महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद
षट्सप्ततितमोऽध्यायः
भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद
संजय उवाच
अथ त्विदानीं तुमुले विमर्दे
द्विषद्भिरेको बहुभिः समावृतः ।
महारणे सारथिमित्युवाच
भीमश्चमूं वाहय धार्तराष्ट्रीम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! उस समय उस घमासान युद्धमें बहुत-से शत्रुओंद्धारा अकेले घिरे हुए भीमसेन महासमरमें अपने सारथिसे बोले—'सारथे! अब तुम रथको धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाकी ओर ले चलो ॥ १ ॥
त्वं सारथे याहि जवेन वाहै-
र्नयाम्येतान् धार्तराष्ट्रान् यमाय ।
संचोदितो भीमसेनेन चैवं
स सारथिः पुत्रबलं त्वदीयम् ॥ २ ॥
प्रायात् ततः सत्वरमुग्रवेगो
यतो भीमस्तद् बलं गन्तुमैच्छत् ।
ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः
प्रत्युद्ययुस्तं कुरवः समन्तात् ॥ ३ ॥
'सूत! तुम अपने वाहनोंद्वारा वेगपूर्वक आगे बढ़ो। जिससे इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको मैं यमलोक भेज सकूँ।' भीमसेनके इस प्रकार आदेश देनेपर सारथि तुरंत ही भयंकर वेगसे युक्त हो आपके पुत्रोंकी सेनाकी ओर, जिधर भीमसेन जाना चाहते थे, चल दिया। तब अन्यान्य कौरवोंने हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी विशाल सेना साथ ले सब ओरसे उनपर आक्रमण किया ॥ २-३ ॥
भीमस्य वाहाग्रयमुदारवेगं
समन्ततो बाणगणैर्निजघ्नुः ।
ततः शरानापततो महात्मा
चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ॥ ४ ॥
वे भीमसेनके अत्यन्त वेगशाली श्रेष्ठ रथपर चारों ओरसे बाणसमूहोंद्वारा प्रहार करने लगे; परंतु महामनस्वी भीमसेनने अपने ऊपर आते हुए उन बाणोंको सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४ ॥
ते वै निपेतुस्तपनीयपुङ्खा
द्विधा त्रिधा भीमशरैर्निकृत्ताः । ततो राजन् नागरथाश्वयूनां भीमाहतानां वरराजमध्ये ॥ ५ ॥ घोरो निनादः प्रबभौ नरेन्द्र वज्राहतानामिव पर्वतानाम् । वे सोनेकी पाँखवाले बाण भीमसेनके बाणोंसे दो-दो तीन-तीन टुकड़ोंमें कटकर गिर गये। राजन्! नरेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाओंकी मण्डलीमें भीमसेनके द्वारा मारे गये हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदल युवकोंका भयंकर आर्तनाद प्रकट होने लगा, मानो वज्रके मारे हुए पहाड़ फट पड़े हों ॥ ५ १/२ ॥
ते वध्यमानाश्च नरेन्द्रमुख्या निर्भिद्यन्तो भीमशरप्रवेकैः ॥ ६ ॥ भीमं समन्तात् समरेऽभ्यरोहन् वृक्षं शकुन्ता इव जातपक्षाः । जैसे जिनके पंख निकल आये हैं, वे पक्षी सब ओरसे उड़कर किसी वृक्षपर चढ़ बैठते हैं, उसी प्रकार भीमसेनके उत्तम बाणोंसे आहत और विदीर्ण होनेवाले प्रधान-प्रधान नरेश समरांगणमें सब ओरसे भीमसेनपर ही चढ़ आये ॥ ६ १/२ ॥
ततोऽभियाते तव सैन्ये स भीमः प्रादुश्चक्रे वेगमनन्तवेगः ॥ ७ ॥ यथान्तकाले क्षपयन् दिधक्षु- र्भूतान्तकृत् काल इवात्तदण्डः । आपकी सेनाके आक्रमण करनेपर अनन्त वेगशाली भीमसेनने अपना महान् वेग प्रकट किया। ठीक उसी तरह, जैसे प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाला काल हाथमें दण्ड लिये सबको नष्ट और दग्ध करनेकी इच्छासे असीम वेग प्रकट करता है ॥
तस्यातिवेगस्य रणेऽतिवेगं नाशक्नुवन् वारयितुं त्वदीयाः ॥ ८ ॥ व्यात्ताननस्यापततो यथैव कालस्य काले हरतः प्रजा वै । अत्यन्त वेगशाली भीमसेनके महान् वेगको आपके सैनिक रणभूमिमें रोक न सके। जैसे प्रलयकालमें मुँह बाकर आक्रमण करनेवाले प्रजासंहारकारी कालके वेगको कोई नहीं रोक सकता ॥ ८ १/२ ॥
ततो बलं भारत भारतानां प्रदह्यमानं समरे महात्मना ॥ ९ ॥ भीतं दिशोऽकीर्यत भीममुन्नं
महानिलेनाभ्रगणा यथैव ।
भारत! तदनन्तर समरांगणमें महामना भीमसेनके द्वारा दग्ध होती हुई कौरव-सेना भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गयी। जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार भीमसेनने आपके सैनिकोंको मार भगाया था ॥ ९१/२ ॥
ततो धीमान् सारथिमब्रवीद् बली
स भीमसेनः पुनरेव हृष्टः ॥ १० ॥
सूताभिजानीहि स्वकान् परान् वा
रथान् ध्वजांश्चापततः समेतान् ।
युद्ध्यन् ह्यहं नाभिजानामि किंचि-
न्मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये पृषत्कैः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् बलवान् और बुद्धिमान् भीमसेन हर्षसे उल्लसित हो अपने सारथिसे पुनः इस प्रकार बोले—'सूत! ये जो बहुत-से रथ और ध्वज एक साथ इधर बढ़े आ रहे हैं, उन्हें पहचानो तो सही! ये अपने पक्षके हैं या शत्रुपक्षके? क्योंकि युद्ध करते समय मुझे अपने-परायेका ज्ञान नहीं रहता, कहीं ऐसा न हो कि अपनी ही सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर डालूँ ॥ १०-११ ॥
अरीन् विशोकाभिनिरीक्ष्य सर्वतो
मनस्तु चिन्ता प्रधुनोति मे भृशम् ।
राजाऽऽतुरो नागमहद् यत् किरीटी
बहूनि दुःखान्यभियातोऽस्मि सूत ॥ १२ ॥
