनम् ।। ५१ ।। 'राजन्! देखिये, शत्रुओंकी करनीका कैसा बदला चुकाया गया? पाण्डवोंके भी सारे पुत्र मार डाले गये। रातमें सोते समय मनुष्यों और वाहनोंसहित उनके सारे शिविरका नाश कर दिया गया ।। ५१ ।।
मया च पापकर्मासौ धृष्टद्युम्नो महीपते । प्रविश्य शिबिरं रात्रौ पशुमारेण मारितः ।। ५२ ।।
‘भूपाल! मैंने स्वयं रातके समय शिविरमें घुसकर पापाचारी धृष्टद्युम्नको पशुओंकी तरह गला घोंट-घोंटकर मार डाला है’ ॥ ५२ ॥
दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनसः प्रियाम् ।
प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
यह मनको प्रिय लगनेवाली बात सुनकर दुर्योधनको पुनः होश आ गया और वह इस प्रकार बोला— ॥ ५३ ॥
न मेऽकरोत् तद् गाङ्गेयो न कर्णो न च ते पिता ।
यत् त्वया कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम् ॥ ५४ ॥
‘मित्रवर! आज आचार्य कृप और कृतवर्माके साथ तुमने जो कार्य कर दिखाया है, उसे न गंगानन्दन भीष्म, न कर्ण और न तुम्हारे पिताजी ही कर सके थे ॥
स च सेनापतिः क्षुद्रो हतः सार्धं शिखण्डिना ।
तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै ॥ ५५ ॥
‘शिखण्डीसहित वह नीच सेनापति धृष्टद्युम्न मार डाला गया, इससे आज निश्चय ही मैं अपनेको इन्द्रके समान समझता हूँ’ ॥ ५५ ॥
स्वस्ति प्राप्नुत भद्रं वः स्वर्गे नः संगमः पुनः ।
इत्येवमुक्त्वा तूष्णीं स कुरुराजो महामनाः ॥ ५६ ॥
प्राणानुपामृजद् वीरः सुहृदां दुःखमुत्सृजन् ।
अपाक्रामद् दिवं पुण्यां शरीरं क्षितिमाविशत् ॥ ५७ ॥
‘तुम सब लोगोंका कल्याण हो। तुम्हें सुख प्राप्त हो। अब स्वर्गमें ही हमलोगोंका पुनर्मिलन होगा।’ ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरुराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदोंके लिये दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोकमें चला गया; किंतु उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वीपर ही पड़ा रह गया ॥ ५६-५७ ॥
एवं ते निधनं यातः पुत्रो दुर्योधनो नृप ।
अग्रे यात्वा रणे शूरः पश्चाद् विनिहतः परैः ॥ ५८ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन मृत्युको प्राप्त हुआ। वह समरांगणमें सबसे पहले गया था और सबसे पीछे शत्रुओंद्वारा मारा गया ॥ ५८ ॥
तथैव ते परिष्वक्ताः परिष्वज्य च ते नृपम् ।
पुनः पुनः प्रेक्षमाणाः स्वकानारुरुहु रथान् ॥ ५९ ॥
मरनेसे पहले दुर्योधनने तीनों वीरोंको गले लगाया और उन तीनोंने भी राजाको हृदयसे लगाकर विदा दी, फिर वे बारंबार उसकी ओर देखते हुए अपने-अपने रथोंपर सवार हो गये ॥ ५९ ॥
इत्येवं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम् ।
प्रत्यूषकाले शोकार्तः प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ ६० ॥
इस प्रकार द्रोणपुत्रके मुखसे वह करुणाजनक समाचार सुनकर मैं शोकसे व्याकुल हो उठा और प्रातःकाल नगरकी ओर दौड़ा चला आया ॥ ६० ॥
एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः ।
घोरो विशसनो रौद्रो राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ६१ ॥
