महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3049, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहतपुत्रौ तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते ॥ २९ ॥ ‘पुरुषश्रेष्ठ राजा दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिये शोक नहीं करता। मुझे तो माता गान्धारी और आपके पिता धृतराष्ट्रके लिये शोक हो रहा है, जिनके सभी पुत्र मार डाले गये हैं ॥ २९ ॥
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् । धिगस्तु कृष्णं वार्ष्णेयमर्जुनं चापि दुर्मतिम् ॥ ३० ॥ धर्मज्ञमानिनौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम् । ‘अब वे बेचारे शोकमग्न हो भिखारी बनकर इस भूतलपर भीख माँगते फिरेंगे। उस वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण और खोटी बुद्धिवाले अर्जुनको भी धिक्कार है, जिन्होंने अपनेको धर्मज्ञ मानते हुए भी आपके अन्यायपूर्वक वधकी उपेक्षा की ॥ ३० १/२ ॥
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे किं वक्ष्यन्ति नराधिप ॥ ३१ ॥ कथं दुर्योधनोऽस्माभिर्हत इत्यनपत्रपाः । ‘नरेश्वर! क्या वे समस्त पाण्डव भी निर्लज्ज होकर लोगोंके सामने कह सकेंगे कि ‘हमने दुर्योधनको किस प्रकार मारा था?’ ॥ ३१ १/२ ॥
धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमायोधने हतः ॥ ३२ ॥ प्रायशोऽभिमुखः शत्रून् धर्मेण पुरुषर्षभ । ‘पुरुषप्रवर गान्धारीनन्दन! आप धन्य हैं, क्योंकि युद्धमें प्रायः धर्मपूर्वक शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये हैं ॥ ३२ १/२ ॥
हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिबान्धवा ॥ ३३ ॥ प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः कां गतिं प्रतिपत्स्यते । ‘जिनके सभी पुत्र, कुटुम्बी और भाई-बन्धु मारे जा चुके हैं, वे माता गान्धारी तथा प्रज्ञाचक्षु दुर्जय राजा धृतराष्ट्र अब किस दशाको प्राप्त होंगे? ॥ ३३ १/२ ॥
धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम् ॥ ३४ ॥ ये वयं न गताः स्वर्गं त्वां पुरस्कृत्य पार्थिवम् । ‘मुझको, कृतवर्माको तथा महारथी कृपाचार्यको भी धिक्कार है कि हम आप-जैसे महाराजको आगे करके स्वर्गलोकमें नहीं गये ॥ ३४ १/२ ॥
दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम् ॥ ३५ ॥ यद् वयं नानुगच्छाम त्वां धिगस्मान् नराधमान् । ‘आप हमें सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थ देते रहे और प्रजाके हितकी रक्षा करते रहे। फिर भी हमलोग जो आपका अनुसरण नहीं कर रहे हैं, इसके लिये हम-जैसे नराधमोंको धिक्कार है! ॥ ३५ १/२ ॥
कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्च मे ॥ ३६ ॥ सभृत्यानां नरव्याघ्र रत्नवन्ति गृहाणि च ।