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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1745)

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पञ्चविंशोऽध्यायः

युयुत्सु और उलूकका युद्ध, युयुत्सुका पलायन, शतानीक और धृतराष्ट्रपुत्र श्रुतकर्माका तथा सुतसोम और शकुनिका घोर युद्ध एवं शकुनिद्वारा पाण्डव-सेनाका विनाश

संजय उवाच

युयुत्सुं तव पुत्रस्य द्रावयन्तं बलं महत् ।
उलूको न्यपतत्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! दूसरी ओर युयुत्सु आपके पुत्रकी विशाल सेनाको खदेड़ रहा था। यह देख उलूक तुरंत वहाँ आ धमका और युयुत्सुसे बोला—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १ ॥

युयुत्सुश्च ततो राजन् शितधारेण पत्रिणा ।
उलूकं ताडयामास वज्रेणेन्द्र इवाचलम् ॥ २ ॥
राजन्! तब युयुत्सुने तीखी धारवाले बाणसे महाबली उलूकको उसी प्रकार पीट दिया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ २ ॥

उलूकस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे ।
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडयामास कर्णिना ॥ ३ ॥
इससे उलूकको बड़ा क्रोध हुआ। उसने युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा आपके पुत्रका धनुष काटकर उसपर कर्णी नामक बाणका प्रहार किया ॥ ३ ॥

तदपास्य धनुश्छिन्नं युयुत्सुर्वेगवत्तरम् ।
अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ॥ ४ ॥
युयुत्सुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर क्रोधसे आँखें लाल करके दूसरा अत्यन्त वेगशाली एवं विशाल धनुष हाथमें लिया ॥ ४ ॥

शाकुनिं तु ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ ।
सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्तं च भूयो व्यविध्यत ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उसने शकुनिपुत्र उलूकको साठ बाणोंसे बेध दिया और तीन बाणोंसे उसके सारथिको पीड़ित किया। तत्पश्चात् उसे और भी घायल कर दिया ॥ ५ ॥

उलूकस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा स्वर्णविभूषितैः ।
अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ६ ॥

तब उलूकने संग्रामभूमिमें कुपित हो स्वर्णभूषित बीस बाणोंसे युयुत्सुको घायल करके उनके सुवर्णमय ध्वजको भी काट डाला ॥ ६ ॥ सच्छिन्नयष्टिः सुमहान् शीर्यमाणो महाध्वजः । पपात प्रमुखे राजन् युयुत्सोः काञ्चनध्वजः ॥ ७ ॥ राजन्! ध्वजका दण्ड कट जानेपर युयुत्सुका वह विशाल कांचनध्वज छिन्न-भिन्न हो उसके सामने ही गिर पड़ा ॥ ७ ॥ ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा युयुत्सुः क्रोधमूर्च्छितः । उलूकं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥ ८ ॥ अपने ध्वजका यह विध्वंस देखकर युयुत्सु क्रोधसे मूर्च्छित-सा हो गया और उसने पाँच बाणोंसे उलूककी छाती छेद डाली ॥ ८ ॥ उलूकस्तस्य समरे तैलधौतेन मारिष । शिरश्छिच्छेद भल्लेन यन्तुर्भरतसत्तम ॥ ९ ॥ माननीय भरतभूषण! उलूकने तेलसे साफ किये हुए भल्लके द्वारा युयुत्सुके सारथिका मस्तक काट डाला ॥ तच्छिन्नमपतद् भूमौ युयुत्सोः सारथेस्तदा । तारारूपं यथा चित्रं निपपात महीतले ॥ १० ॥ उस समय युयुत्सुके सारथिका वह कटा हुआ मस्तक पृथ्वीपर उसी भाँति गिरा, मानो आकाशसे भूत़लपर कोई विचित्र तारा टूट पड़ा हो ॥ १० ॥ जघान चतुरोऽश्वांश्च तं च विव्याध पञ्चभिः । सोऽतिविद्धो बलवता प्रत्यपायाद् रथान्तरम् ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् उलूकने युयुत्सुके चारों घोड़ोंको भी मार डाला और पाँच बाणोंसे उसे भी घायल कर दिया। उस बलवान् वीरके द्वारा अत्यन्त घायल हो युयुत्सु दूसरे रथपर आरूढ़ हो वहाँसे भाग गया ॥ ११ ॥ तं निर्जित्य रणे राजन्नुलूकस्त्वरितो ययौ । पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव विनिघ्नन् निशितैः शरैः ॥ १२ ॥ राजन्! रणभूमिमें युयुत्सुको पराजित करके उलूक तुरंत ही पांचालों और सृंजयोंकी ओर चला गया और उन्हें तीखे बाणोंसे मारने लगा ॥ १२ ॥ शतानीकं महाराज श्रुतकर्मा सुतस्तव । व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धादसम्भ्रमः ॥ १३ ॥ महाराज! दूसरी ओर आपके पुत्र श्रुतकर्माने बिना किसी घबराहटके आधे निमेषमें ही शतानीकके रथको घोड़ों और सारथिसे शून्य कर दिया ॥ १३ ॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शतानीको महारथः । गदां चिक्षेप संक्रुद्धस्तव पुत्रस्य मारिष ॥ १४ ॥

मान्यवर! महारथी शतानीकने कुपित होकर अपने अश्वहीन रथपर खड़े रहकर ही

आपके पुत्रके ऊपर गदाका प्रहार किया ॥ १४ ॥

सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हयांश्चैव ससारथीन् ।

पपात धरणीं तूर्णं दारयन्तीव भारत ॥ १५ ॥

भारत! वह गदा तुरंत ही श्रुतकर्मके रथ, घोड़ों और सारथिको भस्म करके पृथ्वीको

विदीर्ण करती हुई-सी गिर पड़ी ॥ १५ ॥

तावुभौ विरथौ वीरौ कुरूणां कीर्तिवर्धनौ ।

व्यपाक्रमेतां युद्धात्तु प्रेक्षमाणौ परस्परम् ॥ १६ ॥

कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वे दोनों वीर रथहीन हो एक-दूसरेको देखते हुए

