भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2214, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2214

आर्यवृत्तवतां संख्ये सुतरां भीरुदुस्तराम् ॥ ४३ ॥ योधग्राहवतीं संख्ये वहन्तीं यमसादनम् । क्षणेन पुरुषव्याघ्रः प्रावर्तयत निम्नगाम् ॥ ४४ ॥ यथा वैतरणीमुग्रां दुस्तरामकृतात्मभिः । तथा दुस्तरणीं घोरां भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ ४५ ॥ रक्त ही उस नदीका जल था, रथ भँवरके समान जान पड़ते थे, हाथीरूपी ग्राहोंसे वह नदी भरी हुई थी, मनुष्य, मत्स्य और घोड़े नाकोंके समान जान पड़ते थे, सिरके बाल उसमें सेवार और घासके समान थे। कटी हुई भुजाएँ बड़े-बड़े सर्पोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं। वह बहुत-से रत्नोंको बहाये लिये जाती थी। उसके भीतर पड़ी हुई जाँघें ग्राहोंके समान जान पड़ती थीं। मज्जा पंकका काम देती थी, मस्तक पत्थरके टुकड़ोंके समान वहाँ छा रहे थे, धनुष किनारे उगे हुए कासके समान जान पड़ते थे। बाण ही वहाँके अंकुर थे, गदा और परिघ सर्पोंके समान प्रतीत होते थे। छत्र और ध्वज उसमें हंसके सदृश दिखायी पड़ते थे। पगड़ी फेनका भ्रम उत्पन्न करती थी। हार कमलवनके समान प्रतीत होते थे। धरतीकी धूल तरंगमाला बनकर शोभा दे रही थी। योद्धा ग्राह आदि जलजन्तुओं-से प्रतीत होते थे। युद्धस्थलमें बहनेवाली वह रक्तनदी यमलोककी ओर जा रही थी, वैतरणीके समान वह सदाचारी पुरुषोंके लिये सुगमतासे पार होनेयोग्य और कायरोंके लिये दुस्तर थी। पुरुषसिंह भीमसेनने क्षणभरमें वैतरणीके समान भयंकर रक्तकी नदी बहा दी थी। वह अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुस्तर, घोर एवं भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ ४०—४५ ॥ यतो यतः पाण्डवेयः प्रविष्टो रथसत्तमः । ततस्ततोऽघातयत योधन् शतसहस्रशः ॥ ४६ ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्डुनन्दन भीमसेन जिस-जिस ओर घुसते, उसी ओर लाखों योद्धाओंका संहार कर डालते थे ॥ ४६ ॥ एवं दृष्ट्वा कृतं कर्म भीमसेनेन संयुगे । दुर्योधनो महाराज शकुनिं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४७ ॥ महाराज! युद्धस्थलमें भीमसेनके द्वारा किये गये ऐसे कर्मको देखकर दुर्योधनने शकुनिसे कहा— ॥ ४७ ॥ जहि मातुल संग्रामे भीमसेनं महाबलम् । अस्मिन् जिते जितं मन्ये पाण्डवेयं महाबलम् ॥ ४८ ॥ ‘मामाजी! आप संग्राममें महाबली भीमसेनको मार डालिये। यदि इनको जीत लिया गया तो मैं समझूँगा कि पाण्डवोंकी विशाल सेना ही जीत ली गयी’ ॥ ४८ ॥ ततः प्रयान्महाराज सौबलेयः प्रतापवान् । रणाय महते युक्तो भ्रातृभिः परिवारितः ॥ ४९ ॥ स समासाद्य संग्रामे भीमं भीमपराक्रमम् ।

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