राजन्! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके अनुसार कौरवों तथा पाण्डवोंकी सेनाओंका यह घोर एवं भयंकर विनाशकार्य सम्पन्न हुआ है ॥ ६१ ॥
तव पुत्रे गते स्वर्गं शोकार्तस्य ममानघ ।
ऋषिदत्तं प्रणष्टं तद् दिव्यदर्शित्वमद्य वै ॥ ६२ ॥
निष्पाप नरेश! आपके पुत्रके स्वर्गलोकमें चले जानेसे मैं शोकसे आतुर हो गया हूँ और महर्षि व्यासजीकी दी हुई मेरी वह दिव्य दृष्टि भी अब नष्ट हो गयी है ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति श्रुत्वा स नृपतिः पुत्रस्य निधनं तदा ।
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ ६३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने पुत्रकी मृत्युका समाचार सुनकर राजा धृतराष्ट्र गरम-गरम लंबी साँस खींचकर गहरी चिन्तामें डूब गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि दुर्योधनप्राणत्यागे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें दुर्योधनका प्राणत्यागविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
(ऐषीकपर्व)
(ऐषीकपर्व)
दशमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्नके सारथिके मुखसे पुत्रों और पांचालोंके वधका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरका विलाप, द्रौपदीको बुलानेके लिये नकुलको भेजना, सुहृदोंके साथ शिविरमें जाना तथा मारे हुए पुत्रादिको देखकर भाईसहित शोकातुर होना
वैशम्पायन उवाच
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धृष्टद्युम्नस्य सारथिः।
शशंस धर्मराजाय सौप्तिके कदनं कृतम्॥ १॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! वह रात व्यतीत होनेपर धृष्टद्युम्नके सारथिने रातको सोते समय जो संहार किया गया था, उसका समाचार धर्मराज युधिष्ठिरसे कह सुनाया॥ १॥
सूत उवाच
द्रौपदेया हता राजन् द्रुपदस्यात्मजैः सह।
प्रमत्ता निशि विश्वस्ताः स्वपन्तः शिबिरे स्वके॥ २॥
**सारथि बोला—**राजन्! द्रुपदके पुत्रोंसहित द्रौपदी देवीके भी सारे पुत्र मारे गये। वे रातको अपने शिबिरमें निश्चिन्त एवं असावधान होकर सो रहे थे॥ २॥
कृतवर्मणा नृशंसेन गौतमेन कृपेण च।
अश्वत्थाम्ना च पापेन हतं वः शिबिरं निशि॥ ३॥
उसी समय क्रूर कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा पापी अश्वत्थामाने आक्रमण करके आपके सारे शिबिरका विनाश कर डाला॥ ३॥
एतैर्नरगजाश्वानां प्रासशक्तिपरश्वधैः।
सहस्राणि निकृन्तद्भिर्निःशेषं ते बलं कृतम्॥ ४॥
इन तीनोंने प्रास, शक्ति और फरसोंद्वारा सहस्रों मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको काट-काटकर आपकी सारी सेनाको समाप्त कर दिया है॥ ४॥
छिद्यमानस्य महतो वनस्येव परश्वधैः।
शुश्रुवे सुमहान् शब्दो बलस्य तव भारत॥ ५॥