युद्धस्थलसे हट गये ॥ १६ ॥

पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विवित्सो रथमारुहत् ।

शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ॥ १७ ॥

आपका पुत्र श्रुतकर्मा घबरा गया था। वह विवित्सुके रथपर जा चढ़ा और शतानीक

भी तुरंत ही प्रतिविन्ध्यके रथपर चला गया ॥ १७ ॥

सुतसोमं तु शकुनिर्विद्ध्वा तु निशितैः शरैः ।

नाकम्पयत संक्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् ॥ १८ ॥

दूसरी ओर शकुनि अत्यन्त कुपित हो अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमको घायल करके

भी उसे विचलित न कर सका। ठीक उसी तरह जैसे जलका प्रवाह पर्वतको नहीं हिला

सकता ॥ १८ ॥

सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् ।

शरैरनेकसाहस्रैश्छादयामास भारत ॥ १९ ॥

भरतनन्दन! सुतसोमने अपने पिताके अत्यन्त वैरी शकुनिको सामने देखकर उसे कई

हजार बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १९ ॥

ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः ।

लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च जितकाशी च संयुगे ॥ २० ॥

निवार्य समरे चापि शरांस्तान् निशितैः शरैः ।

आजघान सुसंक्रुद्धः सुतसोमं त्रिभिः शरैः ॥ २१ ॥

परंतु शकुनिने तुरंत ही दूसरे बाणोंद्वारा सुतसोमके बाणोंको काट डाला। वह

शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, विचित्र युद्धमें कुशल और युद्धस्थलमें विजयश्रीसे

सुशोभित होनेवाला था। उसने समरांगणमें अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमके बाणोंका

निवारण करके अत्यन्त कुपित हो तीन बाणोंद्वारा सुतसोमको भी घायल कर

दिया ॥ २०-२१ ॥

तस्याश्वान् केतनं सूतं तिलशो व्यधमच्छरैः ।

स्यालस्तव महाराज तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ २२ ॥
महाराज! आपके सालेने सुतसोमके घोड़ोंको तथा ध्वज और सारथिको भी अपने बाणोंसे तिल-तिल करके काट डाला; इससे सब लोग हर्षसूचक कोलाहल करने लगे ॥ २२ ॥
हताश्वो विरथश्चैव छिन्नकेतुश्च मारिष ।
धन्वी धनुर्वरं गृह्य रथाद् भूमावतिष्ठत ॥ २३ ॥
मान्यवर! घोड़े, रथ और ध्वजके नष्ट हो जानेपर धनुर्धर सुतसोम अपने हाथमें श्रेष्ठ धनुष लिये रथसे उतरकर धरतीपर खड़ा हो गया ॥ २३ ॥
व्यसृजत् सायकांश्चैव स्वर्णपुङ्खान् शिलाशितान् ।
छादयामास समरे तव स्यालस्य तं रथम् ॥ २४ ॥
फिर उसने शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण छोड़े। उन बाणोंद्वारा समरभूमिमें उसने आपके सालेके रथको ढक दिया ॥ २४ ॥
शलभानामिव व्राताञ्शरव्रातान् महारथः ।
रथोपगान् समीक्ष्यैवं विव्यथे नैव सौबलः ॥ २५ ॥
प्रममाथ शरांस्तस्य शरव्रातैर्महायशाः ।
उसके बाणसमूह टिड्डीदलोंके समान जान पड़ते थे। उन्हें अपने रथके समीप देखकर भी महारथी सुबलपुत्र शकुनिके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई। उस महायशस्वी वीरने अपने बाणसमूहोंद्वारा सुतसोमके सारे बाणोंको पूर्णतया मथ डाला ॥ २५ १/२ ॥
तत्रातुष्यन्त योधाश्च सिद्धाश्चापि दिवि स्थिताः ॥ २६ ॥
सुतसोमस्य तत् कर्म दृष्ट्वा श्रद्धेयमद्भुतम् ।
रथस्थं शकुनिं यस्तु पदातिः समयोधयत् ॥ २७ ॥
सुतसोम जो वहाँ पैदल होकर भी रथपर बैठे हुए शकुनिके साथ युद्ध कर रहा था। उसके इस अविश्वसनीय और अद्भुत कर्मको देखकर वहाँ खड़े हुए समस्त योद्धा तथा आकाशमें स्थित हुए सिद्धगण भी बहुत संतुष्ट हुए ॥ २६-२७ ॥
तस्य तीक्ष्णैर्महावेगैर्भल्लैः संनतपर्वभिः ।
व्यहनत् कार्मुकं राजंस्तूणीरांश्चैव सर्वशः ॥ २८ ॥
राजन्! उस समय शकुनिने अत्यन्त वेगशाली और झुकी हुई गाँठवाले तीखे भल्लोंद्वारा सुतसोमके धनुष, तरकस तथा अन्य सब उपकरणोंको भी नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥
स छिन्नधन्वा विरथः खड्गमुद्यम्य चानदत् ।
वैदूर्योत्पलवर्णाभं दन्तिदन्तमयत्सरुम् ॥ २९ ॥
रथ तो नष्ट हो ही चुका था, जब धनुष भी कट गया, तब सुतसोमने वैदूर्यमणि तथा नील कमलके समान श्याम रंगवाले, हाथीके दाँतकी बनी हुई मूठसे युक्त खड्गको ऊपर उठाकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २९ ॥

