भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1759, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1759

स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महात्मनः । अयस्मयो हेमदण्डो जगाम धरणीं तदा ॥ १६ ॥ सुवर्णमय दण्डवाला वह लोहनिर्मित तोमर महात्मा श्रीकृष्णकी बायीं भुजापर चोट करके तत्काल धरतीपर गिर पड़ा ॥ १६ ॥ माधवस्य तु विद्धस्य तोमरेण महारणे । प्रतोदः प्रापतद्धस्ताद् रश्मयश्च विशाम्पते ॥ १७ ॥ प्रजानाथ! उस महासमरमें तोमरसे घायल हुए श्रीकृष्णके हाथसे चाबुक और बागडोर गिर पड़ी ॥ १७ ॥ वासुदेवं विभिन्नाङ्गं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । क्रोधमाहारयत्तीव्रं कृष्णं चेदमुवाच ह ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके शरीरमें घाव देखकर कुन्तीकुमार अर्जुन-को बड़ा क्रोध हुआ। वे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥ प्रापयाश्वान् महाबाहो सत्यसेनं प्रति प्रभो । यावदेनं शरैस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् ॥ १९ ॥ ‘प्रभो! महाबाहो! आप घोड़ोंको सत्यसेनके निकट पहुँचाइये। मैं अपने तीखे बाणोंसे पहले इसीको यमलोक भेज दूँगा’ ॥ १९ ॥ प्रतोदं गृह्य सोऽन्यत्तु रश्मीनपि यथा पुरा । वाहयामास तानश्वान् सत्यसेनरथं प्रति ॥ २० ॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने दूसरा चाबुक लेकर पूर्ववत् घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और उन घोड़ोंको सत्यसेनके रथके समीप पहुँचा दिया ॥ २० ॥ विष्वक्सेनं तु निर्भिन्नं दृष्ट्वा पार्थो धनंजयः । सत्यसेनं शरैस्तीक्ष्णैर्वारयित्वा महारथः ॥ २१ ॥ ततः सुनिशितैर्भल्लै राज्ञस्तस्य महच्छिरः । कुण्डलोपचितं कायाच्चकर्त पृतनान्तरे ॥ २२ ॥ कुन्तीकुमार महारथी अर्जुनने श्रीकृष्णको घायल हुआ देख सत्यसेनको तीखे बाणोंसे रोककर तेज धारवाले भल्लोंसे सेनाके मध्यभागमें उस राजकुमारके कुण्डलमण्डित महान् मस्तकको धड़से काट डाला ॥ २१-२२ ॥ तन्निकृत्य शितैर्बाणैर्मित्रवर्माणमाक्षिपत् । वत्सदन्तेन तीक्ष्णेन सारथिं चास्य मारिष ॥ २३ ॥ मान्यवर! सत्यसेनको मारकर तीखे बाणोंद्वारा मित्रवर्माको और एक पैने वत्सदन्तसे उसके सारथिको भी मार गिराया ॥ २३ ॥ ततः शरशतैर्भूयः संशप्तकगणान् बली । पातयामास संक्रुद्धः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २४ ॥

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