'विशोक! सम्पूर्ण दिशाओंमें शत्रुओंको देखकर उठी हुई चिन्ता मेरे हृदयको अत्यन्त संतप्त कर रही है; क्योंकि राजा युधिष्ठिर बाणोंके आघातसे पीड़ित हैं और किरीटधारी अर्जुन अभीतक उनका समाचार लेकर लौटे नहीं। सूत! इन सब कारणोंसे मुझे बहुत दुःख हो रहा है ॥ १२ ॥
एतद् दुःखं सारथे धर्मराजो
यन्मां हित्वा यातवान् शत्रुमध्ये ।
नैनं जीवं नाद्य जानाम्यजीवं
बीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ॥ १३ ॥
'सारथे! पहले तो इस बातका दुःख हो रहा है कि धर्मराज मुझे छोड़कर स्वयं ही शत्रुओंके बीचमें चले गये। पता नहीं, वे अबतक जीवित हैं या नहीं? अर्जुनका भी कोई समाचार नहीं मिला; इससे आज मुझे अधिक दुःख है ॥
सोऽहं द्विषत्सैन्यमुदग्रकल्पं
विनाशयिष्ये परमप्रतीतः ।
एतन्निहत्याजिमध्ये समेतं
प्रीतो भविष्यामि सह त्वयाद्य ।। १४ ।।
‘अच्छा, अब मैं अत्यन्त विश्वस्त होकर शत्रुओंकी प्रचण्ड सेनाका विनाश करूँगा।
यहाँ एकत्र हुई इस सेनाको युद्धस्थलमें नष्ट करके मैं तुम्हारे साथ ही आज प्रसन्नताका
अनुभव करूँगा ।। १४ ।।
सर्वांस्तूनान् सायकानामवेक्ष्य
किं शिष्टं स्यात् सायकानां रथे मे ।
का वा जातिः किं प्रमाणं च तेषां
ज्ञात्वा व्यक्तं तत् समाचक्ष्व सूत ।। १५ ।।
(कति वा सहस्राणि कति वा शतानि
ह्याचक्ष्व मे सारथे क्षिप्रमेव ।।
‘सूत! तुम मेरे रथपर रखे हुए बाणोंके सारे तरकसोंकी देख-भाल करके ठीक-ठीक
समझकर मुझे स्पष्टरूपसे बताओ कि अब उनमें कितने बाण अवशिष्ट रह गये हैं? किस-
किस जातिके बाण बचे हैं और उनकी संख्या कितनी है? सारथे! शीघ्र बताओ, कौन बाण
कितने हजार और कितने सौ शेष हैं?’ ।। १५ ।।
विशोक उवाच
सर्वं विदित्वैवमहं वदामि
तवार्थसिद्धिप्रदमद्य वीर ।।
कैकेयकाम्बोजसुराष्ट्रबाह्लिका
म्लेच्छाश्च सुह्माः परतङ्गणाश्च ।
मद्राश्च वङ्गा मगधाः कुलिन्दा
आनर्तकावर्तकाः पर्वतीयाः ।।
सर्वे गृहीतप्रवरायुधास्त्वां
संख्ये समावेष्ट्य ततो विनेदुः ।।)
विशोकने कहा—वीर! मैं आज सब कुछ पता लगाकर आपके मनोरथकी सिद्धि
करनेवाली बात बता रहा हूँ, कैकेय, काम्बोज, सौराष्ट्र, बाह्लिक, म्लेच्छ, सुह्म, परतंगण,
मद्र, वंग, मगध, कुलिन्द, आनर्त, आवर्त और पर्वतीय सभी योद्धा हाथोंमें श्रेष्ठ आयुध लिये
आपको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें शत्रुओंका सामना करनेके लिये गरज रहे हैं।
षण्मार्गणानामयुतानि वीर
क्षुराश्च भल्लाश्च तथायुताख्याः ।
नाराचानां द्वे सहस्रे च वीर
त्रीण्येव च प्रदराणां स्म पार्थ ।। १६ ।।
वीरवर! अभी अपने पास साठ हजार मार्गण हैं, दस-दस हजार क्षुर और भल्ल हैं, दो हजार नाराच शेष हैं तथा पार्थ! तीन हजार प्रदर बाकी रह गये हैं ।। १६ ।। अस्त्यायुधं पाण्डवेयावशिष्टं न यद् वहेच्छकटं षड्गवीयम् । एतद् विद्वन् मुञ्च सहस्रशोऽपि गदासिबाहुद्रविणं च तेऽस्ति ।। १७ ।। प्रासाश्च मुद्गराः शक्तयस्तोমরাश्च मा भैषीस्त्वं सङ्क्षयादायुधानाम् ।। १८ ।। पाण्डुनन्दन! अभी इतने आयुध शेष हैं कि छः बैलोंसे जुता हुआ छकड़ा भी उन्हें नहीं खींच सकता। विद्वन्! इन सहस्रों अस्त्रोंका आप प्रयोग कीजिये। अभी तो आपके पास बहुत-सी गदाएँ, तलवारें और बाहुबलकी सम्पत्ति हैं। इसी प्रकार बहुतेरे प्रास, मुद्गर, शक्ति और तोमर बाकी बचे हैं। आप इन आयुधोंके समाप्त हो जानेके डरमें न रहिये ।। १७-१८ ।।
भीमसेन उवाच
सूताद्यैनं पश्य भीमप्रयुक्तैः संछिन्दद्भिः पार्थिवानां सुवेगैः । छन्नं बाणैराहवं घोररूपं नष्टादित्यं मृत्युलोकेन तुल्यम् ।। १९ ।। **भीमसेन बोले—**सूत! आज इस युद्धस्थलकी ओर दृष्टिपात करो। भीमसेनके छोड़े हुए अत्यन्त वेगशाली बाणोंने राजाओंका विनाश करते हुए सारे रणक्षेत्रको आच्छादित कर दिया है, जिससे सूर्य भी अदृश्य हो गये हैं और यह भूमि यमलोकके समान भयंकर प्रतीत होती है ।। १९ ।। अद्यैतद् वै विदितं पार्थिवानां भविष्यति ह्याकुमारं च सूत । निमग्नो वा समरे भीमसेन एकः कुरून् वा समरे व्यजैषीत् ।। २० ।। सूत! आज बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक समस्त भूपालोंको यह विदित हो जायगा कि भीमसेन समरसागरमें डूब गये अथवा उन्होंने अकेले ही समस्त कौरवोंको युद्धमें जीत लिया ।। २० ।। सर्वे संख्ये कुरवो निष्पतन्तु मां वा लोकाः कीर्तयन्त्वाकुमारम् । सर्वानेकस्तानहं पातयिष्ये
ते वा सर्वे भीमसेनं तुदन्तु ॥ २१ ॥ आज युद्धस्थलमें समस्त कौरव धराशायी हो जायँ अथवा बालकोंसे लेकर वृद्धोंतक सब लोग मुझ भीमसेनको ही रणभूमिमें गिरा हुआ बतावें! मैं अकेला ही उन समस्त कौरवोंको मार गिराऊँगा अथवा वे ही सब लोग मुझ भीमसेनको पीड़ित करें ॥ २१ ॥
आशास्तारः कर्म चाप्युत्तमं ये तन्मे देवाः केवलं साधयन्तु । आयात्विहाद्यार्जुनः शत्रुघाती शक्रस्तूर्णं यज्ञ इवोपहूतः ॥ २२ ॥ जो उत्तम कर्मोंका उपदेश देनेवाले हैं, वे देवता-लोग मेरा केवल एक कार्य सिद्ध कर दें। जैसे यज्ञमें आवाहन करनेपर इन्द्रदेव तुरंत पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार शत्रुघाती अर्जुन यहाँ शीघ्र ही आ पहुँचे ॥ २२ ॥
