महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3052, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भूपाल! मैंने स्वयं रातके समय शिविरमें घुसकर पापाचारी धृष्टद्युम्नको पशुओंकी तरह गला घोंट-घोंटकर मार डाला है’ ॥ ५२ ॥
दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनसः प्रियाम् ।
प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
यह मनको प्रिय लगनेवाली बात सुनकर दुर्योधनको पुनः होश आ गया और वह इस प्रकार बोला— ॥ ५३ ॥
न मेऽकरोत् तद् गाङ्गेयो न कर्णो न च ते पिता ।
यत् त्वया कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम् ॥ ५४ ॥
‘मित्रवर! आज आचार्य कृप और कृतवर्माके साथ तुमने जो कार्य कर दिखाया है, उसे न गंगानन्दन भीष्म, न कर्ण और न तुम्हारे पिताजी ही कर सके थे ॥
स च सेनापतिः क्षुद्रो हतः सार्धं शिखण्डिना ।
तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै ॥ ५५ ॥
‘शिखण्डीसहित वह नीच सेनापति धृष्टद्युम्न मार डाला गया, इससे आज निश्चय ही मैं अपनेको इन्द्रके समान समझता हूँ’ ॥ ५५ ॥
स्वस्ति प्राप्नुत भद्रं वः स्वर्गे नः संगमः पुनः ।
इत्येवमुक्त्वा तूष्णीं स कुरुराजो महामनाः ॥ ५६ ॥
प्राणानुपामृजद् वीरः सुहृदां दुःखमुत्सृजन् ।
अपाक्रामद् दिवं पुण्यां शरीरं क्षितिमाविशत् ॥ ५७ ॥
‘तुम सब लोगोंका कल्याण हो। तुम्हें सुख प्राप्त हो। अब स्वर्गमें ही हमलोगोंका पुनर्मिलन होगा।’ ऐसा कहकर महामनस्वी वीर कुरुराज दुर्योधन चुप हो गया और अपने सुहृदोंके लिये दुःख छोड़कर उसने अपने प्राण त्याग दिये। वह स्वयं तो पुण्यधाम स्वर्गलोकमें चला गया; किंतु उसका पार्थिव शरीर इस पृथ्वीपर ही पड़ा रह गया ॥ ५६-५७ ॥
एवं ते निधनं यातः पुत्रो दुर्योधनो नृप ।
अग्रे यात्वा रणे शूरः पश्चाद् विनिहतः परैः ॥ ५८ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन मृत्युको प्राप्त हुआ। वह समरांगणमें सबसे पहले गया था और सबसे पीछे शत्रुओंद्वारा मारा गया ॥ ५८ ॥
तथैव ते परिष्वक्ताः परिष्वज्य च ते नृपम् ।
पुनः पुनः प्रेक्षमाणाः स्वकानारुरुहु रथान् ॥ ५९ ॥
मरनेसे पहले दुर्योधनने तीनों वीरोंको गले लगाया और उन तीनोंने भी राजाको हृदयसे लगाकर विदा दी, फिर वे बारंबार उसकी ओर देखते हुए अपने-अपने रथोंपर सवार हो गये ॥ ५९ ॥
इत्येवं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम् ।