भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 3062

बभूव वदनं तस्याः सहसा शोककर्षितम् । फुल्लपद्मपलाशाक्ष्यास्तमोग्रस्त इवांशुमान् ॥ ७ ॥ प्रफुल्ल कमलके समान विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली द्रौपदीका मुख सहसा शोकसे पीड़ित हो राहुके द्वारा ग्रस्त हुए सूर्यके समान तेजोहीन हो गया ॥ ७ ॥

ततस्तां पतितां दृष्ट्वा संरम्भी सत्यविक्रमः । बाहुभ्यां परिजग्राह समुत्पत्य वृकोदरः ॥ ८ ॥ सा समाश्वासिता तेन भीमसेनेन भामिनी । उसे गिरी हुई देख क्रोधमें भरे हुए सत्यपराक्रमी भीमसेनने उछलकर दोनों बाँहोंसे उसको उठा लिया और उस मानिनी पत्नीको धीरज बँधाया ॥ ८½ ॥

रुदती पाण्डवं कृष्णा सा हि भारतमब्रवीत् ॥ ९ ॥ दिष्ट्या राजन्नवाप्येमामखिलां भोक्ष्यसे महीम् । आत्मजान् क्षत्रधर्मेण सम्प्रदाय यमाय वै ॥ १० ॥ उस समय रोती हुई कृष्णाने भरतनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! सौभाग्यकी बात है कि आप क्षत्रिय-धर्मके अनुसार अपने पुत्रोंको यमराजकी भेंट चढ़ाकर यह सारी पृथ्वी पा गये और अब इसका उपभोग करेंगे ॥ ९-१० ॥

दिष्ट्या त्वं कुशली पार्थ मत्तमातङ्गगामिनीम् । अवाप्य पृथिवीं कृत्स्नां सौभद्रं न स्मरिष्यसि ॥ ११ ॥ 'कुन्तीनन्दन! सौभाग्यसे ही आपने कुशलपूर्वक रहकर इस मत्त-मातंगगामिनी सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य प्राप्त कर लिया, अब तो आपको सुभद्राकुमार अभिमन्युकी भी याद नहीं आयेगी ॥ ११ ॥

आत्मजान् क्षत्रधर्मेण श्रुत्वा शूरान् निपातितान् । उपप्लव्ये मया सार्धं दिष्ट्या त्वं न स्मरिष्यसि ॥ १२ ॥ 'अपने वीर पुत्रोंको क्षत्रिय-धर्मके अनुसार मारा गया सुनकर भी आप उपप्लव्यनगरमें मेरे साथ रहते हुए उन्हें सर्वथा भूल जायँगे; यह भी भाग्यकी ही बात है ॥

प्रसुप्तानां वधं श्रुत्वा द्रौणिना पापकर्मणा । शोकस्तपति मां पार्थ हुताशन इवाश्रयम् ॥ १३ ॥ 'पार्थ! पापाचारी द्रोणपुत्रके द्वारा मेरे सोये हुए पुत्रोंका वध किया गया, यह सुनकर शोक मुझे उसी प्रकार संतप्त कर रहा है, जैसे आग अपने आधारभूत काष्ठको ही जला डालती है ॥ १३ ॥

तस्य पापकृतो द्रौणेर्न चेदद्य त्वया रणे । ह्रियते सानुबन्धस्य युधि विक्रम्य जीवितम् ॥ १४ ॥ इहैव प्रायमासिष्ये तन्निबोधत पाण्डवाः । न चेत् फलमवाप्नोति द्रौणिः पापस्य कर्मणः ॥ १५ ॥