भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3064

पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर सुन्दरी कृष्णा भीमसेनके पास आयी और यह उत्तम वचन बोली—'प्रिय भीम! आप क्षत्रिय-धर्मका स्मरण करके मेरे जीवनकी रक्षा कर सकते हैं ।। २१-२२ ।। जहि तं पापकर्माणं शम्बरं मघवानिव । न हि ते विक्रमे तुल्यः पुमानस्तीह कश्चन ॥ २३ ॥ 'वीर! जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मारा था, उसी प्रकार आप भी उस पापकर्मी अश्वत्थामाका वध करें। इस संसारमें कोई भी पुरुष पराक्रममें आपकी समानता करनेवाला नहीं है ।। २३ ।। श्रुतं तत् सर्वलोकेषु परमव्यसने यथा । द्वीपोऽभूस्त्वं हि पार्थानां नगरे वारणावते ॥ २४ ॥ 'यह बात सम्पूर्ण जगत्में प्रसिद्ध है कि वारणावतनगरमें जब कुन्तीके पुत्रोंपर भारी संकट पड़ा था, तब आप ही द्वीपके समान उनके रक्षक हुए थे ।। हिडिम्बदर्शने चैव तथा त्वमभवो गतिः । तथा विराटनगरे कीचकेन भृशार्दिताम् ॥ २५ ॥ मामप्युद्धृतवान् कृच्छ्रात् पौलोमीं मघवानिव । 'इसी प्रकार हिडिम्बासुरसे भेंट होनेपर भी आप ही उनके आश्रयदाता हुए। विराटनगरमें जब कीचकने मुझे बहुत तंग कर दिया, तब उस महान् संकटसे आपने मेरा भी उसी तरह उद्धार किया, जैसे इन्द्रने शचीका किया था ।। २५१/२ ।। यथैतान्यकृथाः पार्थ महाकर्माणि वै पुरा ॥ २६ ॥ तथा द्रौणिममित्रघ्न विनिहत्य सुखी भव । 'शत्रुसूदन पार्थ! जैसे पूर्वकालमें ये महान् कर्म आपने किये थे, उसी प्रकार इस द्रोणपुत्रको भी मारकर सुखी हो जाइये' ।। २६१/२ ।। तस्या बहुविधं दुःखान्निशम्य परिदेवितम् ॥ २७ ॥ नामर्षयत कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । दुःखके कारण द्रौपदीका यह भाँति-भाँतिका विलाप सुनकर महाबली कुन्तीकुमार भीमसेन इसे सहन न कर सके ।। स काञ्चनविचित्राङ्गमारुरोह महारथम् ॥ २८ ॥ आदाय रुचिरं चित्रं समार्गणगुणं धनुः । नकुलं सारथिं कृत्वा द्रोणपुत्रवधे धृतः ॥ २९ ॥ विस्फार्य सशरं चापं तूर्णमश्वानचोदयत् । वे द्रोणपुत्रके वधका निश्चय करके सुवर्णभूषित विचित्र अंगोंवाले रथपर आरूढ़ हुए। उन्होंने बाण और प्रत्यंचासहित एक सुन्दर एवं विचित्र धनुष हाथमें लेकर नकुलको सारथि बनाया तथा बाणसहित धनुषको फैलाकर तुरंत ही घोड़ोंको हँकवाया ।। २८-२९१/२ ।।