महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3050, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘नरश्रेष्ठ! आपके ही बल-पराक्रमसे सेवकोंसहित कृपाचार्यको, मुझको तथा मेरे पिताजीको रत्नोंसे भरे हुए भव्य भवन प्राप्त हुए थे ।। ३६ १/२ ।। तव प्रसादादस्माभिः समित्रैः सह बान्धवैः ।। ३७ ।। अवाप्ताः क्रतवो मुख्या बहवो भूरिदक्षिणाः । ‘आपके ही प्रसादसे मित्रों और बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंने प्रचुर दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक मुख्य-मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ।। ३७ १/२ ।। कुतश्चापीदृशं पापाः प्रवर्तिष्यामहे वयम् ।। ३८ ।। यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गतः सर्वपार्थिवान् । ‘महाराज! आप जिस भावसे समस्त राजाओंको आगे करके स्वर्ग सिधार रहे हैं, हम पापी ऐसा भाव कहाँसे ला सकेंगे? ।। ३८ १/२ ।। वयमेव त्रयो राजन् गच्छन्तं परमां गतिम् ।। ३९ ।। यद् वै त्वां नानुगच्छामस्तेन धक्ष्यामहे वयम् । तत् स्वर्गहीना हीनार्थाः स्मरन्तः सुकृतस्य ते ।। ४० ।। ‘राजन्! परम गतिको जाते समय आपके पीछे-पीछे जो हम तीनों भी नहीं चल रहे हैं, इसके कारण हम स्वर्ग और अर्थ दोनोंसे वंचित हो आपके सुकृतोंका स्मरण करते हुए दिन-रात शोकाग्निमें जलते रहेंगे ।। ३९-४० ।। किं नाम तद् भवेत् कर्म येन त्वां न व्रजाम वै । दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्याम महीमिमाम् ।। ४१ ।। ‘कुरुश्रेष्ठ! न जाने वह कौन-सा कर्म है, जिससे विवश होकर हम आपके साथ नहीं चल रहे हैं। निश्चय ही इस पृथ्वीपर हमें निरन्तर दुःख भोगना पड़ेगा ।। हीनानां नस्त्वया राजन् कुतः शान्तिः कुतः सुखम् । गत्वैव तु महाराज समेत्य च महारथान् ।। ४२ ।। यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयेर्वचनान्मम । ‘महाराज! आपसे बिछुड़ जानेपर हमें शान्ति और सुख कैसे मिल सकते हैं? राजन्! स्वर्गमें जाकर सब महारथियोंसे मिलनेपर आप मेरी ओरसे बड़े-छोटेके क्रमसे उन सबका आदर-सत्कार करें ।। ४२ १/२ ।। आचार्यं पूजयित्वा च केतुं सर्वधनुष्मताम् ।। ४३ ।। हतं मयाद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप । ‘नरेश्वर! फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके ध्वजस्वरूप आचार्यका पूजन करके उनसे कह दें कि ‘आज अश्वत्थामाके द्वारा धृष्टद्युम्न मार डाला गया’ ।। ४३ १/२ ।। परिष्वजेथा राजानं बाह्लिकं सुमहारथम् ।। ४४ ।। सैन्धवं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ।