महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3048, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपश्यामो निहतं त्वां च भीमसेनेन संयुगे ॥ २१ ॥ ‘महाराज! निश्चय ही इस संसारमें समय महाबलवान् है, तभी तो युद्धस्थलमें हम आपको भीमसेनके द्वारा मारा गया देखते हैं ॥ २१ ॥ कथं त्वां सर्वधर्मज्ञं क्षुद्रः पापो वृकोदरः । निकृत्या हतवान् मन्दो नूनं कालो दुरत्ययः ॥ २२ ॥ ‘आप तो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता थे। आपको उस मूर्ख, नीच और पापी भीमसेनने किस तरह धोखेसे मार डाला? अवश्य ही कालका उल्लङ्घन करना सर्वथा कठिन है ॥ २२ ॥ धर्मयुद्धे ह्यधर्मेण समाहूयौजसा मृधे । गदया भीमसेनेन निर्भग्ने सक्थिनी तव ॥ २३ ॥ ‘भीमसेनने आपको धर्मयुद्धके लिये बुलाकर रणभूमिमें अधर्मके बलसे गदाद्वारा आपकी दोनों जाँघें तोड़ डालीं ॥ २३ ॥ अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिरः । य उपेक्षितवान् क्षुद्रं धिक् कृष्णं धिग् युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ ‘एक तो आप रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारे गये। दूसरे भीमसेनने आपके मस्तकपर लात मारी। इतनेपर भी जिन्होंने उस नीचकी उपेक्षा की, उसे कोई दण्ड नहीं दिया, उन श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरको धिक्कार है! ।। युद्धेष्वपवदिष्यन्ति योधा नूनं वृकोदरम् । यावत् स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यसि पातितः ॥ २५ ॥ ‘आप धोखेसे गिराये गये हैं, अतः इस संसारमें जबतक प्राणियोंकी स्थिति रहेगी, तबतक सभी युद्धोंमें सम्पूर्ण योद्धा भीमसेनकी निन्दा ही करेंगे ॥ २५ ॥ ननु रामोऽब्रवीद् राजंस्त्वां सदा यदुनन्दनः । दुर्योधनसमो नास्ति गदया इति वीर्यवान् ॥ २६ ॥ ‘राजन्! पराक्रमी यदुनन्दन बलरामजी आपके विषयमें सदा कहा करते थे कि ‘गदायुद्धकी शिक्षामें दुर्योधनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है’ ॥ श्लाघते त्वां हि वार्ष्णेयो राजसंसत्सु भारत । स शिष्यो मम कौरव्यो गदायुद्ध इति प्रभो ॥ २७ ॥ ‘प्रभो! भरतनन्दन! वे वृष्णिकुलभूषण बलराम राजाओंकी सभामें सदा आपकी प्रशंसा करते हुए कहते थे कि ‘कुरुराज दुर्योधन गदायुद्धमें मेरा शिष्य है’ ॥ यां गतिं क्षत्रियस्याहुः प्रशस्तां परमर्षयः । हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम् ॥ २८ ॥ ‘महर्षियोंने युद्धमें शत्रुा सामना करते हुए मारे जानेवाले क्षत्रियके लिये जो उत्तम गति बतायी है, आपने वही गति प्राप्त की है ॥ २८ ॥ दुर्योधन न शोचामि त्वामहं पुरुषर्षभ ।