भारत! जैसे फरसोंसे विशाल जंगल काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उनके द्वारा छिन्न-भिन्न की जाती हुई आपकी विशाल वाहिनीका महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता था ॥ ५ ॥ अहमेकोऽवशिष्टस्तु तस्मात् सैन्यान्महामते । मुक्तः कथंचिद् धर्मात्मन् व्यग्राच्च कृतवर्मणः ॥ ६ ॥ महामते! धर्मात्मन्! उस विशाल सेनासे अकेला मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूँ। कृतवर्मा दूसरोंको मारनेमें लगा हुआ था; इसीलिये मैं उस संकटसे मुक्त हो सका हूँ ॥ ६ ॥ तच्छ्रुत्वा वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । पपात मह्यां दुर्धर्षः पुत्रशोकसमन्वितः ॥ ७ ॥ वह अमंगलमय वचन सुनकर दुर्धर्ष राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पुत्रशोकसे संतप्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ७ ॥ पतन्तं तमतिक्रम्य परिजग्राह सात्यकिः । भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ८ ॥ गिरते समय आगे बढ़कर सात्यकिने उन्हें थाम लिया। भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवने भी उन्हें पकड़ लिया ॥ ८ ॥ लब्धचेतास्तु कौन्तेयः शोकविह्वलया गिरा । जित्वा शत्रून् जितः पश्चात् पर्यदेवयदार्तवत् ॥ ९ ॥ फिर होशमें आनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल वाणीद्वारा आर्तकी भाँति विलाप करने लगे—‘हाय! मैं शत्रुओंको पहले जीतकर पीछे पराजित हो गया ॥ ९ ॥ दुर्विदा गतिरर्थानामपि ये दिव्यचक्षुषः । जीयमाना जयन्त्यन्ये जयमाना वयं जिताः ॥ १० ॥ ‘जो लोग दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हैं, उनके लिये भी पदार्थोंकी गतिको समझना अत्यन्त दुष्कर है। हाय! दूसरे लोग तो हारकर जीतते हैं; किंतु हमलोग जीतकर हार गये हैं! ॥ १० ॥ हत्वा भ्रातॄन् वयस्यांश्च पितॄन् पुत्रान् सुहृद्गणान् । बन्धूनमात्यान् पौत्रांश्च जित्वा सर्वाञ्जिता वयम् ॥ ११ ॥ ‘हमने भाइयों, समवयस्क मित्रों, पितृतुल्य पुरुषों, पुत्रों, सुहृद्गणों, बन्धुओं, मन्त्रियों तथा पौत्रोंकी हत्या करके उन सबको जीतकर विजय प्राप्त की थी; परंतु अब शत्रुओंद्वारा हम ही पराजित हो गये ॥ ११ ॥ अनर्थो ह्यर्थसंकाशस्तथानर्थोऽर्थदर्शनः । जयोऽयमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजयः ॥ १२ ॥ ‘कभी-कभी अनर्थ भी अर्थ-सा हो जाता है और अर्थके रूपमें दिखायी देनेवाली वस्तु भी अनर्थके रूपमें परिणत हो जाती है, इसी प्रकार हमारी यह विजय भी पराजयका ही
रूप धारण करके आयी थी, इसलिये जय भी पराजय बन गयी ।। १२ ।।
यज्जित्वा तप्यते पश्चादापन्न इव दुर्मतिः ।
कथं मन्येत विजयं ततो जिततरः परैः ॥ १३ ॥
‘दुर्बुद्धि मनुष्य यदि विजय-लाभके पश्चात् विपत्तिमें पड़े हुए पुरुषकी भाँति अनुताप करता है तो वह अपनी उस जीतको जीत कैसे मान सकता है? क्योंकि उस दशामें तो वह शत्रुओंद्वारा पूर्णतः पराजित हो चुका है ।। १३ ।।
येषामर्थाय पापं स्याद् विजयस्य सुहृद्वधैः ।
निर्जितैरप्रमत्तैर्हि विजिता जितकाशिनः ॥ १४ ॥
‘जिन्हें विजयके लिये सुहृदोंके वधका पाप करना पड़ता है, वे एक बार विजयलक्ष्मीसे उल्लसित भले ही हो जायँ, अन्तमें पराजित होकर सतत सावधान रहनेवाले शत्रुओंके हाथसे उन्हें पराजित होना ही पड़ता है ।। १४ ।।
कर्णिनालीकदंष्ट्रस्य खड्गजिह्वस्य संयुगे ।
चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिनः ।। १५ ।।
क्रुद्धस्य नरसिंहस्य संग्रामेष्वपलायिनः ।
ये व्यमुच्यन्त कर्णस्य प्रमादात् त इमे हताः ॥ १६ ॥
