महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1761, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजानाथ! फिर तो वहाँ हजारों बाण प्रकट होने लगे। माननीय भरतवंशी प्रजापालक नरेश! उस समय कट-कटकर गिरनेवाले ध्वज, धनुष, रथ, पताका, तरकस, जूए, धुरे, पहिये, जोत, बागडोर, कूबर, वरूथ (रथका चर्ममय आवरण), बाण, घोड़े, प्रास, ऋष्टि, गदा, परिघ, शक्ति, तोमर, पट्टिश, चक्रयुक्त शतघ्नी, बाँह-जाँघ, कण्ठसूत्र, अंगद, केयूर, हार, निष्क, कवच, छत्र, व्यजन और मुकुटसहित मस्तकोंका महान् शब्द युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ सब ओर सुनायी देने लगा ।। २८—३३ १/२ ।। सकुण्डलानि स्वक्षीणि पूर्णचन्द्रनिभानि च ।। ३४ ।। शिरांस्युर्व्यामदृश्यन्त ताराजालमिवाम्बरे । पृथ्वीपर गिरे हुए कुण्डल और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मस्तक आकाशमें ताराओंके समूहकी भाँति दिखायी देते थे ।। ३४ १/२ ।। सुस्रग्वीणि सुवासांसि चन्दनेनोक्षितानि च ।। ३५ ।। शरीराणि व्यदृश्यन्त निहतानां महीतले । वहाँ मारे गये राजाओंके सुन्दर हारोंसे सुशोभित, उत्तम वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा चन्दनसे चर्चित शरीर पृथ्वीपर पड़े देखे जाते थे ।। ३५ १/२ ।। गन्धर्वनगराकारं घोरमायोधनं तदा ।। ३६ ।। निहतै राजपुत्रैश्च क्षत्रियैश्च महाबलैः । उस समय वहाँ मारे गये राजकुमारों तथा महाबली क्षत्रियोंकी लाशोंसे वह युद्धस्थल गन्धर्वनगरके समान भयानक जान पड़ता था ।। ३६ १/२ ।। हस्तिभिः पतितैश्चैव तुरङ्गैश्चाभवन्मही ।। ३७ ।। अगम्यरूपा समरे विशीर्णैरिव पर्वतैः । समरांगणमें टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हुए हाथियों और घोड़ोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया था ।। ३७ १/२ ।। नासीच्चक्रपथस्तत्र पाण्डवस्य महात्मनः ।। ३८ ।। निघ्नतः शात्रवान् भल्लैर्हस्त्यश्वं चास्यतो महत् । अपने भल्लोंसे शत्रुसैनिकों तथा उनके हाथी-घोड़ेके महान् समुदायको मारते-गिराते हुए महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके रथके पहियोंके लिये मार्ग नहीं मिलता था ।। ३८ १/२ ।। आतङ्कादिव सीदन्ति रथचक्राणि मारिष ।। ३९ ।। चरतस्तस्य संग्रामे तस्मिंल्लोहितकर्दमे । मान्यवर! उस संग्राममें रक्तकी कीच मच गयी थी। उसमें विचरते हुए अर्जुनके रथके पहिये मानो भयसे शिथिल होते जा रहे थे ।। ३९ १/२ ।। सीदमानानि चक्राणि समूहुस्तुरगा भृशम् ।। ४० ।। श्रमेण महता युक्ता मनोमारुतरंहसः ।