महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2213, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तैः परिवृतः शूरैः शूरो राजन् समन्ततः ॥ ३३ ॥ शुशुभे भरतश्रेष्ठो नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः । नरेश्वर! उन शूरवीरोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए शौर्यसम्पन्न भरतश्रेष्ठ भीम नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे ॥ ३३ ½ ॥ परिवेषी यथा सोमः परिपूर्णो विराजते ॥ ३४ ॥ स रराज तथा संख्ये दर्शनीयो नरोत्तमः । निर्विशेषो महाराज यथा हि विजयस्तथा ॥ ३५ ॥ जैसे घेरेसे घिरे हुए पूर्णिमाके चन्द्रमा प्रकाशित होते हों, उसी प्रकार युद्धस्थलमें दर्शनीय नरश्रेष्ठ भीमसेन शोभा पा रहे थे। महाराज! वे अर्जुनके समान ही प्रतीत होते थे। उनमें और अर्जुनमें कोई अन्तर नहीं रह गया था ॥ ३४-३५ ॥ तस्य ते पार्थिवाः सर्वे शरवृष्टिं समासृजन् । क्रोधरक्तेक्षणाः शूरा हन्तुकामा वृकोदरम् ॥ ३६ ॥ तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें किये वे समस्त शूरवीर भूपाल भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३६ ॥ तां विदार्य महासेनां शरैः संनतपर्वभिः । निष्चक्राम रणाद् भीमो मत्स्यो जालादिवाम्भसि ॥ ३७ ॥ यह देख भीमसेन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे उस विशाल सेनाको विदीर्ण करके उसी प्रकार उसके घेरेसे बाहर निकल आये, जैसे कोई-कोई मत्स्य पानीमें डाले हुए जालको छेदकर बाहर निकल जाता है ॥ ३७ ॥ हत्वा दशसहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम् । नृणां शतसहस्रे द्वे द्वे शते चैव भारत ॥ ३८ ॥ पञ्च चाश्वसहस्राणि रथानां शतमेव च । हत्वा प्रास्यन्दयद् भीमो नदीं शोणितवाहिनीम् ॥ ३९ ॥ भारत! युद्धसे पीछे न हटनेवाले दस हजार गजराजों, दो लाख और दो सौ पैदल मनुष्यों, पाँच हजार घोड़ों और सौ रथोंको नष्ट करके भीमसेनने वहाँ रक्तकी नदी बहा दी ॥ ३८-३९ ॥ शोणितोदां रथावर्तां हस्तिग्राहसमाकुलाम् । नरमीनाश्वनक्रान्तां केशशैवलशाद्वलाम् ॥ ४० ॥ संछिन्नभुजनागेन्द्रां बहुरत्नापहारिणीम् । ऊरुग्राहां मज्जपङ्कां शीर्षोपलसमावृताम् ॥ ४१ ॥ धनुष्काशां शरावापां गदापरिघपन्नगाम् । हंसच्छत्रध्वजोपेतामुष्णीषवरफेनिलाम् ॥ ४२ ॥ हारपद्माकरां चैव भूमिर्रेणूर्मिमालिनीम् ।