‘क्रोधमें भरा हुआ कर्ण मनुष्योंमें सिंहके समान था। कर्णि और नालीक नामक बाण उसकी दाढ़ें तथा युद्धमें उठी हुई तलवार उसकी जिह्वा थी। धनुषका खींचना ही उसका मुँह फैलाना था। प्रत्यंचाकी टंकार ही उसके लिये दहाड़नेके समान थी। युद्धोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले उस भयंकर पुरुषसिंहके हाथसे जो जीवित छूट गये, वे ही ये मेरे सगे-सम्बन्धी अपनी असावधानीके कारण मार डाले गये हैं ।। १५-१६ ।।
रथह्रदं शरवर्षोर्मिमन्तं
रत्नाचितं वाहनवाजियुक्तम् ।
शक्त्यृष्टिमीनध्वजनागनक्रं
शरासनावर्तमहेषुफेनम् ॥ १७ ॥
संग्रामचन्द्रोदयवेगवेलं
द्रोणार्णवं ज्यातलनेमिघोषम् ।
ये तेरुरुच्चावचशस्त्रनौभि-
स्ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ॥ १८ ॥
‘द्रोणाचार्य महासागरके समान थे, रथ ही पानीका कुण्ड था, बाणोंकी वर्षा ही लहरोंके समान ऊपर उठती थी, रत्नमय आभूषण ही उस द्रोणरूपी समुद्रके रत्न थे, रथके घोड़े ही समुद्री घोड़ोंके समान जान पड़ते थे, शक्ति और ऋष्टि मत्स्यके समान तथा ध्वज नाग एवं मगरके तुल्य थे, धनुष ही भँवर तथा बड़े-बड़े बाण ही फेन थे, संग्राम ही चन्द्रोदय बनकर उस समुद्रके वेगको चरम सीमातक पहुँचा देता था, प्रत्यंचा और पहियोंकी ध्वनि ही उस
महासागरकी गर्जना थी; ऐसे द्रोणरूपी सागरको जो छोटे-बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये ॥ १७-१८ ॥
न हि प्रमादात् परमस्ति कश्चिद् वधो नराणामिह जीवलोके । प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् त्यजन्त्यनर्थाश्च समाविशन्ति ॥ १९ ॥
‘प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं ॥ १९ ॥
ध्वजोत्तमाग्रोच्छ्रितधूमकेतुं शरार्चिषं कोपमहासमीरम् । महाधनुर्ज्यातलनेमिघोषं तनुत्रनानाविधशस्त्रहोमम् ॥ २० ॥ महाचमूकक्षदवाभिपन्नं महाहवे भीष्ममयाग्निदाहम् । ये सेहुरात्तायुधतीक्ष्णवेगं ते राजपुत्रा निहताः प्रमादात् ॥ २१ ॥
‘महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव-सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण-वर्षा ही आगकी लपटें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट-चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र-शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये ॥ २०-२१ ॥
न हि प्रमत्तेन नरेण शक्यं विद्या तपः श्रीर्विपुलं यशो वा । पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रून् सर्वान् महेन्द्रं सुखमेधमानम् ॥ २२ ॥
‘प्रमादी मनुष्य कभी विद्या, तप, वैभव अथवा महान् यश नहीं प्राप्त कर सकता। देखो, देवराज इन्द्र प्रमाद छोड़ देनेके ही कारण अपने सारे शत्रुओंका संहार करके सुखपूर्वक उन्नति कर रहे हैं ॥ २२ ॥
इन्द्रोपमान् पार्थिवपुत्रपौत्रान्
पश्याविशेषेण हतान् प्रमादात् । तीर्त्वा समुद्रं वणिजः समृद्धा मग्नाः कुनद्यामिव हेलमानाः ॥ २३ ॥ ‘देखो, प्रमादके ही कारण ये इन्द्रके समान पराक्रमी, राजाओंके पुत्र और पौत्र सामान्य रूपसे मार डाले गये, जैसे समृद्धिशाली व्यापारी समुद्रको पार करके प्रमादवश अवहेलना करनेके कारण छोटी-सी नदीमें डूब गये हों ॥ २३ ॥