भ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्बरवर्चसम् । कालदण्डोपमं मेने सुतसोमस्य धीमतः ॥ ३० ॥ बुद्धिमान् सुतसोमके उस निर्मल आकाशके समान कान्तिवाले खड्गको घुमाया जाता देख शकुनिने उसे अपने लिये कालदण्डके समान माना ॥ ३० ॥ सोऽचरत् सहसा खड्गी मण्डलानि समन्ततः । चतुर्दश महाराज शिक्षाबलसमन्वितः ॥ ३१ ॥ महाराज! सुतसोम शिक्षा और बल दोनोंसे सम्पन्न था, वह खड्ग लेकर सहसा उसके चौदह मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरने लगा ॥ ३१ ॥ भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् । सम्पातसमुदीर्णे च दर्शयामास संयुगे ॥ ३२ ॥ उसने युद्धस्थलमें भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि गतियोंको दिखाया ॥ ३२ ॥ सौबलस्तु ततस्तस्य शरांश्चिक्षेप वीर्यवान् । तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ॥ ३३ ॥ तब पराक्रमी सुबलपुत्रने सुतसोमपर बहुत-से बाण चलाये; परंतु उसने अपने उत्तम खड्गसे निकट आते ही उन सब बाणोंको काट गिराया ॥ ३३ ॥ ततः क्रुद्धो महाराज सौबलः परवीरहा । प्राहिणोत् सुतसोमाय शरानाशीविषोपमान् ॥ ३४ ॥ महाराज! इससे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सुतसोमपर विषधर सर्पोंके समान बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४ ॥ चिच्छेद तांस्तु खड्गेन शिक्षया च बलेन च । दर्शयँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यतुल्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥ परंतु गरुड़के तुल्य पराक्रमी सुतसोमने अपनी शिक्षा और बलके अनुसार युद्धमें फुर्ती दिखाते हुए खड्गसे उन सब बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३५ ॥ तस्य संचरतो राजन् मण्डलावर्तने तदा । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ॥ ३६ ॥ राजन्! सुतसोम जब अपनी चमकीली तलवारको मण्डलाकार घुमा रहा था, उसी समय शकुनिने तीखे क्षुरप्रसे उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३६ ॥ स छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महानसिः । अर्धमस्य स्थितं हस्ते सुत्सारोस्तत्र भारत ॥ ३७ ॥ वह महान् खड्ग कटकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भारत! सुन्दर मूठवाले उस खड्गका आधा भाग सुतसोमके हाथमें ही रह गया ॥ ३७ ॥ छिन्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् ।

प्राविध्यत ततः शेषं सुतसोमो महारथः ॥ ३८ ॥
अपने उस खड्गको कटा हुआ जान महारथी सुतसोमने छः पग ऊँचे उछलकर उसके शेष भागको ही शकुनिपर दे मारा ॥ ३८ ॥

तच्छित्त्वा सगुणं चापं रणे तस्य महात्मनः ।
पपात धरणीं तूर्णं स्वर्णवज्रविभूषितम् ॥ ३९ ॥
वह स्वर्ण और हीरेसे विभूषित कटा हुआ खड्ग रणभूमिमें महामना शकुनिके धनुषको प्रत्यंचासहित काटकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥

सुतसोमस्ततोऽगच्छच्छ्रुतकीर्तेर्महारथम् ।
सौबलोऽपि धनुर्गृह्य घोरमन्यत् सुदुर्जयम् ॥ ४० ॥
अभ्ययात् पाण्डवानीकं निघ्नञ्शत्रुगणान् बहून् ।
तत्पश्चात् सुतसोम श्रुतकीर्तिके विशाल रथपर चढ़ गया। उधर शकुनि भी दूसरा अत्यन्त दुर्जय एवं भयंकर धनुष लेकर बहुत-से शत्रुओंका संहार करता हुआ पाण्डव-सेनाकी ओर चल दिया ॥ ४० १/२ ॥

तत्र नादो महानासीत् पाण्डवानां विशाम्पते ॥ ४१ ॥
सौबलं समरे दृष्ट्वा विचरन्तमभीतवत् ।
प्रजानाथ! सुबलपुत्र शकुनिको समरभूमिमें निर्भयसे विचरते देख पाण्डव-दलमें महान् सिंहनाद होने लगा ॥ ४१ १/२ ॥

तान्यनीकानि दृप्तानि शस्त्रवन्ति महान्ति च ॥ ४२ ॥
द्राव्यमाणान्यदृश्यन्त सौबलेन महात्मना ।
महामना शकुनिने घमंडमें भरे हुए उन शस्त्रसम्पन्न महान् सैनिकोंको भगा दिया। यह सब हमने अपनी आँखों देखा ॥ ४२ १/२ ॥

यथा दैत्यचमूं राजन् देवराजो ममर्द ह ।
तथैव पाण्डवीं सेनां सौबलेयो व्यनाशयत् ॥ ४३ ॥
राजन्! जिस प्रकार देवराज इन्द्रने दैत्योंकी सेनाको कुचल दिया था, उसी प्रकार सुबलपुत्र शकुनिने पाण्डव-सेनाका विनाश कर डाला ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सुतसोमसौबलयुद्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सुतसोम और शकुनिका युद्धविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1751)

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षड्विंशोऽध्यायः

कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्नका भय तथा कृतवर्माके द्वारा शिखण्डीकी पराजय

संजय उवाच

धृष्टद्युम्नं कृपो राजन् वारयामास संयुगे ।
यथा दृष्ट्वा वने सिंहं शरभो वारयेद् युधि ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कृपाचार्यने धृष्टद्युम्नको आक्रमण करते देख युद्धभूमिमें उसी प्रकार उन्हें आगे बढ़नेसे रोका, जैसे वनमें शरभ* सिंहको रोक देता है ॥

निरुद्धः पार्षतस्तेन गौतमेन बलीयसा ।
पदात् पदं विचलितुं नाशकत्तत्र भारत ॥ २ ॥
भारत! अत्यन्त बलवान् गौतमगोत्रीय कृपाचार्यसे अवरुद्ध होकर धृष्टद्युम्न एक पग भी चलनेमें समर्थ न हो सका ॥ २ ॥

गौतमस्य रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति ।
वित्रेसुः सर्वभूतानि क्षयं प्राप्तं च मेनिरे ॥ ३ ॥
कृपाचार्यके रथको धृष्टद्युम्नके रथकी ओर जाते देख समस्त प्राणी भयसे थर्रा उठे और धृष्टद्युम्नको नष्ट हुआ ही मानने लगे ॥ ३ ॥

तत्रावोचन् विमनसो रथिनः सादिनस्तथा ।
द्रोणस्य निधनान्नूनं संक्रुद्धो द्विपदां वरः ॥ ४ ॥
शारद्वतो महातेजा दिव्यास्त्रविदुदारधीः ।
अपि स्वस्ति भवेदद्य धृष्टद्युम्नस्य गौतमात् ॥ ५ ॥
वहाँ सभी रथी और घुड़सवार उदास होकर कहने लगे कि ‘निश्चय ही द्रोणाचार्यके मारे जानेसे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता, उदारबुद्धि, महातेजस्वी, नरश्रेष्ठ, शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य अत्यन्त कुपित हो उठे होंगे। क्या आज कृपाचार्यसे धृष्टद्युम्न कुशलपूर्वक सुरक्षित रह सकेंगे? ॥ ४-५ ॥

