महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3047, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेखो, यह सुवर्णभूषित गदा इन वीर भूपालके साथ रणशय्यापर उसी प्रकार सो रही है, जैसे महलमें प्रेम रखनेवाली पत्नी इनके साथ सोया करती थी ॥ १३ ॥
योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे यातः परंतपः । स हतो ग्रसते पांसून् पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १४ ॥ जो ये शत्रुसंतापी नरेश सभी मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चला करते थे, वे ही आज मारे जाकर धरतीपर पड़े-पड़े धूल फाँक रहे हैं। यह समयका उलट-फेर तो देखो ॥ १४ ॥
येनाजौ निहता भूमावशेरत पुरा द्विषः । स भूमौ निहतः शेते कुरुराजः परैरयम् ॥ १५ ॥ पूर्वकालमें जिनके द्वारा युद्धमें मारे गये शत्रु भूमिपर सोया करते थे, वे ही ये कुरुराज आज शत्रुओंद्वारा स्वयं मारे जाकर भूमिपर शयन करते हैं ॥ १५ ॥
भयान्नमन्ति राजानो यस्य स्म शतसंघशः । स वीरशयने शेते क्रव्याद्भिः परिवारितः ॥ १६ ॥ जिनके आगे सैकड़ों राजा भयसे सिर झुकाते थे, वे ही आज हिंसक जन्तुओंसे घिरे हुए वीर-शय्यापर सो रहे हैं ॥ १६ ॥
उपासत द्विजाः पूर्वमर्थहेतोर्यमीश्वरम् । उपासते च तं ह्यद्य क्रव्यादा मांसहेतवः ॥ १७ ॥ पहले बहुत-से ब्राह्मण धनकी प्राप्तिके लिये जिन नरेशके पास बैठे रहते थे, उन्हींके समीप आज मांसके लिये मांसाहारी जन्तु बैठे हुए हैं ॥ १७ ॥
संजय उवाच
तं शयानं कुरुश्रेष्ठं ततो भरतसत्तम । अश्वत्थामा समालोक्य करुणं पर्यदेवयत् ॥ १८ ॥ **संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुरुकुल-भूषण दुर्योधनको रणशय्यापर पड़ा देख अश्वत्थामा इस प्रकार करुण विलाप करने लगा— ॥ १८ ॥
आहुस्त्वां राजशार्दूल मुख्यं सर्वधनुष्मताम् । धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं संकर्षणस्य च ॥ १९ ॥ कथं विवरमद्राक्षीद् भीमसेनस्तवानघ । बलिनं कृतिनं नित्यं स च पापात्मवान् नृप ॥ २० ॥ ‘निष्पाप राजसिंह! आपको समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ कहा जाता था। आप गदायुद्धमें धनाध्यक्ष कुबेरकी समानता करनेवाले तथा साक्षात् संकर्षणके शिष्य थे तो भी भीमसेनने कैसे आपपर प्रहार करनेका अवसर पा लिया? नरेश्वर! आप तो सदासे ही बलवान् और गदायुद्धके विद्वान् रहे हैं। फिर उस पापात्माने कैसे आपको मार दिया? ॥ १९-२० ॥
कालो नूनं महाराज लोकेऽस्मिन् बलवत्तरः ।