अमर्षितैर्ये निहताः शयाना निःसंशयं ते त्रिदिवं प्रपन्नाः । कृष्णां तु शोचामि कथं नु साध्वी शोकार्णवे साद्य विनङ्क्ष्यतीति ॥ २४ ॥ ‘शत्रुओंने अमर्षके वशीभूत होकर जिन्हें सोते समय ही मार डाला है वे तो निःसंदेह स्वर्गलोकमें पहुँच गये हैं। मुझे तो उस सती साध्वी कृष्णाके लिये चिन्ता हो रही है जो आज शोकके समुद्रमें डूबकर नष्ट हो जानेकी स्थितिमें पहुँच गयी है ॥ २४ ॥
भ्रातॄंश्च पुत्रांश्च हतान् निशम्य पाञ्चालराजं पितरं च वृद्धम् । ध्रुवं विसंज्ञा पतिता पृथिव्यां सा शोष्यते शोककृशाङ्गयष्टिः ॥ २५ ॥ ‘एक तो पहलेसे ही शोकके कारण क्षीण होकर उसकी देह सूखी लकड़ीके समान हो गयी है? दूसरे फिर जब वह अपने भाइयों, पुत्रों तथा बूढ़े पिता पांचालराज द्रुपदकी मृत्युका समाचार सुनेगी तब और भी सूख जायगी तथा अवश्य ही अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगी ॥ २५ ॥
तच्छोकजं दुःखमपारयन्ती कथं भविष्यत्युचिता सुखानाम् । पुत्रक्षयभ्रातृवधप्रणुन्ना प्रदह्यमानेन हुताशनेन ॥ २६ ॥ ‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह उस शोकजनित दुःखको न सह सकनेके कारण न जाने कैसी दशाको पहुँच जायगी? पुत्रों और भाइयोंके विनाशसे व्यथित हो उसके हृदयमें जो शोककी आग जल उठेगी, उससे उसकी बड़ी शोचनीय दशा हो जायगी’ ॥ २६ ॥
इत्येवमार्तः परिदेवयन् स राजा कुरूणां नकुलं बभाषे । गच्छानयैनामिह मन्दभाग्यां समातृपक्षामिति राजपुत्रीम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार आर्तस्वरसे विलाप करते हुए कुरुराज युधिष्ठिरने नकुलसे कहा—'भाई! जाओ, मन्दभागिनी राजकुमारी द्रौपदीको उसके मातृपक्षकी स्त्रियोंके साथ यहाँ लिया लाओ' ॥ २७ ॥
माद्रीसुतस्तत् परिगृह्य वाक्यं
धर्मेण धर्मप्रतिमस्य राज्ञः ।
ययौ रथेनालयमाशु देव्याः
पाञ्चालराजस्य च यत्र दाराः ॥ २८ ॥
माद्रीकुमार नकुलने धर्माचरणके द्वारा साक्षात् धर्मराजकी समानता करनेवाले राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके रथके द्वारा तुरंत ही महारानी द्रौपदीके उस भवनकी ओर प्रस्थान किया, जहाँ पांचालराजके घरकी भी महिलाएँ रहती थीं ॥ २८ ॥
प्रस्थाप्य माद्रीसुतमजमीढः
शोकार्तितस्तैः सहितः सुहृद्भिः ।
रूरूयमाणः प्रययौ सुताना-
मायोधनं भूतगणानुकीर्णम् ॥ २९ ॥
माद्रीकुमारको वहाँ भेजकर अजमीढ़कुलनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल हो उन सभी सुहृदोंके साथ बारंबार रोते हुए पुत्रोंके उस युद्धस्थलमें गये, जो भूतगणोंसे भरा हुआ था ॥ २९ ॥
स तत् प्रविश्याशिवमुग्ररूपं
ददर्श पुत्रान् सुहृदः सखींश्च ।
भूमौ शयानान् रुधिरार्द्रगात्रान्
विभिन्नदेहान् प्रहृतोत्तमाङ्गान् ॥ ३० ॥
उस भयंकर एवं अमंगलमय स्थानमें प्रवेश करके उन्होंने अपने पुत्रों, सुहृदों और सखाओंको देखा, जो खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे और मस्तक कट गये थे ॥ ३० ॥
स तांस्तु दृष्ट्वा भृशमार्तरूपो
युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
उच्चैः प्रचुक्रोश च कौरवाग्र्यः
पपात चोर्व्यां सगणो विसंज्ञः ॥ ३१ ॥