अपीयं वाहिनी कृत्स्ना मुच्येत महतो भयात् ।
अप्ययं ब्राह्मणः सर्वान् न नो हन्यात् समागतान् ॥ ६ ॥
‘क्या यह सारी सेना महान् भयसे मुक्त हो सकती है? कहीं ऐसा न हो कि ये ब्राह्मण देवता यहाँ आये हुए हम सब लोगोंका वध कर डालें? ॥ ६ ॥

यादृशं दृश्यते रूपमन्तकप्रतिमं भृशम् ।
गमिष्यत्यद्य पदवीं भारद्वाजस्य गौतमः ॥ ७ ॥

‘इनका यमराजके समान जैसा अत्यन्त भयंकर रूप दिखायी देता है, उससे जान पड़ता है, आज कृपाचार्य भी द्रोणाचार्यके पथपर ही चलेंगे ॥ ७ ॥ आचार्यः क्षिप्रहस्तश्च विजयी च सदा युधि । अस्त्रवान् वीर्यसम्पन्नः क्रोधेन च समन्वितः ॥ ८ ॥ ‘कृपाचार्य शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले तथा युद्धमें सर्वथा विजय प्राप्त करनेवाले हैं। वे अस्त्रवेत्ता, पराक्रमी और क्रोधसे युक्त हैं ॥ ८ ॥ पार्षतश्च महायुद्धे विमुखोऽद्याभिलक्ष्यते । इत्येवं विविधा वाचस्तावकानां परैः सह ॥ ९ ॥ व्यश्रूयन्त महाराज तयोस्तत्र समागमे । ‘आज इस महायुद्धमें धृष्टद्युम्न विमुख होता दिखायी देता है।’ महाराज! इस प्रकार वहाँ धृष्टद्युम्न और कृपाचार्यका समागम होनेपर आपके सैनिकोंकी शत्रुओंके साथ होनेवाली नाना प्रकारकी बातें सुनायी देने लगीं ॥ ९ १/२ ॥ विनिःश्वस्य ततः क्रोधात् कृपः शारद्वतो नृप ॥ १० ॥ पार्षतं चार्दयामास निश्चेष्टं सर्वमर्मसु । नरेश्वर! तदनन्तर शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने क्रोधसे लंबी साँस खींचकर निश्चेष्ट खड़े हुए धृष्टद्युम्नके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १० १/२ ॥ स हन्यमानः समरे गौतमेन महात्मना ॥ ११ ॥ कर्तव्यं न स्म जानाति मोहेन महताऽऽवृतः । समरांगणमें महामना कृपाचार्यके द्वारा आहत होनेपर भी धृष्टद्युम्नको कोई कर्तव्य नहीं सूझता था। वे महान् मोहसे आच्छन्न हो गये ॥ ११ १/२ ॥ तमब्रवीत्ततो यन्ता कच्चित् क्षेमं तु पार्षत ॥ १२ ॥ ईदृशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं मया क्वचित् । तब उनके सारथिने उनसे कहा—‘द्रुपदनन्दन! कुशल तो है न? युद्धमें आपपर कभी ऐसा संकट आया हो, यह मैंने नहीं देखा है ॥ १२ १/२ ॥ दैवयोगात्तु ते बाणा नापतन् मर्मभेदिनः ॥ १३ ॥ प्रेषिता द्विजमुख्येन मर्माण्युद्दिश्य सर्वतः । ‘द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्यने सब ओरसे आपके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके बाण चलाये थे; परंतु दैवयोगसे ही वे मर्मभेदी बाण आपके मर्मस्थानोंपर नहीं पड़े हैं ॥ १३ १/२ ॥ व्यावर्तये रथं तूर्णं नदीवेगमिवार्णवात् ॥ १४ ॥ अवध्यं ब्राह्मणं मन्ये येन ते विक्रमो हतः ।

‘जैसे कोई शक्तिशाली पुरुष समुद्रसे नदीके वेगको पीछे लौटा दे, उसी प्रकार मैं आपके इस रथको तुरंत लौटा ले चलूँगा। मेरी समझमें ये ब्राह्मण देवता अवध्य हैं, जिनसे आज आपका पराक्रम प्रतिहत हो गया’ ।। १४ १/२ ।। धृष्टद्युम्नस्ततो राजन् शनैर्ह्यब्रवीद् वचः ।। १५ ।। मुह्यते मे मनस्तात गात्रस्वेदश्च जायते । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च सारथे ।। १६ ।। राजन्! यह सुनकर धृष्टद्युम्नने धीरेसे कहा—‘सारथे! मेरे मनपर मोह छा रहा है और शरीरसे पसीना छूटने लगा है। मेरे सारे अंग काँप रहे हैं और रोमांच हो आया है ।। १५-१६ ।। वर्जयन् ब्राह्मणं युद्धे शनैर्याहि यतोऽर्जुनः । अर्जुनं भीमसेनं वा समरे प्राप्य सारथे ।। १७ ।। क्षेममद्य भवेदेवमेषा मे नैष्ठिकी मतिः । ‘तुम युद्धस्थलमें ब्राह्मण कृपाचार्यको छोड़ते हुए धीरे-धीरे जहाँ अर्जुन हैं, उसी ओर चल दो। समरांगणमें अर्जुन अथवा भीमसेनके पास पहुँचकर ही आज मैं सकुशल रह सकता हूँ, ऐसा मेरा दृढ़ विचार है’ ।। १७ १/२ ।। ततः प्रायान्महाराज सारथिस्त्वरयन् हयान् ।। १८ ।। यतो भीमो महेष्वासो युयुधे तव सैनिकैः । महाराज! तब सारथि घोड़ोंको तेजीसे हाँकता हुआ उसी ओर चल दिया जहाँ महाधनुर्धर भीमसेन आपके सैनिकोंके साथ युद्ध कर रहे थे ।। १८ १/२ ।। प्रद्रुतं च रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य मारिष ।। १९ ।। किरन् शतशतान्येव गौतमोऽनुययौ तदा । मान्यवर नरेश! धृष्टद्युम्नके रथको वहाँसे भागते देख कृपाचार्यने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया ।। १९ १/२ ।। शङ्खं च पूरयामास मुहुर्मुहुररिंदमः ।। २० ।। पार्षतं त्रासयामास महेन्द्रो नमुचिं यथा । शत्रुओंका दमन करनेवाले कृपाचार्यने बारंबार शंखध्वनि की और जैसे इन्द्रने नमुचिको डराया था, उसी प्रकार उन्होंने धृष्टद्युम्नको भयभीत कर दिया ।। २० १/२ ।। शिखण्डिनं तु समरे भीष्ममृत्युं दुरासदम् ।। २१ ।। हार्दिक्यो वारयामास स्मयन्निव मुहुर्मुहुः । दूसरी ओर समरांगणमें दुर्जय वीर शिखण्डीको, जो भीष्मके लिये मृत्युस्वरूप था, कृतवर्माने बारंबार मुसकराते हुए-से रोका ।। २१ १/२ ।। शिखण्डी तु समासाद्य हृदिकानां महारथम् ।। २२ ।।