(पश्यस्व पश्यस्व विशोक मे त्वं बलं परेषामभिघातभिन्नम् । नानास्वरान् पश्य विमुच्य सर्वे तथा द्रवन्ते बलिनो धार्तराष्ट्राः ॥) विशोक! देखो, देखो, मेरा बल। मेरे आघातोंसे शत्रुओंकी सेना विदीर्ण हो उठी है। देखो, धृतराष्ट्रके सभी बलवान् पुत्र नाना प्रकारके आर्तनाद करते हुए भागने लगे हैं।
ईक्षस्वैतां भारतीं दीर्यमाणा- मेते कस्माद् विद्रवन्ते नरेन्द्राः । व्यक्तं धीमान् सव्यसाची नराग्र्यः सैन्यं ह्येतच्छादयत्याशु बाणैः ॥ २३ ॥ सारथे! इस कौरव-सेनापर तो दृष्टिपात करो। इसमें भी दरार पड़ती जा रही है। ये राजालोग क्यों भाग रहे हैं? इससे तो स्पष्ट जान पड़ता है कि बुद्धिमान् नरश्रेष्ठ अर्जुन आ गये। वे ही अपने बाणोंद्वारा शीघ्रता-पूर्वक इस सेनाको आच्छादित कर रहे हैं ॥ २३ ॥
पश्य ध्वजांश्च द्रवतो विशोक नागान् हयान् पत्तिसंघांश्च संख्ये । रथान् विर्कीर्णान् शरशक्तिताडितान् पश्यस्वैतान् रथिनश्चैव सूत ॥ २४ ॥ विशोक! युद्धस्थलमें भागते हुए रथोंकी ध्वजाओं, हाथियों, घोड़ों और पैदलसमूहोंको देखो। सूत! बाणों और शक्तियोंसे प्रताड़ित होकर बिखरे पड़े हुए इन रथों और रथियोंपर भी दृष्टिपात करो ॥ २४ ॥
आपूर्यते कौरवी चाप्यभीक्ष्णं सेना ह्यसौ सुभृशं हन्यमाना ।
धनंजयस्याशनितुल्यवेगै-
र्ग्रस्ता शरैः काञ्चनबर्हिबाजैः ॥ २५ ॥
अर्जुनके बाण वज्रके समान वेगशाली हैं। उनमें सोने और मयूरपिच्छके पंख लगे हैं। उन बाणोंद्वारा आक्रान्त हुई यह कौरव-सेना अत्यन्त मार पड़नेके कारण बारंबार आर्तनाद कर रही है ॥ २५ ॥
एते द्रवन्ति स्म रथाश्वनागाः
पदातिसङ्घानतिमर्दयन्तः ।
सम्मुह्यमानाः कौरवाः सर्व एव
द्रवन्ति नागा इव दाहभीताः ॥ २६ ॥
ये रथ, घोड़े और हाथी पैदलसमूहोंको कुचलते हुए भागे जा रहे हैं। प्रायः सभी कौरव अचेत-से होकर दावानलके दाहसे डरे हुए हाथियोंके समान पलायन कर रहे हैं ॥ २६ ॥
हाहाकृताश्चैव रणे विशोक
मुञ्चन्ति नादान् विपुलान् गजेन्द्राः ॥ २७ ॥
विशोक! रणभूमिमें सब ओर हाहाकार मचा हुआ है। बहुसंख्यक गजराज बड़े जोर-जोरसे चीत्कार कर रहे हैं ॥ २७ ॥
विशोक उवाच
किं भीम नैनं त्वमिहाशृणोषि
विस्फारितं गाण्डिवस्यातिघोरम् ।
क्रुद्धेन पार्थेन विकृष्यतोऽद्य
कच्चिन्नेमौ तव कर्णौ विनष्टौ ॥ २८ ॥
विशोकने कहा— भीमसेन! क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके द्वारा खींचे जाते हुए गाण्डीव धनुषकी यह अत्यन्त भयंकर टंकार क्या आज आपको सुनायी नहीं दे रही है? आपके ये दोनों कान बहरे तो नहीं हो गये हैं? ॥ २८ ॥
सर्वे कामाः पाण्डव ते समृद्धाः
कपिर्ह्यसौ दृश्यते हस्तिसैन्ये ।
नीलाद् घनाद् विद्युतमुच्चरन्तीं
तथा पश्य विस्फुरन्तीं धनुर्ज्याम् ॥ २९ ॥
पाण्डुनन्दन! आपकी सारी कामनाएँ सफल हुईं। हाथियोंकी सेनामें अर्जुनके रथकी ध्वजाका वह वानर दिखायी दे रहा है। काले मेघसे प्रकट होनेवाली बिजलीके समान चमकती हुई गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचाको देखिये ॥
कपिर्ह्यसौ वीक्षते सर्वतो वै
ध्वजाग्रमारुह्य धनंजयस्य ।
वित्रासयन् रिपुसंघान् विमर्दे
बिभेम्यस्मादात्मनैवाभिवीक्ष्य ॥ ३० ॥
अर्जुनकी ध्वजाके अग्रभागपर आरूढ़ हो वह वानर सब ओर देखता और युद्धस्थलमें शत्रुसमूहोंको भयभीत करता है। मैं स्वयं भी देखकर उससे डर रहा हूँ ॥ ३० ॥
विभ्राजते चातिमात्रं किरीटं
विचित्रमेतच्च धनंजयस्य ।
दिवाकराभो मणिरेष दिव्यो
विभ्राजते चैव किरीटसंस्थः ॥ ३१ ॥
धनंजयका यह विचित्र मुकुट अत्यन्त प्रकाशित हो रहा है। इस मुकुटमें लगी हुई यह दिव्य मणि दिवाकरके समान देदीप्यमान होती है ॥ ३१ ॥
पार्श्वे भीमं पाण्डराभ्रप्रकाशं
पश्यस्व शङ्खं देवदत्तं सुघोषम् ।
अभीषुहस्तस्य जनार्दनस्य
विगाहमानस्य चमूं परेषाम् ॥ ३२ ॥
रविप्रभं वज्रनाभं क्षुरान्तं
पार्श्वे स्थितं पश्य जनार्दनस्य ।
चक्रं यशोवर्धनं केशवस्य
सदार्चितं यदुभिः पश्य वीर ॥ ३३ ॥
वीर! अर्जुनके पार्श्वभागमें श्वेत बादलके समान प्रकाशित होनेवाला और गम्भीर घोष करनेवाला देवदत्त नामक भयानक शंख रखा हुआ है, उसपर दृष्टिपात कीजिये। साथ ही हाथोंमें घोड़ोंकी बागडोर लिये शत्रुओंकी सेनामें घुसे जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णकी बगलमें सूर्यके समान प्रकाशमान चक्र विद्यमान है, जिसकी नाभिमें वज्र और किनारेके भागोंमें छुरे लगे हुए हैं। भगवान् केशवका वह चक्र उनका यश बढ़ानेवाला है। सम्पूर्ण यदुवंशी सदा उसकी पूजा करते हैं। आप उस चक्रको भी देखिये ॥ ३२-३३ ॥
महाद्विपानां सरलद्रुमोपमाः
करा निकृत्ताः प्रपतन्त्यमी क्षुरैः ।
किरीटिना तेन पुनः ससादिनः
शरैर्निकृत्ताः कुलिशैरिवाद्रयः ॥ ३४ ॥
अर्जुनके क्षुरनामक बाणोंसे कटे हुए ये बड़े-बड़े हाथियोंके शुण्डदण्ड देवदारुके समान गिर रहे हैं। फिर उन्हीं किरीटीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान वे हाथी सवारोंसहित धराशायी हो रहे हैं ॥ ३४ ॥
तथैव कृष्णस्य च पाञ्चजन्यं
महार्हमेतं द्विजराजवर्णम् ।