उन्हें देखकर कुरुकुलशिरोमणि तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हो गये और उच्चस्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे। धीरे-धीरे उनकी संज्ञा लुप्त हो गयी और वे अपने साथियोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरशिविरप्रवेशे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें युधिष्ठिरका शिविरमें प्रवेशविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 3061)
एकादशोऽध्यायः
युधिष्ठिरका शोकमें व्याकुल होना, द्रौपदीका विलाप तथा द्रोणकुमारके वधके लिये आग्रह, भीमसेनका अश्वत्थामाको मारनेके लिये प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
स दृष्ट्वा निहतान् संख्ये पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ।
महादुःखपरीतात्मा बभूव जनमेजय ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपने पुत्रों, पौत्रों और मित्रोंको युद्धमें मारा गया देख राजा युधिष्ठिरका हृदय महान् दुःखसे संतप्त हो उठा ॥ १ ॥
ततस्तस्य महान् शोकः प्रादुरासीन्महात्मनः ।
स्मरतः पुत्रपौत्राणां भ्रातॄणां स्वजनस्य ह ॥ २ ॥
उस समय पुत्रों, पौत्रों, भाइयों और स्वजनोंका स्मरण करके उन महात्माके मनमें महान् शोक प्रकट हुआ ॥ २ ॥
तमश्रुपरिपूर्णाक्षं वेपमानमचेतसम् ।
सुहृदो भृशसंविग्नाः सान्त्वयाञ्चक्रिरे तदा ॥ ३ ॥
उनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं, शरीर काँपने लगा और चेतना लुप्त होने लगी। उनकी ऐसी अवस्था देख उनके सुहृद् अत्यन्त व्याकुल हो उस समय उन्हें सान्त्वना देने लगे ॥ ३ ॥
ततस्तस्मिन् क्षणे कल्पो रथेनादित्यवर्चसा ।
नकुलः कृष्णया सार्धमुपायात् परमार्तया ॥ ४ ॥
इसी समय सामर्थ्यशाली नकुल सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा शोकसे अत्यन्त पीड़ित हुई कृष्णाको साथ लेकर वहाँ आ पहुँचे ॥ ४ ॥
उपप्लव्यं गता सा तु श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
तदा विनाशं सर्वेषां पुत्राणां व्यथिताभवत् ॥ ५ ॥
उस समय द्रौपदी उपप्लव्य नगरमें गयी हुई थी, वहाँ अपने सारे पुत्रोंके मारे जानेका अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर वह व्यथित हो उठी थी ॥ ५ ॥
कम्पमानेव कदली वातेनाभिसमीरिता ।
कृष्णा राजानमासाद्य शोकार्ता न्यपतद् भुवि ॥ ६ ॥
राजा युधिष्ठिरके पास पहुँचकर शोकसे व्याकुल हुई कृष्णा हवासे हिलायी गयी कदलीके समान कम्पित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६ ॥
बभूव वदनं तस्याः सहसा शोककर्षितम् । फुल्लपद्मपलाशाक्ष्यास्तमोग्रस्त इवांशुमान् ॥ ७ ॥ प्रफुल्ल कमलके समान विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली द्रौपदीका मुख सहसा शोकसे पीड़ित हो राहुके द्वारा ग्रस्त हुए सूर्यके समान तेजोहीन हो गया ॥ ७ ॥
ततस्तां पतितां दृष्ट्वा संरम्भी सत्यविक्रमः । बाहुभ्यां परिजग्राह समुत्पत्य वृकोदरः ॥ ८ ॥ सा समाश्वासिता तेन भीमसेनेन भामिनी । उसे गिरी हुई देख क्रोधमें भरे हुए सत्यपराक्रमी भीमसेनने उछलकर दोनों बाँहोंसे उसको उठा लिया और उस मानिनी पत्नीको धीरज बँधाया ॥ ८½ ॥