पञ्चभिर्निशितैर्भल्लैर्जत्रुदेशे समाहनत् ।
हृदिकवंशी यादवोंके महारथी वीर कृतवर्माको सामने पाकर शिखण्डीने उसके गलेकी हँसलीपर पाँच तीखे भल्लोंद्वारा प्रहार किया ॥ २२ १/२ ॥
कृतवर्मा तु संक्रुद्धो भित्त्वा षष्ट्या पतत्रिभिः ॥ २३ ॥
धनुरेकेन चिच्छेद हसन् राजन् महारथः ।
राजन्! तब महारथी कृतवर्माने अत्यन्त कुपित हो साठ बाणोंसे शिखण्डीको घायल करके एकसे हँसते-हँसते उसका धनुष काट डाला ॥ २३ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय द्रुपदस्यात्मजो बली ॥ २४ ॥
तिष्ठ तिष्ठेति संक्रुद्धो हार्दिक्यं प्रत्यभाषत ।
तत्पश्चात् द्रुपदके बलवान् पुत्रने दूसरा धनुष हाथमें लेकर कृतवर्मासे क्रोधपूर्वक कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २४ १/२ ॥
ततोऽस्य नवतिं बाणान् रुक्मपुङ्खान् सुतेजनान् ॥ २५ ॥
प्रेषयामास राजेन्द्र तेऽस्याभ्रश्यन्त वर्मणः ।
राजेन्द्र! फिर सोनेकी पाँखवाले नब्बे पैने बाण उसने चलाये, परंतु वे कृतवर्माके कवचसे फिसलकर गिर गये ॥ २५ १/२ ॥
वितथांस्तान् समालक्ष्य पतितांश्च महीतले ॥ २६ ॥
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कार्मुकं चिच्छिदे भृशम् ।
उन्हें व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिरा देख शिखण्डीने तीखे क्षुरप्रसे कृतवर्माके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं भग्नशृङ्गमिवर्षभम् ॥ २७ ॥
अशीत्या मार्गणैः क्रुद्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
धनुष कट जानेपर कृतवर्माकी दशा टूटे सींगवाले बैलके समान हो गयी। उस समय शिखण्डीने कुपित होकर उसकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें अस्सी बाण मारे ॥
कृतवर्मा तु संक्रुद्धो मार्गणैः क्षतविक्षतः ॥ २८ ॥
ववाम रुधिरं गात्रैः कुम्भवक्रादिवोदकम् ।
कृतवर्मा उन बाणोंसे क्षत-विक्षत होकर अत्यन्त कुपित हो उठा और जैसे घड़ेके मुँहसे जल गिर रहा हो, उसी प्रकार वह अपने अंगोंसे रक्त वमन करने लगा ॥
रुधिरेण परिक्लिन्नः कृतवर्मा त्वराजत ॥ २९ ॥
वर्षेण क्लेदितो राजन् यथा गैरिकपर्वतः ।
राजन्! खूनसे लथपथ हुआ कृतवर्मा वर्षासे भीगे हुए गेरूके पहाड़के समान शोभा पा रहा था ॥ २९ १/२ ॥
अथान्यद् धनुरादाय समार्गणगुणं प्रभुः ॥ ३० ॥

शिखण्डिनं बाणगणैः स्कन्धदेशे व्यताडयत् । तदनन्तर शक्तिशाली कृतवर्माने बाण और प्रत्यंचा-सहित दूसरा धनुष हाथमें लेकर शिखण्डीके कंधोंपर अपने बाण-समूहोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३० ½ ॥
स्कन्धदेशस्थितैर्बाणैः शिखण्डी तु व्यराजत ॥ ३१ ॥
शाखाप्रशाखाविपुलः सुमहान् पादपो यथा ।
कंधोंमें धँसे हुए उन बाणोंसे शिखण्डी वैसी ही शोभा पाने लगा, जैसे कोई महान् वृक्ष अपनी शाखा-प्रशाखाओंके कारण अधिक विस्तृत दिखायी देता हो ॥
तावन्योन्यं भृशं विद्ध्वा रुधिरेण समुक्षितौ ॥ ३२ ॥
(पोप्लूयमानौ हि यथा महान्तौ शोणितह्रदे ।)
वे दोनों महान् वीर एक-दूसरेको अत्यन्त घायल करके खूनसे इस प्रकार नहा गये थे, मानो रक्तके सरोवरमें बारंबार डुबकी लगाकर आये हों ॥ ३२ ॥
अन्योन्यशृङ्गाभिहतौ रेजतुर्वृषभाविव ।
उस समय एक-दूसरेके सींगोंसे चोट खाये हुए दो साँड़के समान उन दोनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥
अन्योन्यस्य वधे यत्नं कुर्वाणौ तौ महारथौ ॥ ३३ ॥
रथाभ्यां चेरतुस्तत्र मण्डलानि सहस्रशः ।
एक-दूसरेके वधके लिये प्रयत्न करते हुए वे दोनों महारथी अपने रथके द्वारा वहाँ सहस्रों बार मण्डलाकार गतिसे विचरते थे ॥ ३३ ½ ॥
कृतवर्मा महाराज पार्षतं निशितैः शरैः ॥ ३४ ॥
रणे विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।
महाराज! कृतवर्माने रणभूमिमें सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले सत्तर बाणोंसे द्रुपदपुत्र शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ३४ ½ ॥
ततोऽस्य समरे बाणं भोजः प्रहरतां वरः ॥ ३५ ॥
जीवितान्तकरं घोरं व्यसृजत्त्वरयान्वितः ।
तत्पश्चात् प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ कृतवर्माने उसके ऊपर समरांगणमें बड़ी उतावलीके साथ एक भयंकर प्राणान्तकारी बाण छोड़ा ॥ ३५ ½ ॥
स तेनाभिहतो राजन् मूर्च्छामाशु समाविशत् ॥ ३६ ॥
ध्वजयष्टिं च सहसा शिश्रिये कश्मलावृतः ।
राजन्! उस बाणसे आहत हो शिखण्डी तत्काल मूर्च्छित हो गया। उसने सहसा मोहाच्छन्न होकर ध्वजदण्डका सहारा ले लिया ॥ ३६ ½ ॥
अपोवाह रणात्तूर्णं सारथी रथिनां वरम् ॥ ३७ ॥
हार्दिक्यशरसंतप्तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।