कौन्तेय पश्योरसि कौस्तुभं च जाज्वल्यमानं विजयां स्रजं च ॥ ३५ ॥ कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णके इस बहुमूल्य पांचजन्य शंखको जो चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण है, देखिये। साथ ही उनके वक्षःस्थलपर अपनी प्रभासे प्रज्वलित होनेवाली कौस्तुभमणि तथा वैजयन्ती मालापर भी दृष्टिपात कीजिये ॥ ३५ ॥
ध्रुवं रथाग्रयः समुपैति पार्थो विद्रावयन् सैन्यमिदं परेषाम् । सिताभ्रवर्णैरसितप्रयुक्तै- र्हयैर्महार्है रथिनां वरिष्ठः ॥ ३६ ॥ निश्चय ही रथियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन अर्जुन शत्रुओंकी सेनाको खदेड़ते हुए इधर ही आ रहे हैं। सफेद बादलोंके समान श्वेत कान्तिवाले उनके महामूल्यवान् अश्व श्यामसुन्दर श्रीकृष्णद्वारा संचालित हो रहे हैं ॥ ३६ ॥
रथान् हयान् पत्तिगणांश्च सायकै- र्विदारितान् पश्य पतन्त्यमी यथा । तवानुजेनामरराजतेजसा महावनानीव सुपर्णवायुना ॥ ३७ ॥ देखिये, जैसे गरुड़के पंखसे उठी हुई वायुके द्वारा बड़े-बड़े जंगल धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार देवराज इन्द्रके तुल्य तेजस्वी आपके छोटे भाई अर्जुन बाणोंद्वारा शत्रुओंके रथों, घोड़ों और पैदलसमूहोंको विदीर्ण कर रहे हैं और वे सब-के-सब पृथ्वीपर गिरते जा रहे हैं ॥ ३७ ॥
चतुःशतान् पश्य रथानिमान् हतान् सवाजिसूतान् समरे किरीटिना । महेषुभिः सप्तशतानि दन्तिनां पदातिसादींश्च रथाननेककः ॥ ३८ ॥ वह देखिये, किरीटधारी अर्जुनने समरांगणमें सारथि और घोड़ोंसहित इन चार सौ रथियोंको मार डाला तथा अपने विशाल बाणोंद्वारा सात सौ हाथियों, बहुत-से पैदलों, घुड़सवारों और अनेकानेक रथोंका संहार कर डाला ॥
अयं समभ्येति तवान्तिकं बली निघ्नन् कुरूंश्चित्र इव ग्रहोऽर्जुनः । समृद्धकामोऽसि हतास्तवाहिता बलं तवायुश्च चिराय वर्धताम् ॥ ३९ ॥ विचित्र ग्रहके समान ये बलवान् अर्जुन कौरवोंका संहार करते हुए आपके निकट आ रहे हैं। अब आपकी कामना सफल हुई। आपके शत्रु मारे गये। इस समय चिरकालके लिये
आपका बल और आयु बढ़े ॥ ३९ ॥
भीमसेन उवाच
ददानि ते ग्रामवरांश्चतुर्दश
प्रियाख्याने सारथे सुप्रसन्नः ।
दासीशतं चापि रथांश्च विंशतिं
यदर्जुनं वेदयसे विशोक ॥ ४० ॥
भीमसेनने कहा—विशोक! तुम अर्जुनके आनेका समाचार सुना रहे हो। सारथे! इस प्रिय संवादसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; अतः मैं तुम्हें चौदह बड़े-बड़े गाँवकी जागीर देता हूँ। साथ ही सौ दासियाँ तथा बीस रथ तुम्हें पारितोषिक रूपमें प्राप्त होंगे ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि भीमसेनविशोकसंवादे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें भीमसेन और विशोकका संवादविषयक छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2208)
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कौरव-सेनाका संहार तथा भीमसेनसे शकुनिकी पराजय एवं दुर्योधनादि धृतराष्ट्रपुत्रोंका सेनासहित भागकर कर्णका आश्रय लेना
संजय उवाच
श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं सिंहनादं च संयुगे ।
अर्जुनः प्राह गोविन्दं शीघ्रं नोदय वाजिनः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! उधर युद्धस्थलमें शत्रुओंके रथोंकी घर्घराहट और सिंहनाद सुनकर अर्जुनने श्रीकृष्णसे कह—'प्रभो! घोड़ोंको जल्दी-जल्दी हाँकिये' ॥ १ ॥
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा गोविन्दोऽर्जुनमब्रवीत् ।
एष गच्छामि सुक्षिप्रं यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ २ ॥
अर्जुनकी बात सुनकर श्रीकृष्णने उनसे कहा—'यह लो, मैं बहुत जल्दी उस स्थानपर जा पहुँचता हूँ, जहाँ भीमसेन खड़े हैं' ॥ २ ॥
तं यान्तमश्वैर्हिमशङ्खवर्णैः
सुवर्णमुक्तामणिजालनद्धैः ।
जम्भं जिघांसुं प्रगृहीतवज्रं
जयाय देवेन्द्रमिवोग्रमन्युम् ॥ ३ ॥
रथाश्वमातङ्गपदातिसंघा
बाणस्वनैर्नेमिखुरस्वनैश्च
संनादयन्तो वसुधां दिशश्च
क्रुद्धा नृसिंहा जयमभ्युदीयुः ॥ ४ ॥
जैसे देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर जम्भासुरको मार डालनेकी इच्छासे मनमें भयानक क्रोध भरकर चले थे, उसी प्रकार अर्जुन भी शत्रुओंको जीतनेके लिये भयंकर क्रोधसे युक्त हो सुवर्ण, मुक्ता और मणियोंके जालसे आबद्ध हुए हिम और शंखके समान श्वेत कान्तिवाले अश्वोंद्वारा यात्रा कर रहे थे। उस समय क्रोधमें भरे हुए शत्रुपक्षके पुरुषसिंह वीर, रथी, घुड़सवार, हाथीसवार और पैदलोंके समूह अपने बाणोंकी सनसनाहट, पहियोंकी घर्घराहट तथा टापोंके टप-टपकी आवाजसे सम्पूर्ण दिशाओं और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ३-४ ॥
तेषां च पार्थस्य च मारिषासीद्
देहासुपापक्षपणं सुयुद्धम् ।
त्रैलोक्यहेतोरसुरैर्यथाऽऽसीद् देवस्य विष्णोर्जयतां वरस्य ।। ५ ।। मान्यवर! फिर तो त्रिलोकीके राज्यके लिये जैसे असुरोंके साथ भगवान् विष्णुका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार अर्जुनका उन योद्धाओंके साथ घोर संग्राम होने लगा जो उनके शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाला था ।। ५ ।।