रुदती पाण्डवं कृष्णा सा हि भारतमब्रवीत् ॥ ९ ॥ दिष्ट्या राजन्नवाप्येमामखिलां भोक्ष्यसे महीम् । आत्मजान् क्षत्रधर्मेण सम्प्रदाय यमाय वै ॥ १० ॥ उस समय रोती हुई कृष्णाने भरतनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! सौभाग्यकी बात है कि आप क्षत्रिय-धर्मके अनुसार अपने पुत्रोंको यमराजकी भेंट चढ़ाकर यह सारी पृथ्वी पा गये और अब इसका उपभोग करेंगे ॥ ९-१० ॥
दिष्ट्या त्वं कुशली पार्थ मत्तमातङ्गगामिनीम् । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां सौभद्रं न स्मरिष्यसि ॥ ११ ॥ 'कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे ही आपने कुशलपूर्वक रहकर इस मत्त-मातंगगामिनी सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त कर लिया, अब तो आपको सुभद्राकुमार अभिमन्युकी भी याद नहीं आयेगी ॥ ११ ॥
आत्मजान् क्षत्रधर्मेण श्रुत्वा शूरान् निपातितान् । उपप्लव्ये मया सार्धं दिष्ट्या त्वं न स्मरिष्यसि ॥ १२ ॥ 'अपने वीर पुत्रोंको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार मारा गया सुनकर भी आप उपप्लव्यनगरमें मेरे साथ रहते हुए उन्हें सर्वथा भूल जायँगे; यह भी भाग्यकी ही बात है ॥
प्रसुप्तानां वधं श्रुत्वा द्रौणिना पापकर्मणा । शोकस्तपति मां पार्थ हुताशन इवाश्रयम् ॥ १३ ॥ 'पार्थ! पापाचारी द्रोणपुत्रके द्वारा मेरे सोये हुए पुत्रोंका वध किया गया, यह सुनकर शोक मुझे उसी प्रकार संतप्त कर रहा है, जैसे आग अपने आधारभूत काष्ठको ही जला डालती है ॥ १३ ॥
तस्य पापकृतो द्रौणेर्न चेदद्य त्वया रणे । ह्रियते सानुबन्धस्य युधि विक्रम्य जीवितम् ॥ १४ ॥ इहैव प्रायमासिष्ये तन्निबोधत पाण्डवाः । न चेत् फलमवाप्नोति द्रौणिः पापस्य कर्मणः ॥ १५ ॥
‘यदि आज आप रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करके सगे-सम्बन्धियोंसहित पापाचारी द्रोणकुमारके प्राण नहीं हर लेते हैं तो मैं यहीं अनशन करके अपने जीवनका अन्त कर दूँगी। पाण्डवो! आप सब लोग इस बातको कान खोलकर सुन लें। यदि अश्वत्थामा अपने पापकर्मका फल नहीं पा लेता है तो मैं अवश्य प्राण त्याग दूँगी’।।
एवमुक्त्वा ततः कृष्णा पाण्डवं प्रत्युपाविशत् ।
युधिष्ठिरं याज्ञसेनी धर्मराजं यशस्विनी ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर यशस्विनी द्रुपदकुमारी कृष्णा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके सामने ही अनशनके लिये बैठ गयी ॥ १६ ॥
दृष्ट्वोपविष्टां राजर्षिः पाण्डवो महिषीं प्रियाम् ।
प्रत्युवाच स धर्मात्मा द्रौपदीं चारुदर्शनाम् ॥ १७ ॥
अपनी प्रिय महारानी परम सुन्दरी द्रौपदीको उपवासके लिये बैठी देख धर्मात्मा राजर्षि युधिष्ठिरने उससे कहा— ॥ १७ ॥
धर्म्यं धर्मेण धर्मज्ञे प्राप्तास्ते निधनं शुभे ।
पुत्रास्ते भ्रातरश्चैव तान्न शोचितुमर्हसि ॥ १८ ॥
‘शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली हो। तुम्हारे पुत्रों और भाइयोंने धर्मपूर्वक युद्ध करके धर्मानुकूल मृत्यु प्राप्त की है; अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥
स कल्याणि वनं दुर्गं दूरं द्रौणिरितो गतः ।
तस्य त्वं पातनं संख्ये कथं ज्ञास्यसि शोभने ॥ १९ ॥