कृतवर्माके बाणोंसे संतप्त हो बारंबार लंबी साँस खींचते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डीको उसका सारथि तुरंत रणभूमिसे बाहर हटा ले गया ॥ ३७ १/२ ॥
पराजिते ततः शूरे द्रुपदस्यात्मजे प्रभो ।
व्यद्रवत् पाण्डवी सेना वध्यमाना समन्ततः ॥ ३८ ॥
प्रभो! शूरवीर द्रुपदपुत्रके पराजित हो जानेपर सब ओरसे मारी जाती हुई पाण्डव-सेना भागने लगी ॥ ३८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे षड्‌विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३८ १/२ श्लोक हैं)


* शरभ आठ पैरोंका एक जानवर है, जिसका आधा शरीर पशुका और आधा पक्षीका होता है। भगवान् नृसिंहकी भाँति उसका शरीर भी द्विविध आकृतियोंके सम्मिश्रणसे बना है। वह इतना प्रबल है कि सिंहको भी मार सकता है।

अध्याय (पृष्ठ 1757)

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सप्तविंशोऽध्यायः

अर्जुनद्वारा राजा श्रुतंजय, सौश्रुति, चन्द्रदेव और सत्यसेन आदि महारथियोंका वध एवं संशप्तक-सेनाका संहार

संजय उवाच

श्वेताश्वोऽथ महाराज व्यधमत्तावकं बलम् ।
यथा वायुः समासाद्य तूलराशिं समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! एक ओर श्वेतवाहन अर्जुन आपकी सेनाको उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर रहे थे, जैसे वायु रूईके ढेरको पाकर उसे सब ओर बिखेर देती है ॥ १ ॥

प्रत्युद्ययुस्त्रिगर्त्तास्तं शिबयः कौरवैः सह ।
शाल्वाः संशप्तकाश्चैव नारायणबलं च तत् ॥ २ ॥
उस समय उनका सामना करनेके लिये त्रिगर्त, शिबि, कौरवोंसहित शाल्व, संशप्तकगण तथा नारायणी-सेनाके सैनिक आगे बढ़े ॥ २ ॥

सत्यसेनश्चन्द्रदेवो मित्रदेवः श्रुतंजयः ।
सौश्रुतिश्चित्रसेनश्च मित्रवर्मा च भारत ॥ ३ ॥
त्रिगर्तराजः समरे भ्रातृभिः परिवारितः ।
पुत्रैश्चैव महेष्वासैर्नानाशस्त्रविशारदैः ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! सत्यसेन, चन्द्रदेव, मित्रदेव, श्रुतंजय, सौश्रुति, चित्रसेन तथा मित्रवर्मा— इन सात भाइयों तथा नाना प्रकारके शस्त्रोंके प्रहारमें कुशल महाधनुर्धर पुत्रोंसे घिरा हुआ त्रिगर्तराज सुशर्मा समरांगणमें उपस्थित हुआ ॥

ते सृजन्तः शरव्रातान् किरन्तोऽर्जुनमाहवे ।
अभ्यवर्तन्त सहसा वार्योघा इव सागरम् ॥ ५ ॥
वे सभी वीर युद्धस्थलमें अर्जुनपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए जैसे जलका प्रवाह समुद्रकी ओर जाता है, उसी प्रकार सहसा उनके सामने आ पहुँचे ॥ ५ ॥

ते त्वर्जुनं समासाद्य योधाः शतसहस्रशः ।
अगच्छन् विलयं सर्वे तार्क्ष्यं दृष्ट्वेव पन्नगाः ॥ ६ ॥
परंतु जैसे गरुड़को देखते ही सर्प अपने प्राण खो देते हैं, उसी प्रकार वे सब-के-सब लाखों योद्धा अर्जुनके पास पहुँचते ही कालके गालमें चले गये ॥ ६ ॥