तैरस्तमुच्चावचमायुधं त- देकः प्रचिच्छेद किरीटमाली । क्षुरार्धचन्द्रैर्निशितैश्च भल्लैः शिरांसि तेषां बहुधा च बाहून् ।। ६ ।। छत्राणि वालव्यजनानि केतू- नश्वान् रथान् पत्तिगणान् द्विपांश्च । ते पेतुरुर्व्यां बहुधा विरूपा वातप्रणुन्नानि यथा वनानि ।। ७ ।। उनके चलाये हुए छोटे-बड़े सभी अस्त्र-शस्त्रोंको अकेले किरीटमाली अर्जुनने छुर, अर्धचन्द्र तथा तीखे भल्लोंसे काट डाला। साथ ही उनके मस्तकों, भुजाओं, छत्रों, चवरों, ध्वजाओं, अश्वों, रथों, पैदलसमूहों तथा हाथियोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे सब अनेक टुकड़ोंमें बँटकर विरूप हो आँधीके उखाड़े हुए वनोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ६-७ ।।
सुवर्णजालाववता महागजाः सवैजयन्तीध्वजयोधकल्पिताः । सुवर्णपुङ्खैरिषुभिः समाचिता- श्चकाशिरे प्रज्वलिता यथाचलाः ।। ८ ।। सोनेकी जालियोंसे आच्छादित, वैजयन्ती ध्वजासे सुशोभित तथा योद्धाओंद्धारा सुसज्जित किये हुए बड़े-बड़े हाथी सुवर्णमय पंखवाले बाणोंसे व्याप्त हो प्रज्वलित पर्वतोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ८ ।।
विदार्य नागांश्चरथान् धनंजयः शरोत्तमैर्वासववज्रसंनिभैः । द्रुतं ययौ कर्णजिघांसया तथा यथा मरुत्वान् बलभेदने पुरा ।। ९ ।। जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने बलासुरका विनाश करनेके लिये बड़े वेगसे यात्रा की थी, उसी प्रकार अर्जुन कर्णको मार डालनेकी इच्छासे इन्द्रके वज्रसदृश उत्तम बाणोंद्वारा शत्रुओंके हाथी, घोड़ों और रथोंको विदीर्ण करते हुए शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़े ।। ९ ।।
ततः स पुरुषव्याघ्रस्तव सैन्यमरिंदमः । प्रविवेश महाबाहुर्मकरः सागरं यथा ।। १० ।।
तदनन्तर जैसे मगर समुद्रमें घुस जाता है, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह महाबाहु अर्जुनने आपकी सेनाके भीतर प्रवेश किया ॥ १० ॥
तं हृष्टास्तावका राजन् रथपत्तिसमन्विताः ।
गजाश्वसादिबहुलाः पाण्डवं समुपाद्रवन् ॥ ११ ॥
राजन्! उस समय हर्षमें भरे हुए आपके रथियों और पैदलोंसहित हाथीसवार तथा घुड़सवार सैनिक जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, पाण्डुपुत्र अर्जुनपर टूट पड़े ॥ ११ ॥
तेषामापततां पार्थमारावः सुमहानभूत् ।
सागरस्येव क्षुब्धस्य यथा स्यात् सलिलस्वनः ॥ १२ ॥
पार्थपर आक्रमण करते हुए उन सैनिकोंका महान् कोलाहल विक्षुब्ध समुद्रके जलकी गम्भीर ध्वनिके समान सब ओर गूँज उठा ॥ १२ ॥
ते तु तं पुरुषव्याघ्रं व्याघ्रा इव महारथाः ।
अभ्यद्रवन्त संग्रामे त्यक्त्वा प्राणकृतं भयम् ॥ १३ ॥
वे महारथी संग्राममें प्राणोंका भय छोड़कर बाघके समान पुरुषसिंह अर्जुनकी ओर दौड़े ॥ १३ ॥
तेषामापततां तत्र शरवर्षाणि मुञ्चताम् ।
अर्जुनो व्यधमत् सैन्यं महावातो घनानिव ॥ १४ ॥
परंतु जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने बाणोंकी वर्षापूर्वक आक्रमण करनेवाले उन समस्त योद्धाओंका संहार कर डाला ॥ १४ ॥
तेऽर्जुनं सहिता भूत्वा रथवंशैः प्रहारिणः ।
अभियाय महेष्वासा विव्यधुर्निशितैः शरैः ॥ १५ ॥
तब वे महाधनुर्धर योद्धा संगठित हो रथसमूहोंके साथ चढ़ाई करके अर्जुनको तीखे बाणोंसे घायल करने लगे ॥ १५ ॥
(शक्तिभिस्तोमरैः प्रासैः कुणपैः कूटमुद्गरैः ।
शूलैस्त्रिशूलैः परिघैः भिन्दिपालैः परश्वधैः ॥
करवालैर्हेमदण्डैर्यष्टिभिर्मुसलैर्हलैः ।
प्रहृष्टाश्चक्रिरे पार्थं समन्ताद् गूढमायुधैः ॥)
उन हर्षभरे योद्धाओंने शक्ति, तोमर, प्रास, कुणप, कूट, मुद्गर, शूल, त्रिशूल, परिघ, भिन्दिपाल, परशु, खड्ग, हेमदण्ड, डंडे, मुसल और हल आदि आयुधोंद्वारा अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया।
ततोऽर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् ।
प्रेषयामास विशिखैर्यमस्य सदनं प्रति ॥ १६ ॥
तब अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके सहस्रों रथों, हाथियों और घोड़ोंको यमलोक भेजना आरम्भ किया ॥ १६ ॥
ते वध्यमानाः समरे पार्थचापच्युतैः शरैः । तत्र तत्र स्म लीयन्ते भये जाते महारथाः ॥ १७ ॥ अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए कौरव-महारथी भयके मारे इधर-उधर छिपने लगे ॥ १७ ॥
तेषां चतुःशतान् वीरान् यतमानान् महारथान् । अर्जुनो निशितैर्बाणैरनयद् यमसादनम् ॥ १८ ॥ उनमेंसे चार सौ वीर महारथी यत्नपूर्वक लड़ते रहे, जिन्हें अर्जुनने अपने पैने बाणोंसे यमलोक पहुँचा दिया ॥ १८ ॥
ते वध्यमानाः समरे नानालिङ्गैः शितैः शरैः । अर्जुनं समभित्यज्य दुद्रुवुर्वै दिशो दश ॥ १९ ॥ संग्राममें नाना प्रकारके चिह्नोंसे युक्त तीखे बाणोंकी मार खाकर वे सैनिक अर्जुनको छोड़कर दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ १९ ॥
तेषां शब्दो महानासीद् द्रवतां वाहिनीमुखे । महौघस्येव जलधेर्गिरिमासाद्य दीर्यतः ॥ २० ॥ युद्धके मुहानेपर भागते हुए उन योद्धाओंका महान् कोलाहल वैसा ही जान पड़ता था, जैसा कि समुद्रके महान् जलप्रवाहके पर्वतसे टकरानेपर होता है ॥ २० ॥
