भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1747

मान्यवर! महारथी शतानीकने कुपित होकर अपने अश्वहीन रथपर खड़े रहकर ही

आपके पुत्रके ऊपर गदाका प्रहार किया ॥ १४ ॥

सा कृत्वा स्यन्दनं भस्म हयांश्चैव ससारथीन् ।

पपात धरणीं तूर्णं दारयन्तीव भारत ॥ १५ ॥

भारत! वह गदा तुरंत ही श्रुतकर्मके रथ, घोड़ों और सारथिको भस्म करके पृथ्वीको

विदीर्ण करती हुई-सी गिर पड़ी ॥ १५ ॥

तावुभौ विरथौ वीरौ कुरूणां कीर्तिवर्धनौ ।

व्यपाक्रमेतां युद्धात्तु प्रेक्षमाणौ परस्परम् ॥ १६ ॥

कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वे दोनों वीर रथहीन हो एक-दूसरेको देखते हुए

युद्धस्थलसे हट गये ॥ १६ ॥

पुत्रस्तु तव सम्भ्रान्तो विवित्सो रथमारुहत् ।

शतानीकोऽपि त्वरितः प्रतिविन्ध्यरथं गतः ॥ १७ ॥

आपका पुत्र श्रुतकर्मा घबरा गया था। वह विवित्सुके रथपर जा चढ़ा और शतानीक

भी तुरंत ही प्रतिविन्ध्यके रथपर चला गया ॥ १७ ॥

सुतसोमं तु शकुनिर्विद्ध्वा तु निशितैः शरैः ।

नाकम्पयत संक्रुद्धो वार्योघ इव पर्वतम् ॥ १८ ॥

दूसरी ओर शकुनि अत्यन्त कुपित हो अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमको घायल करके

भी उसे विचलित न कर सका। ठीक उसी तरह जैसे जलका प्रवाह पर्वतको नहीं हिला

सकता ॥ १८ ॥

सुतसोमस्तु तं दृष्ट्वा पितुरत्यन्तवैरिणम् ।

शरैरनेकसाहस्रैश्छादयामास भारत ॥ १९ ॥

भरतनन्दन! सुतसोमने अपने पिताके अत्यन्त वैरी शकुनिको सामने देखकर उसे कई

हजार बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १९ ॥

ताञ्शराञ्शकुनिस्तूर्णं चिच्छेदान्यैः पतत्रिभिः ।

लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च जितकाशी च संयुगे ॥ २० ॥

निवार्य समरे चापि शरांस्तान् निशितैः शरैः ।

आजघान सुसंक्रुद्धः सुतसोमं त्रिभिः शरैः ॥ २१ ॥

परंतु शकुनिने तुरंत ही दूसरे बाणोंद्वारा सुतसोमके बाणोंको काट डाला। वह

शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, विचित्र युद्धमें कुशल और युद्धस्थलमें विजयश्रीसे

सुशोभित होनेवाला था। उसने समरांगणमें अपने तीखे बाणोंसे सुतसोमके बाणोंका

निवारण करके अत्यन्त कुपित हो तीन बाणोंद्वारा सुतसोमको भी घायल कर

दिया ॥ २०-२१ ॥

तस्याश्वान् केतनं सूतं तिलशो व्यधमच्छरैः ।