ते हन्यमानाः समरे नाजहुः पाण्डवं रणे ।
हन्यमाना महाराज शलभा इव पावकम् ॥ ७ ॥

जैसे पतंगे जलते रहनेपर भी आगमें टूटे पड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें मारे जानेपर भी वे समस्त योद्धा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनको छोड़कर भाग न सके ।। ७ ।।
सत्यसेनस्त्रिभिर्बाणैर्विव्याध युधि पाण्डवम् ।
मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु सप्तभिः ।। ८ ।।
मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः ।
श्रुतंजयस्तु विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ।। ९ ।।
सत्यसेनने तीन, मित्रदेवने तिरसठ, चन्द्रदेवने सात, मित्रवर्माने तिहत्तर, सौश्रुतिने सात, श्रुतंजयने बीस तथा सुशर्माने नौ बाणोंसे युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला ।। ८-९ ।।
स विद्धो बहुभिः संख्ये प्रतिविव्याध तान् नृपान् ।
सौश्रुतिं सप्तभिर्विद्ध्वा सत्यसेनं त्रिभिः शरैः ।। १० ।।
इस प्रकार रणभूमिमें बहुसंख्यक योद्धाओंन्द्वारा घायल किये जानेपर बदलेमें अर्जुनने भी उन सभी नरेशोंको क्षत-विक्षत कर दिया। उन्होंने सौश्रुतिको सात बाणोंसे घायल करके सत्यसेनको तीन बाण मारे ।। १० ।।
श्रुतंजयं च विंशत्या चन्द्रदेवं तथाष्टभिः ।
मित्रदेवं शतेनैव श्रुतसेनं त्रिभिः शरैः ।। ११ ।।
नवभिर्मित्रवर्माणं सुशर्माणं तथाष्टभिः ।
श्रुतंजयको बीस, चन्द्रदेवको आठ, मित्रदेवको सौ, श्रुतसेन (चित्रसेन)-को तीन, मित्रवर्माको नौ तथा सुशर्माको आठ बाणोंसे घायल कर दिया ।। ११ १/२ ।।
श्रुतंजयं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः ।। १२ ।।
सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ।
त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।। १३ ।।
फिर सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कई बाणोंसे राजा श्रुतंजयका वध करके सौश्रुतिके शिरस्त्राणसहित सिरको धड़से अलग कर दिया। फिर तुरंत ही चन्द्रदेवको भी अपने बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। १२-१३ ।।
तथैतरान् महाराज यतमानान् महारथान् ।
पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरेकैकं प्रत्यवारयत् ।। १४ ।।
महाराज! इसी प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील अन्य महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाण मारकर रोक दिया ।। १४ ।।
सत्यसेनस्तु संक्रुद्धस्तोमरं व्यसृजन्महत् ।
समुद्दिश्य रणे कृष्णं सिंहनादं ननाद च ।। १५ ।।
तब सत्यसेनने अत्यन्त कुपित होकर रणभूमिमें श्रीकृष्णको लक्ष्य करके एक विशाल तोमरका प्रहार किया और सिंहके समान गर्जना की ।। १५ ।।

स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महात्मनः । अयस्मयो हेमदण्डो जगाम धरणीं तदा ॥ १६ ॥ सुवर्णमय दण्डवाला वह लोहनिर्मित तोमर महात्मा श्रीकृष्णकी बायीं भुजापर चोट करके तत्काल धरतीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ माधवस्य तु विद्धस्य तोमरेण महारणे । प्रतोदः प्रापतद्धस्ताद् रश्मयश्च विशाम्पते ॥ १७ ॥ प्रजानाथ! उस महासमरमें तोमरसे घायल हुए श्रीकृष्णके हाथसे चाबुक और बागडोर गिर पड़ी ॥ १७ ॥ वासुदेवं विभिन्नाङ्गं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । क्रोधमाहारयत्तीव्रं कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके शरीरमें घाव देखकर कुन्तीकुमार अर्जुन-को बड़ा क्रोध हुआ। वे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥ प्रापयाश्वान् महाबाहो सत्यसेनं प्रति प्रभो । यावदेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ १९ ॥ ‘प्रभो! महाबाहो! आप घोड़ोंको सत्यसेनके निकट पहुँचाइये। मैं अपने तीखे बाणोंसे पहले इसीको यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १९ ॥ प्रतोदं गृह्य सोऽन्यत्तु रश्मीनपि यथा पुरा । वाहयामास तानश्वान् सत्यसेनरथं प्रति ॥ २० ॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने दूसरा चाबुक लेकर पूर्ववत् घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और उन घोड़ोंको सत्यसेनके रथके समीप पहुँचा दिया ॥ २० ॥ विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । सत्यसेनं शरैस्तीक्ष्णैर्वारयित्वा महारथः ॥ २१ ॥ ततः सुनिशितैर्भल्लै राज्ञस्तस्य महच्छिरः । कुण्डलोपचितं कायाच्चकर्त पृतनान्तरे ॥ २२ ॥ कुन्तीकुमार महारथी अर्जुनने श्रीकृष्णको घायल हुआ देख सत्यसेनको तीखे बाणोंसे रोककर तेज धारवाले भल्लोंसे सेनाके मध्यभागमें उस राजकुमारके कुण्डलमण्डित महान् मस्तकको धड़से काट डाला ॥ २१-२२ ॥ तन्निकृत्य शितैर्बाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् । वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ॥ २३ ॥ मान्यवर! सत्यसेनको मारकर तीखे बाणोंद्वारा मित्रवर्माको और एक पैने वत्सदन्तसे उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २३ ॥ ततः शरशतैर्भूयः संशप्तकगणान् बली । पातयामास संक्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २४ ॥

तदनन्तर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् अर्जुनने पुनः हजारों और सैकड़ों संशप्तकगणोंको सैकड़ों बाणोंसे मारकर धरतीपर सुला दिया ॥ २४ ॥
ततो रजतपुङ्खेन राजञ्छीर्षं महात्मनः ।
मित्रदेवस्य चिच्छेद क्षुरप्रेण महारथः ॥ २५ ॥
राजन्! फिर महारथी धनंजयने रजतमय पंखवाले क्षुरप्रसे महामना मित्रदेवके मस्तकको काट डाला ॥ २५ ॥
सुशर्माणं सुसंक्रुद्धो जत्रुदेशे समाहनत् ।
ततः संशप्तकाः सर्वे परिवार्य धनंजयम् ॥ २६ ॥
शस्त्रौघैर्ममृदुः क्रुद्धा नादयन्तो दिशो दश ।
साथ ही अत्यन्त कुपित होकर अर्जुनने सुशर्माके गलेकी हँसलीपर भी गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो क्रोधमें भरे हुए सभी संशप्तक दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे प्रतिध्वनित करते हुए अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा पीड़ा देने लगे ॥ २६ १/२ ॥
अभ्यर्दितस्तु तैर्जिष्णुः शक्रतुल्यपराक्रमः ॥ २७ ॥
ऐन्द्रमस्त्रममेयात्मा प्रादुश्चक्रे महारथः ।
उनसे पीड़ित होकर इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी अर्जुनने ऐन्द्रास्त्र प्रकट किया ॥ २७ १/२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रादुरासन् विशाम्पते ॥ २८ ॥
ध्वजानां छिद्यमानानां कार्मुकाणां च मारिष ।
रथानां सपताकानां तूणीराणां युगैः सह ॥ २९ ॥
अक्षाणामथ चक्राणां योक्त्राणां रश्मिभिः सह ।
कूबराणां वरूथानां पूष्त्कानां च संयुगे ॥ ३० ॥
अश्वानां पततां चापि प्रासानाम्ऋष्टिभिः सह ।
गदानां परिघानां च शक्तितोमरपट्टिशैः ॥ ३१ ॥
शतघ्नीनां सचक्राणां भुजानां चोरुभिः सह ।
कण्ठसूत्राङ्गदानां च केयूराणां च मारिष ॥ ३२ ॥
हाराणामथ निष्काणां तनूत्राणां च भारत ।
छत्राणां व्यजनानां च शिरसां मुकुटैः सह ॥ ३३ ॥
अश्रूयत महाशब्दस्तत्र तत्र विशाम्पते ।