तां तु सेनां भृशं विद्ध्वा द्रावयित्वाऽर्जुनः शरैः । प्रायादभिमुखः पार्थः सूतानीकं हि मारिष ॥ २१ ॥ मान्यवर नरेश! उस सेनाको अपने बाणोंसे अत्यन्त घायल करके भगा देनेके पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुन कर्णकी सेनाके सामने चले ॥ २१ ॥
तस्य शब्दो महानासीत् परानभिमुखस्य वै । गरुडस्येव पततः पन्नगार्थे यथा पुरा ॥ २२ ॥ शत्रुओंकी ओर उन्मुख हुए उनके रथका महान् शब्द वैसा ही प्रतीत होता था, जैसा कि पहले किसी सर्पको पकड़नेके लिये झपटते हुए गरुड़के पंखसे प्रकट हुआ था ॥ २२ ॥
तं तु शब्दमभिश्रुत्य भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतः पार्थदर्शनलालसः ॥ २३ ॥ उस शब्दको सुनकर महाबली भीमसेन अर्जुनके दर्शनकी लालसासे बड़े प्रसन्न हुए ॥ २३ ॥
श्रुत्वैव पार्थमायान्तं भीमसेनः प्रतापवान् । त्यक्त्वा प्राणान् महाराज सेनां तव ममर्द ह ॥ २४ ॥ महाराज! पार्थका आना सुनते ही प्रतापी भीमसेन प्राणोंका मोह छोड़कर आपकी सेनाका मर्दन करने लगे ॥
स वायुवीर्यप्रतिमो वायुवेगसमो जवे ।
वायुवद् व्यचरद् भीमो वायुपुत्रः प्रतापवान् ॥ २५ ॥ प्रतापी वायुपुत्र भीमसेन वायुके समान वेगशाली थे। बल और पराक्रममें भी वायुकी ही समानता रखते थे। वे उस रणभूमिमें वायुके समान विचरण करने लगे ॥ २५ ॥ तेनार्द्यमाना राजेन्द्र सेना तव विशाम्पते । व्यभ्रश्यत महाराज भिन्ना नौरिव सागरे ॥ २६ ॥ महाराज! प्रजानाथ! राजेन्द्र! उनसे पीड़ित हुई आपकी सेना समुद्रमें टूटी हुई नावके समान पथभ्रष्ट होने लगी ॥ २६ ॥ तां तु सेनां तदा भीमो दर्शयन् पाणिलाघवम् । शरैरवचकर्तोग्रैः प्रेषयिष्यन् यमक्षयम् ॥ २७ ॥ उस समय भीमसेन अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए आपकी उस सेनाको यमलोक भेजनेके लिये भयंकर बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न करने लगे ॥ २७ ॥ तत्र भारत भीमस्य बलं दृष्ट्वातिमानुषम् । व्यभ्रमन्त रणे योधाः कालस्येव युगक्षये ॥ २८ ॥ भारत! उस समय प्रलयकालीन कालके समान भीमसेनके अलौकिक बलको देखकर रणभूमिमें सारे योद्धा इधर-उधर भटकने लगे ॥ २८ ॥ तथार्दितान् भीमबलान् भीमसेनेन भारत । दृष्ट्वा दुर्योधनो राजा इदं वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ भरतनन्दन! भयंकर बलशाली अपने सैनिकोंको भीमसेनके द्वारा इस प्रकार पीड़ित देखकर राजा दुर्योधनने उनसे निम्नांकित वचन कहा ॥ २९ ॥ सैनिकांश्च महेष्वासान् योधांश्च भरतर्षभ । समादिशन् रणे सर्वान् हत भीममिति स्म ह ॥ ३० ॥ भरतश्रेष्ठ! उसने अपने महाधनुर्धर समस्त सैनिकों और योद्धाओंको रणभूमिमें इस प्रकार आदेश देते हुए कहा—'तुम सब लोग मिलकर भीमसेनको मार डालो ॥ तस्मिन् हते हतं मन्ये पाण्डुसैन्यमशेषतः । प्रतिगृह्य च तामाज्ञां तव पुत्रस्य पार्थिवाः ॥ ३१ ॥ भीमं प्रच्छादयामासुः शरवर्षैः समन्ततः । 'उनके मारे जानेपर मैं सारी पाण्डव-सेनाको मरी हुई ही मानता हूँ।' आपके पुत्रकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके समस्त राजाओंने चारों ओरसे बाण-वर्षा करके भीमसेनको ढक दिया ॥ ३१ १/२ ॥ गजांश्च बहुला राजन् नरांश्च जयगृद्धिनः ॥ ३२ ॥ रथे स्थितांश्च राजेन्द्र परिवव्रुर्वृकोदरम् । राजन्! राजेन्द्र! बहुत-से हाथियों, विजयाभिलाषी पैदल मनुष्यों तथा रथियोंने भी भीमसेनको घेर लिया था ॥
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो राजन् समन्ततः ॥ ३३ ॥ शुशुभे भरतश्रेष्ठो नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । नरेश्वर! उन शूरवीरोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए शौर्यसम्पन्न भरतश्रेष्ठ भीम नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे ॥ ३३ ½ ॥ परिवेषी यथा सोमः परिपूर्णो विराजते ॥ ३४ ॥ स रराज तथा संख्ये दर्शनीयो नरोत्तमः । निर्विशेषो महाराज यथा हि विजयस्तथा ॥ ३५ ॥ जैसे घेरेसे घिरे हुए पूर्णिमाके चन्द्रमा प्रकाशित होते हों, उसी प्रकार युद्धस्थलमें दर्शनीय नरश्रेष्ठ भीमसेन शोभा पा रहे थे। महाराज! वे अर्जुनके समान ही प्रतीत होते थे। उनमें और अर्जुनमें कोई अन्तर नहीं रह गया था ॥ ३४-३५ ॥ तस्य ते पार्थिवाः सर्वे शरवृष्टिं समासृजन् । क्रोधरक्तेक्षणाः शूरा हन्तुकामा वृकोदरम् ॥ ३६ ॥ तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें किये वे समस्त शूरवीर भूपाल भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३६ ॥ तां विदार्य महासेनां शरैः संनतपर्वभिः । निष्चक्राम रणाद् भीमो मत्स्यो जालादिवाम्भसि ॥ ३७ ॥ यह देख भीमसेन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे उस विशाल सेनाको विदीर्ण करके उसी प्रकार उसके घेरेसे बाहर निकल आये, जैसे कोई-कोई मत्स्य पानीमें डाले हुए जालको छेदकर बाहर निकल जाता है ॥ ३७ ॥ हत्वा दशसहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । नृणां शतसहस्रे द्वे द्वे शते चैव भारत ॥ ३८ ॥ पञ्च चाश्वसहस्राणि रथानां शतमेव च । हत्वा प्रास्यन्दयद् भीमो नदीं शोणितवाहिनीम् ॥ ३९ ॥ भारत! युद्धसे पीछे न हटनेवाले दस हजार गजराजों, दो लाख और दो सौ पैदल मनुष्यों, पाँच हजार घोड़ों और सौ रथोंको नष्ट करके भीमसेनने वहाँ रक्तकी नदी बहा दी ॥ ३८-३९ ॥ शोणितोदां रथावर्तां हस्तिग्राहसमाकुलाम् । नरमीनाश्वनक्रान्तां केशशैवलशाद्वलाम् ॥ ४० ॥ संछिन्नभुजनागेन्द्रां बहुरत्नापहारिणीम् । ऊरुग्राहां मज्जपङ्कां शीर्षोपलसमावृताम् ॥ ४१ ॥ धनुष्काशां शरावापां गदापरिघपन्नगाम् । हंसच्छत्रध्वजोपेतामुष्णीषवरफेनिलाम् ॥ ४२ ॥ हारपद्माकरां चैव भूमिर्रेणूर्मिमालिनीम् ।