‘कल्याणि! द्रोणकुमार तो यहाँसे भागकर दुर्गम वनमें चला गया है। शोभने! यदि उसे युद्धमें मार गिराया जाय तो भी तुम्हें इसका विश्वास कैसे होगा?’ ॥
द्रौपद्युवाच
द्रोणपुत्रस्य सहजो मणिः शिरसि मे श्रुतः ।
निहत्य संख्ये तं पापं पश्येयं मणिमाहृतम् ॥ २० ॥
राजन् शिरसि ते कृत्वा जीवेयमिति मे मतिः ।
द्रौपदी बोली— महाराज! मैंने सुना है कि द्रोणपुत्रके मस्तकमें एक मणि है जो उसके जन्मके साथ ही पैदा हुई है। उस पापीको युद्धमें मारकर यदि वह मणि ला दी जायगी तो मैं उसे देख लूँगी। राजन्! उस मणिको आपके सिरपर धारण कराकर ही मैं जीवन धारण कर सकूँगी; ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है ॥ २० १/२ ॥
इत्युक्त्वा पाण्डवं कृष्णा राजानं चारुदर्शना ॥ २१ ॥
भीमसेनमथागत्य परमं वाक्यमब्रवीत् ।
त्रातुमर्हसि मां भीम क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ २२ ॥
पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर सुन्दरी कृष्णा भीमसेनके पास आयी और यह उत्तम वचन बोली—'प्रिय भीम! आप क्षत्रिय-धर्मका स्मरण करके मेरे जीवनकी रक्षा कर सकते हैं ।। २१-२२ ।। जहि तं पापकर्माणं शम्बरं मघवानिव । न हि ते विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन ॥ २३ ॥ 'वीर! जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मारा था, उसी प्रकार आप भी उस पापकर्मी अश्वत्थामाका वध करें। इस संसारमें कोई भी पुरुष पराक्रममें आपकी समानता करनेवाला नहीं है ।। २३ ।। श्रुतं तत् सर्वलोकेषु परमव्यसने यथा । द्वीपोऽभूस्त्वं हि पार्थानां नगरे वारणावते ॥ २४ ॥ 'यह बात सम्पूर्ण जगत्में प्रसिद्ध है कि वारणावतनगरमें जब कुन्तीके पुत्रोंपर भारी संकट पड़ा था, तब आप ही द्वीपके समान उनके रक्षक हुए थे ।। हिडिम्बदर्शने चैव तथा त्वमभवो गतिः । तथा विराटनगरे कीचकेन भृशार्दिताम् ॥ २५ ॥ मामप्युद्धृतवान् कृच्छ्रात् पौलोमीं मघवानिव । 'इसी प्रकार हिडिम्बासुरसे भेंट होनेपर भी आप ही उनके आश्रयदाता हुए। विराटनगरमें जब कीचकने मुझे बहुत तंग कर दिया, तब उस महान् संकटसे आपने मेरा भी उसी तरह उद्धार किया, जैसे इन्द्रने शचीका किया था ।। २५१/२ ।। यथैतान्यकृथाः पार्थ महाकर्माणि वै पुरा ॥ २६ ॥ तथा द्रौणिममित्रघ्न विनिहत्य सुखी भव । 'शत्रुसूदन पार्थ! जैसे पूर्वकालमें ये महान् कर्म आपने किये थे, उसी प्रकार इस द्रोणपुत्रको भी मारकर सुखी हो जाइये' ।। २६१/२ ।। तस्या बहुविधं दुःखान्निशम्य परिदेवितम् ॥ २७ ॥ नामर्षयत कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । दुःखके कारण द्रौपदीका यह भाँति-भाँतिका विलाप सुनकर महाबली कुन्तीकुमार भीमसेन इसे सहन न कर सके ।। स काञ्चनविचित्राङ्गमारुरोह महारथम् ॥ २८ ॥ आदाय रुचिरं चित्रं समार्गणगुणं धनुः । नकुलं सारथिं कृत्वा द्रोणपुत्रवधे धृतः ॥ २९ ॥ विस्फार्य सशरं चापं तूर्णमश्वानचोदयत् । वे द्रोणपुत्रके वधका निश्चय करके सुवर्णभूषित विचित्र अंगोंवाले रथपर आरूढ़ हुए। उन्होंने बाण और प्रत्यंचासहित एक सुन्दर एवं विचित्र धनुष हाथमें लेकर नकुलको सारथि बनाया तथा बाणसहित धनुषको फैलाकर तुरंत ही घोड़ोंको हँकवाया ।। २८-२९१/२ ।।