प्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे। माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट-कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये, जोत, बागडोर, कूबर, वरूथ (रथका चर्ममय आवरण), बाण, घोड़े, प्रास, ऋष्टि, गदा, परिघ, शक्ति, तोमर, पट्टिश, चक्रयुक्त शतघ्नी, बाँह-जाँघ, कण्ठसूत्र, अंगद, केयूर, हार, निष्क, कवच, छत्र, व्यजन और मुकुटसहित मस्तकोंका महान् शब्द युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ सब ओर सुनायी देने लगा ।। २८—३३ १/२ ।। सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च ।। ३४ ।। शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे । पृथ्वीपर गिरे हुए कुण्डल और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मस्तक आकाशमें ताराओंके समूहकी भाँति दिखायी देते थे ।। ३४ १/२ ।। सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च ।। ३५ ।। शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले । वहाँ मारे गये राजाओंके सुन्दर हारोंसे सुशोभित, उत्तम वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा चन्दनसे चर्चित शरीर पृथ्वीपर पड़े देखे जाते थे ।। ३५ १/२ ।। गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ।। ३६ ।। निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः । उस समय वहाँ मारे गये राजकुमारों तथा महाबली क्षत्रियोंकी लाशोंसे वह युद्धस्थल गन्धर्वनगरके समान भयानक जान पड़ता था ।। ३६ १/२ ।। हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही ।। ३७ ।। अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः । समरांगणमें टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हुए हाथियों और घोड़ोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया था ।। ३७ १/२ ।। नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ।। ३८ ।। निघ्नतः शात्रवान् भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् । अपने भल्लोंसे शत्रुसैनिकों तथा उनके हाथी-घोड़ेके महान् समुदायको मारते-गिराते हुए महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके रथके पहियोंके लिये मार्ग नहीं मिलता था ।। ३८ १/२ ।। आतङ्कादिव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष ।। ३९ ।। चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे । मान्यवर! उस संग्राममें रक्तकी कीच मच गयी थी। उसमें विचरते हुए अर्जुनके रथके पहिये मानो भयसे शिथिल होते जा रहे थे ।। ३९ १/२ ।। सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् ।। ४० ।। श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ।

मन और वायुके समान वेगशाली घोड़े भी वहाँ धँसते हुए पहियोंको बड़े परिश्रमसे खींच पाते थे ।। ४० १/२ ।।
वध्यमानं तु तत् सैन्यं पाण्डुपुत्रेण धन्विना ।। ४१ ।।
प्रायशो विमुखं सर्वं नावतिष्ठत भारत ।
धनुर्धर पाण्डुकुमारकी मार खाकर आपकी वह सारी सेना प्राय: पीठ दिखाकर भाग चली। वहाँ क्षणभरके लिये भी ठहर न सकी ।। ४१ १/२ ।।
ताञ्जित्वा समरे जिष्णुः संशप्तकगणान् बहून् ।। ४२ ।।
विरराज तदा पार्थो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।। ४३ ।।
उस समय समरांगणमें उन बहुसंख्यक संशप्तकगणोंको परास्त करके विजयी कुन्तीकुमार अर्जुन धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान शोभा पा रहे थे ।। ४२-४३ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संशप्तकजये सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संशप्तकोंकी पराजयविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।

अर्जुनके द्वारा मित्रसेनका शिरश्छेद

अध्याय (पृष्ठ 1764)

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अष्टाविंशोऽध्यायः

युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध, दुर्योधनकी पराजय तथा उभयपक्षकी सेनाओंका अमर्यादित भयंकर संग्राम

संजय उवाच

युधिष्ठिरं महाराज विसृजन्तं शरान् बहून् ।
स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए युधिष्ठिरका स्वयं राजा दुर्योधनने एक निर्भीक वीरकी भाँति सामना किया ॥ १ ॥

तमापतन्तं सहसा तव पुत्रं महारथम् ।
धर्मराजो द्रुतं विद्ध्वा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २ ॥
सहसा आते हुए आपके महारथी पुत्रको धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही घायल करके कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २ ॥

स तु तं प्रतिविव्याध नवभिर्निशितैः शरैः ।
सारथिं चास्य भल्लेन भृशं क्रुद्धोऽभ्यताडयत् ॥ ३ ॥
इससे दुर्योधनको बड़ा क्रोध हुआ। उसने युधिष्ठिरको नौ तीखे बाणोंसे बेधकर बदला चुकाया और उनके सारथिपर भी एक भल्लका प्रहार किया ॥ ३ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजन् स्वर्णपुङ्खाञ्छिलीमुखान् ।
दुर्योधनाय चिक्षेप त्रयोदश शिलाशितान् ॥ ४ ॥
राजन्! तब युधिष्ठिरने सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तेरह बाण दुर्योधनपर चलाये ॥ ४ ॥

चतुर्भिंश्चतुरो वाहांस्तस्य हत्वा महारथः ।
पञ्चमेन शिरः कायात् सारथेश्च समाक्षिपत् ॥ ५ ॥
महारथी युधिष्ठिरने उनमेंसे चार बाणोंद्वारा दुर्योधनके चारों घोड़ोंको मारकर पाँचवेंसे उसके सारथिका भी मस्तक धड़से काट गिराया ॥ ५ ॥

षष्ठेन तु ध्वजं राज्ञः सप्तमेन तु कार्मुकम् ।
अष्टमेन तथा खड्गं पातयामास भूतले ॥ ६ ॥
फिर छठे बाणसे राजा दुर्योधनके ध्वजको, सातवेंसे उसके धनुषको और आठवेंसे उसकी तलवारको भी पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ६ ॥

पञ्चभिर्नृपतिं चापि धर्मराजोऽर्दयद् भृशम् ।
तदनन्तर पाँच बाणोंसे धर्मराजने राजा दुर्योधनको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ६ ½ ॥