आर्यवृत्तवतां संख्ये सुतरां भीरुदुस्तराम् ॥ ४३ ॥ योधग्राहवतीं संख्ये वहन्तीं यमसादनम् । क्षणेन पुरुषव्याघ्रः प्रावर्तयत निम्नगाम् ॥ ४४ ॥ यथा वैतरणीमुग्रां दुस्तरामकृतात्मभिः । तथा दुस्तरणीं घोरां भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ ४५ ॥ रक्त ही उस नदीका जल था, रथ भँवरके समान जान पड़ते थे, हाथीरूपी ग्राहोंसे वह नदी भरी हुई थी, मनुष्य, मत्स्य और घोड़े नाकोंके समान जान पड़ते थे, सिरके बाल उसमें सेवार और घासके समान थे। कटी हुई भुजाएँ बड़े-बड़े सर्पोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं। वह बहुत-से रत्नोंको बहाये लिये जाती थी। उसके भीतर पड़ी हुई जाँघें ग्राहोंके समान जान पड़ती थीं। मज्जा पंकका काम देती थी, मस्तक पत्थरके टुकड़ोंके समान वहाँ छा रहे थे, धनुष किनारे उगे हुए कासके समान जान पड़ते थे। बाण ही वहाँके अंकुर थे, गदा और परिघ सर्पोंके समान प्रतीत होते थे। छत्र और ध्वज उसमें हंसके सदृश दिखायी पड़ते थे। पगड़ी फेनका भ्रम उत्पन्न करती थी। हार कमलवनके समान प्रतीत होते थे। धरतीकी धूल तरंगमाला बनकर शोभा दे रही थी। योद्धा ग्राह आदि जलजन्तुओं-से प्रतीत होते थे। युद्धस्थलमें बहनेवाली वह रक्तनदी यमलोककी ओर जा रही थी, वैतरणीके समान वह सदाचारी पुरुषोंके लिये सुगमतासे पार होनेयोग्य और कायरोंके लिये दुस्तर थी। पुरुषसिंह भीमसेनने क्षणभरमें वैतरणीके समान भयंकर रक्तकी नदी बहा दी थी। वह अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुस्तर, घोर एवं भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ ४०—४५ ॥ यतो यतः पाण्डवेयः प्रविष्टो रथसत्तमः । ततस्ततोऽघातयत योधन् शतसहस्रशः ॥ ४६ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन भीमसेन जिस-जिस ओर घुसते, उसी ओर लाखों योद्धाओंका संहार कर डालते थे ॥ ४६ ॥ एवं दृष्ट्वा कृतं कर्म भीमसेनेन संयुगे । दुर्योधनो महाराज शकुनिं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४७ ॥ महाराज! युद्धस्थलमें भीमसेनके द्वारा किये गये ऐसे कर्मको देखकर दुर्योधनने शकुनिसे कहा— ॥ ४७ ॥ जहि मातुल संग्रामे भीमसेनं महाबलम् । अस्मिन् जिते जितं मन्ये पाण्डवेयं महाबलम् ॥ ४८ ॥ ‘मामाजी! आप संग्राममें महाबली भीमसेनको मार डालिये। यदि इनको जीत लिया गया तो मैं समझूँगा कि पाण्डवोंकी विशाल सेना ही जीत ली गयी’ ॥ ४८ ॥ ततः प्रयान्महाराज सौबलेयः प्रतापवान् । रणाय महते युक्तो भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ४९ ॥ स समासाद्य संग्रामे भीमं भीमपराक्रमम् ।
वारयामास तं वीरो वेलेव मकरालयम् ॥ ५० ॥ महाराज! तब भाइयोंसे घिरा हुआ प्रतापी सुबलपुत्र शकुनि महान् युद्धके लिये उद्यत हो आगे बढ़ा। संग्राममें भयानक पराक्रमी भीमसेनके पास पहुँचकर उस वीरने उन्हें उसी तरह रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है ॥ ४९-५० ॥ संन्यवर्तत तं भीमो वार्यमाणः शितैः शरैः । शकुनिस्तस्य राजेन्द्र वामपार्श्वे स्तनान्तरे ॥ ५१ ॥ प्रेषयामास नाराचान् रुक्मपुङ्खान् शिलाशितान् । राजेन्द्र! उसके तीखे बाणोंसे रोके जाते हुए भीमसेन उसीकी ओर लौट पड़े! उस समय शकुनिने उनकी बायीं पसली और छातीमें सोनेके पंखवाले और शिलापर तेज किये हुए कई नाराच मारे ॥ ५१ १/२ ॥ वर्म भित्त्वा तु ते घोराः पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ५२ ॥ न्यमज्जन्त महाराज कङ्कबर्हिणवाससः । महाराज! कंक और मयूरके पंखवाले वे भयंकर नाराच महामनस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनका कवच छेदकर उनके शरीरमें डूब गये ॥ ५२ १/२ ॥ सोऽतिविद्धो रणे भीमः शरं रुक्मविभूषितम् ॥ ५३ ॥ प्रेषयामास स रुषा सौबलं प्रति भारत । भारत! तब रणभूमिमें अत्यन्त घायल हुए भीमसेनने कुपित हो शकुनिकी ओर एक सुवर्णभूषित बाण चलाया ॥ ५३ १/२ ॥ तमायान्तं शरं घोरं शकुनिः शत्रुतापनः ॥ ५४ ॥ चिच्छेद सप्तधा राजन् कृतहस्तो महाबलः । राजन्! शत्रुओंको संताप देनेवाला महाबली शकुनि सिद्धहस्त था। उसने अपनी ओर आते हुए उस भयंकर बाणके सात टुकड़े कर डाले ॥ ५४ १/२ ॥ तस्मिन् निपतिते भूमौ भीमः क्रुद्धो विशाम्पते ॥ ५५ ॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन सौबलस्य हसन्निव । राजन्! उस बाणके धराशायी हो जानेपर भीमसेनने क्रोधपूर्वक हँसते हुए-से एक भल्ल मारकर शकुनिके धनुषको काट दिया ॥ ५५ १/२ ॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं सौबलेयः प्रतापवान् ॥ ५६ ॥ अन्यदादाय वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश । प्रतापी सुबलपुत्र शकुनिने उस कटे हुए धनुषको फेंककर बड़े वेगसे दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा सोलह भल्ल चलाये ॥ ५६ १/२ ॥ तैस्तस्य तु महाराज भल्लैः संततपर्वभिः ॥ ५७ ॥ द्वाभ्यां स सारथिं ह्यार्च्छद् भीमं सप्तभिरेव च ।
महाराज! झुकी हुई गाँठवाले उन भल्लोंमेंसे दोके द्वारा शकुनिने भीमसेनके सारथिको और सातसे स्वयं भीमसेनको भी घायल कर दिया ॥ ५७१/२ ॥
ध्वजमेकेन चिच्छेद द्वाभ्यां छत्रं विशाम्पते ॥ ५८ ॥
चतुर्भिश्चतुरो वाहान् विव्याध सुबलात्मजः ।
प्रजानाथ! फिर सुबलपुत्रने एक बाणसे ध्वजको, दो बाणोंसे छत्रको और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥ ५८१/२ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः प्रतापवान् ॥ ५९ ॥
शक्तिं चिक्षेप समरे रुक्मदण्डामयस्मयीम् ।
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने समरांगणमें शकुनिपर सुवर्णमय दण्डवाली एक लोहेकी शक्ति चलायी ॥ ५९१/२ ॥
सा भीमभुजनिर्मुक्ता नागजिह्वेव चञ्चला ॥ ६० ॥
निपपात रणे तूर्णं सौबलस्य महात्मनः ।
भीमसेनके हाथोंसे छूटी हुई सर्पकी जिह्वाके समान वह चंचल शक्ति रणभूमिमें तुरंत ही महामना शकुनिपर जा पड़ी ॥ ६०१/२ ॥
ततस्तामेव संगृह्य शक्तिं कनकभूषणाम् ॥ ६१ ॥
भीमसेनाय चिक्षेप क्रुद्धरूपो विशाम्पते ।
राजन्! क्रोधमें भरे हुए शकुनिने उस सुवर्णभूषित शक्तिको हाथसे पकड़ लिया और उसीको भीमसेनपर दे मारा ॥ ६११/२ ॥
सा निर्भिद्य भुजं सव्यं पाण्डवस्य महात्मनः ॥ ६२ ॥
निपपात तदा भूमौ यथा विद्युन्नभश्च्युता ।
आकाशसे गिरी हुई बिजलीके समान वह शक्ति महामनस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनकी बायीं भुजाको विदीर्ण करके तत्काल भूमिपर गिर पड़ी ॥ ६२१/२ ॥
अथोत्कृष्टं महाराज धार्तराष्ट्रैः समन्ततः ॥ ६३ ॥
न तु तं ममृषे भीमः सिंहनादं तरस्विनाम् ।
महाराज! यह देखकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंने चारों ओरसे गर्जना की; परंतु भीमसेन उन वेगशाली वीरोंका वह सिंहनाद नहीं सह सके ॥ ६३१/२ ॥
अन्यद् गृह्य धनुः सज्यं त्वरमाणो महाबलः ॥ ६४ ॥
मुहूर्तादिव राजेन्द्र छादयामास सायकैः ।
सौबलस्य बलं संख्ये त्यक्त्वाऽऽत्मानं महाबलः ॥ ६५ ॥
राजेन्द्र! महाबली भीमने बड़ी उतावलीके साथ दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी और युद्धमें अपने जीवनका मोह छोड़कर सुबलपुत्रकी सेनाको उसी समय बाणोंद्वारा ढक दिया ॥ ६४-६५ ॥
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सूतं चैव विशाम्पते । ध्वजं चिच्छेद भल्लेन त्वरमाणः पराक्रमी ।। ६६ ।। प्रजानाथ! पराक्रमी भीमसेनने फुर्ती दिखाते हुए शकुनिके चारों घोड़ों और सारथिको मारकर एक भल्लके द्वारा उसके ध्वजको भी काट दिया ।। ६६ ।।
हताश्वं रथमुत्सृज्य त्वरमाणो नरोत्तमः । तस्थौ विस्फारयंश्चापं क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् ।। ६७ ।। उस समय नरश्रेष्ठ शकुनि उस अश्वहीन रथको छोड़कर क्रोधसे लाल आँखें किये लंबी साँस खींचता और धनुषकी टंकार करता हुआ तुरंत भूमिपर खड़ा हो गया ।। ६७ ।।
शरैश्च बहुधा राजन् भीममार्च्छत् समन्ततः । प्रतिहत्य तु वेगेन भीमसेनः प्रतापवान् ।। ६८ ।। धनुश्चिच्छेद संक्रुद्धो विव्याध च शितैः शरैः । राजन्! उसने अपने बाणोंद्वारा भीमसेनपर सब ओरसे बारंबार प्रहार किया, किंतु प्रतापी भीमसेनने बड़े वेगसे उसके बाणोंको नष्ट करके अत्यन्त कुपित हो उसका धनुष काट डाला और पैने बाणोंसे उसे घायल कर दिया ।। ६८ १/२ ।।
सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुकर्शनः ।। ६९ ।। निपपात तदा भूमौ किंचित्प्राणो नराधिपः । बलवान् शत्रुके द्वारा अत्यन्त घायल किया हुआ शत्रुसूदन राजा शकुनि तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसमें जीवनका कुछ-कुछ लक्षण शेष था ।। ६९ १/२ ।।
ततस्तं विह्वलं ज्ञात्वा पुत्रस्तव विशाम्पते ।। ७० ।। अपोवाह रथेनाजौ भीमसेनस्य पश्यतः । प्रजानाथ! उसे विह्वल जानकर आपका पुत्र दुर्योधन रणभूमिमें रथके द्वारा भीमसेनके देखते-देखते अन्यत्र हटा ले गया ।। ७० १/२ ।।
रथस्थे तु नरव्याघ्रे धार्तराष्ट्राः पराङ्मुखाः ।। ७१ ।। प्रदुद्रुवुर्दिशो भीता भीमाज्जाते महाभये । पुरुषसिंह भीमसेन रथपर ही बैठे रहे। उनसे महान् भय प्राप्त होनेके कारण धृतराष्ट्रके सभी पुत्र युद्धसे मुँह मोड़, डरकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। ७१ १/२ ।।
सौबले निर्जिते राजन् भीमसेनेन धन्विना ।। ७२ ।। भयेन महताऽऽविष्टः पुत्रो दुर्योधनस्तव । अपायाज्जवनैरश्वैः सापेक्षो मातुलं प्रति ।। ७३ ।। राजन्! धनुर्धर भीमसेनके द्वारा शकुनिके परास्त हो जानेपर आपके पुत्र दुर्योधनको बड़ा भय हुआ। वह मामाके जीवनकी रक्षा चाहता हुआ वेगशाली घोड़ोंद्वारा वहाँसे भाग निकला ।। ७२-७३ ।।
पराङ्मुखं तु राजानं दृष्ट्वा सैन्यानि भारत ।